अंश किसे कहते हैं ? कम्पनी विभिन्न प्रकार के जो अंश जारी कर सकती है, उनका वर्णन कीजिए। Who are the parts? Describe the different types of shares a company can issue.

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अंश का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definition of Share)

अंश का शाब्दिक अर्थ ‘भाग’ (Portion) से है और अंशों द्वारा सीमित दायित्व वाली कम्पनी की दशा में इसका अर्थ कम्पनी की अंश-पूँजी के एक भाग से लगाया जाता है। दूसरे शब्दों में, जब कम्पनी की अंश-पूंजी निश्चित मूल्य के विभिन्न हिस्सों में विभाजित होती है तो उसका प्रत्येक हिस्सा अंश कहलाता है। इस प्रकार अंश एक निश्चित राशि की अविभाजित इकाई है, कमानी की पूँजी का एक अंग है।

1. कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 2(86) के अनुसार, “अंश से आशय कम्पनी की अंश-पूँजी के एक भाग से है और उसमें स्कन्ध भी सम्मिलित किया जाता है जब तक कि स्कन्ध और अंश में अन्तर न किया गया हो।

“Share means share in the share capital of a company and includes stock except where a distinction between stock and share.”

2. न्यायाधीश लिण्डले Justice Lindley) के अनुसार, “अंश, पूंजी का आनुपातिक भाग है जिसका प्रत्येक सदस्य अधिकारी है। ”

“Share is the proportion of capital which each member is entitled to.”

3. न्यायाधीश बकलन (Justice Bucklan) के अनुसार, “अंश सदस्यों द्वारा व्यक्तिगत रूप से दी गई पूँजी का वह भाग है जो कम्पनी में एक अंशधारी के हित का प्रतिनिधित्व करता है और उसके अधिकारों, कर्तव्यों तथा उस पर दायित्व प्रदान करता है।”

“Share is the proportion of the capital contributed individually which represents a share holder’s interest in the company and provides rights, duties and entails liability on it.”

उपरोक्त से स्पष्ट है कि अंश चल सम्पत्ति होते हैं जिनका हस्तान्तरण कम्पनी के अन्तर्मियो में दी गयी विधि के अनुसार किया जा सकता है। साथ ही अंशों को गिरवी रखा जा सकता है।

अंश की विशेषताएँ (Characteristics of Shares)

अंशों की विशेषताएँ विलिखित हो सकती है–

(1) बल सम्पत्ति-अंस चल सम्पत्ति होते हैं जिनका हस्तान्तरण अन्तनियमों में दी गयी विभि के अनुसार किया जा सकता है।

(2) अशो का प्रमाण पत्र-अंशों के स्वामी को कम्पनी की सार्वमुद्रा अधीन एक प्रमाण-पत्र नियमित किया जाता है जिसे अंशों का प्रमाण-पत्र कहते हैं।

(3) समुचित क्रमांक या संख्या प्रत्येक अंश के लिए एक संख्या निर्धारित कर दी जाती है और उसे उसी संख्या से जाना जाता है।

(4) रजिस्टर में लिखा जाना-प्रत्येक अंशधारी के अंशों को कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर में लिखा जाता है।

(5) मालवस्तु विक्रय अधिनियम में अंशों को माल की श्रेणी में रखा जाता है, जिन्हें बेचा, खरीदा तथा बन्धक रखा जा सकता है।

(6) मौद्रिक हित-अंश किसी कम्पनी के अंशधारी का उस कम्पनी में मौद्रिक हित को प्रकट करता है।

(7) विनिमय साध्य विलेख-अंश को विनिमय साध्य विलेख नहीं माना जाता है।

अंशों के प्रकार (Kinds of Shares)

कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार, एक कम्पनी निम्न प्रकार के अंश निर्गमित कर सकती है–

(1) पूर्वाधिकार अंश (Preferences Shares)- किसी अंश पूँजी वाली कम्पनी के पूर्वाधिकार अंशों से तात्पर्य ऐसे अंशों से है जिन्हें लाभांश के भुगतान में एवं कम्पनी के समापन पर पूँजी की वापसी के सम्बन्ध में प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रकार पूर्वाधिकार अंशों के धारकों को निम्न अधिकार प्रदान किये जाते हैं

(i) लाभांश सम्बन्धी पूर्वाधिकार-जब कम्पनी के लाभों को अंशधारियों को बाँटा जाता है तो पूर्वाधिकार अंशधारियों को कम्पनी के लाभों में से सर्वप्रथम लाभांश प्राप्त करने का अधिकार होता है। इनको लाभ वाँटने के बाद शेष राशि में से ही समता अंशधारियों को लाभांश दिया जाता है।

