बन्धक क्या है ? बन्धक तथा प्रभार में अन्तर बताइए। What is mortgage? Differentiate between mortgage and charge.

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बन्धक का अर्थ (Meaning of Mortgage)

“बन्धक किसी विनिर्दिष्ट स्थायी सम्पत्ति में किसी हित का अन्तरण है, जो उधार दिये गये अथवा दिय जाने वाले धन, विद्यमान अथवा भावी ऋण अथवा आर्थिक दायित्व पैदा करने योग्य किसी भी वचन के पालन की प्रतिभूति देने के उद्देश्य से किया जाता है।”

इस प्रकार बन्धक से आशय अचल सम्पत्ति के अधिकार को ऋण के भुगतान के लिए प्रतिभूति के रूप में रखने से है।

ऋणदाता को किसी अचल सम्पत्ति के अधिकार को जिस प्रपत्र के द्वारा दिया जाता है, उसे बन्धक-पत्र (Mortgage Deed) कहते हैं। हस्तान्तरणकर्ता को बन्धक रखने वाला (Mortgage) एवं हस्तान्तरिती को बन्धक रख लेने वाला (Mortgage) कहा जाता है।

बन्धक की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं–

(1) बन्धक में किसी अचल सम्पत्ति की प्रतिभूति प्रदान की जाती है।

(2) बन्धक में सम्पत्ति के हित का हस्तान्तरण किया जाता है।

(3) बन्धक की उत्पत्ति केवल पक्षकारों द्वारा ही होती है।

(4) बन्धक प्रायः एक निश्चित अवधि के लिए किया जाता है।

(5) बन्धक का क्षेत्र संकुचित होता है, क्योंकि यह प्रभार का ही एक अंग है।

प्रभार का अर्थ (Meaning of Charge)

किसी भी सौद में जब दोनों ही पक्षकार अपने निश्चय या भावना का यह साक्ष्य प्रस्तुत करते है कि कोई विद्यमान या भावी सम्पत्ति किसी ऋण के भुगतान की जमानत के रूप में उपलब्ध रहेगी तथा ऋणदाता को यह अधिकार होगा कि वह उस सम्पत्ति को उपलब्ध करवा सकेगा, तो उस सम्पत्ति पर प्रभार उत्पन्न माना जाता है।

प्रभार तब भी माना जायेगा चाहे ऋणदाता को आज के बजाय भविष्य में अपने अधिकार प्रवर्तित करवाने का अधिकार मिलता हो। प्रभार उस दशा में भी माना जायेगा चाहे ऋणदाता का उस सम्पत्ति पर कोई सम्पूर्ण या विशिष्ट वैधानिक अधिकार प्राप्त न हो या उस सम्पत्ति पर आधिपत्य करने का अधिकार भी न हो किन्तु उसे न्यायालय के आदेश से उस जमानत को उपलब्ध करवाने का अधिकार अवश्य मिलता हो।

प्रभार में ग्रहणाधिकार तथा साम्यिक प्रभार सम्मिलित हैं, चाहे उसे किसी लिखित प्रलेख के द्वारा उत्पन्न किया गया हो या स्वत्व प्रलेखों को जमा करवाकर या उन्हें जमा करवाने के ठहराव द्वारा उत्पन्न किया गया हो।

संक्षेप में, किसी भी सम्पत्ति को किसी ऋण के भुगतान के लिए प्रतिभूति में उपलब्ध करने का ठहराव ही प्रभार है।

प्रभार की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं–

1. प्रभार कम्पनी की किसी भी चल या अचल सम्पत्ति पर किया जाता है।

2. प्रभार में सम्पत्ति के हित को हस्तान्तरित नहीं किया जाता है।

3. प्रभार की उत्पत्ति पक्षकारों के कार्य एवं कानून के लागू होने के कारण होती है।

4. प्रभार सदैव के लिए हो सकता है।

5. प्रभार का क्षेत्र व्यापक है, क्योंकि इसमें बन्धक भी शामिल है।

बन्धक एवं प्रभार में अन्तर (Difference Between Mortgage and Charge)

(1) उत्पत्ति-बन्धक की उत्पत्ति दो पक्षकारों के अनुबन्ध से होती है जबकि प्रभार की उत्पत्ति पक्षकारों के कार्य या राजनियम के क्रियाशील होने पर होती है।

(2) हित का हस्तान्तरण बन्धक में अचल सम्पत्ति में हित का हस्तान्तरण होता है जबकि प्रभार में अचल सम्पत्ति में हित का हस्तान्तरण नहीं होता है |

