कम्पनी में संचालको की क्या वैधानिक स्थिति है ? इसको कभी एजेण्ट, कभी ट्रस्टी, कभी प्रबन्ध साझेदार तथा कभी कम्पनी का प्रमुख अधिकारी माना जाता है, इस कथन की व्याख्या कीजिए। What is the legal status of the directors in the company? It is sometimes considered as agent, sometimes trustee, sometimes managing partner and sometimes the principal officer of the company, explain this statement.

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कम्पनी के संचालकों की वैधानिक स्थिति (Legal Position of Directors of a Company)

कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत संचालकों की विधिक स्थिति को स्पष्ट नहीं किया गया है। संचालक को कम्पनी के पार्षद अन्तनियमों के अन्तर्गत एक ‘अधिकारी’ के रूप में मान्यता दी जाती है। वे कम्पनी के सेवक नहीं माने जाते। संचालकों की विधिक स्थिति के बारे में लॉर्ड जस्टिस बोवेन ने इस प्रकार व्याख्या की है–

“संचालक कभी अभिकर्ता के रूप में, कभी न्यासी के रूप में और कभी-कभी प्रबन्ध करने वाले भागीदार के रूप में वर्णित किए जाते हैं लेकिन इनमें से प्रत्येक सम्बोधन इन व्यक्तियों के सम्पूर्ण अधिकारों एवं उत्तरदायित्वों के लिए सर्वांगीण रूप से प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि इनक प्रयोग किसी एक समय पर अथवा किसी प्रयोजन के लिए किया जाता है।” उच्चतम न्यायालय रामचन्द्र एण्ड सन्स शुगर मिल्स प्रा. लि. बनाम कन्हैया लाल में संचालकों की स्थिति के बारे अग्रलिखित विचार प्रकट किया है–

“यह निर्विवाद है कि कम्पनी एवं कम्पनी के संचालक विभिन्न विधिक व्यक्ति हैं। कम्पनी अपनी शक्तियाँ पार्षद सीमानियम से प्राप्त करती है, इनमें से कुछ शक्तियाँ संचालकों को प्रत्यायोजित दी जाती है। कुछ प्रयोजनों के लिए वे कम्पनी के न्यासी कहे जाते हैं और कुछ अन्य के लिए के अभिकर्ता या प्रबन्धक कहे जाते हैं।”

इस प्रकार कम्पनी के संचालक की वास्तविक स्थिति केवल अभिकर्ता या न्यासी या प्रवन्ध करने वाले भागीदार की नहीं होती बल्कि इन सबका मिश्रण होती है।

(I) संचालक एजेण्ट के रूप में संचालकों की स्थिति एजेण्ट की स्थिति से मिलती-जुलती है। वे एजेण्ट के रूप में कम्पनी की ओर से अनुबन्ध करते हैं। इन अनुबन्धों के लिए कम्पनी उत्तरदायी होती है। संचालक व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होते। ये बहुत से ऐसे कार्य कर सकते हैं जिन कार्यों को करने का अधिकार कम्पनी को है लेकिन यदि वे अधिकारों के बाहर कार्य करते हैं तो ये तीसरे पक्षकार के प्रति उत्तरदायी होंगे। संचालकों को पूर्णरूप से एजेण्ट नहीं कहा जा सकता क्योंकि कुछ दशाओं में संचालकों को एजेण्टों की अपेक्षा विस्तृत अधिकार प्राप्त होते हैं। संचालकों को व्यक्तिगत अंशधारियों के एजेण्ट के रूप में नहीं कहा जा सकता।

(II) प्रबन्ध करने वाले साझेदार के रूप में–संचालक कम्पनी के प्रबन्ध के लिए नियुक्त किये जाते हैव साथ ही उन्हें कम्पनी के अंश भी क्रय करने होते हैं। इस प्रकार कम्पनी के प्रबन्ध करने वाले ताझीदार माने जाते हैं, परन्तु साझीदार व संचालकों में बहुत अन्तर होते हैं जैसे साझेदारों के दायित्व असीमित व संचालकों के सीमित होते हैं। यदि संचालक अपने अधिकारों का दुरुपयोग करें तो उनसे होने याली क्षति के लिए वे उत्तरदायी होंगे।

(III) प्रन्यासियों के रूप में– संचालक कम्पनी के प्रत्यासी नहीं माने जाते, परन्तु वे उन समस्त सम्पत्ति के लिए प्रत्यासी माने जाते हैं जो उनके अधिकार में कम्पनी की ओर से आती है। संचालक कम्पनी के दैतनिक नौकर होते हैं और उनके नाम में न तो मुकदमा चलाया जा सकता है और न ही वे प्रसंविदा कर सकते हैं। यदि संचालक कम्पनी की सम्पत्ति का दुरुपयोग करते हैं तो वे प्रन्यासी की भाँति उत्तरदायी ठहराये जायेंगे। संचालकों की स्थिति प्रन्यासी से भिन्न होने के उपरान्त भी उनके अधिकार में आयी कम्पनी की सम्पत्ति व धन के लिए वे प्रत्यासी समझे जाते हैं। ये प्रन्यासी कम्पनी के लिए होते हैं, न कि अंशधारियों के लिए। यदि संचालक अंशधारियों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हो तो वे अंशधारियों के प्रति उत्तरदायी होंगे। यदि संचालक कम्पनी के धन को बाहर के कार्यों में प्रयोग करते हैं तो उसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे। संचालकों को कम्पनी के निम्न अधिकारों के लिए प्रत्यासी माना जाता है-