(ii) पूँजी की वापसी सम्बन्धी पूर्वाधिकार-जय कम्पनी का समापन होता है तो कम्पनी सभी ऋणदाताओं का भुगतान करने के पश्चात् शेष बची हुई राशि समता अंशधारियों की अपेक्षा पूर्वाधिकारी अारियों को पूँजी वापस की जायेगी। इनको भुगतान के बाद बची हुई राशि में से समता अंशधारियों को भुगतान किया जाता है।

उपर्युक्त अधिकारों के अतिरिक्त पूर्वाधिकार अंशधारियों को निम्न अधिकार भी प्राप्त हो सकते हैं–

(i) अतिरिक्त लाभ में भाग-पूर्वाधिकार अंशधारियों को यह भी अधिकार दिया जा सकता है कि जब कम्पनी को अतिरिक्त लाभ हो तो उसमें भी इन्हें एक निर्धारित अनुपात में लाभ वितरित किया जायेगा।

(ii) आधिक्य में भाग-कभी-कभी यह भी अधिकार प्रदान किया जाता है कि कम्पनी के समापन पर सभी प्रकार के अंशधारियों की पूंजी के भुगतान करने के पश्चात् यदि कोई राशि फिर भी शेष बचती है तो उसमें भी पूर्वाधिकार अंशधारियों को हिस्सा प्राप्त होगा।

पूर्वाधिकार अंशों के प्रकार (Types of Preference Shares)

पूर्वाधिकार अंश निम्न प्रकार के हो सकते हैं–

(i) साधारण पूर्वाधिकार अंश (Simple Preference Share)- इन अंशों पर अन्य अंशों की अपेक्षा सर्वप्रथम एक निश्चित दर से लाभांश दिया जाता है। यदि किसी वर्ष कम्पनी को लाभ नहीं होता है तो इन अंशों पर उस वर्ष कोई लाभांश नहीं दिया जाता, इव्हें असंचयी पूर्वाधिकार अंश भी कहते है। संचयी एवं असंचयी होने के विषय में अन्तनियमों में व्यवस्था कर दी जाती है।

(ii) सचयी पूर्वाधिकार अंश | Cumulative Preference Share)- ये वे पूर्वाधिकार अंश होते हैं जिन्हें कम्पनी द्वारा लाभांश एक निश्चित दर से दिया जाता है। यदि कम्पनी को किसी वित्तीय वर्ष में लाभ अधिक न हो या देने में असमर्थ हो तो उस वर्ष का लाभांश अगले वर्ष में दिया जायेगा।

(iii) परिवर्तनशील पूर्वाधिकार अश (Convertible Preference Share)- ऐसा पूर्वाधिकार अंश जिनके धारकों को यह अधिकार दिया जाता है कि यदि वे चाहें तो एक निश्चित समय के अन्दर अपने अंशों को समता अंशों में बदल सकते हैं, परिवर्तन अंश कहलाते हैं।

(iv) अपरिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश (Non-convertible Preference Share)-ऐसे पूर्वाधिकार अंश जिन्हें समता अंशों में नहीं बदला जा सकता है उन्हें अपरिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश कहते हैं।

(v) भागीय पूर्वाधिकार अंश (Participating Preference Share) ऐसे पूर्वाधिकार अंशधारियों को एक अनिश्चित दर से लाभांश प्राप्त करने के साथ-साथ अतिरिक्तलाभ (सामान्य अंशधारियों को देने के बाद बचे हुए लाभ) में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार होता है। इसी प्रकार कम्पनी के समापन पर पूँजी वापसी पर सामान्य अंशधारियों की पूँजी वापस करने के बाद बची हुई पूँजी पर अतिरिक्त हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार होता है। इसके लिए अन्तनियमों में व्यवस्था होना आवश्यक है।

(vi) अभागीय पूर्वाधिकार अंश (Non-Participation Share)- जिन अंशों के धारक को अतिरिक्तलाभ एवं अतिरिक्त पूँजी में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं होता है, उन्हें अभागीय पूर्वाधिकार अंश कहते हैं।

