अंश हस्तान्तरण क्या है ? अंश हस्तान्तरण की विधि स्पष्ट कीजिए। अंशों के हस्तान्तरण एवं हस्तांकन में क्या अन्तर है ? What is share transfer? Explain the method of transfer of shares. What is the difference between transfer and handing over of shares?

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अंशों के हस्तान्तरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Transfer Shares)

जब कम्पनी के अंशों का स्वामी स्वेच्छा से अपने स्वामित्व को किसी अन्य व्यक्ति को हस्तान्तरित कर देता है तो उसे अंशों का हस्तान्तरण कहते हैं। दूसरे शब्दों में, अंशों के स्वामित्व के हस्तान्तरण को अंशों का हस्तान्तरण कहते हैं। यह अंशों का महत्वपूर्ण लक्षण है।

कम्पनी अधिनियम की धारा 44 के अनुसार, “अंश एक चल सम्पत्ति है जो कम्पनी के अन्तर्नियमों में दी गई विधि के अनुसार हस्तान्तरणीय होते हैं।”

न्यायाधीश नोरमन मेक्लाओड के अनुसार, “अंश एक विचित्र प्रकार की चल सम्पत्ति है जिसका सूत की गाँठ की तरह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरण नहीं हो सकता। अंश एक ऐसी सम्पत्ति है जो उस व्यक्ति के स्वामित्व में मानी जाती है जिसका नाम सदस्य रजिस्टर में लिखा हुआ है और जिसका कम्पनी अन्तर्नियमों में बताई गई विधि के अनुसार ही हस्तान्तरण हो सकता है। ”

अंश हस्तान्तण का प्रभाव यह होता है कि हस्तान्तरण करने वाले व्यक्ति की कम्पनी में सदस्यता समाप्त हो जाती है और जिस व्यक्ति के नाम से अंश हस्तान्तरण हुआ है, वह अंश का स्वामी हो जाता है एवं कम्पनी का सदस्य बन जाता है।

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यदि अंशों का जबरदस्ती विक्रय किया गया हो अथवा न्यायालय द्वारा नीलाम किया गया हो अथवा कम्पनी द्वारा उनका हरण करके पुनः विक्रय किया गया हो, तो वह अंश या अंशों का हस्तान्तरण नहीं कहलायेगा।

अंशों के हस्तान्तरण की विधि (Procedure for the Transfer of Shares)

(1) आवेदन पत्र देना-अंशों के हस्तान्तरण के लिए सर्वप्रथम हस्तान्तरणकर्ता या हस्तान्तरिती द्वारा कम्पनी को आवेदन पत्र दिया जाना चाहिए। इस पर हस्तान्तरण एवं हस्तान्तरिती दोनों के हस्ताक्षर होने चाहिए।

(2) अंशतः चुकता अंशों की दशा में हस्तान्तरिती को सूचना देना-यदि हस्तान्तरणकर्ता द्वारा अपूर्ण-दत्त अंशों के हस्तान्तरण के सम्बन्ध में आवेदन पत्र दिया है तो इस सम्बन्ध में कम्पनी हस्तान्तरिती से आवश्यक पूछताछ करेगी। यदि हस्तान्तरिती दो सप्ताह के अन्दर कोई आपत्ति नहीं करता है तो हस्तान्तरण रजिस्ट्री वैध मानी जायेगी।

(3) उचित स्टाम्प का होना कम्पनी को प्रस्तुत किये जाने वाले हस्तान्तरण विलेख पर उचित स्टाम्प होना आवश्यक है तथा हस्तान्तरणकर्ता एवं हस्तान्तरिती के हस्ताक्षर एवं हस्तान्तरिती के नाम, पते व व्यवसाय आदि का उल्लेख किया जाना आवश्यक है अंश प्रमाण-पत्र को भी साथ में नत्थी किया जाना चाहिए।

