परिवर्तन के प्रबंध से क्या आशय है ? इसकी प्रकृति एवं प्रकारों का वर्णन कीजिए। What is meant by management of change? Describe its nature and types.

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परिवर्तन का प्रबन्ध क्या है ? (What is Management of Change ?)

जिस प्रक्रिया द्वारा एक प्रस्तावित परिवर्तन सम्पन्न किया जाता है, उसे ही परिवर्तन का प्रवन्ध कहते हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, तकनीकी आदि सभी क्षेत्रों में निरन्तर परिवर्तन हो रहे हैं। फलस्वरूप प्रबन्ध के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों के अनुरूप अपने आपको झलना, विकास एवं प्रगति के लिए परम आवश्यक है। यह परिवर्तन संस्था की नीति, उद्देश्य सिद्धान्त तथा कार्यप्रणाली से सम्बन्धित हो सकते हैं अथवा कम्पनी के उत्पादन, उत्पादन की विधियों, कच्चे माल के उपयोग, श्रम तथा विपणन आदि से सम्बन्धित हो सकते हैं। अतः यह आवश्यक हो जाता है कि प्रबन्ध का व्यवहार करने वाले लोग इन परिवर्तनों को समझें और उसके अनुरूप आवश्यक समायोजन करें।

चूँकि परिवर्तन का उद्देश्य संस्था की लाभार्जन क्षमता बढ़ाना है, अतः प्रस्तावित परिवर्तन से जो लोग प्रभावित हों, उनकी प्रतिक्रियाओं या प्रतिरोध या विरोध को कम से कम करने का प्रयास करना चाहिए और यदि सम्भव हो तो बिल्कुल ही समाप्त करना चाहिए। ऐसा करके ही प्रबन्ध परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि परिवर्तन का प्रबन्ध से आशय प्रस्तावित परिवर्तनों को स्वीकार्य बनाना और उसे सफलतापूर्वक क्रियान्वित करना है। प्रायः प्रबन्ध को परिवर्तन अभिकर्ता (Change agent) कहा जाता है क्योंकि परिवर्तनों को लागू करने में पहल करने का काम मुख्यतः उसी का होता है। यद्यपि प्रबन्ध इस दिशा में पहल अवश्य करता है, तथापि इसकी सफलता अन्ततः कर्मचारियों पर निर्भर करती है, क्योंकि परिवर्तनों को परिचालित करने में मुख्य रूप से उनकी ही भूमिका होती है।

परिवर्तन के प्रबन्ध की प्रकृति (Nature of Management of Change)

व्यावसायिक जगत में परिवर्तन सामान्यतया होते रहते हैं। परिवर्तन कम्पनी के उद्देश्यों, नीतियों, सिद्धान्तों तथा कार्य प्रणालियों से सम्बन्धित हो सकते हैं या कम्पनी उत्पाद, विधियों, कच्चे माल के प्रयोग तथा विपणन आदि से सम्बन्धित हो सकते हैं। परिवर्तन हितकारी अथवा अहितकारी, दोनों प्रकार के हो सकते हैं। हितकारी परिवर्तनों का स्वागत एवं सहयोग तथा अहितकारी परिवर्तनों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए। इसी प्रकार परिवर्तन प्रचलित मूल्यों एवं मान्यताओं के अनुकूल या प्रतिकूल हो सकते हैं। परिवर्तन का प्रभाव क्षेत्र प्रायः व्यापक होता है, क्योंकि परिवर्तन, कारण परिणाम प्रक्रिया का अनुगमन करते हैं तथा पारस्परिक अन्तनिर्भरता रखने वाले होते हैं। परिवर्तन का क्षेत्र कम्पनी के प्रबन्ध, दर्शन, संगठन के स्वरूप या ढाँचे तथा कम्पनी अथवा उसकी विभिन्न इकाइयों की अवस्थापन से सम्बन्धित हो सकता है। परिवर्तन का सम्भावित क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसकी समय सूची बना पाना एक कठिन कार्य है। परिवर्तन के प्रबन्ध की प्रकृति को निम्न शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है–

(1) परिवर्तन अत्यन्त जरुरी है-इस नश्वर संसार में हमेशा परिवर्तन होता रहता है, जो चीजें पुरानी है उन वस्तुओं में परिवर्तन करके उन्हें नया डिजाइन या रंग-रूप प्रदान किया जाता है जिससे वस्तुओं की बिक्री अधिक हो सके। कई बार व्यावसायिक वातावरण और परिस्थितियों में भी अन्तर आ जाते हैं जिस कारण हमें इन परिवर्तनों के लिए तैयार रहना चाहिए। अतः परिवर्तन अत्यन्त जरूरी है।

(2) परिवर्तन अनिश्चित है-जब कोई परिवर्तन होता है वह अनिश्चित होता है क्योंकि परिवर्तन के विषय में कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि होने वाला परिवर्तन आपके लिए लाभदायक है या हानिकारक अतः परिवर्तन अनिश्चित है।

(3) परिवर्तन से लाभ या हानि होती है-परिवर्तन के सम्बन्ध में यह मान्यता है कि परिवर्तन एक व्यक्ति के लिए लाभ है तो दूसरे व्यक्ति के लिए वह हानि हो सकती है।

(4) परिवर्तन की आलोचना की जाती है जब भी कोई परिवर्तन होता है तो उस परिवर्तन की आलोचना सर्वप्रथम होती है। इसके पश्चात यह देखा जाता है कि होने वाला परिवर्तन हमारे लिए लाभदायक है या नहीं।

(5) परिवर्तन में निरन्तरता होती है इस संसार का यह नियम है कि जीवन में हमेशा परिवर्तन होते रहते हैं, क्योंकि एक परिवर्तन होने के पश्चात दूसरा परिवर्तन भी आवश्यक होगा परन्तु यह निश्चित नहीं है कि दूसरे होने वाले परिवर्तन में कितना समय लगे।

