अंशपूँजी से क्या आशय है ? अश पूँजी कितने प्रकार की होती है ? अशपूँजी में परिवर्तन करने के विभिन्न ढंग तथा इससे सम्बन्धित वैधानिक नियम क्या है ? इसकी विवेचना कीजिए। What is meant by share capital? What are the types of equity capital? What are the different methods of converting equity capital and the statutory rules related to it? Discuss it.

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अंश-पूँजी का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definition of Share Capital)

जैसाकि इसके नाम से स्पष्ट है, अंश-पूंजी से आशय कम्पनी की कुल पूंजी के उस भाग से है जोकि एक कम्पनी को अपने अंशों का निर्मगल (Share) करके प्राप्त हुई या प्राप्त की जानी है।

कम्पनी की पूंजी एक निश्चित राशि की अविभाजित इकाइयों में बेटी हुई होती है। ये इकाइयाँ ‘अंश’ कहलाती है। अंशों का योग ‘अंश पूँजी’ कहलाता है।

एम. सी कुल (M C Kuchhal) के अनुसार, “अंश-पूँजी से आशय पूंजी की उस मात्रा से है जोकि कम्पनी के अंशों के निर्भमन से प्राप्त हुई है अथवा प्राप्त की जानी है।”

एस. एम. शाह के अनुसार, “कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत पूँजी शब्द कई अर्थों-अधिकृत पूँजी नियंतिपूँजी, प्रार्थित पूँजी, प्रदत्त पूंजी में प्रयुक्त किया जाता है।”

पामर (Palmer) के अनुसार, “अंश-पूँजी से आशय उस पूंजी से है जो अंशों का विक्रय करके प्राप्त की जाती है।”

उपयुक्त परिभाषा

अंश-पूंजी की उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के पश्चात् निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि अंश-पूंजी से आशय कम्पनी की पूंजी की उस मात्रा से है जो उसे अंशों के निर्गमन करने पर प्राप्त हुई है अथवा प्राप्त की जाती है। ”

अंश-पूँजी के प्रकार (Kinds of Share Capital)

एक अंशों द्वारा सीमित दायित्वों वाली कम्पनी की अंशपूँजी निम्नलिखित दो प्रकार की होगी–

1. समता अशपूँजी (Equity Share Capital)-समता अंश पूंजी से आशय उस पूँजी से है जो पूर्वाधिकार अंशपूँजी नहीं है। दूसरे शब्दों में समता अंशपूंजी से आशय उस पूँजी से है जिसके धारकों को निम्न अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं-(i) वरीयता के आधार पर लाभांश प्राप्त करने का अधिकार (ii) कम्पनी के समापन की दशा में पूंजी वापसी में वरीयता पाने का अधिकार

इस प्रकार समता अंशपूंजी के धारकों को लाभांश पूर्वाधिकार अंसपूँजी पर लाभांश देने के पश्चात् दिया जाता है और इस बेटवारे के बाद लाभांश नहीं बचता है तो इन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। इनके लाभांश की दर संचालकों द्वारा निर्धारित की जाती है। समता अंतपूंजी के प्रारक कम्पनी के प्रवन्ध में सक्रिय भाग लेते हैं, मताधिकार द्वारा संचालक मण्डल चुनते हैं और वार्षिक सामान्य सभा के द्वारा कम्पनी पर नियन्त्रण रखते हैं। वास्तव में समता अंश पूंजी के धारक कम्पनी के वास्तविक स्वामी होते हैं।

समता अंशपूँजी निम्न में से किसी भी प्रकार की हो सकती है- (i) मताधिकार सहित (With voting right) अंशपूँजी (ii) लाभांश, मताधिकार या अन्य किसी प्रकार के असमान या विभेदक अधिकार वाली अंशपूँजी जो कि निर्धारित नियमों के अनुसार व शर्तों के अधीन होगी।

2. पूर्वाधिकार अशपूँजी (Preference Share Capital)- अंशों द्वारा सीमित किसी कम्पनी की दशा में पूर्वाधिकार अंशपूँजी से आशय कम्पनी द्वारा निर्गमित अंशपूँजी के ऐसे भाग से है जिस पर लाभांश के भुगतान में तथा कम्पनी के समापन पर पूँजी के भुगतान में पूर्वाधिकार प्राप्त होता है।