(4) हस्तान्तरण विलेख खो जाने पर यदि हस्तान्तरण विलेख खो जाता है तो ऐसी दशा में हस्तान्तरिती द्वारा कम्पनी को एक लिखित आवेदन पत्र देना चाहिए तथा साथ ही उस पर उचित स्टाम्प लगाना चाहिए।

(5) हस्तान्तरण विलेख की जाँच-जब हस्तान्तरण विलेख कम्पनी के पास जमा कर दिया जाता है तो कम्पनी इस प्रलेख की किसी उत्तरदायी व्यक्ति द्वारा गहन जाँच करवाती है। यदि हस्तान्तरण विलेख सभी प्रकार से ठीक प्रतीत होता है तो उस पर रजिस्ट्रेशन स्टाम्प लगा दिया जाता है। यदि किसी भी प्रकार की कोई त्रुटि हो तो हस्तान्तरण को अस्वीकार कर दिया जाता है। इस प्रकार की जाँच एवं सूचना की अवधि समाप्त होने के बाद सचिव द्वारा विलेख से सम्बन्धित प्रविष्टियाँ हस्तान्तरण रजिस्टर में की जाती है।

(6) हस्तान्तरण की आज्ञा-संचालक मण्डल द्वारा एक प्रस्ताव द्वारा हस्तान्तरण के पंजीयन के लिए आज्ञा दी जा सकती है।

हस्तान्तरण की आज्ञा प्राप्त होने की तिथि से 2 माह के अन्दर नया अंश प्रमाण-पत्र हस्तान्तरिती के पास भेजना आवश्यक है।

(7) अर्थदण्ड- यदि कम्पनी अंश हस्तान्तरण को स्वीकार नहीं करती है तो इसकी सूचना हस्तान्तरणकर्ता एवं हस्तान्तरिती को हस्तान्तरण विलेख प्राप्त करने की तिथि के 2 माह के अन्दर देनी चाहिए, अन्यथा कम्पनी तथा प्रत्येक दोषी अधिकारी पर ₹ 500 प्रतिदिन के हिसाब से आर्थिक दण्ड लगाया जा सकता है।

अंशों के हस्तान्तरण पर वैधानिक प्रतिबन्ध (Statutory Restrictions Regarding Transfer of Shares)

कम्पनी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के अन्तर्गत अंशों के हस्तान्तरण के सम्बन्ध में निम्न प्रतिबन्ध लगाये गये हैं–

1. कम्पनी अधिनियम द्वारा लगाये गये प्रतिबन्ध-कम्पनियाँ सामान्यतः उन प्रतिबन्धों को अपने अन्तर्नियमों में सम्मिलित कर लेती हैं जो प्रतिबन्ध प्रतिभूतियों के अन्तरण पर कम्पनी अधिनियम के अधीन लगाये गये हैं।

2. अनिवार्य प्रतिबन्ध-प्रत्येक निजी कम्पनी को अपने अन्तनियमों में अपने सदस्यों के प्रतिभूतियों के अन्तरण के अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाने ही पड़ते हैं। ऐसा करके ही कोई निजी कम्पनी अपनी सदस्य संख्या को सीमित बनाये रख सकती है।

3. अवयस्क अन्तरिती-किसी भी कम्पनी के अन्तर्नियम में अवयस्क के नाम में प्रतिभूतियों के अन्तरण पर प्रतिबन्ध हो सकते हैं। किन्तु कम्पनियाँ पूर्णदत्त प्रतिभूतियों को अवयस्क के नाम अन्तरित करने की छूट दे सकती हैं यदि अन्तरण विलेख पर उसके संरक्षक के हस्ताक्षर हो।

4. अस्वस्थ मस्तिष्क के व्यक्ति-अन्तर्नियमों में अस्वस्थ मस्तिष्क के व्यक्ति को प्रतिभूतियाँ अन्तरित करने पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।