(6) परिवर्तन के विभिन्न प्रकार है-किसी भी व्यवसाय में परिवर्तन के विभिन्न प्रकार होते हैं। व्यवसाय के उत्थान के लिए व्यवसाय में श्रमिकों की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए परिवर्तन किये जाते हैं जबकि कई बार बिक्री को बढ़ाने के लिए वस्तु के रंग-रूप और डिजाइन में भी परिवर्तन किये जाते हैं।

उपर्युक्त विवेचन से परिवर्तन की प्रकृति का अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार का परिवर्तन (अ) समाज में प्रचलित मान्यताओं के अनुकूल या प्रतिकूल हो सकता है; (ब) विद्यमान व्यवस्था के लिए हितकर या अहितकर सिद्ध हो सकता है, और (स) परिवर्तन का प्रभाव क्षेत्र सामान्यतया व्यापक माना जाता है।

परिवर्तन के कारण (Causes of Changes)

संस्था में परिवर्तन का प्रबन्ध आवश्यक है, क्योंकि यह कर्मचारियों के विकास से प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखता है। यदि प्रबन्ध अपने कर्मचारियों का विकास करने, उनको सन्तुष्ट करने तथा उनको समझने में असमर्थ है तो वह कभी भी सफल नहीं हो सकता है। वस्तुतः प्रबन्ध की सफलता उसकी उपलब्धियों में निहित होती है और यह उपलब्धियाँ संस्था की सेवा में लगे कर्मचारियों के ऐच्छिक सहयोग पर निर्भर करती हैं। यदि किसी संस्था के कर्मचारी योग्य, दक्ष, अनुभवी तथा वफादार है तो उस संस्था के साधनों का अधिकतम विदोहन सम्भव हो सकेगा एवं संस्था प्रगति कर सकेगी। यह परिवर्तन के प्रबन्ध के द्वारा ही सम्भव है। संस्था में होने वाले परिवर्तन के प्रमुख कारण निम्न है

1. ज्ञान, सूचना तथा तकनीकों में परिवर्तन-प्रबन्ध के क्षेत्र में तकनीकी पक्ष का अधिकतम विकास हुआ है। मनुष्य तथा उसके वातावरण में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं, इसलिए प्रबन्ध स्वयं निष्क्रिय नहीं रह सकता। उसमें गतिशीलता का होना तथा परिवर्तन के अनुकूल अपने को व्यवस्थित करने का प्रयास करना आवश्यक हो जाता है।

2. प्रबन्ध के क्षेत्र में परिवर्तन आज का प्रबन्धक चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत हो अथवा किसी शिक्षण संस्थान का प्रबन्धक हो, उसकी अपनी कुछ समसयायें होती हैं। अतः प्रबन्ध के क्षेत्र की अवधारणायें तथा तकनीकें संगठन की संरचना में परिवर्तन होने के साथ-साथ बदलती रहती है।

3. प्रबन्धकों की समस्याओं में परिवर्तन-तकनीकी परिवर्तनों के कारण कार्य के स्वभाव में भी अनेक परिवर्तन हो गये हैं। मशीनों के अधिक प्रयोगों के कारण श्रमिकों की संख्या में कमी तथा प्रवन्धकों की समस्याओं में वृद्धि हुई है। प्रबन्धकों की समस्याओं में परिवर्तन के कारण भी प्रबन्ध में परिवर्तन करना जरूरी हो जाता है।

4. वातावरण में परिवर्तन आज का युग परिवर्तन का युग है। हर जगह अनेक प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं। प्रत्येक संगठन के प्रबन्धक को निरन्तर इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है। लोगों की रुचि, उपभोग की किस्मों, व्यक्तियों की मान्यताओं, आशाओं, आकांक्षाओं में निरन्तर परिवर्तन हो रहे हैं। प्रबन्धक ऐसे परिवर्तनशील वातावरण की उपेक्षा नहीं कर सकता है।

5. प्रतिस्पर्धा आज प्रत्येक संगठन में परिवर्तन का क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है। प्रतिस्पर्धा के इस युग में वही संगठन जीवित रह सकता है जो अन्य प्रतिस्पर्धी संगठनों की नीतियों, योजनाओं और कार्यपद्धतियों के अनुरूप अपनी योजनाओं तथा कार्यपद्धतियों में परिवर्तन कर लेता है। इस प्रकार प्रतिस्पर्धा भी परिवर्तन को बाध्य कर देती है।

6. संयोजन-प्रतिस्पर्धा की समाप्ति के लिए विभिन्न व्यावसायिक इकाइयों में एकीकरण, अधिग्रहण और सम्मिश्रण होते हैं, जिससे स्वामित्व और प्रबन्ध में परिवर्तन हो जाता है। फलस्वरूप संयोजित इकाइयाँ विभिन्न परिवर्तनों के लिए प्रेरित होती है।

7. आकस्मिक परिस्थितियाँ अनेक बार संगठन की परिस्थितियों में कुछ आकस्मिक परिवर्तन हो जाते हैं; जैसे-सरकार की औद्योगिक एवं कर नीति में परिवर्तन और इस कारण से परिवर्तन के लिए बाध्य होना पड़ता है।

8. कार्य के स्वभाव एवं प्रक्रिया में परिवर्तन–विभिन्न तकनीकी परिवर्तनों के कारण कार्य के स्वभाव एवं प्रक्रिया में भी परिवर्तन होते रहते हैं। जो कार्य पहले से हो रहे हैं उन्हें आधुनिक यंत्रों एवं उपकरणों की सहायता से किया जाने लगा है। इन कार्यों को कुशलतापूर्वक निष्पादन योग्य एवं प्रशिक्षण प्राप्त कर्मचारियों के द्वारा ही किया जा सकता है। इस प्रकार कार्य के स्वभाव एवं प्रक्रिया में हो रहे परिवर्तनों के लिए उच्च अधिकारियों को अनेक परिवर्तन करने पड़ते हैं।

परिवर्तन के प्रकार (Types of Changes)