(vii) विमोचनशील पूर्वाधिकार अंश (Redeemable Preference Share)- एक कम्पनी अपने अन्तर्नियमों में व्यवस्था होने पर विमोचनशील पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन कर सकती है जिनका विमोचन कुछ निश्चित शर्तों के अधीन किया जाता है। ऐसे अंशों का विमोचन तभी किया जायेगा जबकि ये पूर्णदत्त इनका विमोचन लाभों में से प्रीमियम में से या संचित कोषों में किया जा सकता है।

पूर्वाधिकार अंशों के निर्गमन की शर्तें /प्रतिबन्ध (Conditions/Restrictions on Issue of Preference Shares)

पूर्वाधिकार अंशों के निर्गमन की शर्तें या उन पर प्रतिबन्ध अग्रलिखित है–

1. अशी द्वारा सीमित कम्पनी द्वारा निर्गमन-केवल अंशों द्वारा सीमित कम्पनियाँ ही पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन कर सकती है।

2. अशोध्य पूर्वाधिकार अशो का निर्गमन नहीं कोई भी कम्पनी अशोध्य पूर्वाधिकार अंशों क निर्भमन नहीं कर सकती है।

3. अन्तनियमो द्वारा अधिकृत-शोध्य पूर्वाधिकार अशों का निर्गमन तभी किया जा सकता है. जबकि कम्पनी के अन्तनियमों द्वारा इनके निर्गमन का अधिकार दिय गया हो।

4. सामान्यतः बीस वर्ष में शोधन-कोई भी कम्पनी ऐसे शोध्य पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन नहीं कर सकती है जिनका शोधन उनके निर्गमन के 20 से अधिक वर्षों के बाद किया जायेगा।

5. आधारभूत संरचना परियोजनाओं के अंशो का अधिकतम 30 वर्षों में शोधण-आधारभूत संरचना सम्बन्धी परियोजनाओं के लिए कम्पनियाँ 20 वर्षों से अधिक किन्तु 30 वर्षों तक की अवधि के भीतर शोध्य पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन कर सकती है।

(2) समता अश Equity Share)-समता अंश उन अंशों को कहते हैं जो पूर्वाधिकार अंश नहीं है। इन्हें लाभांश उसी दशा में मिलता है जब पूर्वाधिकार अंशधारियों को लाभांश का भुगतान करने के पश्चात् कुछ लाभ शेष रह जाता है। इसके अतिरिक्त, इन्हें दिये जाने वाले लाभांश की दर पहले से निर्धारित नहीं रहती। इन्हें किस दर से लाभांश देना चाहिए, यह संचालकों द्वारा तय किया जाता है। इसी प्रकार कम्पनी के समापन की अवस्था में पूर्वाधिकार अंशधारियों की सम्पूर्ण पूँजी को लौटा देने के पश्चात् ही इनकी पूंजी लौटायी जाती है। इन अंशधारियों को कम्पनी की सभाओं की सूचना पाने, उनमें उपस्थित होने तथा मत देने का अधिकार प्राप्त होता है। यदि देखा जाए तो समता अंशधारी ही वास्तव में कम्पनी के स्वामी होते हैं।

एक अंशों द्वारा सीमित दायित्व वाली कम्पनी निम्न प्रकार के समता अंशों का निर्गमन कर सकाति है–

1. मताधिकार सहित एवं

2. लाभांश, मताधिकार आदि के सम्बन्ध में विभेदात्मक अधिकार रखने वाले समता अंश ।

स्कन्ध या स्टॉक का अर्थ (Meaning of Stock)

स्टॉक से आशय पूर्णदत्त अंशों की एकत्रित राशि से है जिन्हें बाद में छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटा जा सकता है जिससे कि उन्हें पूँजी की किसी भी राशि में हस्तान्तरित किया जा सके। इसके लिए कम्पनी की कुछ पूँजी स्टॉक के रूप में होना आवश्यक है। कम्पनी अधिनियम के अनुसार, “कम्पनी अपने पूर्ण दत्त अंशों को स्कन्ध में परिवर्तित कर सकती है बशर्ते कि यह अधिकार अन्तर्नियमों द्वारा अधिकृत हो।”

