संदेशवाहन से क्या आशय है ? संदेशवाहन की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। What is meant by conveyance? Describe the process of messaging.

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सन्देशवाहन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Communication)

साधारण शब्दों में, सन्देशवाहन का आशय सूचना या विचारों के लिखित या मौखिक आदान-प्रदान से है। दो या दो से अधिक व्यक्तियों में तथ्यों, विचारों, अनुमानों या संवेगों के पारस्परिक आदान-प्रदान को सन्देशवाहन कहते हैं। इसमें दो मस्तिष्कों का होना आवश्यक है। इसके यदि दो मस्तिष्क नहीं होंगे तो सन्देशवाहन नहीं हो सकेगा। यदि पहले व्यक्ति का विचार दूसरा व्यक्ति अच्छी तरह से समझ नहीं पाता है अथवा उसके अनुसार कार्य नहीं करता है तो फिर सन्देशवाहन का कोई महत्व नहीं रह जाता है। उदाहरण के लिए, यदि छात्रों को कॉलेज का घण्टा धीमी आवाज से बजने के कारण सुनाई नहीं दे तो फिर उसका होना अवधा न होना महत्वहीन ही है। आधुनिक वैज्ञानिक युग में विज्ञान ने तार, टेलीफोन, टेलीविजन, रेडियो आदि जैसे साधन उपलब्ध कराकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक विचारों का सम्प्रेषण अधिक सुगम बना दिया है। सन्देशवाहन के इन साधनों के विस्तार के कारण अब विचारों का आदान-प्रदन करना काफी सुगम हो गया है। सन्देशवाहन को सम्प्रेषण, संचार, संवादवाहन आदि अनेक नामों से भी जाना जाता है।

सी. जी. ब्राउन (C. G. Brown) के अनुसार, “सन्देशवाहन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के मध्य सूचनाओं का सम्प्रेषण है, चाहे उससे विश्वास उत्पन्न हो अथवा नहीं और पारस्परिक विनिमय हो या नहीं, किन्तु इस प्रकार दी गई सूचना प्राप्तकर्ता को समझ आ जानी चाहिए।

न्यूमैन एवं समर (Newman and Summer) के अनुसार, “सन्देशवाहन दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य तव्यों, विचारों, सम्मतियों अथवा भावनाओं का विनिमय है।”

फ्रेड जी. मायर (Fred G. Mayer) के अनुसार, “सन्देशवाहन शब्दों, पत्रों अथवा सूचना, विचारों सम्मतियों का आदान-प्रदान करने का समागम है।”

सम्प्रेषण की विशेषताएँ (Characteristics of Communication)

सम्प्रेषण की प्रमुख विशेषताओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) सम्प्रेषण निरन्तर या लगातार चलने वाली व्यवस्थित प्रक्रिया है।

(2) सम्प्रेषण में सूचनाओं का आदान-प्रदान मानवीय समूह के मध्य किया जाता है।

(3) सम्प्रेषण में दो पक्षकार होते हैं। प्रथम सूचना देने वाला एवं द्वितीय, सूचना प्राप्तकर्ता

(4) सम्प्रेषण में सूचनाओं तथ्यों, विचारों, भावनाओं, सम्मतियों, सुझाव आदि का आदान-प्रदान किया जाता है।

(5) सम्प्रेषण का मुख्य उद्देश्य समझ पैदा करना है।

(6) सम्प्रेषण लिखित, मौखिक एवं सांकेतिक हो सकता है।

(7) सम्प्रेषण व्यवसाय, समाज, धर्म, राजनीति एवं अर्थव्यवस्था में समान रूप से उपयोगी है, अतः यह सर्वव्यापक क्रिया है।

(8) सम्प्रेषण निर्देशन का एक महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि यह निर्देशक एवं निर्देशित दोनों के मध्य सेतु का कार्य करता है।

(9) सम्प्रेषण, अफवाहें एवं भ्रम को दूर करने में सहायक है।

(10) सम्प्रेषण में सूचना देना ही शामिल नहीं है बल्कि सम्प्रेषिति की प्रतिक्रिया को जानना भी शामिल होता है।

