पार्षद अन्तर्नियम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। Write a short note on the Articles of Association.

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पार्षद अन्तर्नियम का अर्थ एवं परिभाष Meaning and Definition of Articles of Association)

कम्पनी के समामेलन के लिए रजिस्ट्रार के कार्यालय में भेजे गये प्रलेखों में दूसरा महत्वपूर्ण प्रपत्र पार्षद अन्तर्नियम है। पार्षद अन्तर्नियमों का आशय उस प्रलेख से है जिससे कम्पनी को सुचा रूप से चलाने एवं पार्षद सीमानियम के अनुसार उद्देश्यित कार्यों की पूर्ति हेतु बनाये गये नियमों तक उपनियमों का स्पष्ट उल्लेख होता है।

कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 2 (5) के अनुसार- “पार्षद अन्तर्नियम से आशय कम्पनी के उन अन्तर्नियमों से है जो पिछले कम्पनी अधिनियमों अथवा इस अधिनियम के अधीन मूल रूप से बनाये गये हो अथवा उनको समय-समय पर परिवर्तित किया गया हो।”

लाई चान्सलर केयर्न्स के अनुसार, “अन्तर्नियम सम्पूर्ण कम्पनी तथा संचालक मण्डल के आपसी अधिकारों, कर्तव्यों, शक्तियों को परिभाषित करते हैं तथा उस रीति एवं प्रारूप को निर्धारित करते है जिसके अनुसार कम्पनी के व्यवसाय का संचालन किया जाता है तथा उस रीति एवं प्रारूप को परिभाषित किया जाता है जिसके अनुसार समय-समय पर कम्पनी के आन्तरिक संचालन में परिवर्तन किये जा सकें।”

न्यायाधीश बोदेन के अनुसार-अन्तनियम कम्पनी के अन्तरिम नियम है। वास्तव में इस प्रलेख में पार्षद सीमानियम के अधीन उद्देश्यों एवं कार्यों की पूर्ति के लिए तथा कम्पनी के सुचारू संचालन हेतु बनाये गये नियमों तथा उपनियमों का उल्लेख होता है। ”

न्यायाधीश चार्ल्स वर्य के अनुसार, “पार्षद अन्तर्नियम एक ऐसा प्रलेख है जो कम्पनी के सदस्यों के आपसी अधिकारों एवं उन रीतियों का नियमन करता है जिसके अनुसार कम्पनी का व्यापार चलाया जायेगा।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि “पार्षद अन्तर्नियम कम्पनी के पार्षद सीमानियम के अधीन बनाये गये नियम एवं उपनियम है जिनसे कम्पनी के आन्तरिक मामलों को नियन्त्रित एवं नियमित किया जाता है।”

ये अन्तर्नियम छपे होने चाहिए, पैराग्राफों में विभाजित होने चाहिए एवं पार्षद सीमानियम के हस्ताक्षरकर्ताओं के इन पर भी हस्ताक्षर होने चाहिए। इसके अतिरिक्त इन पर पर्याप्त मुद्रांक (stamps) भी होना चाहिए।

पार्षद अन्तर्नियमों के लक्षण अथवा विशेषताएँ (Characteristics of Features of Articles of Association)

पार्षद अन्तर्नियम की परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर इसके निम्न प्रमुख लक्षण प्रकट होते हैं–

1. पार्षद अन्तर्नियम, कम्पनी अधिनियम एवं पार्षद सीमानियम दोनों के अधीन होता है।

2. यह कम्पनी का दूसरा महत्वपूर्ण प्रलेख है जिसे कम्पनी के समामेलन के समय रजिस्ट्रार के कार्यालय में जमा करना पड़ता है।

3. इसमें पार्षद सीमानियम में उल्लिखित उद्देश्यों को प्राप्त करने एवं कम्पनी की आन्तरिक प्रबन्ध व्यवस्था को चलाने के लिए नियमों, विनियमों तथा उपनियमों का समावेश होता है।

4. पार्षद सीमानियम की भाँति पार्षद अन्तर्नियम भी कम्पनी का एक सार्वजनिक प्रलेख (Public Document) माना जाता है जो जनता के निरीक्षण एवं अध्ययन हेतु सदैव उपलब्ध रहता है।

