नेतृत्व से क्या आशय है ? व्यवसाय प्रबन्ध में नेतृत्व के महत्व को समझाइये। What is meant by leadership? Explain the importance of leadership in business management.

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नेतृत्व का अर्थ व परिभाषा (Meaning and Definition of Leadership)

किसी भी क्षेत्र में सामूहिक क्रियाओं की सफलता एक बड़े अंश तक दक्ष नेतृत्व पर निर्भर होती है। सक्षम नेता समूह की प्रियाओं व प्रयत्नों को संगठित करके सही दिशा प्रदान करता है। नेतृत्व से किसी व्यक्ति विशेष के उस गुण से है जिसके द्वारा वह अन्य व्यक्तियों का मार्ग प्रदर्शन करता है तथा नेता के रूप में उनकी क्रियाओं का संचालन करता है। अच्छा नेतृत्व अपने अनुयायियों को निष्पादन में कुशलता एवं सुरक्षा प्रदान करता है।

अलफ्रेड एवं बीटी (Alfred and Beety) के शब्दों में, “नेतृत्व वह गुण है जिसके द्वारा अनुयायियों के एक समूह से वांछित कार्य स्वेच्छापूर्वक एवं बिना किसी दबाव के कराये जाते हैं।”

कीथ डेविस (Keath Davis) के अनुसार, “नेतृत्व दूसरे व्यक्तियों को पूर्व निश्चित उद्देश्यों को उत्साहपूर्वक प्राप्त करने के लिए प्रेरित करने की योग्यता है।”

●कूण्टन एवं ओ’डोनेल (Koontz and ODonnell) के अनुसार, “नेतृत्व व्यक्तियों को प्रभावित करने की कला अथवा प्रक्रिया है, जिससे कि समूह के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वे स्वेच्छापूर्वक काम करने लगें।”

नेतृत्व की विशेषताएँ (Characteristics of Leadership)

नेतृत्व की प्रमुख विशेषताओं को अग्र प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) व्यक्तिगत योग्यता-नेतृत्व एक व्यक्तिगत योग्यता है जो कि व्यक्ति को एक समूह में एकत्र रखती है अथवा अनुयायियों का एक समूह होता है। बिना अनुयायियों के नेता की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

(2) उद्देश्यों में एकता-नेता एवं अनुयायियों के उद्देश्यों में एकता होनी चाहिए। यदि दोनों के उद्देश्य अलग-अलग होंगे तो नेतृत्व प्रभावहीन हो जायेगा।

(3) अनुयायियों का मार्गदर्शन-नेतृत्व के अन्तर्गत नेता अपने अनुयायियों का मार्गदर्शन करता है अर्थात् वह सभी कार्यों में सबसे आगे रहता है।

(4) नेतृत्व गुण-नेतृत्व प्रदान करने वाले व्यक्ति में ऐसी चारित्रिक विशेषताएँ तथा गुण होते चाहिए जो दूसरे को प्रेरणा दे और लोग उस पर अपना विश्वास रखें। यह भी कहा जा सकता है कि आवश्यक योग्यताओं एवं गुणों से युक्त व्यक्ति को ही नेता कहा जाता है।

(5) परिस्थितियों का ध्यान–नेतृत्व के द्वारा बदलती हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते। अनुवादी समूह को उत्प्रेरण की सहायता से लक्ष्य तथा पहुँचाया जाता है।

(6) समूह का संगठन-नेता अपने समूह का संगठन करता है तथा इसे निर्धारित विधि से कार्य करने हेतु प्रेरित करता है।

(7) सतत् एवं गतिशील क्रिया-नेतृत्व एक सतत् रूप से गतिशील और चिर नवीन क्रिया है।

नेतृत्व के गुण (Qualities of Leadership)

साधारणतः यह कहा जाता है कि नेता बनना अथवा नेतृत्व करना बहुत सरल है, लेकिन यह विचारधारा पूर्णतः सही नहीं है। कुशल नेतृत्व काफी मुश्किल से मिलता है। वास्तव में एक नेता में दे सभी गुण होने चाहिए जिनसे वह कुशलतापूर्वक कार्य कर सके। एक नेता को सम्पूर्ण व्यक्तित्व वाला व्यक्ति होना चाहिए। विभिन्न विद्वानों ने नेतृत्व के अलग-अलग गुण बताये हैं। एक नेता में पाये जाने वाले प्रमुख गुणों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) प्रभावी व्यक्तित्व-एक कुशल नेता का व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए कि वह दूसरों को प्रभावित कर सके अर्थात् उसका व्यक्तित्व प्रभावित करने वाला होना चाहिए।

(2) उत्तम चरित्र-नेता दूसरों को तभी प्रभावित कर सकता है जबकि उसका चरित्र भी उत्तम हो।

(3) आत्म-विश्वास-दूसरों का विश्वास प्राप्त करने के लिए यह भी जरूरी है कि आप में आत्म-विश्वास की शक्ति हो। एक कुशल नेतृत्व में यह गुण होना भी बहुत जरूरी है।

(4) सम्प्रेषण कुशलता-नेता तथा अधीनस्थों के बीच समय-समय पर विचारों, सूचनाओं तथा आदेशों का आदान-प्रदान होता रहता है। अतः एक नेता में अपने अनुयायियों को आदेश तथा अन्य •व्यक्तियों को कुशलतापूर्वक सूचनाएँ देने की योग्यता होनी चाहिए।

(5) धैर्य एवं सहनशीलता-कठिनाइयों का सुगमतापूर्वक समाधान करने के लिए नेता में सहनशीलता का गुण होना चाहिए। नेता अधिकांशतः आलोचनाओं के शिकार होते हैं उन्हें धैर्यपूर्वक अपनी आलोचनाओं को सुनना चाहिए तथा किसी भी विपरीत परिस्थिति में विचलित नहीं होना चाहिए। धैर्यपूर्वक सभी संकटकालीन परिस्थितियों का सामना कर लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना चाहिए।