सन्देशवाहन का महत्व (Importance of Communication)

किसी भी संस्था का कुशल संचालन काफी सीमा तक सम्प्रेषण की पद्धति की पूर्णता पर निर्भर करता है। प्रत्येक संस्था चाहे वह बड़े आकार की हो या छोटे आकार की, चाहे वह निजी क्षेत्र की हो, सार्वजनिक क्षेत्र की बिना उचित सम्प्रेषण की व्यवस्था के अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर सकती। इसलिए कहा जाता है कि सम्प्रेषण सम्पूर्ण औद्योगिक क्रियाओं की आधारशिला है। सन्देशवाहन के महत्व को निम्न प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं–

(1) प्रबन्धकीय कार्यक्षमता में वृद्धि-प्रबन्धकीय कार्यक्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रबन्ध अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से कितनी कुशलता से कार्य करा सकते हैं। इस कुशलता को प्राप्त करने के लिए प्रबन्ध सन्देशवाहन द्वारा कर्मचारियों को भिन्न-भिन्न प्रकार से आदेश एवं निर्देश देते हैं, उनकी कठिनाइयों को समझते हैं तथा उन्हें दूर करने के उपाय सुझाते हैं।

(2) कुशल संचालन सम्भव-किसी भी उपक्रम का कुशल संचालन काफी सीमा तक सब्देशवाहन की पद्धति की पूर्णता पर निर्भर करता है। प्रत्येक उपक्रम चाहे वह बड़े आकार का हो या छोटे आकार का, चाहे वह निजी क्षेत्र का हो या सार्वजनिक क्षेत्र का, बिना उचित सन्देशवाहन की व्यवस्था के अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर सकता। अनेक उपक्रमों में तो सन्देशवाहन के अतिरिक्त कुछ दृष्टिगत ही नहीं होता है।

(3) शीघ्र निर्णय में सुविधा-एक व्यापारी अपने व्यापार सम्बन्धी निर्णय करने में स्वतन्त्र होता है, किन्तु साझेदारी संस्था के निर्णय सभी साझेदारों की सहमति से लिए जाते हैं, और संयुक्त पूँजी वाली कम्पनियों के निर्णय संचालकों की सभा में पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद लिये जाते हैं। अतः शीघ्र से शीघ्र विचार-विमर्श करके निर्णय लेने के लिए प्रभावशाली सन्देशवाहन व्यवस्था का होना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है।

(4) सहयोग प्राप्त करने में सुविधा श्रेष्ठ संवादवाहन की व्यवस्था कर्मचारियों को अच्छा कार्य करने का अवसर प्रदान करती है। किसी कार्य को पूरा करने से पूर्व उस कार्य के विषय में मानसिक रूप से तैयार होना बहुत अधिक आवश्यक है। इसका अर्थ यह है कि वास्तविक कार्य के पूर्व कार्य करने की इच्छा का जागत होना अत्यन्त आवश्यक होता है। इस इच्छा को जाग्रत करने के लिए कार्य को समझाने हेतु संवादवाहन की अवश्यकता होती है।

(5) नेतृत्व करने में सहायक-संवादवाहन नेतृत्व का आधार है। यदि प्रबन्धक प्रभावपूर्ण नेता बनना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि वे कर्मचारियों का विश्वास जीत लें और यह तभी सम्भव है जब दोनों के बीच विचार-विमर्श की अच्छी व्यवस्था हो । प्रबन्धक कर्मचारियों की भावना और इच्छा को समझ सकें, उन्हें सही दिशा में मोड़ सकें और उन्हें उपयुक्त प्रकार के आदेश व निर्देश दे सकें। एक जेता अपने विचारों सुझावों और निर्णयों को केवल संवादवाहन के द्वारा ही प्रसारित कर सकता है। इसी प्रकार से अनुयायी भी अपने अनुभव, सुझाव तथा समस्याओं को अपने नेता को संवादवाहन की व्यवस्था में ही अवगत करा सकते हैं।