व्यावसायिक जगत में परिवर्तन निरन्तर होते ही रहते हैं, क्योंकि व्यावसायिक सफलता के लिए परिवर्तन अनिवार्य है। इन परिवर्तनों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) कार्यविधियों में परिवर्तन, (2) सेविवर्गीय दल में परिवर्तन (3) संगठन संरचना में परिवर्तन (4) विकास सम्बन्धी परिवर्तन, (5) कार्य की दशाओं में परिवर्तन, (6) तकनीकी परिवर्तन, (7) विक्रय नीतियों में परिवर्तन (8) वितरण नीतियों में परिवर्तन |

परिवर्तन प्रबन्ध को प्रभावित करने वाली शक्तियाँ (Forces affected Management of Change)

परिवर्तन अनेक बाह्य एवं आन्तरिक शक्तियों से प्रभावित होता है जिन्हें निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है–

(1) आर्थिक परिवर्तन-ये परिवर्तन निम्न में से कोई भी रूप ले सकते हैं–

(अ) आर्थिक नियोजन के परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति आय एवं राष्ट्रीय आय में तथा राष्ट्रीय सम्पत्ति में परिवर्तन हो सकते हैं। ऐसे परिवर्तनों का बाजार के स्वभाव एवं विस्तार पर प्रभाव पड़ना आवश्यक है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने से नये-नये कारखानों, नयी-नयी विधियों और नये-नये उत्पादों के लिए माँग बढ़ जायेगी। अतः प्रबन्धकों का कर्त्तव्य है कि परिवर्तन की दशा का अनुमान लगायें और तद्नुसार ही अपने कार्यकलापों को समायोजित करें।

(ब) मुद्रा प्रसार एक वृद्धिशील अर्थव्यवस्था का चिह्न है बशर्ते कि इसका समुचित प्रबन्ध एवं नियन्त्रण किया जाये। प्रबन्धकों के लिए वह वरदान सिद्ध हो सकता है और एक अभिशाप भी। अतः प्रवन्धकों को चाहिए कि मुद्रा प्रसार के कारण होने वाली लागत वृद्धियों के प्रति सावधान रहें और ऊँची मॉग के रूप में ऐसे आर्थिक परिवर्तन के जो सुप्रभाव प्रगट होते हैं, उनका पूरा-पूरा लाभ उठायें।

(स) पूँजी बाजार, कच्चे माल के बाजार, पूँजीगत सामान के बाजार में होने वाले परिवर्तनों और माँग सम्बन्धी परिवर्तनों का भी अध्ययन सावधानी से करना चाहिए, जिससे उनके अनुरूप समुचित समायोजन किया जा सके।

(2) सामाजिक परिवर्तन समाजशास्त्रीय प्रभाव वाले क्षेत्र निम्न हैं (1) कार्य के प्रति अभिप्रेरण में परिवर्तन होना, (ii) बढ़ा हुआ समूह-साहचर्य, (iii) घटी हुई व्यक्तिगत सन्तुष्टि, (iv) सांस्कृतिक स्थायित्व में विघ्न पड़ना, (v) जीवन स्तर में एक स्पष्ट वृद्धि होना, (vi) कठोर प्रशासकीय व्यवस्था का विघटन, (vii) विश्वव्यापी व्यावसायिक प्रवृत्ति, (viii) व्यवसाय में सार्वजनिक उत्तरदायित्व को स्वीकार करना।

(3) सरकारी परिवर्तन-इससे निम्न प्रकार के परिवर्तनों को सम्मिलित किया जा सकता है (1) सरकार के स्वभाव में परिवर्तन राष्ट्रीय या विदेशी सरकार बनाना; (ii) सराकर की नीतियाँ, (iii) सरकार की आर्थिक योजनाएँ, (iv) प्रशुल्क एवं मौद्रिक नीतियाँ, (v) निर्यात एवं आयात प्रतिबन्ध; (vi) सरकरी कर्मचारी वर्ग प्रबन्ध को इनसे सम्बन्धित परिवर्तनों का सावधानी से अध्ययन करना चाहिए और तद्नुसार अपनी नीतियों को समायोजित करते रहना चाहिए।

(4) तकनीकी परिवर्तन-तकनीकी प्रगति का एक अप्रत्यक्ष प्रभाव कार्य के प्रति श्रमिकों की मनोधारणा एवं अभिप्रेरणाओं में परिवर्तन होना है। “कार्य ही पूजा है” का परम्परागत सिद्धान्त अब धीरे-धीरे नये श्रमिकों द्वारा अस्वीकार किया जाने लगा है। तकनीकी प्रगति के फलस्वरूप उद्योग की उत्पादकता बहुत बढ़ गयी है किन्तु इसके साथ ही साथ आधुनिक तकनीकी कौशल एवं कम्प्यूटर विज्ञान ने श्रम समस्याओं को कुप्रभावित किया है। परिवर्तनशील इस युग में प्रबन्ध हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता। यह उसका कर्तव्य एवं दायित्व है कि वह परिवर्तन को अपनाने के लिए उचित वातावरण तैयार करें।

(5) प्रबन्धकीय परिवर्तन (Managerial Change)-प्रबन्ध सम्बन्धी विभिन्न परिवर्तन निम्न है–

(i) प्रबन्ध के रूप में परिवर्तन होना,

(ii) शीर्ष कार्यवाहकों में परिवर्तन होना,

(iii) सेविवर्गीय नीति में परिवर्तन,

(iv) संगठन चार्ट में परिवर्तन, एवं

(v) प्रबन्ध के गुण में परिवर्तन

(6) परिचालन सम्बन्धी परिवर्तन (Operational Changes) सम्बन्ध में निम्न बातों को दृष्टिगत रखना चाहिए

(i) लेआउट एवं इसका सुधार,

(ii) विपणि सर्वेक्षण;

(iii) भर्ती एवं प्रशिक्षण सुविधाएँ,

(iv) मजदूरों का भुगतान करने का ढंग,

(v) अन्य सुविधाएँ; जैसे-जल, शक्ति आदि,

(vi) परिवहन व संचार की सुविधाएँ,

(vii) लाइसेंन्सिग, व

(viii) प्रबन्धकीय निपुणता एवं विकास।

(7) प्रवृद्धि एवं विकास सम्बन्धी परिवर्तन (Developmental Changes)-प्रवृद्धि के क्षेत्र में जिन परिवर्तनों से निपटना पड़ेगा वे निम्न से सम्बन्ध रखते हैं–