(6) मानसिक क्षमता-कुशल नेता में विकसित मानसिक क्षमता का होना भी बहुत आवश्यक होता है। नेता को कभी भी संकीर्ण विचारों वाला नहीं होना चाहिए। उसका दृष्टिकोण हमेशा व्यापक होना चाहिए। नेता को अपने विचार हमेशा स्थिर नहीं रखने चाहिए। उसमें परिस्थितियों के अनुरूप अपने विचारों में परिवर्तन करने का गुण होना चाहिए।

(7) निर्देशन योग्यता-नेता को समय-समय पर अपने अधीनस्थों का निर्देशन करना पड़ता है, अतः उसमें निर्देशन योग्यता का होना भी जरूरी है।

(8) तीव्र निर्णायक शक्ति-यदि निर्णय उचित होगा तो सही कार्य समय पर हो सकता है अतः एक कुशल नेता में शीघ्र निर्णय लेने का गुण होना चाहिए।

(9) स्नेह एवं मैत्रीभाव-स्नेह एवं मैत्रीभाव भी एक कुशल नेता का प्रमुख गुण है क्योंकि इससे दूसरों का दिल जीता जा सकता है। नेता को अपने अधीनस्थों से स्नेह अवश्य रखना चाहिए।

(10) सहकारिता-नेता में अधिक से अधिक लोगों के साथ मिलकर कार्य करने की क्षमता होनी चाहिए। अन्य शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि एक कुशल नेता में सहकारिता का गुण होना चाहिए।

प्रबन्ध में नेतृत्व का महत्व (Importance of Leadership in Management)

नेतृत्व को प्रबन्धकीय सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना गया है। नेतृत्व के कार्य तथा महत्व को निम्न शीर्षकों द्वारा समझा जा सकता है

(1) सहयोग का अधिकार स्तम्भ-एक कुशल नेतृत्व भ्रम, पारस्परिक कटुता तथा द्वेष की भावना का अन्त करके उसके स्थान पर सहयोग की भावना पैदा करता है। इस प्रकार कुशल नेतृत्व सहयोग का आधार स्तम्भ होता है।

(2) मार्गदर्शन में सहायक-चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में नेतृत्व कर्मचारियों का मार्गदर्शन करके उन्हें चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।

(3) अभिप्रेरणा का आधार-नेतृत्व लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कर्मचारियों को अभिप्रेरित करता है। वह उनके हृदय में कार्य करने की आन्तरिक इच्छा जाग्रत करता है।

(4) अवसरों का लाभ-नेतृत्व के मार्गदर्शन में कार्य करके वर्तमान एवं भावी अवसरों का पूर्ण लाभ उठाया जा सकता है।

(5) सामूहिक कार्यों का संचालन-नेतृत्व के अभाव में किसी उपक्रम के सदस्य अलग-अलग भले ही कुशलतापूर्वक कार्य कर लें, परन्तु उनमें एकता, समन्वय तथा सामूहिकता उत्पन्न नहीं हो सकती है।

(6) अनुशासन की स्थापना-अनुशासनहीनता के वातावरण में अच्छे से अच्छे व्यक्तियों के गुणों एवं कार्यक्षमता का लाभ नहीं लिया जा सकता है। नेतृत्व अपनी सत्ता, प्रतिभा तथा प्रभाव के बल पर समूह में अनुशासनमय वातावरण की स्थापना करता है और उसको बनाये रखता है।

(7) निरन्तर सुधार-नेतृत्व एक सतत् गतिशील शक्ति है। नेतृत्व वर्ग परम्पराओं से बँधा नहीं रहता। वह काम करने के लिए नये-नये तरीके ढूँढ़ता है, विवेकीकरण की आधुनिकतम युक्तियाँ  खोजता है और उपक्रम में उनके अवलम्बन पर जोर देता है।

(8) क्षमता का पूर्ण उपयोग-किसी भी अधीनस्थ व्यक्ति की क्षमता को समझना, उसका विकास करना और फिर उस क्षमता का व्यवसाय के हित के लिए उपयोग करना यह भी नेतृत्व का प्रमुख कार्य है। किसी भी संस्था में श्रम, कच्चे माल एवं वित्त के रूप में कितनी भी क्षमताएँ हो सकती हैं लेकिन नेतृत्व के अभाव में अप्रयुक्त पड़ी रहेंगी। नेतृत्व सभी क्षमताओं का पूर्ण दोहन करता है |

(9) समन्वय में सहायक नेतृत्व के द्वारा अधीनस्थों के कार्यों में समन्वय स्थापित करने में पर्याप्त सहायता मिलती है। किसी भी संस्था के निर्धारित उद्देश्य तभी प्राप्त किये जा सकते हैं, जबकि सम्पूर्ण संगठनात्मक ढाँचे के मध्य कार्य करने वाले व्यक्तियों की क्रियाओं में समन्वय रहे। सक्षम नेता यह कार्य आसानी से कर सकता है।

नेतृत्व के सिद्धान्त अथवा विचारधाराएँ (Theories or Approaches of Leadership)

नेतृत्व के प्रमुख सिद्धान्त अथवा नेतृत्व के सम्बन्ध में प्रमुख विचारधाराओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) नेतृत्व का लक्षणमूलक सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अन्तर्गत नेता के गुणों पर अधिक बल दिया गया है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन करने का श्रेय ओडी टीड, चैस्टर आई. बर्नाई, इरविन एच. सवेल आदि को है। इन्होंने कुछ प्रसिद्ध नेताओं के जीवन का गहन अध्ययन करके प्रभावी नेता के गुणों का प्रतिपादन किया। ये गुण जिस नेता में जितने अधिक होते हैं, वह उतना ही श्रेष्ठ माना जाता है| अतः नेतृत्व का लक्षणमूलक सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि नेतृत्व एक कला है और प्रभावी नेतृत्व में निश्चित गुणों का होना अत्यन्त आवश्यक है।