(6) समन्वय में सुविधा उपक्रम के विभिन्न विभागों और कर्मचारियों की क्रियाओं में स स्थापित करने के लिए भी प्रभावपूर्ण संवादवाहन की व्यवस्था अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। इ फलस्वरूप सारे कर्मचारियों को यह मालूम रहता है कि उपक्रम में कब क्या हो रहा है और उपक्रम की प्रगति में उनके योगदान का क्या महत्व है ? प्रत्येक विभाग यह प्रयत्न करता है कि अपने काम में वह दूसरे विभागों से पीछे न रह जाये और उसकी योजनाएँ व प्रगति दूसरे विभागों की योजनाओं और प्रगति से मेल खायें।

(7) न्यूनतम व्यय पर अधिकतम उत्पादन सम्भव-वर्तमान युग में प्रबन्धक और कर्मचारियों के बीच प्रत्यक्ष, धनिष्ठ एवं आमने-सामने के सम्पर्क का अभाव हो गया है। इस अभाव की पूर्ति संवादवाहन की उचित व्यवस्था द्वारा की जा सकती है। एक संगठन में सूचनाएँ एवं आदेश विभिन्न कर्मचारियों के माध्यम से श्रमिकों तक पहुँचाये जाते हैं। संगठन में भ्रम उत्पन्न न हो सके, इसके लिए यह आवश्यक होता है कि प्रत्येक कर्मचारी के कार्य को निश्चित कर दिया जाये, उन्हें आवश्यक निर्देशों के प्रसारण की भी व्यवस्था होनी चाहिए।

(8) मनोबल का निर्माण एवं जनतन्त्रीय प्रबन्ध सम्भव-एक प्रभावशाली संवादवाहन की व्यवस्था के अधीन कर्मचारियों के लिए अपनी शिकायतें प्रस्तुत करना और उनका उचित निराकरण करना सरल होता है। इससे वातावरण में तनाव नहीं आने पाता। इसके विपरीत, यदि शिकायतें बनी रहती हैं तो वे कुछ समय बाद गम्भीर मोड़ ले लेती है तथा हड़ताले और तालेबन्दी होती है। वास्तव में, व्यवसाय में अधिकांश विवाद और संघर्ष इसलिए उत्पन्न होते हैं कि उद्देश्यों को गलत समझ लिया जाता है और कर्मचारी तथ्यों से अनभिज्ञ रहते हैं।

सन्देशवाहन की प्रक्रिया (Process of Communication)

सन्देशवाहन एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है जिससे विचारों एवं सूचनाओं का आदान-प्रदान विभिन्न व्यक्तियों के मध्य निरन्तर चलता रहता है। यह एक चक्रीय प्रक्रिया है क्योंकि इसमें एक के बाद कई चरण होते हैं। इसे निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) प्रेषक (Sender)-जो व्यक्ति सन्देश भेजता है, वह सन्देश प्रेषक कहलाता है। यह सन्देशवाहन प्रक्रिया का सूत्रधार होता है। जब भी कोई व्यक्ति अथवा प्रबन्धक सन्देशवाहन करना चाहता है तो वह सर्वप्रथम यह निर्धारित करता है कि वास्तव में समस्या क्या है, जिसके बारे में उसको देशदूसरे पक्षकार या पक्षकारों को देना है।

(2) विचार (Ideas)- सन्देश प्रेषक का विचार ही सन्देशवाहन की विषय-वस्तु है। इसके अन्तर्गत धारणा, सम्मति, भावनाएँ, विचार, दृष्टिकोण, अनुभव, सुझाव, आदेश-निर्देश आदि को सम्मिलित किया जाता है।

(3) लिपिबद्धीकरण (Enconding)-सन्देश या सूचना की विषय-वस्तु अदृश्य होती है। अतः उसको स्वरूप प्रदान करने के लिए उसे लिपिबद्ध किया जाता है। इसे लिपिबद्ध करने के लिए शब्दों, चित्रों, संकेतों का उपयोग किया जा सकता है।