5. यह कम्पनी के सदस्यों तथा संचालक मण्डल के पारस्परिक सम्बन्धों, अधिकारों, कर्तव्यों एवं दायित्वों को परिभाषित करता है।

6. यह एक परिवर्तनीय प्रलेख है जिसे पार्षद सीमानियम की सीमाओं के अन्तर्गत अनेक बार परिवर्तित किया जा सकता है।

7. यह मुद्रित, हस्ताक्षरित तथा अनुच्छेदों में विभाजित होता है।

8. अंशों द्वारा सीमित सार्वजनिक कम्पनी के लिए पार्षद अन्तर्नियम बनाना एवं रजिस्ट्रार के यहाँ फाइल करना अनिवार्य नहीं है। इसके अभाव में वह कम्पनी अधिनियम की प्रथम अनुसूची की वाली ‘एफ’ को अन्तर्नियमों के रूप में स्वीकार कर सकती है।

9. प्रत्येक गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी, असीमित दायित्व वाली कम्पनी तथा निजी कम्पनी के लिए पार्षद अन्तर्नियम तैयार करना एवं उसे रजिस्ट्रार के पास फाइल करना अनिवार्य है।

10, कम्पनी के अधिकारियों के अधिकारों, कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों की व्याख्या करता है।

पार्षद अन्तर्नियमों की आवश्यकता अथवा महत्व (Need or Importance of Articles of Association)

सीमानियम के पश्चात् अन्तर्नियम कम्पनी का दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रलेख है जिसे समामेलन हैतु रजिस्ट्रार के पास प्रस्तुत करना होता है। इन अन्तर्नियमों में कम्पनी आन्तरिक प्रबन्ध व्यवस्था है संचालन से सम्बन्धित नियमों का उल्लेख होता है। अन्तर्नियमों के महत्व को निम्नलिखित विन्दु के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है–

(1) रजिस्ट्रेशन हेतु आवश्यक (Essential for Registration) – असीमित दायित्व पनी निजी कम्पनी तथा गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी के रजिस्ट्रेशन के लिए अन्तर्नियम तैयार नाव रजिस्ट्रार के पास प्रस्तुत करना अनिवार्य है। किन्तु अंशों द्वारा सीमित दायित्व वाली कम्प लिए नियम तैयार करना अनिवार्य नहीं है। इसके अभाव में ‘सारणी अ’ में दिये गये निय लागू होंगे।

(2) उद्देश्य प्राप्ति में सहायक (Helpful in achieving object) एक कम्पनी के उद्देश्यों उल्लेख पार्षद सीमानियम में किया जाता है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु प्रयुक्त साधनों, विधियों क रीतियों का उल्लेख कम्पनी के अन्तर्नियमों में किया जाता है। इस प्रकार अन्तर्नियम कम्पनी के उद्देश्य प्राप्ति सहायक होते हैं।

(3) आन्तरिक प्रबन्ध संचालन में सहायक (Helpful in Internal Administration) अन्तर्जियम कम्पनी के प्रबन्ध संचालन में सहायक होते हैं। वास्तव में, अन्तर्नियमों में ही कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्ध व्यवस्था से सम्बन्धित नियमों व उपनियमों का उल्लेख होता है। इससे आन्तरिक प्रबन्ध संचालन में सुविधा रहती है।

(4) पारस्परिक समझौता (Mutual Agreement)-पार्षद अन्तर्नियम कम्पनी व सदस्यों के मध्य व्हराव है जो दोनों पक्षकारों को परस्पर बाध्य करता है।

(5) क्रियाओं का नियमन (Regulation of Activities)- कम्पनी अधिनियम के अनेक प्रावधानों के अनुसार एक कम्पनी अनेक कार्य तभी कर सकती है, जबकि अन्तर्नियमों द्वारा उसे कार्य करने का अधिकार मिला हुआ हो। इससे स्पष्ट है कि अन्तर्नियम एक सीमा तक कम्पनी की क्रियाओं का नियमन करते हैं।

(6) सार्वजनिक प्रलेख (Public Document)-पार्षद अन्तर्नियम एक सार्वजनिक प्रलेख है यह मान लिया जाता है कि कम्पनी के साथ व्यवहार करने वाले प्रत्येक पक्षकार को इस प्रलेख के समुचित जानकारी है।