• वर्तमान युग में नेतृत्व का लक्षणमूलक सिद्धान्त प्रभावहीन हो गया है। क्योंकि इसमें निम्न दोष व्याप्त हो गए हैं

(i) इस सिद्धान्त को प्रतिपादित करने वाले विद्वानों ने कुछ प्रमुख नेताओं के जीवन-चरित्र का अध्ययन करके नेतृत्व के गुणों को प्रतिपादित किया है, परन्तु उन्होंने कहीं पर भी उन आदर्शों का वर्णन नहीं किया, जिनके आधार पर गुणों को आधार माना गया है।

(ii) नेतृत्व के गुणों की पहचान करना कठिन है। इसके अतिरिक्त यह भी ज्ञात करना अपने आप में समस्या है कि अमुक व्यक्ति में कौन-सा गुण कितनी मात्रा में है ?

(iii) नेतृत्व के गुणों पर विद्वानों ने अपनी एक राय प्रकट नहीं की है। ओर्डवे टीड ने 10, चैस्टर आई. बर्नार्ड ने 5 और इरविन एच. सचेल ने केवल 3 ही नेतृत्व के गुण बताये हैं। अतः विद्वान् नेतृत्व की योग्यताओं पर एकमत नहीं हैं।

(2) नेतृत्व का परिस्थितित्यात्मक सिद्धान्त-यह सिद्धान्त नेतृत्व के गुणों की पहचान पर अधिक बल देता है, जबकि नेतृत्व का लक्षणमूलक सिद्धान्त नेतृत्व में गुणों की गिनती पर आधारित है। इस में सिद्धान्त का प्रयोग सर्वप्रथम जर्मनी में किया गया था। इस सिद्धान्त को प्रतिपादित करने वाले विद्वान यह तो मानते ही हैं कि एक नेता में भाषण देने की क्षमता, बुद्धिमता, साहस, धैर्य, ईमानदारी, चातुर्य, कर्त्तव्यनिष्ठा आदि गुण तो होने चाहिए लेकिन इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण बात यह है कि परीक्षा की घड़ियों में अथवा किसी विशेष परिस्थिति में वह नेता अपने गुणों का किस प्रकार प्रयोग करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार एक नेता में परिस्थिति के साथ समायोजन करने का गुण होना भी अत्यन्त आवश्यक है। जहाँ पर कुछ लोगों का मत है कि ‘नेता पैदा होते हैं, बनाये नहीं जाते’ वहाँ पर कुछ लोगों का यह भी मत है कि ‘मनुष्य में नेतृत्व की क्षमता व गुणों का विकास परिस्थिति के अनुसार हो जाता है। हम व्यावहारिक जीवन में देखते हैं कि कुछ लोग प्रारम्भ में नेता नहीं थे, लेकिन बाद में उन्हें परिस्थितियों के कारण नेतृत्व के अवसर मिलने से वे अच्छे नेता बन गये। इस सिद्धान्त के अनुसार नेता के गुणों की जाँच परिस्थिति विशेष में ही की जाती है।

व्यावसायिक तथा गैर-व्यावसायिक उपक्रमों में भी नेतृत्व के विकास में परिस्थितियों का योगदान रहता है। इस दृष्टिकोण के अन्तर्गत सन् 1970 के दशक में प्रतिपादित दो प्रमुख सिद्धान्त इस प्रकार हैं

(अ) फीडलर का सायोगिक नेतृत्व सिद्धान्त-यह सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि प्रभावी नेतृत्व की कोई एक शैली ऐसी नहीं हो सकती जो प्रत्येक परिस्थिति में उपयुक्त हो। दूसरे शब्दों में, परिस्थिति के अनुसार नेतृत्व की शैली में परिवर्तन करने से ही वह प्रभावी बन सकती है। इस सिद्धान्त के तीन मुख्य तत्व हैं

(i) यदि समूह के सदस्यों के साथ नेता के सम्बन्ध सद्भाव व सम्मानपूर्ण हैं तो वह अपने सदस्यों को अधिक प्रभावित कर सकता हाय |

(ii) उच्च ढाँचे वाले कार्यों (जैसे, उत्पादन कार्य) की तुलना में निम्न ढाँचे वाले कार्यों (जैसे-शिक्षण या शोधकर्ता) में नेता का नियन्त्रण अधिक प्रभावी हो सकता है।

(iii) नेता के अधिकारों का भी नियन्त्रण की प्रभावशीलता पर प्रभाव पड़ता है। इन तीन तत्वों के आधार पर फीडलर ने ऐसी आठ परिस्थितियों का विकास किया है जिनमें तीन में प्रभावपूर्ण नेतृत्व के लिए पूर्ण अनुकूल परिस्थिति होती है, एक में पूर्ण प्रतिकूल और शेष चार में मध्यम स्तर की अनुकूल परिस्थिति होती है। इस सिद्धान्त के तीन महत्वपूर्ण निष्कर्ष निम्न प्रकार हैं |

(a) प्रभावी एवं अप्रभावी नेतृत्व में अन्तर करना कठिन कार्य है। वास्तव में एक ही नेता अनुकूल परिस्थिति में प्रभावी और प्रतिकूल परिस्थिति में अप्रभावी सिद्ध हो सकता है।

(b) गुणमूलक सिद्धान्तानुसार नेता में बहुत सारे गुणों का होना आवश्यक नहीं है।

(c) परिस्थिति के अनुसार नेता सदस्य सम्बन्धों, कार्य के ढाँचे एवं नेता के अधिकारों में परिवर्तन करके नेतृत्व को प्रभावी बनाया जा सकता है।