अंशपूँजी के रूप (Form of Share Capital)

कम्पनी की अंशपूंजी के विभिन्न रूपों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है–

1. अधिकृत पूँजी (Authorised Capital)-इसे पंजीकृत पूँजी (Registered Capital) या नाममात्र (Nominal Capital) भी कहते हैं। अधिकृत पूँजी का उल्लेख कम्पनी के पार्षद सीमानियम के पूंजी वाक्य में होता है। यह किसी कम्पनी की अधिकतम पूँजी होती है। इसको निर्धारित करते समय कम्पनी की वर्तमान एवं भावी दोनों प्रकार की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाता है।

2. निर्गमित पूँजी (Issued Capital)-यह अधिकृत पूँजी का वह भाग है जो जनता द्वारा क्रय करने के लिए कम्पनी द्वारा निर्गमित किया जाता है। व्यवहार में, सम्पूर्ण अधिकृत पूँजी एक समय में ही निर्गमित नहीं की जाती है, परन्तु उसका केवाल एक भाग ही तत्काल और शेष भाग आवश्यकता पड़ने पर निर्भमत किया जाता है।

3. प्रार्थित पूँजी (Subscribed Capital)-प्रार्थित पूँजीनत पूँजी का वह भाग है, जो जनता द्वारा संग्रह करने के लिए प्रार्थित निर्गमन हेतु प्रस्तुत किया जाता है। प्रार्थित पूँजी की दा स्थितियों हो सकती है- (1) अधि-प्रार्थित होना, या (ii) अल्प प्रार्थित होना। जय कम्पनी द्वारा प्रस्तादिय संख्या से अधिक संख्या में जनता से क्रय आवेदन-पत्र प्राप्त हो जाते हैं तो ऐसी दशा में पूंजी अधि-प्रार्थित (Over Subscribed) कही जायेगी। यदि क्रय आवेदन पत्र कम संख्या में आये है, तो पूँजी अल्प प्रार्थित (Under Subscribed) कही जायेगी।

4. याचित पूँजी (Called-up Capital)-कम्पनी अंशपूँजी प्रायः किश्तों में माँगती है। प्रत्येक अंशधारी अपने लिए अंशों का मूल्य इन किश्तों में भुगतान करता है। किश्तों को माँग (कहने हैं। अतः कम्पनी विक्रय किये गये अंशों पर जितने धन की माँग करती है, वह उसकी माँगी हुई पूंजी कहलाती है। उदाहरणतया अंश का मूल्य जितना है उस पर पहली किश्त प्रार्थित धन (Application Money), दूसरी किश्त आवंटन राशि (Allotment Money), तीसरी कित पहली माँग राशि (Finst Call Money) कहलाती है। इसके बाद की किश्त को दूसरी माँग राशि और पाँचवी किश्त अन्तिम माँग राशि कहलाती है। इस प्रकार सब किश्तों के भुगतान होने पर हम कह सकते हैं कि अंशों का सब रुपया वसूल हो गया है। इस प्रकार जितने धन की कम्पनी माँग करती है वह माँगी हुई पूँजी कहलाती है।

5. अयाचित पूँजी (Uncalled-up Capital)-आबंटित पूँजी का वह भाग जिसको नहीं माँगा गया है अर्थात् माँगा जाना शेष है, अयाचित पूँजी कहलाता है, जैसे-₹100 अंकित मूल्य वाले अंश में केवल ₹75 ही माँग गये हैं, तो शेष ₹25 अयाचित पूँजी (Calls-in-arrears) कहलायेगी।

6. चुकता पूँजी (Paid up Capital) यह याचित पूँजी का वह भाग है जो अंशधारियों द्वा चुकता किया जा सकता है। ऐसा भी सम्भव है कि कुछ अंशधारी याचित पूँजी की पूर्ण राशि नहीं है पाते। इसलिए यह शेष याचना राशि कहलाती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(64) अनुसार, “चुकता अंशपूँजी का आशय निर्गमित अंशों पर भुगतान के रूप में प्राप्त राशि तथा कम्पनी के अंशों के सम्बन्ध में भुगतान की गयी राशि के रूप में जमा की गयी राशि के योग से होता है।