इस प्रकार स्कन्ध अनेक पूर्ण प्रदत्त अंशों का समेकित (Consolidated) रूप है। यह अनेक अंशों को मिलाकर बनाया जाता है। अतः स्कन्ध पूँजी का वह भाग है जो अनेक पूर्ण प्रदत्त अंशों को मिलाकर बनाया जाता है। अंशों की भाँति स्कन्ध का कोई अंकित मूल्य नहीं होता है। अतः एक कम्पनी की पूँजी में कितने ही स्कन्ध हो सकते हैं तथा प्रत्येक का मूल्य भिन्न हो सकता है। कोई भी कम्पनी प्रारम्भ से ही स्कन्ध जारी नहीं कर सकती है। अंशपूँजी वाली कम्पनी को सर्वप्रथम अंश जारी करने ही पड़ते हैं। तत्पश्चात् कम्पनी उन अंशों को स्कन्ध में परिवर्तित कर सकती है। यदि कम्पनी के अन्तर्नियम उसे ऐसा करने का अधिकार प्रदान करते हैं।

अशों को स्कन्च में परिवर्तित करने की वैधानिक व्यवस्थाएँ (Statutory Regulations of Conversion of Shares into Stock)

अंशों को स्कन्ध में परिवर्तित करने की वैधानिक व्यवस्थाएं निम्नलिखित है–

(1) अंशों का स्कन्च में परिवर्तन करने के लिए कम्पनी के अन्तनियमों में व्यवस्था होना अनिवार्य है। अन्तनियमों में ऐसी व्यवस्था नहीं है तो कम्पनी अन्तनियमों में परिवर्तन करके ऐसी व्यवस्था करनी पड़ती है। अतः यदि कम्पनी के अन्तनियमों में व्यवस्था हो तो कोई भी कम्पनी अपने पूर्णदत्त अंशों को स्कन्ध में परिवर्तित कर सकती है।

(2) एक कम्पनी अपने साधारण प्रस्ताय द्वारा (i) अपने पूर्णदत्त अंशों को स्कन्ध में बदल सकती है अथवा (ii) स्कन्ध को किसी भी मूल्य के पूर्णदत्त चुकता अंशों में पुनः परिवर्तित कर के सकती है।

(3) स्कन्ध को उसी प्रकार हस्तान्तरित किया जा सकता है जिस प्रकार पूर्णदत्त अंशों का हस्तान्तरण किया जाता है लेकिन संचालक मण्डल स्कन्ध हस्तान्तरण की एक न्यूनतम राशि निर्धारित कर सकता है जिससे कम राशि का हस्तान्तरण नहीं किया जा सकता। परन्तु यह न्यूनतम राशि उन अंशों के अंकित मूल्य से अधिक नहीं होगी जिनसे स्कन्ध का निर्माण हुआ है।

(4) स्कन्धधारी को कम्पनी की सभाओं में मत देने, लाभ पाने व अन्य मामलों में वही अधिकार प्राप्त होंगे जो कि अंशधारियों को प्राप्त होते हैं।

(5) कम्पनी के जो नियम पूर्णदत्त अंशों के बारे में लागू होते हैं वहीं स्कन्च पर भी लागू होंगे।

अंशों को स्कन्ध में परिवर्तित करने की विधि (Procedure of Conversion of Shares into Stock)

यदि कम्पनी के अंश पूर्णदत्त है और कम्पनी के अन्तर्नियम अंशों को स्कन्ध में परिवर्तित करने की आज्ञा देते हैं तो अंशधारियों की साधारण सभा में इस आशय का एक प्रस्ताव पास किया जायेगा। इसके पश्चात् अंश हस्तान्तरण की पुस्तक बन्द कर दी जाती है तथा कम्पनी अंशधारियों को अपने अंश प्रमाण-पत्र कम्पनी को समर्पण करने की एक सूचना देती है अंश प्रमाण-पत्रों के समर्पण के उपरान्त कम्पनी एक रसीद जारी करती है। जिसके बदले में कुछ समय के पश्चात् स्कन्ध प्रमाण पत्र प्राप्त किये जा सकते हैं। स्कन्ध प्रमाण-पत्र जारी करते समय सदस्यों के रजिस्टर में आवश्यक प्रविष्टि कर दी जाती है तथा एक नयी पुस्तक स्कन्ध रजिस्टर में खोल दी जाती है। इस स्कन्ध रजिस्टर में सदस्यों द्वारा पारित अंशों के मूल्य के स्थान पर स्कन्ध का मूल्य दिखाया जाता है। अंशों के स्कन्द में परिवर्तित हो जाने के 30 दिन के अन्दर कम्पनी द्वारा इसकी सूचना कम्पनी रजिस्ट्रार को दे देनी आवश्यक है। इस सूचना में उन अंशों या स्कन्चों की संख्या का उल्लेख करना चाहिए जिन्हें स्कन्ध में परिवर्तित किया गया है या जिन्हें अंशों में पुन परिवर्तित किया गया है।