(i) वित्त व्यवस्था,

(ii) विनियोग सम्बन्धी निर्णय,

(iii) विपणि स्थायित्व,

(iv) सामाजिक-आर्थिक पूर्वानुमान एवं सर्वेक्षण,

(v) विदेशी विनिमय, एवं

(vi) प्रबन्धकीय निपुणता ।

(8) संयन्त्र सम्बन्धी परिवर्तन (Plant-Partaining Changes)-इस क्षेत्र में प्रबन्ध पर जिन परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है वे अग्र घटकों से सम्बन्धित है–

(1) ले-आउट, (ii) सेवाएँ, जैसे-शक्ति, ईंधन, गैस, भाप, पानी, वायु अनुकूलन, नमी रक्षा, फूल रक्षा, आडीकरण आदि। (iii) निपुण श्रम, (iv) अप्रचलन, (v) सुरक्षा प्रावधान, (vi) निपुण पर्यवक्षण

(9) विधियों, प्रक्रियाओं व डिजायन में परिवर्तन (Changes Relating to Proceduron, Processes and Design)-इन परिवर्तनों के प्रति भी सावधान या सजग रहना प्रबन्ध के लिए परमावश्यक है।

परिवर्तन का प्रबन्ध पर प्रभाव (Impact of Changes on Management)

व्यावसायिक जगत में जो परिवर्तन होंगे उनका प्रबन्ध पर जो प्रभाव पड़ता है, उनको निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है–

1. निर्णयन सम्बन्धी जटिलता-परिवर्तनों के कारण प्रबन्धकों को निर्णय लेने में अनेक जटिलताओं का सामना करना पड़ेगा।

2. पुराना अनुभव बेकार होना भविष्य में प्रबन्ध करने के लिए अधिक चतुरता बौद्धिक ज्ञान एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी।

3. सामाजिक उत्तरदायित्व में वृद्धि-परिवर्तनों के कारण प्रबन्धकों के सामाजिक उत्तरदायित्वों में काफी वृद्धि हो जावेगी।

4. श्रम शक्ति का प्रबन्ध अधिक कठिन होगा-परिवर्तनों के कारण आज की तुलना में श्रम शक्ति का प्रबन्ध करना अधिक कठिन हो जावेगा।

5. भावी अनिश्चितताओं में वृद्धि-प्रबन्धकों को अनेक भावी अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ेगा।

6. सरकारी नीतियों के अनुसार नीतियों का निर्माण प्रबन्ध को सरकार की विभिन्न नीतियों का गहन अध्ययन करना पड़ेगा और उनके अनुसार अपनी नीतियों में आवश्यक परिवर्तन करने होंगे।

परिवर्तन में आने वाली समस्याएँ (Problems Arises in the Change)

जिस तकनीक व उत्पादन रीति के नवीन विचार को लागू करने का प्रयत्न किया जा रहा है उसके सम्बन्ध में यह मान्यता होती है कि संस्था उसके संस्थापित या संचालन करने में पूर्णतः सक्षम है। प्रारम्भिक अवस्था में वित्त व तकनीकी ज्ञान की उपलब्धि सीमित कारक के रूप में कार्य कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, प्रारम्भ में वित्त व तकनीकी ज्ञान का क्षणिक अभाव नवीन विचारधारा को लागू करने में बाधक नहीं हो सकती है। परन्तु कभी-कभी संस्था/संगठन की इस सक्षमता व तत्परता के बावजूद भी नवीन विचार को प्रभावशाली ढंग से लागू करने में अनेक समस्याएँ जन्म ले सकती हैं। इन समस्याओं का निम्नांकित श्रेणी में रखा जा सकता है

(अ) आर्थिक समस्याएँ-कोई भी व्यक्ति कार्य करने के लिए तभी प्रेरित होता है जब उस कार्य से उसकी आर्थिक आवश्यकताएँ, जैसे-जीवन निर्वाह, सुरक्षा व स्थिरता (नौकरी) आदि की पूर्ति हो सके। लाये जाने वाले प्रत्येक परिवर्तन से इन आवश्यकताओं की पूर्ति प्रभावित होती है। परिवर्तन इन मूलभूत आर्थिक आवश्यकताओं को इस ढंग से प्रभावित करता है कि कुछ समस्याएँ पैदा हो जाती है। आर्थिक समस्या के अन्तर्गत निम्नलिखित समस्याओं को शामिल करते हैं

(1) कर्मचारियों में तकनीकी परिवर्तनों द्वारा सदैव तकनीकी बेरोजगारी का भय व्याप्त रहता है। तकनीक की विचारधारा को प्रयोग करने पर उत्पादन-रीतियाँ एवं कार्यविधियाँ अधिक विवेकपूर्ण बन जाती है जिसके कारण श्रमिकों की संख्या में कमी लानी पड़ती है। कर्मचारियों की छँटनी से कर्मचारी बेरोजगार हो जाता है। प्रत्येक कर्मचारी अपनी नौकरी की सुरक्षा के प्रति भयभीत रहता है।

(2) कर्मचारियों में यह डर लगा रहता है कि नयी तकनीक के प्रयोग से कार्य की गति व क्षमता में वृद्धि होती है जिसके कारण मानव-श्रम अधिक समय बेकार पड़ा रहता है।

(3) बेकार रहने के भय के साथ-साथ उसे यह भी भय बना रहता है कि संगठनात्मक वेतनक्रम-स्तरों में कमी न आ जाये। दूसरे शब्दों में, विभिन्न स्तरों व पदों को अनावश्यक करार देते हुए वेतनक्रम वाला न कर दिया जाये। ऐसी स्थिति में पारिश्रमिक में कमी आने का डर बना रहता है।

(4) नई तकनीक के माध्यम से कार्य-निष्पादन सम्बन्धी ऊंचे प्रमापों की स्थापना की सम्भावना होती है। इसके कारण बोनस तथा प्रेरणात्मक आमदनी के अवसर कम हो जाने का भय होता है।