7. सचित अथवा आरक्षित पूँजी (Reserve Capital or Reserve Liability/- कभी-कभी जब कम्पनियों व अनुभव करती है कि उन्हें अब धन की आवश्यकता नहीं है तो वे विशेष प्रस्ताव द्वार यह निश्चित कर सकती है कि उनकी समस्त न माँगी हुई पूंजी (Uncalled-up Capital) अवध उसका कुछ भाग तब तक अंशधारियों से नहीं माँगा जायेगा जब तक कि कम्पनी के समाय (Winding-up) का समय न आ जाय। अतएव न माँगी हुई पूँजी का वह भाग जोकि किसी विशेष उद्देश्य के लिए संचित कर लिया जाता है, संचित पूँजी कहलाता है।

अधिकृत पूँजी, निर्गमित पूँजी और चुकता पूँजी में अन्तर ( Difference between Authorised Capital, Issued and Paid-up capital )

अंशपूँजी में परिवर्तन (Alteration of Share Capital)– एक अंशपूँजी वाली कम्पनी अथवा गारन्टी द्वारा सीमित अंशपूँजी वाली कम्पनी के अन्तनियम यदि स्वीकृति प्रदान करें तो कम्पनी अधिनियम के अनुसार अपने पार्षद सीमानियम में दी गयी शर्तों में परिवर्तन करके निम्न प्रकार से पूंजी में परिवर्तन कर सकती है–

(1) नये अंशों के निर्गमन द्वारा अंशपूँजी में वृद्धि-कम्पनी अपने अन्तनियमों द्वारा अधिकृत होने पर अपनी आवश्यकतानुसार नये अंशों का निर्गमन करके अपनी अंशपूँजी में वृद्धि कर सकती है।

(2) अंशपूँजी का अधिक मूल्य के अशों में एकीकरण तथा विभाजन करके-कम्पनी अपनी समस्त अथवा कुछ अंशपूँजी का एकीकरण करके कम मूल्यों के अंशों की अपेक्षा अधिक मूल्यों के अंशों में परिवर्तित कर सकती है। इस प्रकार कम्पनी की अधिकृत पूँजी में कोई परिवर्तन नहीं होता बल्कि अंशों का अंकित मूल्य बढ़ जाता है और अंशों की संख्या कम हो जाती है।

(3) पूर्णदत्त अंशो का स्टॉक तथा स्टॉक का किसी निश्चित मूल्य के पूर्णदत्त अंशों में परिवर्तन करके-कम्पनी के अन्तर्नियमों में व्यवस्था होने पर एक अंशपूँजी वाली सीमित दायित्व वाली कम्पनी अपने समस्त अथवा कुछ पूर्णदत्त अंशों को स्टॉक में परिवर्तित कर सकती है। इसी प्रकार स्टॉक पूँजी को पुनः अंशपूँजी में परिवर्तित कर सकती है। ऐसी दशा में पूंजी वाक्य में पुनः अंशपूँजी सम्बन्धी विवरण अंकित किया जायेगा।

(4) अंशपूँजी का उपविभाजन करके-कम्पनी अपने अंशों अथवा उसमें से कुछ भाग को पार्षद सीमानियम द्वारा निर्धारित मूल्य से कम मूल्य के अंशों में उपविभाजन कर सकती है। ऐसे उपविभाजन में प्रत्येक कम किये गये अंशों पर प्रदत्त धनराशि तथा किसी अदत्त धनराशि का अनुपात वही रहना चाहिये जो कि मूल अंशों में था।

(5) अशपूँजी को रद्द करके-कम्पनी ऐसे अंशों को रद्द कर सकती है जो कि प्रस्ताव पारित होने की तिथि तक न तो किसी व्यक्ति द्वारा ग्रहण किये गये हैं न ही इस सम्बन्ध में कोई व्हराव हुआ है। इस सम्बन्ध में यह महत्वपूर्ण है कि इस अवस्था के अधीन अंशपूँजी में कमी करना अधिनियम के अधीन अंशपूँजी कम कर देना नहीं माना जायेगा। इसे पूँजी का हास कहते हैं।