(4) माध्यम (Media)-सन्देश या सूचना को लिपिबद्ध करने के बाद सन्देश का माध्यम या साधन निर्धारित किया जाता है। सब्देश तथा सन्देश की लिपि माध्यम के चुनाव को प्रभावित करती है। अतः माध्यम का चुनाव करते समय सन्देश या सन्देश की लिपि को ध्यान में रखा जाता है। सुविधा एवं आवश्यकता के अनुसार लिखित, मौखिक, सांकेतिक, दृश्य-श्रव्य आदि में किसी भी माध्यम का चुनाव किया जा सकता है।

(5) सन्देश प्राप्तकर्ता (Receiver)-सन्देश एवं माध्यम का निर्धारण होने के पश्चात् सन्देश प्राप्तकर्ता का नम्बर आता है। यह वह व्यक्ति होता है जिसके लिए सन्देश भेजा जाता है। सब्देश प्राप्तकर्ता सन्देशवाहन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण अंग होता है।

(6) व्याख्या करना (Interpreting or Decoding)- जब सन्देश प्राप्तकर्ता को सन्देश प्राप्त हो जाता है तो वह उसकी व्याख्या करता है। वह शब्दों, संकेतों, चित्रों आदि का अर्थ लगाता है और उको समझने का प्रयास करता है। सब्देशवाहन की सफलता इस बात पर ही निर्भर करती है कि प्राप्तकर्ता सन्देशों की किस प्रकार व्याख्या करता है।

(7) प्रतिपुष्टि (Feedback)-सब्देशवाहन प्रक्रिया प्रतिपुष्टि के बिना अधूरी रहती है। सब्देशवाहन प्रक्रिया तब पूरी होती है जबकि सन्देश प्रेषक को यह जानकारी प्राप्त हो जाती है कि दिया गया सन्देश दवासमय उपयुक्त व्यक्ति के पास पहुँच गया है तथा उसने उसे प्रेषक की भावना एवं अर्थों के अनुरूप समझ लिया है। प्रेषक द्वारा वापसी जानकारी प्राप्त करने के पश्चात् सन्देशवाहन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।

प्रभावी सन्देशवाहन के आवश्यक तत्व (Essential Elements of Effective Communication)

सन्देश का आदान-प्रदान इस रूप में हो जिससे कि अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सके। इसके लिए निम्न तत्वों पर ध्यान देना आवश्यक होगा

(1) स्पष्टता, संक्षिप्तता एवं पूर्णता-सन्देश को प्रभावी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उसे स्पष्ट सीधे व संक्षिप्त रूप में प्रेषित किया जाये। स्पष्टता के लिए सूचनाकर्ता को स्वयं सभी बातों का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। स्पष्ट संवाद को समझने में संवाद प्राप्तकर्ता को व्यर्थ समय नहीं खोना पड़ता और वह तुरन्त निर्देशानुसार कार्य कर सकता है। यदि सन्देश लिखित हो तो यह सुन्दर लेख में होना चाहिए अथवा टाइप किया हुआ हो सन्देश में ऐसे शब्दों का प्रयोग कभी न किया जाय जिनके भिन्न-भिन्न अर्थ निकलते हो। सन्देश कम से कम शब्दों में प्रेषित किया जाना चाहिए। सन्देश प्रेषक को व्यावसायिक संवाद का अन्तर ठीक से समझ लेना चाहिए किन्तु संवाद की संक्षिप्तता से तात्पर्य शालीनता का अभाव कदापि नहीं है। संवाद संक्षिप्त होने के साथ तब्य की दृष्टि से पूर्ण भी होना चाहिये |

(2) शिष्टता एवं शालीनता-संवाद को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि वह शिष्ट मथुर एवं शालीन हो। विनस भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए किन्तु वक्तव्य की यथार्थता को बनाये रखने के लिए भाषा में कुछ कठोरता भी लानी पड़े तो वह परिस्थिति के अनुकूल ही हो। उदाहरणार्थ, यदि कर्मचारी समय पर दफ्तर नहीं पहुँचते और उन्हें कई बार इसके लिए समझाया जा चुका है तो उन्हें फिर कठोर भाषा में चेतावनी देना आवश्यक हो जायेगा किन्तु ऐसे अवसरों पर भी शालीनता का अभाव क्षम्य नहीं है।

