सभा से क्या आशय है ? कम्पनी की सभाएँ कितने प्रकार की होती है ? What is meant by meeting? What are the types of company meetings?

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कम्पनी सभा से आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Company Meeting)

कम्पनी विधान द्वारा निर्मित एक कृत्रिम व्यक्ति है, जिसका प्रबन्ध व प्रशासन सजीव व वास्तविक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। इन व्यक्तियों को सामान्यतः संचालक कहते हैं। यह व्यक्ति कम्पनी के समामेलन से लेकर समापन तक के समस्त कार्यों को अनेक प्रकार की सभाओं में निश्चित करके पूरा करते हैं जिससे कम्पनी का प्रबन्ध सुव्यवस्थित एवं वैधानिक ढंग से चल सके और कम्पनी का सर्वांगीण विकास हो सके।

जब दो या दो से अधिक व्यक्ति एक निश्चित स्थान पर किसी पूर्व सूचना या पारस्परिक व्यवस्था द्वारा किन्ही विशेष कार्यों पर विचार-विमर्श करके किसी निर्णय के लिए एकत्रित होते हैं तो इसे सभा कहते हैं। शार्प एवं डब्ज के अनुसार, एक से अधिक व्यक्तियों का एक स्थान पर एकत्रित होना सभा कहलाता है।

हैड एवं विलराल के अनुसार कम्पनी के सामान्य या विशेष व्यावसायिक कार्यों को करने के उद्देश्य से एक न्यू-कार्यवाहक संस्था का एक साथ आबा अथवा संयुक्त रूप से लाभा कहलाता है।

वैध सभा के आवश्यक तत्व (Requisities of a Valid Meeting)

कम्पनी द्वारा आयोजित की जाने वाली सभाएँ वैध होनी चाहिए अन्यथा उन सभाओं में लिए जाने वाले निर्णयों तथा पारित किये जाने वाले प्रस्तावों का कोई वैधानिक प्रभाव नहीं होगा। वैध सभा के आयोजन के लिए निम्न आवश्यक बातों को ध्यान में रखना चाहिए–

(1) सभा अधिकृत प्राधिकारी द्वारा बुलाई जानी चाहिए।

(2) सभा में उपस्थित होने का अधिकार रखने वाले सभी व्यक्तियों को उचित सूचना दी जानी चाहिए।

(3) सभा में कार्यवाहक संख्या या गणपूर्ति (Quarum) होनी चाहिए।

(4) सभा का अध्यक्ष उचित रूप से नियुक्त किया हुआ होना चाहिए।

(5) सभा की निश्चित कार्यसूची (Agenda) होनी चाहिए।

(6) स्थगित सभाएँ भी उचित ढंग से आयोजित होनी चाहिए।

(7) सभा में निर्णय हेतु उचित प्रकार के प्रस्ताव पारित होने चाहिए।

(8) सभा की कार्यवाही के कार्यवृत्त या सूक्ष्म (minutes) लिखने चाहिए।

कम्पनी की सभाओं के प्रकार (Kinds of Company Meetings)

(A) अशापारियों की सभाएँ-वे सभाएँ जिनमें कम्पनी के समस्त सदस्य उपस्थित होने एवं वोट देने का अधिकार रखते हैं, अंशधारियों की सभाएँ कहलाती है। ये सभाएँ निम्न प्रकार की होती है–

(1) वार्षिक सामान्य सभा (Annual General Meeting)- वार्षिक सामान्य सभा से आशय कम्पनी के सदस्यों की एक महत्वपूर्ण सभा से है। इसे प्रतिवर्ष बुलाना एवं आयोजित करना प्रत्येक कम्पनी (एक व्यक्ति कम्पनी को छोड़कर) के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य है।

प्रत्येक कम्पनी को अपनी प्रथम वार्षिक सामान्य सभा अपने प्रथम वित्तीय वर्ष की समाप्ति के 9 माह के अन्दर आयोजित करनी पड़ती है। यदि कोई कम्पनी इस अवधि में अपनी प्रथम वार्षिक सामान्य सभा आयोजित करती है तो उसे अपने समामेलन के वर्ष में कोई वार्षिक सामान्य सभा आयोजित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