(7) व्यावसायिक क्षमता में सहायक-अन्तर्नियम कम्पनी का सार्वजनिक प्रलेख होने के साथ-साथ व्यावसायिक प्रलेख भी है, एवं इसकी परिभाषा इस प्रकार से की जाती है कि उस कम्पनी को उचित व्यवसायिक क्षमता प्राप्त करने में सहायता मिल सके।

पार्षद अन्तर्नियमों का प्रारूप (Form of Articles of Association)

कम्पनी अधिनियम 2013 की अनुसूची-प्रथम की सारणी F से J तक में विभिन्न कम्पनि के पार्षद अन्तर्नियमों के प्रारूप निर्धारित किये गये हैं जो निम्न प्रकार हैं–

(1) साली पुन (Table T”)- अंशों द्वारा सीमित सार्वजनिक कम्पनी के लिए।

(2) नाटणी ‘G’ (Table ‘G’)-अंश-पूँजी सहित गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी के लि प्रारूप है।

(3) सारणी ‘H’ (Table ‘H’)-अंश-पूँजी रहित गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी के लि प्रारूप है।

(4) सारणी ‘T’ (Table ‘T’)-अंश पूँजी वाली असीमित कम्पनियों के लिए प्रारूप है।

(5) सारणी ‘J’ (Table’J’)- बिना अंश पूँजी वाली असीमित कम्पनियों के लिए प्रारूप है।

कोई भी कम्पनी अपने लिए निर्धारित प्रारूपों के अन्तर्जियमों में से कुछ या सभी अन्तनियम को अपना सकती है।

पार्षद अन्तर्नियमों की विषय-सामग्री (Subject-Matter of Articles of Association)

सामान्यतः कम्पनी के अन्तर्नियमों में उन सब विषयों के सम्बन्ध में नियमों तथा उपनियमों का समावेश किया जाता है जो कि कम्पनी विधान की प्रथम सूची की सारणी ‘अ’ में दिया हुआ है। प्रायः सभी कम्पनियाँ अपने अन्तर्नियमों में कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्ध एवं संचालन के लिए जिन विषयों के सम्बन्ध में नियमों तथा उपनियमों की व्यवस्था करती हैं वे निम्नवत् हैं —

(1) सारणी ‘अ’ के कौन-कौन से नियमन लागू होंगे।

(2) प्रारम्भिक समझौते की स्वीकृति की व्यवस्था ।

(3) अंश-पूँजी का विभिन्न अंशों में विभाजन, अंश-हस्तान्तरण, अंश-अपहरण, पूँजी में परिवर्तन तथा सदस्यों के मताधिकार।

(4) अंशों के आवंटन की विधि।

(5) न्यूनतम अभिदान राशि का निर्धारण ।

(6) अंश प्रमाण-पत्र तथा अंश अधिपत्र निर्गमन की विधि।

(7) अंशों पर याचनायें, याचना की विधि तथा दो याचनाओं के बीच समयान्तर

(8) अंश-पूँजी में वृद्धि, कमी तथा पुनर्गठन की विधि।

(9) अभिगोपन कमीशन का भुगतान।

(10) अंशों एवं ऋणपत्रों पर कमीशन व दलाली का भुगतान।

(11) अंशों का एकाकीकरण तथा उपविभाजन

(12) कम्पनी की सामान्य सभाओं की विधि, सूचना, न्यूनतम कार्यवाहक संख्या, स्वगर प्रतिपुरुष तथा मतदान एवं सभापति सम्बन्धी नियम