(3) पारस्परिक सहयोग-सन्देशवाहन के प्रभावी होने के लिए भी आवश्यक है कि सब्देश देने वाले, सब्देश प्राप्तकर्ता के मध्य मिलकर सब्देशानुकूल कार्य करने की भावना हो। यदि सन्देश ग्रहण ही न किया जाये तो यह व्यर्थ हो जायेगा। सन्देश का सम्प्रेषण जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण इसकी प्राप्ति है। सन्देश प्रभावशाली हो और इसके अनुसार क्रियान्वयन हो, इसके लिए देश की भाषा शिष्ट एवं सम्मानपूर्ण होनी चाहिए।

(4) सन्देशवाहन निरन्तर हो-सन्देशवाहन का महत्व अब पूरी तरह स्वीकार किया जाने लगा है और इसका क्षेत्र भी अब एकपक्षीय संवहन से बढ़कर द्विपक्षीय हो गया है। सन्देशवाहन सम्बन्धित पक्षों में निर्वाध गति से सतत चालू रहना चाहिए जिससे निरन्तर विचारों के आदान-प्रदान का लाभ प्राप्त हो सके, सन्देशवाहन प्रणाली तभी सफल हो सकती है।

(5) समुचित सम्प्रेक्षण विधि-सन्देश की भाषा कितनी ही मधुर व शालीन हो किन्तु यदि सम्प्रेषण विधि अभद्र हो तो इससे भी सन्देश प्रापक के आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचने का भय है। तब सन्देशवाहन का प्रयोजन ही असफल हो जायेगा। संवाद सम्प्रेषण की कोई एक निर्धारित विधि नहीं है। वस्तुतः यह संवाद भेजने वाले और प्रापक के पद, स्तर, अवसर तथा प्रचलित रीतियों पर निर्भर करेगा।

(6) आदर्श व्यवहार प्रस्तुत करना सन्देशवाहन उचित आदर्श प्रस्तुत कर अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। यदि हम चाहते हैं कि कर्मचारी किन्हीं निर्देशित नियमों का उचित रूप से पालन करें तो उन नियमों का स्वयं पालन कर हमें आदर्श दृष्टान्त प्रस्तुत करना चाहिए।

  • (7) प्रशासन के विभिन्न अंगों के मध्य मधुर सम्बन्ध यद्यपि यह सही है कि एक कुशल सन्देशवाहन प्रणाली को अपनाकर व्यवसाय के स्वामी प्रबन्ध, कार्यकर्ता और जनता के मध्य विचारों के निरन्तर आदान-प्रदान द्वारा आपसी समस्याओं का समाधान हो जाता है, जिससे सम्बन्धों को मधुर बनाने में सहायता मिलती है।

(8) आकर्षक भाषा व शैली-सन्देश की भाषा एवं शैली आकर्षक हो ताकि सामने वाले व्यक्ति को वह प्रभावित कर सके।

(9) समय तत्व-सन्देश भेजते समय समय-तत्व का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। यदि सन्देश समय पर नहीं मिले तो सन्देश भेजना ही बेकार है।

(10) द्विमार्गी-सम्प्रेषण व्यवस्था इस प्रकार की होनी चाहिए कि दोनों ओर से बिना किसी बाधा के विचारों का आदान-प्रदान किया जा सके।


Meaning and Definition of Communication

In simple words, communication refers to the written or oral exchange of information or ideas. The mutual exchange of facts, ideas, conjectures or emotions between two or more persons is called communication. It must have two minds. If it does not have two heads, then there will be no communication. If the idea of ​​the first person is not understood well by the second person or does not act according to it, then there is no importance of communication. For example, if the students cannot hear the college bell because of the low-pitched sound, then its absence is insignificant. In the modern scientific era, science has made the communication of ideas more easy from one place to another by providing means like wire, telephone, television, radio etc. Due to the expansion of these means of communication, it has become much easier to exchange ideas. Messaging is also known by many names like communication, communication, communication vehicle etc.

C. G. According to Brown (C. G. Brown), “Conveyance is the transmission of information from one person to another, whether or not it generates trust and is mutually exchanged, but the information so conveyed must be understood by the recipient.