प्रथम वार्षिक सामान्य सभा के बाद होने वाली प्रत्येक वार्षिक सामान्य सभा कम्पनी के वित्तीय वर्ष की समाप्ति के 6 माह के अन्दर आयोजित करनी होगी। दो वार्षिक सामान्य सभाओं के मध्य 15 माह से अधिक समय नहीं होना चाहिए। यदि रजिस्ट्रार चाहे तो प्रथम वार्षिक सामान्य सभा को छोड़कर अन्य वार्षिक सामान्य सभाओं की अवधि 3 माह तक और बढ़ा सकता है।

प्रत्येक वार्षिक साधारण सभा कार्यालय के समय में तथा ऐसे दिन जो सार्वजनिक छुट्टी का दिन न हो, बुलाई जाती है। वह सभा या तो कम्पनी के रजिस्टर्ड कार्यालय में होती है या ऐसे शहर, कस्बे, गाँव के किसी अन्य भाग में की जाती है जिसमें कम्पनी का रजिस्टर्ड कार्यालय हो।

इस सभा में कम्पनी की वर्ष भर की प्रगति की समीक्षा की जाती है, वार्षिक खातों पर विचार-विमर्श करके उन्हें स्वीकार किया जाता है, संचालकों व अंकेक्षकों की नियुक्ति की जाती है तथा लाभांश की सिफारिश की जाती है।

वार्षिक साधारण सभा बुलाने के लिए कम्पनी के समस्त सदस्यों, अंकेक्षकों तथा अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों को 21 दिन पूर्व स्पष्ट नोटिस भेज देना चाहिए। इस नोटिस के साथ प्रॉक्सी फार्म एवं कार्यक्रम संलग्न कर देना चाहिए।

इस सभा के लिए कम्पनी अधिनियम के अनुसार पब्लिक कम्पनी की दशा में 5 व्यक्तियों और प्राइवेट कम्पनी की दशा में 2 व्यक्तियों की उपस्थिति कोरम मानी जाती है।

(2) असाधारण सामान्य सभा (Extra-ordinary General Meeting)- कम्पनी के सदस्यों की वे सभी सभायें जो दो वार्षिक साधारण सभाओं के अन्तराल के दौरान होती है, असाधारण सामान्य सभाएँ कहलाती हैं। कोई भी कम्पनी जब चाहे अपनी असाधारण सामान्य सभा कर सकती है किन्तु किसी भी कम्पनी के लिए ऐसी सभा बुलाना एवं आयोजित करना अनिवार्य नहीं है। जब कभी संचालक मण्डल के सदस्य यह अनुभव करते हैं कि कुछ कार्यों को अगली वार्षिक सामान्य सभा तक टाला नहीं जा सकता है, ऐसी स्थिति में कम्पनी को अपने सदस्यों की तत्काल एक सभा बुलानी पड़ती है। इसी प्रकार कम्पनी के सदस्य भी कम्पनी की तत्काल सभा बुलाने की माँग करते हैं। ऐसी सभा को असाधारण सामान्य सभा कहते हैं। यह सभा एक वर्ष में कई बार एवं कभी भी बुलाई जा सकती है। असाधारण सभाएँ विशिष्ट और अति आवश्यक कार्यों पर तत्काल विचार-विमर्श या निर्णय लेने हेतु आयोजित की जाती है ताकि अवसर का लाभ उठाया जा सके।

(3) वर्ग सभाएँ-जब कम्पनी कई प्रकार के अंश निर्गमित करती है तो वह प्रत्येक प्रकार के अंशधारियों की सभा बुला सकता है ताकि उस वर्ग के अंशधारियों के अधिकारों में परिवर्तन पर विचार किया जा सके अथवा इनका वर्ग बदला जा सके तो ऐसी सभाएँ वर्ग सभा कहलाती हैं। दूसरे शब्दों में, जब भिन्न-भिन्न प्रकार के अंशधारियों की पृथक्-पृथक् सभाएँ आयोजित की जाती है तो इन्हें वर्ग सभा कहते हैं।

(B) संचालकों की सभाएँ-कम्पनी का मूल प्रबन्ध संचालकों के हाथ में होता है। यद्यपि संचालकों पर अंशधारी का ही नियन्त्रण होता है किन्तु अंशधारियों के नियन्त्रण का क्षेत्र सीमित होता है। कम्पनी की नीतियों, प्रबन्ध नियन्त्रणों एवं अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर विचार-विमर्श संचालकों की सभाओं में ही होता है। संचालकों की सभाओं को निम्न दो भागों में बाँटा गया है-(1) संचालक मण्डल की सभाएँ, (2) संचालक समितियों की सभाएँ।