5. दिवालिया व्यक्ति के अंशों का अन्तरण-यदि कोई व्यक्ति कम्पनी का प्रतिभूति धारक है और वह व्यक्ति दिवालिया घोषित कर दिया जाता है तो उस व्यक्ति को प्रतिभूतियों के अन्तरण के सम्बन्ध में भी अन्तनियमों में प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। यदि अन्तनियमों में व्यवस्था की जाती है कि किसी भी सदस्य के दिवालिया हो जाने पर उसकी प्रतिभूतियाँ किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों को ही एक निश्चित मूल्य पर बेची जा सकेंगी, तो ऐसा प्रतिबन्ध तब तक वैध माना जाता है जब तक कि यह सिद्ध नहीं कर दिया जाता है कि ऐसा प्रावधान पक्षपात करने के उद्देश्य से किया गया है।

6. याचना अदत्त रहने पर यदि प्रतिभूतियों पर याचना की गई राशि का प्रतिभूति धारक द्वारा भुगतान नहीं किया है तो अन्तर्नियमों में व्यवस्था होने पर कम्पनी प्रतिभूतियों के अन्तरण को तब तक रोक सकती है जब तक कि अंशधारी बकाया याचना राशि का भुगतान नहीं कर देता है।

7. ग्रहणाधिकार- यदि कम्पनी को ग्रहणाधिकार प्राप्त हो तो कम्पनी प्रतिभूतियों के अन्तरण को तब तक रोक सकती है जब तक कि अंशधारी देय याचना राशि या अन्य ऋणों का भुगतान नहीं कर देता है।

8. कम प्रतिफल- यदि प्रतिभूतियों के अन्तरण प्रलेख में दर्शाया गया प्रतिफल प्रतिभूतियों पर दिये गये वास्तविक प्रतिफल से कम हो तो प्रतिभूतियों के अन्तरण को रोका जा सकता है। लोग ऐसा इसलिए करते हैं कि कम प्रतिफल दिखाने पर कम मुद्रांक शुल्क (Stamp duty) लगता है।

9. शुल्क- कम्पनी अपने अन्तर्नियमों के अधीन प्रतिभूति अन्तरण शुल्क निर्धारित कर सकती है। ऐसे में यदि अन्तरण के लिए निर्धारित शुल्क जमा नहीं कराया जाता है तो कम्पनी प्रतिभूतियों के अन्तरण पर रोक लगा सकती है।

10. सदस्यों के रजिस्टर के बन्द रहने पर कम्पनी अन्तर्नियमों में यह प्रावधान कर सकती है कि अंशों का अन्तरण तब तक नहीं हो सकेगा जब तक कि सदस्यों का रजिस्टर बन्द रहेगा, किन्तु सदस्यों का रजिस्टर अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार बन्द हो तभी अंशों के अन्तरण पर प्रतिबन्ध रहेगा।

अंशों के हस्तान्तरण सम्बन्धी वैधानिक नियम (Legal Provision Regarding Transfer of Shares)

अंशों के हस्तान्तरण के सम्बन्ध में निम्नलिखित वैधानिक नियम हैं–

(1) आवश्यक रजिस्ट्रेशन-अंशों के हस्तान्तरण को वैध कराने के लिए अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन कराना आवश्यक है।

(2) रजिस्ट्रेशन का समय-अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए हस्तान्तरण प्रपत्र निर्धारित प्रारूप के अनुसार तैयार किया जाना चाहिए और हस्तान्तरण के 2 माह के अन्दर हस्तान्तरण सम्बन्धी प्रपत्र रजिस्ट्रेशन के लिए कम्पनी में जमा कर देना चाहिए।

(3) अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए आवेदन-पत्र-अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए आवेदन-पत्र हस्तान्तरणकर्ता (Transferror) अथवा हस्तान्तरिती (Transferee) दोनों में से किसी एक व्यक्ति के द्वारा दिया जा सकता है।