(13) संचालकों की संख्या, नियुक्ति योग्यताएँ, पारिश्रमिक।

(14) कम्पनी की लेखा पुस्तकें तथा उनके रखने की विधि।

(15) सदस्यों को सूचना देने की विधि।

(16) लाभों का पूंजीकरण

(17) अंकेक्षकों की नियुक्ति तथा उनका पारिश्रमिक निर्धारण ।

(18) संचालक, सचिव तथा मैनेजर की नियुक्ति सम्बन्धी व्यवस्था।

(19) संचालक मण्डल के अधिकार।

(20) कम्पनी की सार्वमुद्रा का प्रयोग

(21) कम्पनी के समापन सम्बन्धी विशेष व्यवस्था ।

(22) अंशों के हरण की विधि।

(23) ऋण लेने की विधि।

(24) ऋण लेने के अधिकार एवं सीमा।

उपरोक्त विषयों के अतिरिक्त कम्पनी अधिनियम की विभिन्न धाराओं में ऐसे प्रावधान है कि कम्पनी कुछ महत्वपूर्ण अधिकारों का प्रयोग तब तक नहीं कर सकती है जब तक कि कम्पनी के अन्तर्नियमों द्वारा उन अधिकारों के प्रयोग करने की व्यवस्था अधिकृत नहीं है।

पार्षद अन्तर्नियमों में परिवर्तन (Alteration in Articles of Association)

कम्पनी अधिनियम की व्यवस्थाओं तथा पार्षद सीमानियम की शर्तों के अधीन एक विशेष प्रस्ताव पारित करके कम्पनी के अन्तर्नियमों में परिवर्तन किया जा सकता है। अन्तर्नियमों में किये गये परिवर्तनों को वैध माना जायेगा। यदि एक पब्लिक कम्पनी अपने अन्तर्नियमों को इस प्रकार परिवर्तित करती है कि वह लोक कम्पनी के स्थान पर निजी कम्पनी हो जाये, तो ऐसे परिवर्तन के लिए केन्द्रीय सरकार की सहमति प्राप्त करना आवश्यक है और इसकी एक प्रति एक माह के अन्दर रजिस्ट्रार को भेजनी चाहिए। अन्तर्नियमों में परिवर्तन कम्पनी अधिनियम एवं पार्षद सीमानियम के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। कम्पनी के अन्तर्नियमों में परिवर्तन पर कुछ प्रतिबन्ध लगाये गये है न्यायाधीशों के निर्णयों पर आधारित है। ये प्रतिबन्ध निम्नलिखित हैं

(I) वैधानिक प्रतिबन्ध (Statutory Restrictions)

अन्तर्जियमों में परिवर्तन करते समय निम्न वैधानिक प्रतिबन्धों को ध्यान में रखना चाहिए–

(1) कम्पनी अधिनियम के अधीन अन्तर्जियमों में किया जाने वाला प्रत्येक परिवर्तन कम्पन अधिनियम के प्रावधानों के अधीन होना चाहिए। साथ ही कोई भी परिवर्तन ऐसा नहीं होना चाहिए ज कम्पनी अधिनियम द्वारा वर्जित किसी कार्य को करने की अनुमति देता है।

(2) पार्षद सीमानियम की शर्तों के अधीन अन्तर्नियमों में परिवर्तन पार्षद सीमानियम की शर्तों के अधीन होना चाहिए तथा अन्तर्नियमों की शर्तों का भी उल्लंघन नहीं होना चाहिए। साथ ही अन्तर्नियमों में परिवर्तन से पार्षद सीमानियम में दिये गये उद्देश्यों तथा कार्य क्षेत्र की सीमाओं का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

(3) विशेष प्रस्ताव- अन्तर्नियम में किये जाने वाले प्रत्येक प्रकार के परिवर्तन के लिए विशेष प्रस्ताव पारित करना आवश्यक होता है। अन्तर्नियमों में विद्यमान मामूली त्रुटियों में सुधार हेतु भी में विशेष प्रस्ताव पारित करना होता है।

(4) निजी कम्पनी में परिवर्तित होने पर यदि अन्तर्नियमों में इस प्रकार का परिवर्तन कर दिया जाता है जिससे एक सार्वजनिक कम्पनी को एक निजी कम्पनी में परिवर्तित करना पड़े तो यह परिवर्तन केन्द्रीय सरकार की सहमति प्राप्त करने पर ही प्रभावशाली होगा।

(5) दायित्व बढ़ने पर लिखित सहमति-यदि अन्तर्नियमों में कोई इस प्रकार का परिवर्तन किया जाना है कि उससे सदस्यों का दायत्वि बढ़ जाता है, तो यह परिवर्तन सदस्यों की लिखित सहमति प्राप्त करने एवं कम्पनी का असीमित दायित्व वाली कम्पनी के रूप में पुनः पंजीयन कराने पर प्रभावशील हो सकेगा।