(ब) नेतृत्व का पय-लक्ष्य सिद्धान्त-इस सिद्धान्त का प्रतिपादन रॉबर्ट जे हाउसे ने किया है। इसके अन्तर्गत निम्न चार नेतृत्व व्यवहारों को इंगित किया गया है

(i) निर्देशात्मक नेतृत्व-इसके अन्तर्गत नेता अधीनस्थों को यह बताता है कि उनसे क्या अपेक्षित है एवं उनको कार्य विषयक मार्गदर्शन भी प्रदान करता है।

(ii) सहयोगात्मक नेतृत्व-इसके अनुसार नेता का व्यवहार मैत्रीपूर्ण होता है।

(iii) उपलब्धि-उन्मुख नेतृत्व-इसके अनुसार नेता चुनौतीपूर्ण लक्ष्य निर्धारित करता है तथा अपने अधीनस्थों से सर्वोत्तम निष्पादन की अपेक्षा करता है।

(iv) सहभागितापूर्ण नेतृत्व-इसके अनुसार नेता अपने अधीनस्थों को निर्णय में भागीदार बनाता है।

यह सिद्धान्त फीडलर के सिद्धान्त की भाँति मात्र यही नहीं बताता कि अमुक परिस्थिति में कौन-सा नेतृत्व व्यवहार उपयुक्त होगा, वरन यह भी स्पष्ट करता है कि अमुक नेतृत्व व्यवहार उपयुक्त क्यों रहेगा। संक्षेप में यह सिद्धान्त अधिक तर्कपूर्ण है।

(3) नेतृत्व का व्यवहार या आचरण विषयक सिद्धान्त-इस विचारधारा के प्रणेता रे ए. किलियन (Ray A. Killian) हैं। उनके अनुसार, “एक नेता मूल रूप से चाहे कुशल निर्णय लेने वाला हो, समस्याओं का समाधान करने वाला हो, अच्छा परामर्शदाता हो, सूचना प्रदान करने वाला हो या नियोजक हो, परन्तु उसे अपने अनुयायियों के समक्ष आदर्श आचरण प्रस्तुत करना चाहिए। आदर्श आचरण या अच्छे व्यवहार के अभाव में वह कभी भी सफल नेता नहीं बन सकता।” उदाहरण के लिए, यदि एक व्यक्ति स्वयं शराबी है, और अनुयायियों से यह अपेक्षा करे कि वे शराब न पियें तो उसकी यह आशा निराधार होगी व्यवहार सम्बन्धी दृष्टिकोण में नेता के व्यक्तिगत गुणों तथा उसकी विशेषताओं के स्थान पर उसके आचरण के अध्ययन पर अधिक बल दिया जाता है। इस प्रकार किसी नेता की सफलता का मूल्यांकन उसके व्यवहार का विश्लेषण करके किया जा सकता है। संक्षेप में, इस सिद्धान्त के अनुसार अनुयायियों की कुछ प्राथमिक आवश्यकताएँ होती हैं और जो भी व्यक्ति उनकी इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक सिद्ध होता है, उसी व्यक्ति को नेता मान लिया जाता है। अतः इस सिद्धान्त के अनुसार किसी व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता को ज्ञात करने के लिए उसके अनुयायियों के आचरण का अध्ययन करना चाहिए।

(4) प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण का सिद्धान्त-सभी कर्मचारी यह आशा करते हैं कि पर्यवेक्षक उनमें व्यक्तिगत रुचि लेकर उनके व्यक्तित्व का विकास करे। अतः नेता एवं कर्मचारियों के मध्य जितना अधिक व्यक्तिगत व प्रत्यक्ष सम्पर्क होगा, नेतृत्व भी उतना ही अधिक प्रभावशाली होगा।

(5) अभिप्रेरणा का सिद्धान्त इस सिद्धान्त के अनुसार अभिप्रेरणा को नेतृत्व से पृथक् एवं स्वतन्त्र करके कर्मचारियों की कार्यक्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं किया जा सकता। नेतृत्व मूलतः अभिप्रेरणा पर ही निर्भर करता है।

(6) नेतृत्व की तकनीकों का सिद्धान्त यह सिद्धान्त इस तथ्य की व्याख्या करता है कि नेतृत्व की प्रभावशीलता के लिए यह आवश्यक है कि नेतृत्व की तकनीक उचित परिस्थितियों के अनुरूप एवं आधुनिक हो।

(7) नेतृत्व का X तथा Y सिद्धान्त-नेतृत्व के सम्बन्ध में X सिद्धान्त तथा Y सिद्धान्त महत्वपूर्ण है। इस X सिद्धान्त का प्रतिपादन मैक ग्रेगोर ने किया था। इन दोनों सिद्धान्तों ने दो विरोधी पहलुओं को उभारा है। X सिद्धान्त के अनुसार, व्यक्ति स्वयं अपनी इच्छा से कार्य करना नहीं चाहता। अतएव उससे कार्य कराने के लिए उसे डराना, धमकाना, लताड़ना एवं पग-पग पर निर्देशन देना परम आवश्यक होता है। ऐसा करने पर ही कार्य का निष्पादन कराया जा सकता है। ऐसी स्थिति में  से कार्य लेने के लिए नेतृत्व उसे धमकायेगा, हरायेगा एवं समय-समय पर निर्देशन प्रदान करेगा। इसके विपरीत Y सिद्धान्त की यह मान्यता है कि व्यक्ति स्वयं अपनी ओर से कार्य करना चाहता है। इसका कारण यह है कि उसमें सृजनात्मक प्रवृत्ति विद्यमान रहती है एवं यह आशावादी होता है। अतएव नेतृत्व का कार्य तो केवल उसका उचित मार्गदर्शन करना ही है। इससे व्यक्ति अधिक सन्तोष का अनुभव करता है।