(4) हस्तान्तरण प्रपत्र खोने पर हस्तान्तरण प्रपत्र खो जाने पर हस्तान्तरिती को पुनः लिखित रूप में कम्पनी को आवेदन-पत्र देना होगा और उपयुक्त स्टाम्प पर आवश्यक प्रमाण देने होंगे। यदि संचालकगण इस बात से सन्तुष्ट हो जाते हैं तो क्षतिपूर्ति की उचित शर्तों के अधीन वे अंशों के हस्तान्तरण की रजिस्ट्री कर सकते हैं।

(5) वैधानिक उत्तराधिकार द्वारा अंशो का हस्तान्तरण-किसी मृत सदस्य का वैधानिक उत्तराधिकारी अपने अधिकृत अंशों का हस्तान्तरण उसी प्रकार कर सकता है जैसे कि वह कम्पनी का स्वयं सदस्य हो।

(6) आंशिक दत्त अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन-आंशिक दत्त (Partly Paid) अंशों की दशा में अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए आवेदन पत्र दिये जाने की दशा में कम्पनी का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह ऐसे अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन करने से पूर्व हस्तान्तरिती को इस सम्बन्ध में सूचना दे दे कि अंश आंशिक दत्त है। हस्तान्तरिती को इस सम्बन्ध में सूचना प्राप्त होने की तिथि से 2 माह के अन्दर अथवा हस्तान्तरिती का कोई ऐतराज न होने पर कम्पनी आंशिक दत्त अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन कर सकती है।

(7) पूर्णदत्त अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन-पूर्णदत्त (Fully Paid) अंर्शों की दशा में अंशों के हस्तान्तरण का रजिस्ट्रेशन करने से पूर्व कम्पनी द्वारा हस्तान्तरिती को सूचना देने की आवश्यकता नहीं होती।

(8) अंशों के हस्तान्तरण को रजिस्ट्री करने से मना करना कम्पनी पार्षद अन्तर्नियमों के दिये गये अधिकारों के अधीन किसी अंशों के हस्तान्तरण की रजिस्ट्री करने से मना कर सकती है और ऐसी अस्वीकृति के 2 माह के अन्दर हस्तान्तरण प्रपत्रों को कम्पनी द्वारा लौटा दिया जाना चाहिए। इस व्यवस्था का पालन न किये जाने पर कम्पनी तथा उसके प्रत्येक दोषी अधिकारी पर ₹ 50 प्रतिदिन के हिसाब से आर्थिक दण्ड लगाया जा सकता है।

(9) अस्वीकृति के विरुद्ध अपील-कम्पनी से अंशों के हस्तान्तरण के रजिस्ट्रेशन की अस्वीकृति को सूचना प्राप्त होने के 2 माह के अन्दर हस्तान्तरणकर्ता अथवा हस्तान्तरिती ऐसी अस्वीकृति के विरुद्ध केन्द्रीय सरकार से आवेदन कर सकते हैं। ऐसा आवेदन पत्र पर विचार करने के लिए सरकार, कम्पनी हस्तान्तरणकर्ता एवं हस्तान्तरिती को अपना पक्ष लिखित में प्रस्तुत करने के लिए यथोचित अवसर देगी सरकार ऐसे आवेदन पत्र को रद्द कर सकती है या कम्पनी को अंशों के हस्तान्तरण की रजिस्ट्री करने के लिए आदेश भी दे सकती है और ऐसी स्थिति में केन्द्रीय सरकार से आज्ञा प्राप्त होने के 10 दिन के अन्दर – अन्दर कम्पनी द्वारा अंशों के हस्तान्तरण की रजिस्ट्री कर दी जानी चाहिए।

हस्तान्तरिती का स्वत्व (Title of Transferee)