(6) संचालकों में परिवर्तन पर केन्द्रीय सरकार की सहमति-यदि पब्लिक कम्पनी में कोई परिवर्तन प्रबन्ध संचालक या संचालक की नियुक्ति या पुनः नियुक्ति के सम्बन्ध में, या एक संचालक के पारिश्रमिक के बढ़ाने के सम्बन्ध में हो, तो उसके लिए केन्द्रीय सरकार की सहमति प्राप्त करना आवश्यक होगा।

(7) अधिकरण के आदेश के अनुरूप परिवर्तन अधिकरण कम्पनी में हो रहे अन्याय एवं कुप्रबन्ध को रोकने हेतु कम्पनी को अपने अन्तर्नियमों में परिवर्तन करने का आदेश दे सकता है। ऐसे में उस कम्पनी को अधिकरण के आदेशों या निर्देशों के अनुरूप ही अपने अन्तर्नियमों में परिवर्तन करना होता है।

(8) अन्तर्नियमों का पंजीयन-अन्तर्नियमों में किया गया प्रत्येक परिवर्तन तभी प्रभावी होता है जबकि उसका रजिस्ट्रार द्वारा पंजीयन कर लिया गया हो। अतः परिवर्तन को प्रभावी बनाने हेतु नये अन्तर्नियमों का पंजीयन कराना अनिवार्य है।

(II) न्यायिक प्रतिबन्ध (Judicial Restrictions)

कम्पनी के अन्तर्नियम में न्यायित प्रतिबन्धों में निम्नलिखित को सम्मिलित किया जा सकता है–

(1) परिवर्तन अवैधानिक न हो कम्पनी के अन्तर्नियम में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं होना चाहिए जो कि अधिनियम के अन्तर्गत वैधानिक न हो।

(2) कम्पनी के लाभार्थ परिवर्तन होना-कम्पनी के अन्तर्नियम में परिवर्तन सद्भावनापूर्ण एवं कम्पनी के लाभार्थ किया जाना चाहिए। यदि व्यक्तिगत लाभ के लिए ऐसे परिवर्तन किये जायें तो वह सर्वथा व्यर्थ होंगे।

(3) न्यायसंगत परिवर्तन-अन्तर्नियम में परिवर्तन नहीं किया जा सकता जो न्यायसंगत नहीं है। यदि बहुसंख्यक अंशधारी अल्पसंख्यक अंशधारियों के अंशों को क्रय करने सम्बन्धी प्रस्ताव पारित कर लें तो वह न्यायसंगत नहीं माना जायेगा।

(4) तृतीय पक्ष के साथ अनुबन्ध का खण्डन न होना-कम्पनी के अन्तर्नियम में परिवर्तन इस प्रकार नहीं होना चाहिए कि उस कम्पनी को तृतीय पक्ष के साथ अनुबन्ध खण्डित करने का अधिकार प्राप्त हो सके। यदि अन्तर्नियमों में परिवर्तन के कारण किसी पक्षकार के साथ हुआ अनुबन्ध भंग होता है तो कम्पनी उस व्यक्ति को क्षतिपूर्ति देने के लिए बाध्य होगी।

(5) परिवर्तन से किसी सदस्य का निष्कासन नहीं होना चाहिए-अन्तर्नियमों में परिवर्तन ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे कम्पनी के संचालक मण्डल को किसी भी सदस्य को हटाने या निकालने का अधिकार प्राप्त हो। यदि ऐसा कोई भी परिवर्तन किया जाता है तो प्रभावी नहीं होगा।

(6) सद्भावनापूर्ण परिवर्तन होना-कम्पनी के अन्तर्नियमों में परिवर्तन सद्भावना के स किया जाना चाहिए और उससे किसी भी अंशधारी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।

(7) अवैध व्यापार की आज्ञा देने वाला नहीं हो-अन्तर्नियम में परिवर्तन इस प्रकार नहीं हो चाहिए कि उसके परिणामस्वरूप कम्पनी को अवैध व्यापार करने की आज्ञा प्राप्त हो जाए |