According to Newman and Summer, “Messaging is the exchange of elements, ideas, opinions or feelings between two or more persons.”

Fred G. According to Fred G. Mayer, “Messaging is a meeting of words, letters or information, exchange of ideas and opinions.”

Characteristics of Communication

The main characteristics of communication can be explained as follows:

(1) Communication is a continuous or continuous systematic process.

(2) In communication, information is exchanged between human groups.

(3) There are two parties in communication. First informer and second informant

(4) In communication, information, facts, ideas, feelings, opinions, suggestions etc. are exchanged.

(5) The main purpose of communication is to create understanding.

(6) Communication can be written, oral and symbolic.

(7) Communication is equally useful in business, society, religion, politics and economy, so it is a universal activity.

(8) Communication is an important part of directing, as it acts as a bridge between the director and the director.

(9) Communication is helpful in removing rumors and confusion.

(10) Communication not only involves giving information but also includes knowing the response of the communicator.

Importance of Communication

The efficient operation of any organization depends to a large extent on the completeness of the method of communication. Every organization, whether it is of large size or small size, whether it is private sector, public sector cannot do its work smoothly without proper communication system. That is why it is said that communication is the cornerstone of all industrial activities. The importance of messaging can be explained as follows-

(1) Increase in managerial efficiency- Managerial efficiency depends on how efficiently the management can get the work done by its subordinate employees. In order to achieve this skill, management gives various orders and instructions to the employees through communication, understands their difficulties and suggests ways to overcome them.

(2) Efficient operation possible- The efficient operation of any undertaking depends to a great extent on the completeness of the method of Sabdeshvahan. Every undertaking, whether it is of large size or small size, whether it is private sector or public sector, cannot do its work smoothly without proper communication system. In many undertakings, nothing is seen except the conveyance of the message.

(3) Facilitation in quick decision- A trader is free to make his business decisions, but the decisions of the partnership organization are taken with the consent of all the partners, and the decisions of joint-capitalized companies are taken after adequate deliberation in the meeting of directors. are taken later. Therefore, it is not only necessary but necessary to have an effective messaging system for taking decisions after deliberating at the earliest.

(4) Convenience in getting cooperation, the arrangement of best communication gives the employees an opportunity to do good work. Before completing any work, it is very important to be mentally prepared about that work. This means that before the actual work, it is very necessary to be aware of the desire to do the work. To awaken this desire, communication is needed to explain the work.

(5) Auxiliary communication in leading is the basis of leadership. If the managers want to be effective leaders then it is necessary that they win the trust of the employees and this is possible only when there is a good arrangement of consultation between the two. Managers can understand the feelings and desires of the employees, can direct them in the right direction and can give them the appropriate type of orders and instructions. A leader can communicate his ideas, suggestions and decisions only through communication. In the same way the followers also share their experience, understanding.

You can convey the problems and problems to your leader only in the system of communication.

(6) The arrangement of effective communication is also very important to establish the facilitation in coordination between the activities of various departments and employees of the undertaking. As a result, all the employees know when what is happening in the enterprise and what is the importance of their contribution in the progress of the enterprise. Every department tries that it should not lag behind other departments in its work and its plans and progress should match with the plans and progress of other departments.

(7) Maximum production possible at minimum expenditure – In the present era there has been a lack of direct, close and face-to-face contact between the manager and the employees. This deficiency can be filled by proper arrangement of communication. In an organization, information and orders are passed on to the workers through different employees. In order not to create confusion in the organization, it is necessary that the work of each employee should be fixed, there should also be a system of transmission of necessary instructions to them.

(8) Build morale and democratic management possible – Under the system of effective communication, it is easy for the employees to present their grievances and get them redressed properly. Due to this there is no tension in the environment. Conversely, if complaints persist, they take a serious turn after some time and lead to strikes and lockouts. In fact, most disputes and conflicts in business arise because objectives are misunderstood and employees are unaware of the facts.

Process of Communication

Messaging is a continuous process through which the exchange of ideas and information goes on continuously between different people. It is a cyclic process as it consists of several stages one after the other. This can be clarified as follows

(1) Sender – The person who sends the message is called the sender of the message. It is the facilitator of the messaging process. Whenever a person or manager wants to communicate, he first determines what exactly is the problem, about which he has to give the country to the other party or parties.