(3) अवधि-बन्धक प्रायः एक निश्चित अवधि के लिए होता है जबकि प्रभार सदैव के लिए हो सकता है।

(4) क्षेत्र-बन्धक का क्षेत्र सीमित होता है जबकि प्रभार का क्षेत्र व्यापक होता है।

प्रभारों के प्रकार (Types of Charges)

प्रभार निम्न दो प्रकार का हो सकता है–

(1) स्थायी या स्थिर प्रभार (Fixed charge)-जब प्रभार कुछ निश्चित एवं विशिष्ट सम्पत्तियों पर उत्पन्न किया जाता है तो वह स्थायी प्रभार कहलाता है। ऐसी सम्पत्तियाँ आसानी से पहचानी जा सकती हैं तथा संस्था के पास एक लम्बी अवधि तक बनी रहती हैं। प्रायः ऐसी सम्पत्तियों में भूमि, भवन, मशीनों आदि को सम्मिलित किया जा सकता है, जिन्हें एक लम्बे समय तक आसानी से पहचाना जा सकता है।

जिन सम्पत्तियों पर स्थायी प्रभार उत्पन्न कर दिया जाता है, संस्था द्वारा उनका लेन-देन या हस्तान्तरण किसी भी अन्य व्यक्तिको नहीं किया जा सकता है जब तक कि प्रभार रखने वाला व्यक्ति अनुमति नहीं देता है।

(2) चल प्रभार (Floating charge) जब किसी ऋण के भुगतान की जमानत के रूप में किसी विशिष्ट सम्पत्ति पर प्रभार उत्पन्न नहीं किया जाता है बल्कि संस्था की सभी या कुछ सामान्य समय-समय पर परिवर्तनशील सम्पत्तियों पर प्रभार उत्पन्न किया जाता है, उसे चल प्रभार कहते हैं। लॉर्ड गॉवर (Lord Gower) के अनुसार, “चल प्रभार बादलों की तरह समय-समय पर सामान्य विवरण की सभी सम्पत्तियों पर छाया रहता है।” लॉर्ड मेक्नॉटन के अनुसार, “चल प्रभार किसी समय विशेष पर किसी संस्था की चल सम्पत्तियों पर साम्यिक प्रभार है।” ऐसे प्रभार का प्रमुख तत्व यह है कि ऐसा प्रभार तब तक अप्रभावी होता है जब तक कि प्रभारित संस्था चलती रहती है अथवा जिस व्यक्ति के हित में प्रभार उत्पन्न किया गया है वह उसको प्रवर्तित नहीं करवाता है। उसके ऐसे अधिकार को आपसी व्हराव से स्थगित भी किया जा सकता है। किन्तु यदि ऐसा कोई व्हराव नहीं किया जाता है तो वह अपने अधिकार का उपयोग भुगतान में त्रुटि के बाद कभी भी कर सकता है।

चल प्रभार एवं स्थायी प्रभार में अन्तर (Difference in Fixed and Floating Charges).

(1) सम्पत्तियाँ-स्थायी प्रभार उन कुछ विशिष्ट सम्पत्तियों पर ही उत्पन्न किया जा सकता है, जो स्थायी रूप से पहचानी एवं निर्धारित की जा सकती हों चल प्रभार सभी सम्पत्तियों या सम्पत्तियों के किसी भी भाग या वर्ग पर उत्पन्न किया जा सकता है जो समय-समय पर बदलती या परिवर्तित होती रहती हैं।

(2) सम्पत्ति का लेन-देन या अन्तरण-स्थायी प्रभार के अन्तर्गत प्रभारित सम्पत्ति का कम्पनी क्रय-विक्रय या अन्तरण नहीं कर सकती है, जबकि चल प्रभार के अन्तर्गत प्रभारित सम्पत्ति का सामान्य व्यापार के अन्तर्गत लेन-देन या अन्तरण किया जा सकता है।

(3) विद्यमान या भावी सम्पत्तियाँ-चल प्रभार दोनों ही प्रकार की सम्पत्तियों पर उत्पन्न किया जा सकता है, जबकि स्थिर प्रभार विद्यमान सम्पत्तियों पर ही उत्पन्न किया जा सकता है।

(4) परिवर्तन-चल प्रभार स्थायी प्रभार में परिवर्तित हो जाता है, किन्तु स्थायी प्रभार चल प्रभार नहीं बन सकता है।