(8) सभी परिवर्तन भूतकालीन तिथि से प्रभावी नहीं हो सकते-अन्तर्नियमों में किये परिवर्तन से सदस्य ठीक उसी तरह बाध्य होते हैं मानो ये परिवर्तन कम्पनी के अन्तर्नियमों में प्रारंभ से ही विद्यमान थे। किन्तु इसका आशय यह नहीं है सभी परिवर्तित अन्तर्नियमों का प्रभाव भूतकालर तिथि से हो जायेगा।

(III) अन्य प्रतिबन्ध (Other Restrictions)

अन्य प्रतिबन्धों में निम्नलिखित को सम्मिलित किया जाता है–

(1) परिवर्तित अन्तर्नियमों की प्रतिलिपि सदस्यों को देना-एक कम्पनी के सदस्य द्वारा प्रार्थन किये जाने पर तथा एक रुपया शुल्क प्रतिलिपि के लिए जमा कर देने पर कम्पनी आवेदन के सा दिन के अन्दर परिवर्तित अन्तर्नियमों की प्रतिलिपि उस सदस्य के पास भेज देगी।

(2) परिवर्तन के पश्चात् निर्गमित प्रत्येक प्रतिलिपि के अनुसार होनी चाहिए-जब अन्तर्निय में परिवर्तन कर दिया जाता है तो परिवर्तन की तारीख के बाद जो भी इसकी प्रतिलिपि निर्गमित क जाती है वह परिवर्तन के अनुसार होनी चाहिए। यदि कम्पनी प्रतिलिपियों को परिवर्तन के अनुसा नहीं भेजती है तो कम्पनी और कम्पनी के प्रत्येक अधिकारी पर, जो इसका दोषी है, प्रत्येक ऐ निर्गमित प्रतिलिपि के लिए ₹ 100 तक आर्थिक दण्ड लगाया जा सकता है।


Meaning and Definition of Articles of Association

The second important form in the documents sent to the Registrar’s office for the amalgamation of the company is the Articles of Association. Councilor’s Articles mean the document from which the bye-laws are clearly mentioned up to the rules made for the smooth running of the company and the fulfillment of the objectives as per the Councilor’s Memorandum of Understanding.

According to section 2(5) of the Companies Act 2013- “Articles of Councilors” means those articles of the company which have been originally made or modified from time to time under the previous Companies Acts or this Act.

According to Lai Chancellor Cairns, “The Articles define the mutual rights, duties, powers of the entire company and the Board of Directors and lay down the manner and form in which the business of the company is to be conducted and the manner and form of the According to which changes may be made in the internal operations of the company from time to time.

According to Judge Bowden, the provisional rule is the interim rule of the company. In fact, in this document, the rules and bye-laws made for the fulfillment of the objectives and functions under the councilor’s memorandum and for the smooth operation of the company are mentioned. ,

According to Judge Charles Wray, “The Articles of Council are a document that regulates the mutual rights of the members of the company and the manner in which the business of the company shall be carried on.”

It is clear from the above definitions that “The Articles of Councilors are the rules and bye-laws made under the Councilor Memorandum of the Company by which the internal affairs of the company are controlled and regularised.”

These Articles should be printed, divided into paragraphs and signed by the signatories of the Councilor Memorandum. Apart from this, they should also have adequate stamps.

Characteristics of Features of Articles of Association

On analyzing the definitions of the Articles of Association, the following main features appear:-

1. The Councilor’s Article is subject to both the Companies Act and the Councilor’s Memorandum of Understanding.

2. This is the second important document of the company which has to be submitted to the Registrar’s office at the time of amalgamation of the company.

3. It consists of rules, regulations and bye-laws to achieve the objectives mentioned in the Councilor Memorandum and to run the internal management system of the company.

4. Like the Councilor’s Memorandum, the Councilor’s Article is also considered a public document of the company, which is always available for the inspection and study of the public.

5. It defines the mutual relations, rights, duties and responsibilities of the members of the company and the board of directors.

6. It is a convertible document which can be changed multiple times within the limits of the Councilor’s Memorandum.

7. It is printed, signed and divided into paragraphs.

8. It is not mandatory for a public company limited by shares to make an Articles of Association and file it with the Registrar. In the absence of this, it can accept ‘F’ of the First Schedule of the Companies Act as Articles.