हस्तान्तरिती कम्पनी का सदस्य उसी समय होता है जबकि कम्पनी द्वारा अंशों के हस्तान्तरण की रजिस्ट्री कर दी जाती है अर्थात् हस्तान्तरणकर्ता जब तक अंशों का वैध धारक माना जाता है, जब तक कि उसका नाम सदस्यों के रजिस्टर में से कम्पनी द्वारा हटा नहीं दिया जाता। जब हस्तान्तरणकर्ता का नाम रद्द करके सदस्यों के रजिस्टर में हस्तान्तरिती का नाम लिख दिया जाता है तो हस्तान्तरिती को उन अंशों का स्वत्व पूरी तरह प्राप्त हो जाता है। उसका नाम दर्ज हो जाने के बाद उसे नया अंश प्रमाण-पत्र भी निर्गमित कर दिया जाता है लेकिन हस्तान्तरणकर्ता तथा हस्तान्तरिती के बीच हस्तान्तरिती का स्वत्व उसी समय पूरा हो जाता है जबकि उन दोनों में एक अनुबन्ध हो जाता है।


Meaning and Definitions of Transfer Shares

When the owner of the company’s shares voluntarily transfers his ownership to another person, it is called transfer of shares. In other words, the transfer of ownership of shares is called transfer of shares. This is an important characteristic of fractions.

According to Section 44 of the Companies Act, “Shares are movable property which are transferable in accordance with the law provided in the Articles of Association of the Company”.

According to Judge Norman MacLeod, “A share is a strange kind of movable property which cannot be transferred from one person to another like a knot of yarn. A share is a property deemed to be owned by a person whose name is mentioned in the register of members and which can be transferred only in accordance with the law set forth in the Articles of Association of the Company. ,

The effect of transfer of shares is that the person making the transfer ceases to be a member of the company and the person in whose name the share has been transferred becomes the owner of the share and becomes a member of the company.

It is necessary to note here that if the shares are forcibly sold or auctioned by the court or if they have been forfeited and resold by the company, then that share or shares will not be called transfer.

Procedure for the Transfer of Shares

(1) Application Form – For the transfer of shares, first of all an application should be made to the company by the transferor or the transferee. It should be signed by both the transferee and the transferee.

(2) Informing the transferee in the case of partly paid-up shares – If the transferee has made an application regarding the transfer of incompletely paid shares, the company shall make necessary inquiries from the transferee in this regard. If the transferee does not raise any objection within two weeks, the transfer registry will be considered valid.

(3) It is necessary to have proper stamp on the transfer deed to be presented to the company and it is necessary to mention the signatures of the transferor and the transferee and the name, address and occupation of the transferee etc., along with the share certificate. should be attached.

(4) Loss of deed of transfer If the deed of transfer is lost, then in such case a written application should be made by the transferee to the company and along with proper stamp should be affixed thereon.

(5) Scrutiny of the deed of transfer – When the deed of transfer is deposited with the company, the company gets this document thoroughly examined by a responsible person. If the transfer deed appears to be correct in all respects, a registration stamp is affixed on it. If there is any error of any kind, the transfer is rejected. After the expiry of the period of such inquiry and information, the entries related to the deed are made by the secretary in the transfer register.

(6) Order of transfer – A resolution can be given by the Board of Directors for registration of transfer.

It is necessary to send a new share certificate to the transferee within 2 months from the date of receipt of the transfer order.

(7) Penalty – If the company does not accept the transfer of shares, then it should be informed to the transferor and the transferee within 2 months from the date of receipt of the transfer deed, otherwise the company and every guilty officer will be fined ₹ 500 per day. can be imposed.

Statutory Restrictions Regarding Transfer of Shares

The following restrictions have been imposed in relation to the transfer of shares under various sections of the Companies Act-

1. Restrictions imposed by the Companies Act- Companies generally incorporate those restrictions in their Articles which have been imposed under the Companies Act on the transfer of securities.

2. Compulsory Restrictions – Every private company has to impose restrictions on the right of its members to transfer securities in its Articles. Only by doing this a private company can keep its membership number limited.

3. Minor Transferee – The Articles of Association of any company may contain restrictions on the transfer of securities in the name of a minor. However, companies may allow transfer of fully paid-up securities in the name of a minor if the transfer deed is signed by his guardian.