(5) प्रभाव-चल प्रभार तब तक अप्रभावी रहती है जब तक कि संस्था चलती रहती है अथवा संस्था द्वारा ऋण भुगतान में त्रुटि करने पर ऋणदाता द्वारा इस अधिकार का उपयोग नहीं किया जाता है। स्थायी प्रभार का प्रभाव प्रारम्भ से ही स्पष्ट होता है कि त्रुटि की दशा में कौन-सी सम्पत्तियों प्रभावित होंगी।

चल प्रभार का स्थायी प्रभार में परिवर्तन (When the Floating Charge becomes Fixed Charge)

यदि ऋणदाता अपने चल प्रभार को स्थायी प्रभार में परिवर्तित नहीं करवा पाता है तो उसका वह प्रभार व्यर्थ है। ऋणदाता ऐसा परिवर्तन करवा सकता है। ऐसे परिवर्तन की प्रक्रिया को ही स्थिरीकरण की प्रक्रिया (Process of crystallisation) कहते हैं। एक चल प्रभार निम्नलिखित दशाओं में स्थायी प्रभार बन जाता है–

1. जब संस्था व्यवसाय करना बन्द कर देती है।

2. जब कम्पनी का समापन प्रारम्भ हो जाता है।

3. जब संस्था की सम्पत्तियों के लिए राजकीय प्रापक या निस्तारक की नियुक्तिकर दी जाती है।

4. जय संस्था ब्याज के भुगतान में त्रुटि करती है।

5. जब व्यवसाय की सम्पत्तियाँ ऋणदाताओं के अधिकार में अन्तरित कर दी जाती हैं।

6. जब संस्था ऋण के भुगतान में त्रुटि करती है और प्रभारधारी व्यक्ति अपने अधिकार का उपयोग करता है।

प्रभार जिनका पंजीयन अनिवार्य है। (Charges Whose Registration is Compulsory)

निम्नलिखित प्रकार के प्रभारों का पंजीयन अनिवार्य है–

1. ऋणपत्रों के किसी भी निर्गमन को सुरक्षित करने वाला प्रभार अर्थात् यदि कोई कम्पनी पत्र जारी करती है और उनके लिए कम्पनी की सम्पत्ति पर प्रभार उत्पन्न करती है तो उस प्रभार |

2. अप्रार्थित या अयाचित (uncalled) अंशपूँजी पर प्रभार पंजीयन करना अनिवार्य है।

3. किसी स्थायी सम्पत्ति पर प्रभार चाहे कहीं भी स्थित हो या उसमें कितना ही हित क्यों न हो।

4. कम्पनी के किन्ही पुस्तक ऋणों पर प्रभार |

5. उपक्रम पर चल प्रभार जिसमें स्टॉक भी सम्मिलित है।

6. याचित अर्थात् प्रार्थित किन्तु भुगतान न की गई यावनाओं पर प्रभार |

7. किसी जहाज या जहाज के किसी हिस्से पर प्रभार |

8. ख्याति पेटेण्ट या पेटेण्ट के अन्तर्गत लाइसेन्स या ट्रेडमार्क या कॉपीराइट पर प्रभार |

9. विदेश में स्थित सम्पत्ति पर विदेश में उत्पन्न प्रभार |

10. विदेश में स्थित सम्पत्ति पर भारत में उत्पन्न प्रभार |

प्रभार का पंजीयन न कराने के परिणाम (Conequence of Non-Registration of Charge)

जिन प्रभारों का पंजीयन करना अनिवार्य है और उनका पंजीयन नहीं करवाया जाता है तो उसके निम्नलिखित परिणाम होते हैं–

(1) प्रभार व्यर्थ-यदि अधिनियम के अन्तर्गत किसी प्रभार का पंजीयन करवाना अनिवार्य है और उसका पंजीयन नहीं करवाया जाता है तो वह प्रभार व्यर्थ हो जाता है। इसका तात्पर्य यह नहीं है। कि ऋणदाता तथा कम्पनी के बीच का अनुबन्ध ही व्यर्थ हो गया है तथा ऋणदाता कम्पनी से धन वसूल नहीं कर सकते हैं।

(2) धन का तत्काल देय होना-यदि कोई प्रभार प्रलेख किया जाता है और उसका पंजीयन नहीं करवाने के कारण व्यर्थ हो जाता है तो उसके द्वारा सुरक्षित धन तत्काल देय हो जाता है।