9. It is mandatory for every company limited by guarantee, company with unlimited liability and private company to prepare the Articles of Association and file it with the Registrar.

10, explains the rights, duties and responsibilities of the officers of the company.

Need or Importance of Articles of Association

After the memorandum, the memorandum is the second important document of the company which has to be presented to the Registrar for amalgamation. In these articles, the rules related to the company’s internal management system are mentioned. The importance of the Articles can be clarified under the following points-

(1) Essential for Registration – It is mandatory to submit the Articles prepared for the registration of a private company and limited company by guarantee to the boat registrar. But it is not mandatory to frame rules for a company having limited liability by shares. In the absence of this, the rules given in ‘Table A’ will apply.

(2) Helpful in achieving object The objectives of a company are mentioned in the Councilor’s Seemaanium. The means and methods of methods used for the attainment of these objectives are mentioned in the Articles of the Company. Thus Articles are helpful in achieving the objectives of the company.

(3) Helpful in Internal Management Operations Intergium is helpful in the management operation of the company. In fact, in the Articles itself, the rules and bye-laws related to the internal management system of the company are mentioned. This facilitates internal management operations.

(4) Mutual Agreement – The Articles of Association between the company and the members bind both the parties to each other.

(5) Regulation of Activities – According to many provisions of the Companies Act, a company can do many things only if it has the right to act by the Articles.

be mixed It is clear from this that the Articles of Association regulate the activities of the company to a certain extent.

(6) Public Document – The Councilor’s Article is a public document that assumes that every party dealing with the company has proper knowledge of this document.

(7) Subsidiary-Articles in business capacity is a public document of the company as well as a business document, and is defined in such a way as to assist that company in attaining reasonable business capacity.

Form of Articles of Association

In the Table F to J of Schedule-I of the Companies Act 2013, the drafts of the Articles of Association of various companies have been prescribed which are as follows-

(1) Sister-in-law (Table T”)- for a public company limited by shares.

(2) Declaration ‘G’ (Table ‘G’) is the form for a company limited by guarantee with share capital.

(3) Table ‘H’ (Table ‘H’) is the format for a company limited by guarantee without equity.

(4) Table ‘T’ is the format for unlimited number of companies with share capital.

(5) Table ‘J’ is the format for unlimited companies without share capital.

Any company may adopt some or all of the Articles of Association of the forms prescribed for it.

Subject-Matter of Articles of Association

Generally, in the Articles of the Company, rules and bye-laws are included in respect of all those matters which are given in Table ‘A’ of the First List of the Companies Legislation. Almost all the companies in their Articles provide for the rules and bye-laws for the internal management and operation of the company, in respect of which the rules and bye-laws are as follows –

(1) Which regulations of Table ‘A’ will be applicable.

(2) Arrangement for acceptance of preliminary agreement.

(3) Division of share-capital into different shares, share-transfer, share-forfeiture, change in capital and voting rights of the members.

(4) Method of allotment of shares.

(5) Fixation of minimum subscription amount.

(6) Method of issue of share certificate and share warrant.

(7) Calls on shares, method of solicitation and time difference between two solicitations

(8) Method of increase, decrease and restructuring of share capital.

(9) Payment of underwriting commission.

(10) Payment of commission and brokerage on shares and debentures.

(11) Integration and subdivision of shares

(12) Law of general meetings of the company, information, minimum number of caretakers, self-respect and rules regarding voting and chairman

(13) Number of directors, appointment qualifications, remuneration.

(14) The books of account of the company and the method of their maintenance.

(15) The method of giving notice to the members.

(16) Capitalization of profits

(17) Appointment of auditors and fixation of their remuneration.

(18) Arrangement for the appointment of director, secretary and manager.

(19) Powers of the Board of Directors.

(20) Use of the company’s common currency

(21) Special arrangement regarding winding up of the company.

(22) Method of forfeiture of shares.

(23) Method of taking loan.

(24) Rights and limits to take loans.

In addition to the above matters, there is such a provision in various sections of the Companies Act that the company cannot exercise certain important rights unless the provision is authorized to exercise those rights by the Articles of the Company.