(ब) व्यक्तिगत समस्याएँ आर्थिक आवश्यकताओं के अलावा व्यक्तियों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ भी होती है जिन्हें वे अपने कार्य के माध्यम से पूर्ण करना चाहते हैं। आत्मपूर्णता, घमण्ड व करतूत आदि का मान मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। तकीनीकी परिवर्तन व्यक्ति की इन आशाओं को उलट-पलट कर देता है और उसकी व्यक्तिगत समस्याएँ पैदा हो जाती है। इनके कतिपय उदाहरण इस प्रकार हैं–

(1) नवीन विचार का प्रयोग इस बात का सूचक माना जाता है कि वर्तमान तकनीकी व रीतियों अक्षम या अपर्याप्त हैं। यह एक प्रकार से गर्भित आलोचना है और कर्मचारी वर्ग इससे अपने अहम् को अपमानित समझता है।

(2) चूँकि तकनीकी परिवर्तन से शारीरिक कार्य (श्रम) की आवश्यकता समाप्त हो जायेगी या कम हो जायेगी। अतः कर्मचारी वर्ग सोचने लगता है कि उन्हें अपने व्यक्तिगत साहस तथा दक्षता को दर्शाने व विकसित करने का अवसर कम ही प्राप्त होगा।

(3) कार्य के अधिक से अधिक स्वचालित या यन्त्रवत् हो जाने के भय से कर्मचारी वर्ग सोचने लगता है कि कार्य बहुत ही उदासी वाला व शुष्क हो जायेगा और इस प्रकार वे अपनी कार्य-रुचि को त्यागने लगते हैं।

(स) सामाजिक समस्याएँ व्यक्तियों का समूह जहाँ कार्य करता है, वहाँ पर एक नये सामाजिक वातावरण व संस्कृति की रचना कर लेता है। यह उनकी प्रकृति के अनुरूप भी है, क्योंकि वे कार्य स्थिति से ही अपनी सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहते हैं। अपनत्व, स्नेह, आदरव सम्मान आदि उनकी सामाजिक आवश्यकताएँ हैं। परिवर्तन इस सामाजिक वातवारण को ठेस पहुँचाता है और कुछ समस्याएँ उत्पन्न हो जाती है।

(1) परिवर्तन के कारण नये सामाजिक समायोजन की आवश्यकता पड़ती है और इस प्रक्रिया में पुरान सामाजिक सम्बन्धों एवं बन्धनों को तोड़ना भी पड़ता है। इन दोनों से कर्मचारियों का मानसिक सन्तुलन बिगड़ सकता है।

(2) यह भी सन्देह रहता है कि नया सामाजिक वातावरण उतना सन्तोषप्रद नहीं होगा, जितना पुराना सामाजिक वातावरण है।

(3) इस सामाजिक वातावरण के निर्माण व पोषण में उन व्यक्तियों का विरोध होने लगता है। (तकनीशियनों का) जो परिवर्तन लागू करने के लिए पहल किये होते हैं।

(4) कर्मचारियों में सामूहिक भावना उत्पन्न हो जाती है कि इस परिवर्तनों से मालिकों को ही लाभ मिलेगा, उनके हितों में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं होगी।

परिवर्तन के प्रबन्ध की प्रक्रिया (Process of Management of Change)

परिवर्तनों का प्रबन्ध एक व्यवस्थित प्रक्रिया है जो पूर्व नियोजित होती है। परिवर्तन के प्रबन्ध की प्रक्रिया को प्रायः निम्न चरणों में पूरा किया जाता है–

(1) परिवर्तनों के कारणों को ज्ञात करना (knowing the Causes of Change)-किसी भी संस्था में परिवर्तन की आवश्यकता किन्ही विशेष कारणों से उत्पन्न होती है। अतः प्रवन्ध को सर्वप्रथम उन कारणों या शक्तियों (Forces) का पता लगाना चाहिए जिनके कारण संख्या में परिवर्तन की आवश्यकता है। परिवर्तन के लिए उत्तरदायी कारणों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है–(1) आन्तरिक कारण (11) बाढ़ा कारण, तथा (III) तकनीकी कारण। आन्तरिक कारण संस्था की आन्तरिक परिस्थितियों से उत्पन्न होते हैं जबकि बाह्य कारण बाहा वातावरण की परिस्थितियों के कारण तथा तकनीकी कारण तकनीकी परिवर्तनों के कारण होते हैं। प्रत्येक प्रबन्धक संस्था में किसी परिवर्तन पर विचार करने से पूर्व उसके कारणों को भली प्रकार ज्ञात करना चाहिए।

(2) परिवर्तनकारी शक्तियों का विश्लेषण करना (Analysing the Forces of Change)-समय पर दो शक्तियाँ कार्य करती है-(1) प्रेरक शक्तियों तथा (ii) प्रतिरोधक शक्तियों प्रेरक शक्तियों परिवर्तनों को लागू करने में सहायक होती है जबकि प्रतिरोधक शक्तियाँ परिवर्तनों का विरोध करती है। जब इन दोनों में साम्य (Equilibrium) की स्थिति आती है तो संख्या एक निश्चित प्रकार का व्यवहार करती है तभी संस्था में कुछ सम्भव हो पाता है। अतः परिवर्तन की योजना बनाने तथा उसे लागू करने से पूर्व इन दोनों ही शक्तियों को पहचानना चाहिए तथा साम्य की स्थिति में होने वाले सम्भावित परिवर्तन का पूर्वानुमान करना चाहिए।

(3) परिवर्तन की योजना का निर्माण (Preparing Plan to Change)- परिवर्तन के कारणों तथा परिवर्तनों को प्रभावित करने वाली शक्तियों को ध्यान में रखते हुए ही प्रबन्धकों को अब परिवर्तनों की योजना बनानी चाहिए। प्रायः संस्था में तीन प्रकार के परिवर्तन करने पड़ते हैं

(i) संगठन संरचना में परिवर्तन,

(ii) तकनीक में परिवर्तन तथा

(iii) कर्मचारियों में परिवर्तन।

प्रबन्धक एक समय पर इनमें से किसी भी परिवर्तन की योजना बना सकते हैं किन्तु उन्हें एक में परिवर्तन से दूसरे पर पड़ने वाले प्रभावों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।