परिवर्तन के लिए वैधानिक प्रावधान (Legal Provision for Alteration of Capital) कम्पनी की अंशपूंजी में परिवर्तन करने के लिए कम्पनी अधिनियम में निम्नलिखित वैधानिक प्रावधान है–

(1) अन्तर्नियमों द्वारा अधिकृत होने पर-अंशपूंजी में परिवर्तन तभी किया जा सकता है जबकि अन्तनियम इसे अधिकृत करे। यदि अन्तर्णियमों में ऐसा अधिकार प्रदान नहीं किया गया है तो सर्वप्रथम एक विशेष प्रस्ताव पारित करके अन्तनियमों में इस आशय का परिवर्तन कर लेना चाहिए।

(2) साधारण प्रस्ताव पारित करना-अंजी में परिवर्तन कम्पनी की सामान्य सभा में एक साधारण प्रस्ताव पारित करके किया जा सकता है। एक अनुमति नहीं है।

(13) अधिकरण से अनुमोदन कम्पनीको में किये जाने के लिए अधिकरण से अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक नहीं है।

(4) रजिस्ट्रार को सूचना भेजना-अंजी में परिवर्तन की तिथि से 30 दिनों के अन्दर परिवर्तन की सूचना रजिस्ट्रार को भेजी जायेगी। यह निर्धारित शुल्क एवं परिवर्तित समयम की प्रति के साथ दी जायेगी। इसके पश्चात् रजिस्ट्रार सूचना का पंजीयन कर लेगा।

(5) रजिस्ट्रार को सूचना न देने पर आर्थिक दण्ड यदि अंपूँजी में परिवर्तन की सूचना रजिस्ट्रार को नहीं दी जाती है तो कम्पनी तथा कम्पनी के प्रत्येक दोषी अधिकारी को ₹1,000 प्रतिदिन के हिसाब से तब तक आर्थिक दण्ड लगाया जायज तक ऐसा दोष जारी रहेगा अथवा ₹5 लाख दोनों में से जो भी कम हो।


Meaning and Definition of Share Capital

As its name suggests, share capital means that part of the total capital of the company which a company has received or is to be received by the issue of its shares.

The capital of the company is divided into undivided units of a fixed amount. These units are called ‘fractions’. The sum of the shares is called ‘share capital’.

According to M. C. Kuchhal, “Part-capital means that amount of capital which has been received or is to be received from the issue of shares of the company.”

s. According to M. Shah, “Under the Companies Act, the word capital is used in many senses – authorized capital, controlled capital, requested capital, paid up capital.”

According to Palmer, “Share capital means the capital obtained by selling shares”.

appropriate definition

After studying the above definitions of share capital, in conclusion it can be said that share capital means that amount of capital of the company which is received or received by it on issue of shares. ,

Kinds of Share Capital

The share capital of a company having liabilities limited by one share will be of the following two types-

1. Equity Share Capital – Equity share capital means that capital which is not preference share capital. In other words, equity share capital means that capital, the holders of which do not have the following rights- (i) right to receive dividend on preference basis (ii) right to get priority in return of capital in case of winding up of the company.

Thus, the holders of equity share capital are given dividend after paying dividend on preference equity and after this divide, if there is no dividend left, then they do not get anything. The rate of their dividend is determined by the operators. The originators of equity end capital take an active part in the management of the company, elect the board of directors by voting rights and exercise control over the company through annual general meetings. In fact, the holders of equity share capital are the real owners of the company.

Equity share capital may be of any of the following types – (i) With voting right, share capital (ii) Share capital with dividend, voting rights or any other unequal or differential rights which is subject to the prescribed terms and conditions. will be subject to

2. Preference Share Capital – In the case of a company limited by shares, preference share capital means such part of the equity capital issued by the company on which preference is given in the payment of dividend and in the payment of capital on the dissolution of the company. .

Form of Share Capital

The different forms of share capital of a company can be explained as follows-

1. Authorized Capital – It is also called Registered Capital or Nominal Capital. The authorized capital is mentioned in the capital clause of the company’s councilor memorandum. It is the maximum capital of a company. While determining this, both present and future needs of the company are kept in mind.

2. Issued Capital – This is that part of the authorized capital which is issued by the company for the purchase of the public. In practice, the entire authorized capital is not issued at a time, but only a part of it is issued immediately and the remaining part is issued as and when required.