(3) ऋणदाता का असुरक्षित होना–यदि किसी प्रकार के पंजीयन में भूल की जाती है तो उसमें उल्लिखित ऋणदाता असुरक्षित ऋणदाताओं की श्रेणी में आ जाता है।

(4) कम्पनी का दायित्व अप्रभावित प्रभार के पंजीयन न करने से ऋणी या कम्पनी के दायित्व अप्रभावित रहते हैं। कम्पनी को तो धनराशि चुकानी ही होती है। इसके पीछे कारण यह है कि कोई कम्पनी अपनी ही भूल का लाभ नहीं उठा सकती है।

(5) स्वामित्व के प्रलेखों पर ग्रहणाधिकार नहीं जब प्रभार के पंजीयन न कराने के कारण प्रभार व्यर्थ हो जाता है तो ऋणदाता का कम्पनी की सम्पत्ति के स्वत्व प्रलेखों पर ग्रहणाधिकार भी समाप्त हो जाता है। स्वामित्व के प्रलेखों पर ग्रहणाधिकार प्रभार के साथ ही होता है, पृथक् नहीं।

(6) बाद वाले बन्धकी या प्रभारधारी के अधिकार यदि किसी सम्पत्ति पर पहले प्रभार का पंजीयन नहीं करवाया जाता है और उसी सम्पत्ति पर दूसरा प्रभार उत्पन्न कर दिया जाता है और उसका पंजीयन करवा लिया जाता है तो दूसरे प्रभार का धारक प्रथम प्रभार के धारक की अपेक्षा उस सम्पत्ति पर प्रथम अधिकार प्राप्त कर सकेगा। यदि दूसरे प्रभार के धारक को पहले प्रभार की जानकारी भी हो तो भी उसके अधिकारों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त परिणाम तभी उत्पन्न होते हैं जबकि प्रभार पक्षकारों द्वारा उत्पन्न किया गया हो। किन्तु यदि प्रभार (i) न्यायालय के आदेश से; अथवा (ii) निस्तारक द्वारा उत्पन्न किया गया हो तो उसका पंजीयन न कराने पर उपर्युक्त परिणाम उत्पन्न नहीं होंगे।


Meaning of Mortgage

“Mortgage is the transfer of any interest in a specified fixed asset with a view to providing security for the performance of any money lent or to be lent, debt existing or future, or any promise to create a pecuniary liability.”

Thus, mortgage is meant to hold the right of immovable property as security for the payment of debt.

The form through which the right to an immovable property is given to the lender is called a mortgage deed. The transferor is called the mortgagee and the transferee is called the mortgagee.

The main features of mortgage are as follows-

(1) The security of an immovable property is provided in mortgage.

(2) The interest in the property in mortgage is transferred.

(3) The origin of the mortgage is only by the parties.

(4) Mortgages are usually made for a fixed period.

(5) The region of the host is narrower because it is a part of the charge itself.

Meaning of Charge

In any deal, when both the parties produce evidence of their determination or feeling that any existing or future property will be available as security for the payment of any debt and the creditor shall have the right to make available that property, So the charge on that asset is considered to have arisen.

The charge will be considered even if the lender has the right to get its rights enforced in the future instead of today. The charge will be considered even if the lender does not have any whole or specific statutory right over that property or does not have the right to take possession of that property, but he must have the right to provide that security by the order of the court.

Charges include lien and equitable charges, whether created by means of a written instrument or by way of depositing or arranging the deposit of title deeds.

In short, a charge is an arrangement to make any asset available in security for the payment of a debt.

The main features of the charge are as follows-

1. The charge is made on any movable or immovable property of the company.

2. The interest in the property in charge is not transferred.

3. The charge arises because of the actions of the parties and the application of law.

4. The charge can be forever.

5. The area of ​​charge is wide, as it includes the mortgage.

Difference Between Mortgage and Charge

(1) Origination – Mortgage arises from the contract of two parties whereas charge arises due to the act or act of law of the parties.

(2) Transfer of interest In mortgage, there is a transfer of interest in immovable property whereas in charge there is no transfer of interest in immovable property.

(3) Term Mortgage is usually for a fixed period whereas the charge can be forever.

(4) The field-boundary has a limited area while the charge field is wide.

Types of Charges

Charges can be of two types-

(1) Fixed charge – When the charge is generated on certain and specific assets, then it is called fixed charge. Such assets are easily identifiable and remain with the organization for a long period of time. Often such assets may include land, buildings, machines, etc., which are easily identifiable over a long period of time.