(8) नेतृत्व का अनुयायी सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार किसी व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता की माप करने के लिए उसके अनुयायियों के आचरण का अध्ययन किया जाता है अर्थात् इस सिद्धान्त के अनुसार अनुयायियों की कुछ प्रारम्भिक आवश्यकताएँ होती है और जो व्यक्ति इन आवश्यकताओं की पूर्ति में सबसे अधिक सहायक होता है, उसी को नेता मान लिया जाता है।

(9) उद्देश्यों की सामंजस्यता का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त का सार इस बात में निहित है कि प्रभावी नेतृत्व के द्वारा संस्था एवं उसके कर्मचारियों के व्यक्तिगत उद्देश्यों में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। जब कर्मचारियों को यह विश्वास हो जाता है कि उनके वैयक्तिक लक्ष्य तथा संगठन के उद्देश्य परस्पर सहायक एवं पूरक हैं तो वे आत्म-विश्वास व निष्ठा के साथ काम करते हैं।

(10) क्रियात्मक विचारधारा-इस विचारधारा के अनुसार नेता का एक व्यक्ति के रूप में अध्ययन नहीं करना चाहिए वरन एक समूह के रूप में उस व्यक्ति का अध्ययन नेता के रूप में करना चाहिए कि वह समूह में किस प्रकार कार्य करता है क्योंकि नेता का सम्बन्ध व्यक्ति विशेष से न होकर व्यक्तियों के समूह से होता है।

नेतृत्व की शैलियों के विभिन्न स्वरूप (Various Styles of Leadership)

प्रबन्ध में नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण भूमिका है और प्रबन्ध की सफलता बहुत कुछ कुशल और प्रभावशाली नेतृत्व पर निर्भर करती है। नेतृत्व से आशय किसी व्यक्ति विशेष के उन गुणों से है, जिनके द्वारा वह अन्य व्यक्तियों का मार्गदर्शन करता है और नेता के रूप में उसकी क्रियाओं का संचालन करता है। नेतृत्व शैली से आशय नेता के विशिष्ट व्यवहार और कार्य करने के ढंग से होता है। जिसके आधार पर वह कार्य करना चाहता है। इस प्रकार नेतृत्व की शैलियाँ अथवा स्वरूप नेतृत्व से सम्बन्धित विभिन्न विशिष्ट व्यवहारों की व्याख्या करती हैं। नेतृत्व की मुख्य शैलियों को निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता है

(1) अभिप्रेरणात्मक शैली या स्वरूप (Motivational Style) इस प्रकार की नेतृत्व प्रणाली में कर्मचारियों को विभिन्न प्रकार की प्रेरणाएँ देकर काम लेने पर जोर दिया जाता है। नेतृत्व की अभिप्रेरणा शैली के निम्न दो रूप हो सकते हैं

(i) धनात्मक शैली (Positive Style)-जब नेता अपने अनुयायियों को वित्तीय तथा अवित्तीय प्रेरणाएँ देकर काम करने के लिए आवश्यक निर्देश देता है तो इसे धनात्मक अभिप्रेरणा कहते हैं। फलस्वरूप अनुयायियों द्वारा अधिक परिश्रम एवं लगन से कार्य किया जाता है तथा वे औद्योगिक शान्ति की स्थापना में पूर्ण सहयोग करते हैं।

(ii) ऋणात्मक शैली (Negative Style)-इस विधि में नेता कर्मचारियों को डरा-धमकाकर, दण्ड का भय दिखाकर, कार्य से हटाने व वेतन में कमी करके और अधिक समय तक काम लेने की धमकी देकर कार्य करने हेतु अभिप्रेरित करता है। इस शैली द्वारा अनुयायियों को अल्पकाल के लिए तो अभिप्रेरित किया जाता है, किन्तु निरन्तर अभिप्रेरणा की दृष्टि से नेतृत्व की यह शैली उपयुक्त नहीं मानी जा सकती। इसके अतिरिक्त इस शैली द्वारा औद्योगिक शक्ति के वातावरण का निर्माण भी नहीं किया जा सकता है।

(2) शक्ति शैली या स्वरूप (Power Style) इस प्रणाली में नेता शक्ति के आधार पर नेतृत्व प्रदान करता है। शक्ति के आधार पर नेतृत्व की शैली के निम्नांकित रूप प्रचलित है

(i) अधिनायकवादी शैली (Autocratic Style)-अधिनायकवादी नेतृत्व का अनुसरण करने वाले प्रबन्धक नेता अपने अधिकारों एवं सत्ता का प्रयोग करके अधीनस्थों से काम कराते हैं और असन्तोषजनक कार्य निष्पादन की स्थिति में उनकी प्रतारणा, निन्दा, भर्त्सना एवं आलोचना आदि करते हैं। इस प्रकार के नेतृत्व में मानव मूल्यों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। प्रबन्धक अपना ध्यान केवल उत्पादन पर केन्द्रित करते हैं।

(ii) प्रजातान्त्रिक शैली (Democratic Style)-प्रजातान्त्रिक नेतृत्व प्रणाली, अधिनायकवादी नेतृत्व प्रणाली से विपरीत होती है। इस प्रकार के नेतृत्व का अनुसरण करने वाले प्रबन्धक उत्पादन की ओर अपना ध्यान कर्मचारियों पर केन्द्रित करते हैं। इसमें प्रबन्धक नीतियों का निर्धारण स्वयं अकेला न करके अपने अधीनस्थों से विचार-विमर्श करके करता है। इस प्रकार के नेतृत्व में नेता को अपने अधिकारों के प्रति अधिक स्नेह नहीं होता है। इससे अधीनस्थों में सहकारिता की भावना का विकास होता है तथा स्वस्थ मानवीय सम्बन्धों की स्थापना में सहयोग मिलता है।

