संचालको की सभा का क्या आशय है ? कम्पनी के संचालक मण्डल की सभाओं से सम्बन्धित वैधानिक प्रावधानों की विवेचना कीजिए।

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संचालकों की सभा से आशय (Meaning of Director’s Meeting )

यह सभाएँ वर्ष में कई बार आयोजित होती है। इन सभाओं में कम्पनी से सम्बन्धित मामलों और नीतियों पर विचार-विमर्श किया जाता है और निर्णय लिये जाते हैं, जैसे-अंशों का आवंटन, कम्पनी की नीतियों का निर्धारण करना, बोनस अंश निर्गमित करने की सिफारिश करना, अंश हस्तान्तरण की स्वीकृति देना, ऋण-पत्र निर्गमन की योजना बनाना, लाभांश के सम्बन्ध में सिफारिश करना आदि। संचालकों की सभाओं को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया है

(1) संचालक मण्डल की सभाएँ-संचालकों के समूह को संचालक मण्डल कहते हैं। यह संचालक मण्डल जब कम्पनी से सम्बन्धित नीतियों एवं महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श करने के लिए सभा आयोजित करता है तो इसे संचालक मण्डल की सभा कहते हैं। ऐसी दशा में प्रत्येक संचालक को एक वोट देने का अधिकार होता है। यदि पक्ष और विपक्ष में वोट बराबर होते हैं तो अध्यक्ष का वोट निर्णायक वोट कहलाता है।

(2) संचालक समिति की सभाएँ-बड़ी-बड़ी कम्पनियों में यदि उनके अन्तर्नियम अनुमति दें तो संचालक मण्डल कुछ विशेष प्रकार के कार्यों को सम्पन्न करने के लिए संचालकों की छोटी-छोटी समितियाँ बना देते हैं, जिनमें 1, 2 या 3 संचालक होते हैं। इनमें से कुछ समितियाँ स्थायी स्वभाव की होती हैं, जैसे-अंश हस्तान्तरण समिति, वित्त समिति आदि, किन्तु कुछ समितियाँ विशेष कार्यों को सम्पन्न करने के लिए अस्थायी रूप से गठित की जाती हैं, जैसे-स्टाफ प्रॉवीडेण्ट फण्ड पर विचार करना। जब इनमें से किसी एक या अधिक समिति की सभा बुलायी जाती है तो इन्हें संचालक समिति की सभा कहते हैं।

संचालक मण्डल की सभा से सम्बन्धित प्रावधान (Provisions Regarding Director’s Meeting)

संचालक मण्डल की सभा के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रावधान हैं–

(1) संचालक मण्डल की सभाओं का समय-संचालक मण्डल की सभाएँ करने का समय अन्तर्जियमों में दिया रहता है, परन्तु संचालकों को यह अधिकार होता है कि वे आवश्यकतानुसार हम्पनी सभाएँ बुला सकते हैं। वे प्रत्येक सभा में अगली सभा की तिथि निर्धारित कर सकते हैं। | यद्यपि संचालक मण्डल की सभाएँ कम्पनी व्यापार के स्वभाव के अनुसार साप्ताहिक, मासिक या अन्य किसी अवधि के अनुसार बुलायी जा सकती हैं, परन्तु कम्पनी अधिनियम के अनुसार संचालक मण्डल की सभाएँ तीन महीने में एक और प्रत्येक वर्ष में कम से कम ऐसी चार सभाएँ जरूर होनी चाहिए।

(2) संचालक मण्डल की सभा की सूचना-इन सभाओं की लिखित सूचना ऐसे संचालकों को, जो कुछ समय के लिए भारत से बाहर है, दी जायेगी तथा अन्य संचालकों को उनके भारत के साधारण पते पर भेजी जाती हैं। यदि इस सूचना के देने में त्रुटि की जाती है तो दोषी व्यक्ति पर ₹1,000 तक जुर्माना किया जा सकता है।

(3) संचालक मण्डल की सभा की कार्यवाहक संख्या-संचालक मण्डल की सभा के लिए | न्यूनतम संख्या (Quorum) संचालकों की कुल संख्या के 1/3 या दो जो अधिक है, होगी। यदि न्यूनतम संख्या नहीं हो पाती है, तो सभा उसी स्थान पर समय पर अगले सप्ताह के लिए स्थगित कर दी जाती है। यदि स्वगित सभा में भी न्यूनतम संख्या नहीं हो पाती तो जितने भी संचालक उपस्थित होंगे वही न्यूनतम संख्या मान ली जायेगी।

(4) संचालक मण्डल की सभा का अध्यक्ष-संचालक मण्डल की सभा अध्यक्ष के नियन्त्रण में होती है। संचालक मण्डल की प्रथम सभा में अन्तर्नियमों की व्यवस्था के अनुसार अध्यक्ष चुन लिया जाता है। वही प्रत्येक सभा का अध्यक्ष होता है। यदि अध्यक्ष अनुपस्थित रहता है तो किसी उपस्थित संचालक को अध्यक्ष चुन लिया जाता है।

(5) संचालकों के कार्य की वैधता- किसी संचालक द्वारा किये गये समस्त कार्य वैध होंगे, चाहे बाद में यह पता चले कि उसकी नियुक्ति किसी अयोग्यता के कारण अवैध यी अथवा अधिनियम या अन्तनियमों के अधीन समाप्त हो चुकी थी |

(6) घुमाकर पारित किये जाने वाले प्रस्ताव-जब संचालक मण्डल की सभा तुरन्त बुलाना सम्भव न हो तो महत्वपूर्ण प्रस्तावों को संचालकों के पास भेजकर उनकी स्वीकृति ली जाती है। जो प्रस्ताव पारित करना है उसको आवश्यक कागजातों के साथ संचालकों की स्वीकृति हेतु घुमाया जाना चाहिए।

(7) प्रस्ताव में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हित-भारतीय कम्पनी अधिनियम की धारा 300 के अनुसार, विचाराधीन प्रस्तावों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित रखने वाले संचालकों को मण्डल की सभा में तो उस समय भाग लेने का अधिकार है, जब प्रस्ताव विचाराधीन हों और न ही अपना मत प्रकट करने का अधिकार होता है।

(8) प्रश्न पर निर्णय सभा में उठाये गये प्रश्न का निर्णय पक्ष और विपक्ष के मतों की बराबरी की स्थिति में मण्डल अध्यक्ष के निर्णयानुसार होगा या बहुमत द्वारा किया जायेगा।

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