(i) कम्पनी के धन को कम्पनी के हित में प्रयोग करने का अधिकार।

(ii) कम्पनी की सम्पत्ति के व्यापार में प्रयोग करने का अधिकार।

(iin) लाभांश को साधारण सभा में घोषित करने का अधिकार ।

(iv) अंशों के आवण्टन करने का अधिकार |

(v) अंशों के हस्तान्तरण को स्वीकार करने का अधिकार।

(vi) अशों के समर्पण को स्वीकार करने का अधिकार।

(IV) संचालक कम्पनी के एक अधिकारी के रूप में (Director as an Officer of the (Catmpany)- कम्पनी अधिनियम के अनुसार, संचालक कम्पनी का एक पदाधिकारी होता है। इसलिये यह कम्पनी अधिनियम की व्यवस्थाओं का उल्लंघन करता है तो उसको कारावास की सजा अथवा आर्थिक दण्ड अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकता है।

(V) संचालक कम्पनी के एक कर्मचारी के रूप में (Director as an Employee of the Company)-संचालक और कम्पनी के बीच उनकी नियुक्ति के सम्बन्ध में एक अनुबन्ध होता है जिसके आधार पर संचालक एक निश्चित समय तक कम्पनी को अपनी सेवायें समर्पित करते हैं और उसके बदले में वे कम्पनी से पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं। इस प्रकार संचालक को कम्पनी का कर्मचारी माना जा सकता है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि संचालक पूर्ण रूप से न तो कम्पनी का अभिकर्ता, न प्रन्यासी और न ही प्रबन्ध साझेदार होता है वरन उसको विभिन्न रूपों में अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है। इस सम्बन्ध में कोई दो मत नहीं है कि संचालकों का कम्पनी के साथ विश्वासाश्रित सम्बन्ध होता है।


Legal Position of Directors of a Company

The legal status of the directors has not been clarified under the Companies Act. The director is recognized as an ‘officer’ under the Articles of Association of the company. They are not considered servants of the company. Lord Justice Bowen has explained about the legal position of the operators as follows-

“Operators are sometimes described as agents, sometimes as trustees and sometimes as managing partners, but each of these expressions is not used in an exhaustive manner to refer to the full rights and responsibilities of these persons, Rather they are used at any one time or for any purpose.” The Supreme Court in Ramchandra & Sons Sugar Mills Pvt. Ltd. Vs Kanhaiya Lal has expressed the following view regarding the position of the operators-

“It is indisputable that the company and the directors of the company are different legal persons. The company derives its powers from the councilor memorandum, some of these powers are delegated to the directors. For some purposes they are called trustees of the company and others are called the agents or managers of the

Thus, the actual position of the director of the company is not only that of the agent or the trustee or the managing partner but it is a combination of all these.

(I) The status of operators as operating agents is similar to that of agents. They enter into contracts on behalf of the company as an agent. The company is responsible for these contracts. Directors are not personally liable. They can do many things that the company has the right to do but if they act outside the rights then they will be liable to third parties. Operators cannot be termed as agents because in some cases, operators have wider powers than agents. The operators cannot be termed as agents of the individual shareholders.

(II) As Managing Partner – The operators are appointed for the management of the company and at the same time they have to buy the shares of the company. In this way, the managing directors of the company are considered as fresh partners, but there are many differences between the partners and the directors, such as the liability of the partners is unlimited and that of the directors is limited. If the operators misuse their rights, they will be liable for the damages caused by them.

(III) As trustees – The directors are not considered to be the trustees of the company, but they are considered to be the trustees for all the property which comes in their possession on behalf of the company. Directors are daily servants of the company and cannot be prosecuted or covenanted in their name. If the directors misuse the property of the company, they will be held liable like the trustees. Even after the status of the directors is different from that of the trustee, they are considered to be the trustees for the property and money of the company under their control. These trustees are for the company and not the shareholders. If the directors represent the interests of the shareholders, they shall be liable to the shareholders. If the directors use the company’s money for outside purposes, then they will be personally responsible for that. The directors are considered to be the candidates for the following rights of the company-

(i) Right to use the money of the company in the interest of the company.

(ii) the right to use the property of the company in the business.

(iin) Power to declare dividend in general assembly.

(iv) Right to allot shares.

(v) Right to accept transfer of shares.

(vi) Right to accept the surrender of shares.

(IV) Director as an officer of the company (Catmpany) – According to the Companies Act, the director is an officer of the company. Therefore, if he violates the provisions of the Companies Act, he will be punished with imprisonment. or may be punished with fine or with both.

(V) Director as an Employee of the Company – There is a contract between the operator and the company regarding his appointment, on the basis of which the directors dedicate their services to the company for a certain period of time. And in return they get remuneration from the company. Thus the director can be treated as an employee of the company.

It is clear from the above discussion that the director is neither the agent, nor the trustee nor the managing partner of the company wholly, but he has to perform his role in various forms. There is no two views in this regard that the directors have a trusting relationship with the company.

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