(iii) स्वतन्त्र अथवा निर्बाध शैली (Free Rein Style)-इस प्रणाली का अनुसरण करने वाले नेता अपने अनुयायियों को न तो दिशा प्रदान करता है और न ही उनका मार्गदर्शन करता है। वह अपने अनुयायियों को खुली छूट देता है कि वे अपनी इच्छा से जैसा उचित समझें करें ऐसे प्रबन्धक न तो कर्मचारी केन्द्रित होते हैं और न ही उत्पादन केन्द्रित। इसमें अनुयायी स्वयं ही लक्ष्य निर्धारित करते हैं और स्वयं ही लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक निर्णय लेते हैं।

(3) पर्यवेक्षकीय शैली या स्वरूप (Supervisory Style)-नेतृत्व के इस स्वरूप में नेता किसी उद्देश्य विशेष को आमने-सामने रखता है और उस उद्देश्य विशेष को ध्यान में रखते हुए नेतृत्व करता है अथवा उत्पादन को अधिक महत्व देते हुए नेतृत्व करता है। इसको निम्न भागों में बाँटा जा सकता है

(i) कर्मचारी प्रधान शैली-इस प्रकार के नेतृत्व में अधीनस्थों की सुविधाओं, कार्य की दशाओं, कार्य के वातावरण में सुधार आदि पर अधिक ध्यान दिया जाता है जिससे कर्मचारी कार्य के प्रति आकृष्ट होकर श्रेष्ठतम व अधिकतम कार्य कर सकें। इसमें मानवीय दृष्टिकोण पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

(ii) उत्पादन प्रधान शैली-नेतृत्व की इस प्रणाली में उत्पादन वृद्धि पर सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। इसमें नेतृत्व प्रदान करने वाला इस मान्यता को लेकर चलता है कि उत्पादन की नवीन तकनीकों को अपनाने, कर्मचारियों को सदैव कार्यरत रखने एवं कार्य के प्रति उनका आकर्षण बढ़ाने से संस्था के लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।

उपयुक्त नेतृत्व शैली का चुनाव (Selection of Suitable Leadership Style)

नेतृत्व की विभिन्न शैलियों के अध्ययन के आधार पर प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि कौन-सी नेतृत्व शैली उपयुक्त है या किसे अपनाया जाना चाहिए। इस सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि नेतृत्व की कोई भी विधि अपने आप में पूर्ण नहीं है। प्रायः सभी शैलियों में से किसी एक शैली को परिस्थितियों के अनुसार अपनाया जा सकता है। यदि औद्योगिक प्रजातन्त्र की स्थापना सौहार्द्रपूर्ण मानवीय सम्बन्ध एवं औद्योगिक शान्ति को प्रोत्साहन देना है तो एक नेता को जनतन्त्रात्मक शैली या धनात्मक शैली या कर्मचारी प्रधान शैली को अपनाना चाहिए।


Meaning and Definition of Leadership

The success of collective action in any field depends to a large extent on efficient leadership. Competent leader organizes the group’s love and efforts and provides the right direction. Leadership refers to that quality of a person by which he guides other people and conducts their activities as a leader. Good leadership provides its followers with efficiency and security in execution.

In the words of Alfred and Beety, “Leadership is the quality by which a group of followers get the desired work done voluntarily and without coercion.”

According to Keith Davis, “Leadership is the ability to motivate others to enthusiastically achieve predetermined objectives.”

According to Koontz and O’Donnell, “Leadership is the art or process of influencing individuals to act voluntarily to achieve the goals of the group.”

Characteristics of Leadership

The main characteristics of leadership can be explained as follows

(1) Individual Ability – Leadership is an individual ability that holds a person together in a group or a group of followers. A leader cannot be imagined without followers.

(2) Unity in Objectives – There should be unity in the aims of the leader and the followers. If the objectives of both are different then leadership will be ineffective.

(3) Guidance of followers – Under leadership, the leader guides his followers, that is, he remains at the forefront of all the tasks.

(4) Leadership qualities – The person providing leadership should have such characteristics and qualities which inspire others and people put their trust in him. It can also be said that only a person with the necessary abilities and qualities is called a leader.

(5) Attention to circumstances – Keeping in mind the changing circumstances through leadership. The translation group is targeted and delivered with the help of a stimulus.

(6) Organization of the group- The leader organizes his group and motivates it to work in the prescribed manner.

(7) Continuous and dynamic action-Leadership is a continuously dynamic and ever-increasing action.

Qualities of Leadership

It is generally said that it is very easy to become a leader or to lead, but this ideology is not entirely correct. Efficient leadership is hard to find. In fact, a leader should have all the qualities so that he can work efficiently. A leader should be a person with complete personality. Different scholars have given different qualities of leadership. The main qualities found in a leader can be explained as follows:

(1) Effective personality- The personality of a skilled leader should be such that he can influence others, that is, his personality should be influencing.

(2) Good character- A leader can influence others only when his character is also good.

(3) Self-Confidence – To gain the trust of others, it is also necessary that you have the power of self-belief. It is also very important to have this quality in an efficient leadership.

(4) Communication Skills – There is an exchange of ideas, information and orders between the leader and the subordinates from time to time. Therefore, a leader must have the ability to give orders to his followers and information efficiently to other persons.

(5) Patience and Tolerance – To solve the difficulties easily, the leader should have the quality of tolerance. Leaders are mostly victims of criticism, they should listen patiently to their criticisms and should not get distracted in any adverse situation. Patience should be done in the face of all critical situations and move forward towards the goal.

(6) Mental ability – It is also very important to have developed mental ability in a skilled leader. A leader should never be narrow minded. His outlook should always be comprehensive. A leader should not always keep his thoughts stable. He should have the ability to change his thoughts according to the circumstances.

(7) Direction Ability- The leader has to direct his subordinates from time to time, so it is also necessary to have directing ability.

(8) Sharp Decisive Power – If the decision is right, then the right work can be done on time, so a skilled leader should have the quality of taking quick decisions.

(9) Affection and friendship – Affection and friendship are also the main qualities of a skilled leader because it can win the hearts of others. The leader must have affection for his subordinates.