3. Subscribed Capital – The part of the requested capital is that which is offered for the requested issue for collection by the public. Two situations of requested capital can be – (1) to be over-requested, or (ii) to be under-requested. If more number of purchase applications are received from the public than the number proposed by Jai Company, then in such a case the capital will be said to be over subscribed. If less number of purchase applications have come, then the capital will be said to be under subscribed.

4. Called-up Capital – The company usually asks for the share capital in installments. Each shareholder pays for himself the value of the shares in these instalments. The installments are to be called (say. Therefore, the amount demanded by the company on the shares sold is called its called capital. For example, the amount of the share is as much as the first installment is requested (application money), the second installment is the allocation amount. (Allotment Money), the third installment is called the first call money. After this the second installment is called the second call money and the fifth installment is called the final call money. Thus after all the installments are paid, we can say that the number of shares is All the money has been recovered.In this way the amount demanded by the company is called called capital.

5. Uncalled-up Capital – That part of the allocated capital which has not been asked, i.e. remains to be called, is called uncalled capital, e.g. only ₹ 75 has been asked in the share of ₹ 100 face value, then The remaining ₹25 will be called Calls-in-arrears.

6. Paid up Capital This is that part of the called up capital which can be paid up by the shareholders. It is also possible that some shareholders may not get the full amount of the called capital. Hence this balance is called call amount. As per section 2(64) of the Companies Act, 2013, “paid-up share capital

Means the sum of the amount received by way of payment on the shares issued and the amount deposited as payment in respect of the shares of the company.

7. Reserve Capital or Reserve Liable -up Capital) Oudh, part of it will not be demanded from the shareholders until the time of winding-up of the company comes. Therefore, that part of the un-asked capital which would have been accumulated for a particular purpose. It is called accumulated capital.

Difference between Authorized Capital, Issued and Paid-up capital

Alteration of Share Capital – If the articles of a company with a share capital or a company having limited share capital by guarantee approve, then the company can change the capital in the following way by changing the conditions given in its councilor memorandum according to the Act. is–

(1) Increase in share capital by issue of new shares – The company may increase its share capital by issuing new shares as per its requirement if authorized by its Articles.

(2) By amalgamation and division of share capital into shares of higher value – a company can amalgamate all or some of its share capital and convert it into shares of higher value than shares of lower value. In this way there is no change in the authorized capital of the company rather the face value of the shares increases and the number of shares decreases.

(3) By converting fully paid-up shares into stock and stock of a certain value into fully paid-up shares—a share capital limited liability company may convert all or some of its fully paid-up shares into stock, provided that the articles of the company provide for it. Similarly, stock capital can be converted back into share capital. In such a case, the details regarding share capital will be mentioned again in the capital sentence.

(4) By sub-dividing the share capital – the company may sub-divide its shares or part of it into shares of less value than the value fixed by the councilor’s memorandum. In such subdivision, the ratio of the amount paid on each of the reduced shares and any unpaid amount should remain the same as in the original shares.

(5) By cancellation of share capital – The company may cancel such shares which, as on the date of the passing of the resolution, have neither been held by any person nor any movement has taken place in this behalf. It is important in this regard that reduction in share capital under this stage will not be treated as reduction in share capital under the Act. This is called depletion of capital.

Legal Provision for Alteration of Capital There are following statutory provisions in the Companies Act to make changes in the share capital of the company-

(1) Authorized by Articles – Change in share capital can be done only if the Articles authorize it. If such a right has not been provided in the Articles, then first by passing a special resolution, this effect should be changed in the Articles.

(2) Passing of general resolution – Change in the register can be done by passing a general resolution in the general meeting of the company. One is not allowed.

(13) It is not necessary to obtain the approval of the Tribunal for the approval of the Tribunal in a company.

(4) Sending intimation to the Registrar- A notice of change shall be sent to the Registrar within 30 days from the date of change in the number. It will be given along with the prescribed fee and a copy of the changed time. Thereafter the registrar will register the information.

(5) Penalty for not giving notice to the Registrar If the change in capital is not informed to the Registrar, then fine of ₹ 1,000 per day to the company and every defaulting officer of the company will continue till such defect is justified, or ₹ 5 lakh whichever is less.

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