Alteration in Articles of Association

Changes can be made in the Articles of the Company by passing a special resolution under the provisions of the Companies Act and the terms of the Councilor Memorandum. Any changes made to the Articles of Association shall be deemed to be valid. If a public company changes its articles in such a way that it becomes a private company in place of a public company, the consent of the Central Government must be obtained for such change and a copy thereof should be sent to the Registrar within one month. Changes in Articles should not be against the Companies Act and Councilor’s Memorandum of Understanding. Some restrictions have been imposed on the changes in the Articles of the Company based on the decisions of the judges. These restrictions are as follows

(I) Statutory Restrictions

The following statutory restrictions should be kept in mind while making changes in the Articles of Association:

(1) Every change made in the Articles of Association under the Companies Act shall be subject to the provisions of the Companies Act. Also, no change should be such as to permit the doing of any act prohibited by the Companies Act.

(2) Subject to the terms of the Councilor’s Memorandum, the change in the Articles should be subject to the conditions of the Councilor’s Memorandum and the conditions of the Articles should not be violated. At the same time, changes in the Articles should not violate the objectives and limits of work area given in the Councilor’s Memorandum.

(3) Special resolution – It is necessary to pass a special resolution for every change to be made in the Article. A special resolution has to be passed in order to rectify even the minor errors existing in the Articles.

(4) If such a change is made in the Articles of Association on conversion to a private company, so as to convert a public company into a private company, then such change shall be effective only after obtaining the concurrence of the Central Government.

(5) right Written consent on increase of finances – If any such change is to be made in the Articles that increases the liability of the members, then this change shall be effective after obtaining written consent of the members and re-registration of the company as a company with unlimited liability. would be able to.

(6) Concurrence of the Central Government on change of directors- If there is any change in the public company in relation to the appointment or reappointment of a managing director or director, or in relation to the increase in the remuneration of a director, the consent of the Central Government thereon will be required to obtain.

(7) According to the order of the Tribunal, the Change Tribunal may order the company to amend its Articles to prevent injustice and mismanagement in the company. In such a situation, that company has to make changes in its Articles according to the orders or directions of the Tribunal.

(8) Registration of Articles – Every change made in the Articles of Association takes effect only when it has been registered by the Registrar. Therefore, it is necessary to register new articles to make the change effective.

(II) Judicial Restrictions

The following restrictions may be included in the Articles of Association of the company-

(1) Change not to be unlawful There should be no change in the Articles of Association of the company which is not statutory under the Act.

(2) Changes to be made for the benefit of the company – Changes in the Articles of Association should be made in good faith and for the benefit of the company. If such changes are made for personal gain, then they will be completely useless.

(3) Justified alteration – The article cannot be changed which is not just. If the majority shareholders pass a resolution to buy the shares of minority shareholders, then it will not be considered just.

(4) Contract with third party not to be rescinded – The article of the company should not be changed in such a way as to give that company the right to rescind the contract with the third party. If there is a breach of contract with a party due to a change in the Articles of Association, the company shall be bound to compensate that person.

(5) Change should not lead to expulsion of any member – The change in the Articles should not be such that the Board of Directors of the company has the right to remove or remove any member. If any such change is made it will not be effective.

(6) Alteration to be in good faith – The article of the company shall be amended in good faith and shall not cause injustice to any of the shareholders.

(7) Not to allow trafficking – The article should not be changed in such a way that as a result the company gets permission to do trafficking.

(8) All changes may not be effective from the past date – The members are bound by the changes made in the Articles of Association in the same manner as if these changes existed in the Articles of the Company from the very beginning. But this does not mean that the effect of all the changed Articles will be from the past date.

(III) Other Restrictions

Other restrictions include the following:-

(1) Giving a copy of the amended Articles to the members- A company shall send a copy of the amended Articles to that member within a day from the day of the application, on the request made by a member of the company and on depositing a fee of one rupee for the copy.

(2) Every copy issued after the alteration shall be in accordance with the change – When the interchange is made, whatever copy thereof is issued after the date of the alteration shall be in accordance with the alteration. If the company does not send the copies in accordance with the change, a fine up to ₹ 100 may be imposed on the company and every officer of the company who is guilty of this for each copy issued.

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