यदि कोई कम्पनी ऐसा परिवर्तन करने के पश्चात् रजिस्ट्रार को सूचित नहीं करती है तो कम्पनी तथा कम्पनी के प्रत्येक दोषी अधिकारी को ₹1000 प्रतिदिन के अर्थदण्ड से तब तक दण्डित किया जाता रहेगा जब तक ऐसा दोष जारी रहेगा अथवा ₹5 लाख से जो भी कम हो दण्डित किया जा सकेगा।


Meaning and Definitions of Share

The literal meaning of the part is ‘portion’ and in the case of a company limited by shares it is interpreted to mean a part of the share capital of the company. In other words, when the share capital of a company is divided into different parts of fixed value, then each part of it is called a share. Thus a share is an undivided unit of a fixed amount, a part of the share capital.

1. As per section 2(86) of the Companies Act, 2013, “share” means a part of the equity capital of a company and includes inventory unless a distinction is made between stock and share.

“Share means share in the share capital of a company and includes stock except where a distinction between stock and share.”

2. According to Justice Lindley, “A share is a proportionate part of the capital of which every member is an officer.”

“Share is the proportion of capital which each member is entitled to.”

3. According to Justice Bucklan, “Share is that part of the capital given personally by the members which represents the interest of a shareholder in the company and confers on his rights, duties and liabilities thereon.”

“Share is the proportion of the capital contributed individually which represents a share holder’s interest in the company and provides rights, duties and entails liability on it.”

It is clear from the above that shares are movable property, which can be transferred according to the law given in the company’s interlocutors. Also shares can be pledged.

Characteristics of Shares

The characteristics of the shares may be written-

(1) Force property – are movable property which can be transferred in accordance with the manner given in the Articles of Association.

(2) Certificate of shares – A certificate is issued to the owner of the shares under the common seal of the company, which is called certificate of shares.

(3) The appropriate serial number or number is assigned a number for each fraction and is known by that number.

(4) Recording in the register – The shares of every shareholder are entered in the register of the members of the company.

(5) In the Sale of Goods Act, shares are kept in the category of goods, which can be sold, bought and mortgaged.

(6) Monetary interest-Share represents the monetary interest of a shareholder of a company in that company.

(7) Exchangeable deed-Part is not treated as an exchangeable deed.

Kinds of Shares

As per the Companies Act, 2013, a company can issue the following types of shares-

(1) Preference Shares – Preference shares of a company having share capital means such shares which are given priority in payment of dividend and return of capital on dissolution of the company. In this way the following rights are provided to the holders of preference shares:

(i) Preference regarding dividend- When the profits of the company are divided among the shareholders, then the preference shareholders have the right to receive the first dividend out of the profits of the company. After sharing the profit to them, dividend is given to the equity shareholders out of the remaining amount.

(ii) Preference regarding return of capital- If the company is dissolved, then the amount remaining after paying all the creditors of the company will be returned to the predecessors as compared to the equity shareholders. These are paid out to the equity shareholders out of the remaining amount after payment.

In addition to the above rights, the preference shareholders can also get the following rights-

(i) Share in the additional profit – Preference shareholders can also be given the right that when the company has additional profit, the profit will be distributed to them in a specified proportion.

(ii) Share in excess – Sometimes it is also provided that the preference shareholders will get a share in the company if any amount still remains after paying the capital of all types of shareholders. .

Types of Preference Shares

Preference shares can be of the following types-

(i) Simple Preference Share – On these shares, first of all a fixed rate of dividend is paid as compared to other shares. If the company does not make profit in any year, then no dividend is paid on these shares in that year, they are also called non-cumulative preference shares. The provision is made in the Articles regarding being cumulative and non-cumulative.

(ii) true preference share. Cumulative Preference Share) – These are the preference shares in which dividend is paid by the company at a fixed rate. If the company does not have more profit in any financial year or is unable to pay, then the dividend for that year will be paid in the next year.

(iii) Convertible Preference Shares – Such preference shares, the holders of which are given the right to convert their shares into equity shares, if they so desire, are called convertible shares.

(iv) Non-convertible Preference Shares- Such preference shares which cannot be converted into equity shares are called irrevocable preference shares.

(v) Participating Preference Share) Such preference shareholders have the right to receive dividends at an indefinite rate as well as share in excess profits (the profits left after passing to common shareholders). Similarly, on the return of capital on the dissolution of the company, the common shareholders have the right to receive additional share on the remaining capital after returning the capital. For this, it is necessary to have a provision in the provisions of the Act.