(4) प्रतिरोध का निवारण करना (Over-coming Resistance)- परिवर्तनों का प्रायः प्रतिरोध किया जाता है। प्रतिरोध कई कारणों से किया जाता है। आर्थिक हानि होने, नौकरी के अवसर कम होने, अधिकारों, शक्तियों आदि में कमी आने, सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन होने इत्यादि कारणों से परिवर्तनों का प्रतिरोध किया जाता है। किन्तु कुशल प्रबन्ध इन सभी प्रतिरोधों का निवारण करके परिवर्तनों को लागू करने में सफल हो जाते हैं। इस हेतु उन्हें परिवर्तनों के सम्बन्ध में लोगों की एवं भ्रान्तियों को दूर करने के लिए परिवर्तनों की सही-सही जानकारी देनी चाहिए।

(5) लोगों को परिवर्तनों हेतु तैयार करना (Preparing People to Changes)-परिवर्तन की योजना बनाने के बाद लोगों को परिवर्तन के लिए तैयार करना चाहिए। इस हेतु लोगों को यह विश्वास दिलाना होता है कि उनका वर्तमान व्यवहार या कार्य प्रणाली अप्रभावी या बेअसर (Ineffective) है तथा उन्हें नई कार्य प्रणाली एवं व्यवहार सीखना है। यह कार्य बहुत ही कठिन है किन्तु प्रबन्धकों को अपने कर्मचारियों को परिवर्तनों के लिए तैयार करना ही पड़ता है। इसके अतिरिक्त, परिवर्तन के लिए आवश्यकता संसाधन एवं उपकरण भी उपलब्ध कराने चाहिए।

(6) परिवर्तन को लागू करना (Execute the Change)-जब कर्मचारी परिवर्तनों के लिए तैयार हो जाते हैं तो परिवर्तनों को लागू करना चाहिए। इस हेतु प्रशिक्षित प्रबन्धकों का परिवर्तन प्रतिनिधियों ( Change Agents) की सेवाएँ लेनी चाहिए। परिवर्तन प्रतिनिधि नये व्यवहार तथा नई कार्य प्रणाली से लोगों को अवगत करवाते हैं। तब लोग उसी प्रकार का नया व्यवहार तथा कार्य प्रणाली का अभ्यास करते हैं तथा वे उसके प्रभावों का आकलन करते हैं। उसमें कुछ समय लगता है। अतः प्रबन्धक या परिवर्तन प्रतिनिधियों को धैर्य से परिवर्तन लागू करना चाहिए।

(7) परिवर्तन का मूल्यांकन / अनुगमन करना (Evaluating or Follow up to Change)- परिवर्तन लागू करने के बाद उसके प्रभावों का मूल्यांकन करना चाहिए। इस हेतु परिवर्तन योजना का अनुगमन करना चाहिए। इस प्रक्रिया में प्रबन्धक यह देखते है कि परिवर्तन कार्यक्रम नियोजित रूप से क्रियान्वित किया जा रहा है अथवा नहीं, तथा इससे अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो रहे है अथवा नहीं। यदि परिवर्तन के क्रियान्वयन में कोई कमी दिखाई देती है या उससे अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे होते हैं तो प्रबन्धक आवश्यक कदम उठाते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि परिवर्तन के लिए एक नियोजित प्रक्रिया होनी चाहिए, जिससे परिवर्तनों का प्रबन्ध करना आसान हो जाता है।


What is change management? (What is Management of Change ?)

The process by which a proposed change is accomplished is called provision of change. Change is the law of life. Changes are taking place continuously in all fields like economic, social, political, religious, technological etc. As a result, many changes are taking place in the field of management. Sustaining oneself according to these changes is absolutely necessary for development and progress. These changes may be related to the policy, objectives, principles and methodology of the organization or may be related to the company’s production, methods of production, use of raw materials, labor and marketing etc. Therefore, it becomes necessary that the people dealing with the management understand these changes and make necessary adjustments accordingly.

Since the purpose of the change is to increase the profit making capacity of the organization, efforts should be made to minimize the reactions or resistance or opposition of those who are affected by the proposed change and, if possible, should be eliminated at all. Only by doing this can management pave the way for change.

It is thus clear that management of change means to make the proposed changes acceptable and to implement them successfully. Management is often called a change agent because it is mainly responsible for taking the initiative in implementing changes. Although the management does take the initiative in this direction, its success ultimately depends on the employees, as they are the main contributors to the changes.

Nature of Management of Change

Changes are common in the business world. Changes may be related to the objectives, policies, principles and practices of the company or may be related to the company’s products, methods, use of raw materials and marketing etc. Changes can be beneficial or unfavourable. Beneficial changes should be welcomed and supported and harmful changes should be resisted. Similarly changes may be favorable or unfavourable to prevailing values ​​and beliefs. The scope of change is often wide, because change follows a cause-effect process and is mutually interdependent. The scope of change may be related to the company’s management philosophy, the nature or structure of the organization and the location of the company or its various units. The potential scope of change is so wide that it is a difficult task to schedule it. The nature of management of change can be explained by the following headings-

(1) Change is very important – Changes are always taking place in this mortal world, by changing those things which are old, they are given a new design or look so that the goods can be sold more. Sometimes there are differences in the business environment and circumstances too, due to which we should be prepared for these changes. So change is very necessary.

(2) Change is uncertain – When a change happens it is uncertain because nothing can be said about the change whether the change that happens is beneficial or harmful for you, so the change is uncertain.

(3) Change causes profit or loss- It is believed in relation to change that change is a benefit for one person, then it can be a loss for another person.

(4) Change is criticized whenever there is a change, that change is criticized first. After this it is seen whether the change happening is beneficial for us or not.

(5) There is continuity in change, it is the rule of this world that changes are always taking place in life, because after one change, another change will also be necessary, but it is not certain that how much time it takes for another change to happen.

(6) There are different types of change – There are different types of change in any business. For the growth of the business, changes are made to increase the efficiency of the workers in the business, while sometimes changes are also made in the look and design of the item to increase the sales.