(2) Ideas – The idea of ​​the sender of the message is the subject matter of the message. Under this, perception, opinion, feelings, thoughts, attitudes, experiences, suggestions, orders, instructions etc. are included.

(3) Enconding – The content of the message or information is invisible. Therefore, it is written in order to give it its form. Words, pictures, signs can be used to describe it.

(4) Media – After recording the message or information, the medium or means of the message is determined. The message and the script of the message influence the choice of medium. Therefore, while choosing the medium, the message or the script of the message is kept in mind. According to the convenience and need, any medium can be chosen in written, oral, symbolic, audio-visual etc.

(5) Receiver of the message – After the determination of the message and medium, the number of the recipient of the message comes. This is the person to whom the message is sent. The message receiver is an important part of the messaging process.

(6) Interpreting or Decoding – When the message receiver gets the message, he interprets it. He makes meaning of words, signs, pictures etc. and tries to understand them. The success of Sabdesh Vahan depends on how the recipient interprets the messages.

(7) Feedback – The process of communication remains incomplete without feedback. The communication process is completed when the sender of the message gets the information that the given message has reached the appropriate person at the time of medicine and he has understood it according to the feelings and meanings of the sender. After receiving the return information by the sender, the process of messaging is completed.

Essential Elements of Effective Communication

The exchange of messages should be in such a way that the intended purpose can be fulfilled. For this it is necessary to pay attention to the following elements

(1) Clarity, conciseness and completeness – In order for the message to be effective, it is necessary that it should be conveyed clearly, directly and in a concise manner. For clarity, the informant himself should have complete knowledge of everything. In understanding the clear dialogue, the recipient of the dialogue does not have to waste time and he can act as directed immediately. If the message is written, it should be in a beautiful article or typed, never use words that have different meanings in the message. The message should be conveyed in minimum words. The sender of the message should understand the difference of business communication properly, but the brevity of the dialogue does not mean lack of decency. The dialogue should be short as well as complete from the point of view of health.

(2) Courtesy and decency – To make the dialogue effective, it is necessary that it should be polite, chubby and decent. Vinous language should be used but some rigidity should also be introduced in the language to maintain the accuracy of the statement.

If not, then it should be according to the situation. For example, if the employees do not reach the office on time and they have been explained for this many times, then it will be necessary to warn them again in harsh language, but even on such occasions lack of decency is not excusable.

(3) Mutual cooperation – For the communication to be effective, it is also necessary that there should be a feeling of working in harmony between the sender of the message, the recipient of the message. If the message is not received at all, it will be in vain. As important as the transmission of the message is, equally important is its receipt. For the message to be effective and to be implemented accordingly, the language of the country should be polite and respectful.

(4) Continuing communication – The importance of messaging is now fully accepted and its area has also increased from unilateral communication to bilateral. Messaging should be continued at a smooth pace among the concerned parties so that the benefit of continuous exchange of ideas can be obtained, only then the messaging system can be successful.

(5) Appropriate communication method – No matter how sweet and courteous the language of the message may be, but if the communication method is indecent, then there is a fear of hurting the self-esteem of the message receiver. Then the very purpose of communication will be defeated. There is no one fixed method of communication. In fact, it will depend on the position, level, occasion and customs of the sender and receiver of the communication.

(6) Presenting Ideal Behavior The message can be made more effective by presenting appropriate ideals. If we want the employees to follow any given rules properly, then by following those rules ourselves, we should set an ideal example.

(7) Good relations between the different parts of the administration, although it is true that by adopting an efficient communication system, mutual problems are resolved by the constant exchange of ideas between the owner, management, workers and the public, thereby improving the relations. Helps to make it sweet.

(8) Attractive language and style – The language and style of the message should be attractive so that it can impress the person in front.

(9) Time Element Special care should be taken while sending the message. If the message is not received on time then it is useless to send the message.

(10) The two-way communication system should be such that ideas can be exchanged without any hindrance from both the sides.

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