(C) लेनदारों की सभा-जब कभी ऐसे विषय पर विचार करना पड़ता है जिसका प्रभाव लेनदारों के हितों पर पड़ता है, उस समय लेनदारों की सभा बुलानी पड़ती है। प्रायः कम्पनी कोई समझौता अपने लेनदारों से करना चाहती है, उस समय उसके द्वारा अथवा उसके किसी लेनदार अथवा सदस्य द्वारा प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किये जाने पर न्यायालय लेनदारों की सभा बुलाने का आदेश दे सकता है। यदि प्रस्तावित विषय कम्पनी के सम्पूर्ण लेनदारों में से 3/4 भाग द्वारा स्वीकृत हो जाता है, तो न्यायालय द्वारा उसकी स्वीकृति मिल जाने पर अंशधारियों को भी मान्य होगा। कम्पनी के समापन समय पर लेनदारों की सभा बुलाई जा सकती है। ऐसे समय सभा के बुलाने का उद्देश्य कम्पनी के ऋणों का अनुमान लगाना तथा सभापति की नियुक्ति करना होता है।

(D) ऋणपत्रधारियों की सभा-सदस्यों और संचालकों की सभाओं के अतिरिक्त ऋऋणपत्रधारियों की सभाएँ भी होती हैं। ऋणपत्रधारी कम्पनी के विशेष प्रकार के महाजन होते हैं। जब कम्पनियों ऋणपत्र जारी करती है और दूसरों की नियुक्ति करती हैं, उसी समय वे ऋणपत्रधारियों की सभा बुलाने की व्यवस्था करती है। जब किसी कारणवश ऋणपत्रधारियों का हित प्रभावित होता है तो उनकी राय लेने के लिये जो सभा बुलाई जाती है, उसे ऋणपत्रधारियों की सभा कहते हैं।

कम्पनी सभाओं के सम्बन्ध में सचिव के कर्तव्य (Duties of Secretary about the Meeting of Companies)

(अ) सभा के पूर्व कर्त्तव्य

(1) सभा की तिथि तय करना, (2) सभा का कार्यक्रम निर्धारित करना, (3) सभा की सूचना देना, (4) प्रस्तावों की तैयारी (5) महत्वपूर्ण प्रलेखों की तैयारी करना, (6) अन्य आवश्यक सामग्री की व्यवस्था, (7) उत्तम बैठक व्यवस्था।

(ब) सभा के समय सचिव के कर्त्तव्य

(1) उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर लेना, (2) कार्यवाहक संख्या की जाँच, (3) सूक्ष्म पढ़ना, (4) स्पष्टीकरण एवं आवश्यक प्रलेखों को प्रस्तुत करना, (5) सभा संचालन में सभाध्यक्ष की मदद करना।

(स) सभा के पश्चात् सचिव के कर्त्तव्य

(1) सूक्ष्म तैयार करना , (2) स्वीकृत प्रस्तावों को कार्यान्वित करना।


Meaning and Definition of Company Meeting

A company is an artificial person created by law, whose management and administration is done by living and real persons. These persons are commonly called directors. These persons complete all the tasks from the amalgamation to the winding up of the company by fixing it in many types of meetings so that the management of the company can run in an orderly and legal manner and all round development of the company can be done.

When two or more people gather at a fixed place for a decision after discussing some particular work by prior information or mutual arrangement, it is called a meeting. According to Sharpe and Dabbs, gathering of more than one person at one place is called assembly.

According to Haidt and Villarral, the acquisition of a new-carrying organization for the purpose of carrying out the general or special business functions of the company is called jointly or jointly beneficiary.

Requirements of a Valid Meeting

The meetings to be organized by the company should be legal, otherwise the decisions taken in those meetings and the resolutions to be passed will not have any statutory effect. The following important things should be kept in mind for organizing a valid meeting-

(1) The meeting shall be convened by the authorized authority.

(2) Proper notice should be given to all persons entitled to attend the meeting.

(3) There should be a caretaker number or quorum in the assembly.

(4) The Speaker of the House should be properly appointed.

(5) There should be a definite agenda of the meeting.

(6) The adjourned meetings should also be organized properly.