The nature of the change can be inferred from the above discussion. Such a change may (a) be favorable or unfavourable to the prevailing beliefs in the society; (b) may prove beneficial or detrimental to the existing system, and (c) the area of ​​effect of the change is generally assumed to be wide.

Cause of Changes

Management of change is necessary in the organization, because it is directly related to the development of the employees. If management is unable to develop, satisfy and understand its employees then it can never be successful. In fact, the success of the management lies in its achievements and these achievements depend on the willing cooperation of the employees engaged in the service of the organization. If the employees of an organization are capable, skilled, experienced and loyal, then maximum exploitation of the resources of that organization will be possible and the organization can progress. This is possible only through management of change. The main reasons for the change taking place in the organization are as follows:

1. There has been maximum development of technical side in the field of change-management in knowledge, information and technologies. man and his There are constant changes in the environment, so the management itself cannot remain inactive. It becomes necessary to have dynamism in it and try to organize itself to adapt to the change.

2. Changes in the field of management Today’s manager, whether he is working in public sector or is a manager of an educational institution, has some problems of his own. Therefore, the concepts and techniques of the field of management keep on changing with the changes in the structure of the organization.

3. Changes in the problems of the managers – Due to technological changes, there have been many changes in the nature of work. Due to the more use of machines, the number of workers has decreased and the problems of managers have increased. Changes in management also become necessary due to changes in the problems of the managers.

4. Change in the environment Today’s era is the era of change. Various changes are taking place everywhere. The manager of every organization is constantly facing this problem. People’s tastes, consumption patterns, beliefs, hopes, aspirations of the people are constantly changing. The manager cannot ignore such a changing environment.

5. Competition Today the field of change in every organization has become international. In this era of competition, only the organization can survive which makes changes in its plans and methods according to the policies, plans and methods of other competing organizations. Thus competition also forces change.

6. Combination-Amalgamation, acquisition and amalgamation take place in different business units to eliminate competition, leading to change in ownership and management. As a result, the combined units are motivated to undergo various changes.

7. Contingency Circumstances Many times there are some sudden changes in the circumstances of the organization; For example, changes in the industrial and tax policy of the government and for this reason have to be forced to change.

8. Changes in the nature and process of work – Due to various technological changes, there are also changes in the nature and process of work. The works which are already being done are being done with the help of modern tools and equipment. These tasks can be performed efficiently only by qualified and trained employees. In this way, for the changes taking place in the nature and process of work, many changes have to be made by the higher officials.

Types of Changes

Changes happen constantly in the business world, because change is essential for business success. These changes can be explained as follows

(1) Change in procedures, (2) Change in departmental team (3) Change in organization structure (4) Development related changes, (5) Change in working conditions, (6) Technological change, (7) Change in sales policies (8) Changes in distribution policies.

Forces affected Management of Change

Change is affected by many external and internal forces which can be explained as follows-

(1) Economic changes – These changes can take any of the following forms-

(a) Economic planning can result in changes in per capita income and national income and in national wealth. Such changes need to have an impact on the nature and expansion of the market. With the increase in national income, the demand for new factories, new methods and new products will increase. Therefore, it is the duty of the managers to anticipate the change situation and adjust their activities accordingly.

(b) Money circulation is a sign of a growing economy provided it is properly managed and controlled. For the managers, that can prove to be a boon as well as a curse. Therefore, managers should be mindful of cost escalations due to currency expansion and take full advantage of the effects of such economic change in the form of higher demand.

(c) The changes taking place in the capital market, raw material market, capital goods market and demand related changes should also be studied carefully, so that appropriate adjustments can be made accordingly.

(2) Social Change The areas of sociological impact are (1) change in motivation for work, (ii) increased group-compatibility, (iii) decreased individual satisfaction, (iv) disturbance in cultural stability, (v) ) There should be a marked increase in the standard of living, (vi) the dissolution of the rigid administrative system, (vii) the worldwide business trend, (viii) the acceptance of public responsibility in business.

(3) Government Changes- It may include the following types of changes: (1) Change in the nature of government to form a national or foreign government; (ii) policies of the government, (iii) economic plans of the government, (iv) tariff and monetary policies, (v) export and import restrictions; (vi) Government employee management should carefully study the changes related to these and keep adjusting its policies accordingly.

(4) Technological change- An indirect effect of technological progress is the change in the attitudes and motivations of workers towards work. Tradition of “Work is Worship”

The cost theory is now gradually being rejected by the new workers. The productivity of the industry has increased a lot as a result of technological progress, but at the same time modern technical skills and computer science have affected labor problems. In this changing age, the management cannot sit with its hands on its hands. It is his duty and responsibility to create the right environment for adopting the change.

(5) Managerial Change – Various changes related to management are as follows-

(i) change in the form of management,

(ii) change in top caretakers,

(iii) changes in the departmental policy,

(iv) Changes in the Organization Chart, and

(v) Change in the quality of management

(6) The following things should be kept in mind in relation to Operational Changes

(i) Layout and its improvement,

(ii) marketing survey;

(iii) Recruitment and Training Facilities,

(iv) the mode of payment of labour,

(v) other facilities; For example, water, power etc.,

(vi) facilities for transport and communication,

(vii) Licensing, and

(viii) Managerial skills and development.

(7) Growth and Developmental Changes – The changes which have to be dealt with in the field of growth are related to-

(i) Finance,

(ii) appropriation decisions,

(iii) Marketing Sustainability,

(iv) Socio-Economic Forecasts and Surveys,

(v) foreign exchange, and

(vi) Managerial skills.

(8) Plant-Partaining Changes – The changes which affect the management in this area are related to the following factors–

(1) Layout, (ii) Services, such as power, fuel, gas, steam, water, air conditioning, moisture protection, flower protection, audiation etc. (iii) Skilled Labour, (iv) Obsolescence, (v) Security Provisions, (vi) Skilled Supervision

(9) Changes Relating to Proceduron, Processes and Design – It is essential for the management to be careful or aware of these changes.