The properties on which a fixed charge has been created cannot be traded or transferred by the entity to any other person unless the person holding the charge gives permission.

(2) Floating charge: When a charge is generated not on a specific asset as a security for the payment of a loan, but on all or some of the normal from time to time variable assets of the institution, it is called Called moving charge. According to Lord Gower, “movable charge casts a shadow from time to time over all properties of general description like clouds.” According to Lord Macnaughton, “movable charge is the equitable charge on the movable properties of an institution at a particular point of time”. The salient element of such charge is that such charge is ineffective unless the entity charged is in operation or the person in whose interest the charge is generated does not cause it to be enforced. Such right of his can also be suspended by mutual interference. But if no such transfer is made, he can exercise his right at any time after the error in payment.

Difference in Fixed and Floating Charges.

(1) Assets – Fixed charge can be generated only on certain specific assets which are permanently identifiable and determined Movable charge can be generated on all assets or any part or class of properties which are Changes or keeps on changing from time to time.

(2) Transaction or transfer of property – The company cannot buy, sell or transfer the property charged under fixed charge, whereas the property charged under movable charge can be transacted or transferred under normal business. .

(3) Existing or future assets – both types of movable charges Can be generated on existing assets, whereas fixed charge can be generated only on existing assets.

(4) Conversion – A mobile charge is converted into a fixed charge, but a fixed charge cannot become a mobile charge.

(5) Effect – The floating charge remains ineffective until such time as the institution continues or this right is not exercised by the lender in case of default in payment of the loan by the institution. The effect of fixed charge is clear from the very beginning as to which properties will be affected in case of error.

When the Floating Charge becomes Fixed Charge

If the lender is not able to get his floating charge converted into a fixed charge, then his charge is void. The lender can get such a change done. The process of such change is called the process of crystallisation. A floating charge becomes a permanent charge in the following cases-

1. When the organization ceases to do business.

2. When the winding up of the company starts.

3. When the state recipient or disburser is appointed for the properties of the institution.

4. Jai Sanstha commits error in payment of interest.

5. When the assets of the business are transferred to the creditors.

6. When the institution makes error in payment of the loan and the person in charge exercises his right.

Charges for which registration is mandatory. (Charges Whose Registration is Compulsory)

Registration of the following types of charges is mandatory-

1. A charge securing any issue of debentures i.e. if a company issues debentures and generates a charge for them on the company’s property, then that charge.

2. It is mandatory to register charge on uncalled share capital.

3. Charge on any fixed asset, wherever situated or whatever interest therein may be.

4. Charges on any book debts of the company.

5. Moving charges on undertaking including stock.

6. Charges on requests i.e. applications requested but not paid.

7. Charges on any ship or part of a ship.

8. Goodwill Patent or License under Patent or Charge on Trademark or Copyright.

9. Charges arising abroad on property located abroad.

10. Charges arising in India on property located abroad.

Consequence of Non-Registration of Charge

The charges which are mandatory to be registered and their registration is not done, then it has the following consequences-

(1) Charges in vain – If it is mandatory to register a charge under the Act and it is not registered, then that charge becomes useless. This is not what it means. That the contract between the lender and the company has become void and the lender cannot recover the money from the company.

(2) Money to be payable immediately – If any charge is documented and it becomes void due to non-registration, then the money secured by him becomes payable immediately.

(3) Lender being unsecured – If there is a mistake in any kind of registration, then the lender mentioned therein comes under the category of unsecured lenders.

(4) Liability of the company Due to non-registration of unaffected charge, the liabilities of the debtor or the company remain unaffected. The company has to pay the amount. The reason behind this is that a company cannot take advantage of its own mistake.

(5) No lien on the documents of ownership When the charge becomes void due to non-registration of the charge, the lien of the lender on the ownership documents of the company’s property also ceases. The lien on the documents of ownership is in addition to the charge, not separately.

(6) Rights of the mortgagee or charge-holder of the latter If the first charge on any property is not registered and a second charge is generated and registered on the same property, the holder of the second charge shall be entitled to the holder of the first charge. The expectation will be able to get the first right on that property. Even if the holder of the second charge is aware of the first charge, his rights are not adversely affected.

It may be mentioned here that the above results arise only when the charge is created by the parties. Provided that if the charge is (i) by order of the Court; or (ii) has been generated by the distributor, the above results will not arise if it is not registered.

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