4. Person of unsound mind – The articles of law prohibit the transfer of securities to a person of unsound mind.

5. Transfer of shares of insolvent person- If a person is a security holder of the company and that person is declared insolvent, then the provisions of the Articles can also be prohibited in relation to transfer of securities to that person. If the Articles provide that in the event of a member becoming insolvent, his securities may be sold only to specified persons at a fixed price, such restriction shall be deemed to be valid until it is proved That such provision has been made for the purpose of causing favoritism.

6. If the amount called for on securities has not been paid by the holder of the security after the solicitation remains unpaid, the provisions of the Articles

The company may stop the transfer of securities until the shareholder pays the outstanding call amount.

7. Lien- If the company has a lien, the company can withhold the transfer of securities until the shareholder pays the dues or other debts.

8. Low Return- If the return shown in the transfer document of securities is less than the actual return paid on the securities, the transfer of securities can be stopped. People do this because showing lower returns attracts less stamp duty.

9. Fees – The company may, under its Articles, fix the securities transfer fees. In such a situation, if the prescribed fee is not deposited for the transfer, then the company can stop the transfer of securities.

10. On the closure of the register of members, the company may provide in the Articles that the transfer of shares shall not take place as long as the register of members is closed, but only when the register of members is closed in accordance with the provisions of the Act. There will be a ban.

Legal Provision Regarding Transfer of Shares

The following are the statutory rules regarding transfer of shares:

(1) Necessary registration – In order to legalize the transfer of shares, it is necessary to register the transfer of shares.

(2) Time of registration – For registering the transfer of shares, the transfer form should be prepared according to the prescribed format and within 2 months of the transfer, the transfer form should be submitted to the company for registration.

(3) Application for registration of transfer of shares – Application for registration of transfer of shares can be made by either the transferor or the transferee.

(4) In case of loss of transfer form, in case of loss of transfer form, the transferee shall again apply to the company in writing and give necessary proof on suitable stamp. If the directors are satisfied with this, they can register the transfer of shares subject to reasonable conditions of compensation.

(5) Transfer of shares by statutory succession – The legal heir of a deceased member can transfer his authorized shares in the same manner as if he was a member of the company himself.

(6) Registration of Transfer of Partly Paid Shares- In case of Partly Paid Shares, in case of application for registration of transfer of shares, it becomes the duty of the company to undertake the transfer of such shares. Before registering, inform the transferee that the share is partly paid. The company may register the transfer of partly paid shares within two months from the date of receipt of intimation in this regard to the transferee or if the transferee has no objection.

(7) Registration of transfer of fully paid-up shares – In case of fully paid-up shares, there is no need to inform the transferee by the company before registering the transfer of shares.

(8) Refusal to register the transfer of shares The company may refuse to register the transfer of any shares subject to the powers conferred by the Articles of Association and the transfer forms should be returned by the company within two months of such rejection. . If this arrangement is not followed, a fine of ₹ 50 per day can be imposed on the company and each of its guilty officers.

(9) Appeal against rejection- The transferor or the transferee may make an application to the Central Government against such rejection within two months from the date of receipt of the notice of rejection of registration of transfer of shares from the company. In considering such application, the Government shall give a reasonable opportunity to the transferee and the transferee of the company to present their side in writing; the Government may reject such application or may order the company to register the transfer of shares. and in such a case, the transfer of shares by the company should be registered within 10 days from the date of receipt of permission from the Central Government.

Title of Transferee

The transferee is a member of the company only when the transfer of shares is registered by the company i.e. until the transferor is deemed to be the legitimate holder of the shares, until his name is removed by the company from the register of members. When the transferee’s name is canceled and the transferee’s name is entered in the register of members, the transferee gets full ownership of those shares. After his name is registered, a new share certificate is also issued to him, but the title of the transferee between the transferor and the transferee is completed at the same time when a contract is entered into between them.

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