(10) The cooperative leader should have the ability to work with as many people as possible. In other words, it can be said that an efficient leader should have the quality of cooperative.

Importance of Leadership in Management

Leadership has been recognized as the most important cornerstone of managerial success. The function and importance of leadership can be understood by the following headings

(1) Right pillar of cooperation – An efficient leadership creates a feeling of cooperation in its place by eliminating the feeling of confusion, mutual animosity and hatred. Thus, efficient leadership is the cornerstone of cooperation.

(2) Supporting Guidance—Leadership Staff in Challenging Situations By guiding them, it empowers them to face challenging situations.

(3) Basis of Motivation – Leadership motivates the employees to achieve the goal. It awakens the inner desire to work in their hearts.

(4) Take advantage of opportunities – By working under the guidance of leadership, full advantage of present and future opportunities can be taken.

(5) Conduct of collective work – In the absence of leadership, the members of an enterprise may work efficiently separately, but unity, co-ordination and collectiveness cannot arise among them.

(6) Establishment of discipline – In an environment of indiscipline, the qualities and efficiency of the best of the best cannot be taken advantage of. Leadership on the strength of its power, talent and influence establishes and maintains a disciplinary environment in the group.

(7) Continuous Improvement – ​​Leadership is a constantly moving force. Leadership is not bound by class traditions. He seeks out new ways of doing things, discovers the latest methods of rationalization and emphasizes on their dependence in the enterprise.

(8) Full utilization of potential – Understanding the potential of any subordinate person, developing it and then using that ability for the benefit of the business is also the main function of leadership. Any organization may have any number of capabilities in terms of labour, raw material and finance but will remain unutilized due to lack of leadership. Leadership makes full use of all potentials.

(9) Co-ordination helps adequately in coordinating the work of subordinates by supporting leadership. The defined objectives of any organization can be achieved only when there is co-ordination in the activities of the people working among the entire organizational structure. A competent leader can do this work easily.

Theories or Approaches of Leadership

The main principles of leadership or the main ideologies in relation to leadership can be clarified as follows:

(1) Characteristic Theory of Leadership- Under this theory, more emphasis has been laid on the qualities of the leader. The credit for propounding this theory goes to Odie Teed, Chester I. Burnai, Irwin H. Savell etc. By studying the lives of some famous leaders, he rendered the qualities of an effective leader. The more these qualities are in the leader, the better he is considered to be. Therefore, the characteristic theory of leadership emphasizes that leadership is an art and it is very important to have certain qualities in effective leadership.

• In the present era, the characteristic theory of leadership has become ineffective. Because the following faults have prevailed in it

(i) Scholars propounding this theory have propounded the qualities of leadership by studying the life-characters of some prominent leaders, but they have nowhere described the ideals on the basis of which the qualities have been considered as the basis. .

(ii) It is difficult to identify the qualities of leadership. Apart from this, it is also a problem in itself to know that which quality is in such a person in what quantity?

(iii) Scholars have not expressed their single opinion on the qualities of leadership. Ordway Teed has 10, Chester I. Bernard 5 and Irwin H. Sachall has given only 3 leadership qualities. Therefore, scholars are not unanimous on the merits of leadership.

(2) Situational Theory of Leadership- This theory lays more emphasis on the identification of the qualities of leadership, whereas the characteristic theory of leadership is based on the counting of qualities in leadership. In this the principle was first used in Germany. Scholars propounding this theory believe that a leader should have the ability to deliver speech, intelligence, courage, patience, honesty, tact, devotion, etc., but the important thing in this regard is that in times of examination. Or how that leader uses his qualities in a particular situation. According to this principle, it is very important for a leader to have the ability to adjust with the situation. Where some people are of the opinion that ‘leaders are born, they are not made’, there some people also believe that ‘the ability and qualities of leadership in man are developed according to the situation’. We see in practical life that some people were not leaders in the beginning, but later they became good leaders by getting opportunities for leadership due to circumstances. According to this principle, the qualities of a leader are tested only in a particular situation.

Circumstances contribute to the development of leadership in business and non-business ventures as well. Under this approach, the two main principles propounded in the 1970s are as follows:

(a) Fiedler’s Coherent Leadership Theory- This theory emphasizes that there can be no one style of effective leadership which is suitable in every situation. In other words, it can become effective only by changing the style of leadership according to the situation. There are three main elements of this theory

(i) If the relationship of the leader with the members of the group is good and respectful, then he can influence his members more.

(ii) Leader’s control may be more effective in low structure tasks (eg, teaching or researcher) than in high structure tasks (eg, production functions).

(iii) the rights of the leader It affects the effectiveness of the control. Based on these three elements, Fiedler has developed eight situations in which three are absolutely favorable conditions for effective leadership, one completely unfavourable and the remaining four are moderately favorable conditions. The three important conclusions of this theory are as follows.

(a) It is a difficult task to differentiate between effective and ineffective leadership. In fact, only one leader can prove to be effective in favorable circumstances and ineffective in unfavorable circumstances.

(b) According to the trait theory, it is not necessary to have many qualities in a leader.

(c) According to the situation, leadership can be made effective by making changes in the leader member relations, work structure and the authority of the leader.

(b) Goal Theory of Leadership – This theory has been propounded by Robert J. House. Under this, the following four leadership behaviors have been indicated.

(i) Directional Leadership- Under this, the leader tells the subordinates what is expected of them and also provides them with work related guidance.

(ii) Collaborative Leadership- According to this, the behavior of the leader is friendly.

(iii) Achievement-oriented leadership- According to this the leader sets challenging goals and expects the best performance from his subordinates.

(iv) Participatory Leadership- According to this, the leader makes his subordinates partners in decisions.

This theory, like Fiedler’s theory, not only explains which leadership behavior would be appropriate in a certain situation, but it also explains why such leadership behavior would be appropriate. In short, this theory is more logical.