(vi) Non-participation share- The shares whose holders do not have the right to receive additional profit and share in additional capital are called non-participation preference shares.

(vii) Redeemable Preference Shares – A company may issue redeemable preference shares, which are redeemed subject to certain conditions, if provided in its Articles. Such shares shall be redeemed only when fully paid up can be redeemed out of profits, out of premium or in accumulated corpus.

Conditions/Restrictions on Issue of Preference Shares

The conditions or restrictions on the issue of preference shares are as follows-

1. Issue by a Company Limited by Aashi- Only a company limited by shares can issue preference shares.

2. No issue of bad preference shares No company can issue bad preference shares.

3. The issue of due preference shares can be done only if authorized by the provisions of the Articles. Whereas the right of issue has been given by the Articles of the Company.

4. Ordinarily beneficiary within twenty years – No company can issue due preference shares which will be liquidated after more than 20 years from the date of their issue.

5. Liquidation of shares of infrastructure projects within a maximum period of 30 years – For infrastructure projects, companies can issue preference shares due within a period of more than 20 years but up to 30 years.

(2) Equity Shares – Equity Shares are those shares which are not Preference Shares. They get dividend only if some profit remains after paying the dividend to the preference shareholders. In addition, the rate of dividend to be paid to them is not pre-determined. The rate at which they should pay dividend is decided by the operators. Similarly, in the event of dissolution of the company, only after returning the entire capital of the preference shareholders, their capital is returned. These shareholders have the right to notice, attend and vote in the meetings of the company. If seen, the equity shareholders are actually the owners of the company.

A company limited by one share of liability can issue the following types of equity shares-

1. With the right to vote and

2. Equity shares having differential rights in respect of dividend, voting rights etc.

Meaning of Stock

Stock refers to the aggregate amount of fully paid-up shares which can then be broken up into smaller pieces so that they can be transferred to any amount of capital. For this, it is necessary to have some capital of the company in the form of stock. According to the Companies Act, “A company may convert its fully paid-up shares into stock, provided such right is authorized by the Articles of Association.”

Thus, the stock is the consolidated form of several fully paid-up shares. It is made by mixing several components. Therefore, inventory is that part of capital which is made up of several fully paid-up shares. Like shares, stock has no face value. Therefore, a company’s capital can have any number of stocks and the value of each can be different. No company can issue inventory right from the beginning. The company having share capital has to issue shares first. The company can then convert those shares into inventory. If the Articles of Association of the company authorize it to do so.

Statutory Regulations of Conversion of Shares into Stock

The following are the statutory arrangements for converting shares into inventory-

(1) It is necessary to have a provision in the articles of the company for conversion of shares into sunch. If there is no such provision in the Articles of Association, then the company has to make such arrangements by making changes in the Articles of Association. Therefore, any company can convert its fully paid-up shares into inventory, if there is a provision in the articles of the company.

(2) A company may by its ordinary proposition (i) convert its fully paid-up shares into equity or (ii) re-convert the stock into fully paid-up shares of any value.

(3) The inventory can be transferred in the same way as the fully paid-up shares are transferred, but the Board of Directors may fix a minimum amount of the transfer of the inventory, from which the amount less than that cannot be transferred. Provided that this minimum amount shall not exceed the face value of the shares from which the stock is formed.

(4) The stockholders shall have the same rights to vote in the meetings of the company, to get profits and in other matters, as are enjoyed by the shareholders.

(5) The rules of the company with respect to fully paid-up shares Same applies to Skunk as well.

Process of Conversion of Shares into Stock

If the shares of the company are fully paid-up and the Articles of Association of the company permits to convert the shares into stock, a resolution to this effect shall be passed in the general meeting of the shareholders. After this, the book of transfer is closed and the company gives a notice to the shareholders to surrender their share certificates to the company, after the surrender of the share certificates, the company issues a receipt. In return of which, after some time stock certificates can be obtained. At the time of issue of inventory certificate, necessary entry is made in the register of members and a new book is opened in the inventory register. In this inventory register, instead of the value of the shares passed by the members, the value of the stock is shown. The company must inform the Registrar of Companies about the conversion of shares into corpus within 30 days. This information should state the number of shares or aggregates which have been converted into inventory or which have been converted back into shares.

If a company does not inform the Registrar after making such changes, the company and every guilty officer of the company shall be punished with a fine of ₹ 1000 per day so long as such defect continues or ₹ 5 lakh whichever is less. can be punished.

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