Impact of Changes on Management

The changes that will take place in the business world, the effect that they have on the management can be explained as follows-

1. Decision Making Complexity – Due to changes, the managers will face many complexities in decision making.

2. Old experience to be wasted, more cleverness, intellectual knowledge and training will be required to manage in future.

3. Increase in Social Responsibility – Due to the changes, the social responsibilities of the managers will increase significantly.

4. Management of labor force will be more difficult – Due to changes, it will become more difficult to manage labor force than today.

5. Future Uncertainties Growth-Managers will have to face many future uncertainties.

6. Formulation of policies according to government policies The management will have to make a thorough study of the various policies of the government and make necessary changes in its policies accordingly.

Problems Arises in the Change

In relation to which the new idea of ​​technology and production method is being tried to be implemented, it is recognized that the institution is fully capable of establishing or operating it. In the initial stage, the availability of finance and technical knowledge can act as a limiting factor. In other words, a momentary lack of finance and technical knowledge in the beginning cannot be a hindrance in implementing the new ideology. But sometimes, despite this capability and readiness of the organization, many problems may arise in implementing the new idea effectively. These problems can be placed in the following categories

(a) Economic problems – Any person is motivated to work only when his economic needs like subsistence, security and stability (job) etc. can be fulfilled by that work. Every change brought about affects the fulfillment of these needs. Change affects these basic economic needs in such a way that some problems arise. Economic problems include the following problems

(1) The fear of technical unemployment always prevails among the employees due to technological changes. By applying the ideology of technology, the production methods and procedures become more rational, due to which the number of workers has to be reduced. Layoff of employees makes the employee unemployed. Every employee is fearful about the security of his job.

(2) There is a fear among the employees that due to the use of new technology, the speed and efficiency of work increases, due to which more time of man-labor remains lying idle.

(3) Along with the fear of being useless, he also has a fear that the organizational pay-levels may not come down. In other words, the different levels and posts should not be made in the pay scale by terming it unnecessary. In such a situation, there is a fear of reduction in remuneration.

(4) There is a possibility of establishing high standards of performance through new technology. Due to this there is a fear of losing bonus and motivational income opportunities.

(b) Personal problems Apart from economic needs, individuals also have psychological needs which they want to fulfill through their work. Values ​​of self-fulfillment, pride and deeds etc.

Knowledge is needed. Technological changes turn these hopes upside down and personal problems arise. Some examples of these are as follows-

(1) The use of new ideas is considered an indicator that current techniques and methods are inefficient or inadequate. This is a kind of implied criticism and the working class considers its ego to be humiliated by this.

(2) Since technological change will eliminate or reduce the need for physical work (labour). Therefore, the working class starts thinking that they will get less opportunity to show and develop their personal courage and competence.

(3) Due to the fear of work becoming more and more automatic or mechanical, the working class starts thinking that the work will become very sad and dry and thus they start giving up their interest in work.

(c) Social problems Where a group of individuals works, a new social environment and culture is created there. This is also in line with their nature, as they want to fulfill their social needs from the work position itself. Affinity, affection, respect, respect etc. are their social needs. Change hurts this social environment and some problems arise.

(1) New social adjustment is needed due to change and in this process old social relations and bonds have to be broken. Both of these can disturb the mental balance of the employees.

(2) It is also suspected that the new social environment will not be as satisfactory as the old social environment.

(3) In creating and nurturing this social environment, those people start to oppose. (of technicians) who take the initiative to implement changes.

(4) There is a collective feeling among the employees that this changes will only benefit the owners, their interests will not increase in any way.

Process of Management of Change

Management of changes is a systematic process which is pre-planned. The process of managing change is usually accomplished in the following steps:

(1) Knowing the Causes of Change – The need for change in any organization arises due to some particular reasons. Therefore, the management should first find out the reasons or forces due to which there is a need to change the number. The reasons responsible for the change can be put into three categories – (1) internal reasons (11) flood reasons, and (III) technical reasons. Internal causes arise from the internal conditions of the organization while external causes are due to external environmental conditions and technical causes are due to technological changes. Before considering any change in every management organization, its reasons should be well known.

(2) Analysing the Forces of Change- Two forces act at time- (1) Inductive forces and (ii) Resistive forces. opposes. When the condition of Equilibrium comes between these two, then the number behaves in a certain way, only then something becomes possible in the organization. Therefore, before planning and implementing change, both these forces should be recognized and the possible change in the state of equilibrium should be foreseen.

(3) Preparing Plan to Change – Managers should now plan for changes keeping in mind the reasons for the change and the forces affecting the changes. Usually three types of changes have to be made in the organization

(i) Changes in the organization structure,

(ii) Changes in technology and

(iii) Changes in employees.

Managers can plan for any of these changes at a time, but they must take into account the effects of changes in one on the other.

(4) Over-coming Resistance – Changes are often resisted. Resistance is done for a number of reasons. Changes are resisted due to economic loss, loss of job opportunities, reduction in rights, powers etc., changes in social relations etc. But efficient management overcomes all these resistances and becomes successful in implementing changes. For this, they should give accurate information about the changes to the people and to remove the misconceptions regarding the changes.

(5) Preparing People for Changes – After planning for change, people should be prepared for change. For this, people have to be convinced that their current behavior or method is ineffective or ineffective and they have to learn new method and behavior. This task is very difficult but the managers have to prepare their employees for the changes. In addition, the necessary resources and tools should also be made available for change.

(6) Execute the Change – When the employees are ready for the changes, the changes should be implemented. For this, the services of Change Agents should be taken from the trained managers. change

Ratinidhi makes people aware of new behavior and new working method. Then people practice the same type of new behavior and method and they assess its effects. It takes some time. Therefore, the manager or change representatives should implement the change patiently.

(7) Evaluating or Follow up to Change – After implementing the change, its effects should be evaluated. For this change plan should be followed. In this process, the manager sees whether the change program is being implemented as planned or not, and whether the expected results are being achieved or not. If any deficiencies are noticed in the implementation of the change or if the expected results are not being achieved, then the manager takes necessary steps.

It is thus clear that there should be a planned process for change, which makes it easier to manage the changes.

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