(3) The theory of behavior or conduct of leadership – The founder of this ideology, Ray A. Killian (Ray A. Killian). According to him, “A leader may be basically an efficient decision maker, problem solver, good counsellor, information provide or planner, but he should present ideal conduct to his followers. Without ideal conduct or good behavior, he can never become a successful leader.” For example, if a person himself is an alcoholic, and expects followers not to drink, his hope would be unfounded in his behavioral approach. More emphasis is laid on the study of the leader’s personal qualities and his/her behavior rather than his/her characteristics. Thus the success of a leader can be assessed by analyzing his/her behaviour. In short, according to this theory, some primary characteristics of the followers are There are needs and whoever proves to be helpful in fulfilling these needs, that person is considered to be the leader. Therefore, according to this principle, to know the leadership ability of a person, to study the behavior of his followers. needed.

(4) Principle of Direct Supervision – All employees expect that the supervisor develops their personality by taking personal interest in them. Therefore, the more personal and direct contact between the leader and the employees, the more effective the leadership will be.

(5) Theory of Motivation According to this principle, the efficiency of employees cannot be fully utilized by separating and independent of motivation from leadership. Leadership basically depends on motivation.

(6) Theory of Leadership Techniques This theory explains the fact that for the effectiveness of leadership it is necessary that the techniques of leadership are appropriate and modern in appropriate circumstances.

(7) X and Y Theory of Leadership – X principle and Y principle are important in relation to leadership. This X principle was propounded by Mac Gregor. Both these theories have raised two opposing aspects. According to the X principle, a person does not want to act of his own volition. Therefore, in order to get him to work, it is absolutely necessary to intimidate, threaten, reprimand and direct him every step of the way. Only then can the work be executed. In such a situation, the leadership will intimidate, beat and give direction from time to time to take the task from him. In contrast, the theory of Y assumes that the individual wants to act on his own behalf. The reason for this is that there is a creative tendency in him and he is optimistic. Therefore, the job of leadership is only to guide him properly. This makes a person feel more satisfied.

(8) Follower Theory of Leadership – According to this theory, to measure the leadership ability of a person, the behavior of his followers is studied, that is, according to this theory, the followers have some initial needs and the person who fulfills these needs. He is most helpful, he is considered as the leader.

(9) The principle of harmony of objectives – The essence of this principle lies in the fact that through effective leadership harmony can be established between the individual objectives of the organization and its employees. When employees are convinced that their individual goals and organizational objectives are mutually supportive and complementary, they work with confidence and integrity.

(10) Functional ideology – According to this ideology, the leader should not be studied as an individual, but as a group, the person should be studied as a leader, how he is in the group.

It works because the leader is not related to the individual but to the group of people.

Various Styles of Leadership

Leadership has an important role in management and the success of management depends a lot on efficient and effective leadership. Leadership refers to those qualities of a particular person by which he guides other people and conducts his activities as a leader. Leadership style refers to the specific behavior and way of doing things of the leader. on the basis of which he wants to act. In this way the styles or forms of leadership explain various specific behaviors related to leadership. The main styles of leadership can be understood under the following heads

(1) Motivational Style: In this type of leadership system, emphasis is laid on giving different types of motivations to the employees. The motivational style of leadership can be of the following two forms:

(i) Positive Style – When the leader gives necessary instructions to his followers to work by giving financial and non-financial motivations, then it is called positive motivation. As a result, the followers work with more diligence and dedication and they fully cooperate in the establishment of industrial peace.

(ii) Negative Style – In this method, the leader motivates the employees to work by intimidating, showing fear of punishment, removal from work and reduction in salary and threatening to take more time. Through this style, the followers are motivated for a short period of time, but this style of leadership cannot be considered suitable from the point of view of continuous motivation. Apart from this, the atmosphere of industrial power cannot be created by this style.

(2) Power Style: In this system, the leader provides leadership on the basis of power. On the basis of power, the following forms of leadership style are prevalent.

(i) Autocratic Style – The managerial leaders following authoritarian leadership, by using their authority and authority, get the subordinates to work and in the event of unsatisfactory performance they criticize, criticize, criticize, etc. In this type of leadership, no attention is paid to human values. Managers focus their attention only on production.

(ii) Democratic Style – Democratic leadership system is opposite to the authoritarian leadership system. Managers following this type of leadership tend to focus their attention on the employees towards production. In this, the manager decides the policies not by himself but in consultation with his subordinates. In this type of leadership the leader does not have much affection for his rights. This develops the spirit of co-operation among the subordinates and helps in establishing healthy human relations.

(iii) Free Rein Style – The leader who follows this system neither provides direction nor guides his followers. He gives free rein to his followers to do as they wish to as they deem fit, such managers are neither employee centric nor production oriented. In this, the followers set their own goals and themselves take necessary decisions to achieve the goals.

(3) Supervisory Style – In this form of leadership, the leader puts a particular objective face to face and leads with that particular objective in mind or leads by giving more importance to production. It can be divided into the following parts

(i) Employee-oriented style- In this type of leadership, more attention is paid to the facilities, working conditions, improvement of work environment etc. so that the employees can get the best and maximum work by getting attracted towards the work. It focuses more on the human point of view.

(ii) Production-oriented style – In this system of leadership, the highest importance is given to production growth. In this, the person providing leadership takes the belief that the goals of the organization can be easily achieved by adopting new techniques of production, keeping the employees always employed and increasing their attraction towards the work.

Selection of Suitable Leadership Style

Based on the study of different styles of leadership, the question arises that which leadership style is appropriate or which should be adopted. In this context it can be said that no method of leadership is complete in itself. Almost any one of the styles can be adopted according to the circumstances. If the establishment of industrial democracy is to promote harmonious human relations and industrial peace, then a leader should adopt democratic style or positive style or employee-oriented style.

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