(7) Appropriate type of resolutions should be passed for decision in the assembly.

(8) Minutes or minutes of the proceedings of the House should be written.

Kinds of Company Meetings

(A) Meetings of non-sharers- Those meetings in which all the members of the company have the right to be present and vote are called shareholders’ meetings. These meetings are of the following types:

(1) Annual General Meeting – Annual General Meeting means an important meeting of the members of the company. It is mandatory by law for every company (except one person company) to convene and organize it annually.

Every company has to hold its first Annual General Meeting within 9 months from the end of its first financial year. If a company holds its first annual general meeting during this period, it need not hold any annual general meeting in the year of its amalgamation.

Every annual general meeting to be held after the first annual general meeting shall be held within 6 months from the end of the financial year of the company. There should not be more than 15 months between two annual general meetings. The registrar may, if he so desires, extend the duration of the annual general meetings other than the first annual general meeting for a further period of three months.

Every Annual General Meeting is convened during office hours and on a day not being a public holiday. The meeting is held either in the registered office of the company or in any other part of the city, town, village in which the registered office of the company is located.

In this meeting, the progress of the company is reviewed during the year, annual accounts are discussed and accepted, directors and auditors are appointed and dividend is recommended.

A clear notice should be sent 21 days in advance to all the members, auditors and other concerned persons of the company for convening the annual general meeting. Proxy form and schedule should be attached with this notice.

According to the Companies Act, the presence of 5 persons in case of public company and 2 persons in case of private company is considered as quorum for this meeting.

(2) Extra-ordinary General Meeting – All those meetings of the members of the company which are held during the interval of two annual general meetings are called Extraordinary General Meetings. Any company can hold its extraordinary general meeting whenever it wants, but it is not mandatory for any company to call and organize such meeting. Whenever the members of the Board of Directors feel that some business cannot be postponed till the next Annual General Meeting, the company has to convene a meeting of its members immediately. Similarly, the members of the company also demand to convene an immediate meeting of the company. Such a meeting is called an extraordinary general meeting. This meeting can be called several times in a year and at any time. Extraordinary meetings are organized for immediate discussion or decision on specific and urgent matters so that opportunity can be taken advantage of.

(3) Class meetings – When the company issues several types of shares, it may convene a meeting of each type of shareholders to consider the change in the rights of the shareholders of that class or if their class can be changed, then such meetings can be called class meetings. It’s called a meeting. In other words, when different meetings of different types of shareholders are organized then they are called class meetings.

(B) Meetings of Directors – The basic management of the company is in the hands of the directors. Although the shareholder has control over the operators, but the area of ​​control of the shareholders is limited.

Is. The company’s policies, management controls and other important matters are discussed in the meetings of the directors only. The meetings of the directors are divided into the following two parts – (1) the meetings of the board of directors, (2) the meetings of the directors’ committees.

(C) Meeting of creditors – Whenever a matter has to be considered which affects the interests of the creditors, then the meeting of creditors has to be called. Often the company wants to make a settlement with its creditors, at that time the court can order to convene a meeting of creditors on the presentation of the application by it or by any of its creditors or members. If the proposed subject is approved by 3/4th of the total creditors of the company, then the shareholders will also be accepted after getting its approval by the court. The meeting of creditors can be called at the time of winding up of the company. The purpose of convening the meeting at such times is to estimate the debts of the company and to appoint a chairman.

(D) In ​​addition to the meetings of debenture holders and directors, there are also debenture holders meetings. Debenture holders are special type of moneylenders of the company. When companies issue debentures and appoint others, they arrange to convene a meeting of debenture holders. When the interest of debenture holders is affected due to any reason, the meeting which is convened to take their opinion is called debenture holder’s meeting.

Duties of Secretary about the Meeting of Companies

(a) Duty before the meeting

(1) To fix the date of the meeting, (2) to determine the program of the meeting, (3) to give notice of the meeting, (4) to prepare the motions, (5) to prepare important documents, (6) to arrange other necessary materials, (7) Good seating arrangement.

(b) Duties of the Secretary at the time of the meeting

(1) Taking the signature in the attendance register, (2) Checking the caretaker number, (3) Reading carefully, (4) Presenting the explanation and necessary documents, (5) Helping the Speaker in the conduct of the meeting.

(c) Duties of the Secretary after the meeting

(1) Preparing the details, (2) Implementing the accepted proposals.

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