विभागीयकरण क्या है ? विभागीयकरण प्रक्रिया में क्रिया विश्लेषण की भूमिका का विवेचन कीजिए। What is departmentalisation? Discuss the role of action analysis in the departmentalization process.

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  • विभागीयकरण का अर्थ एवं परिभाषा  (Meaning and Definition of Departmentation)

व्यावसायिक उपक्रम की क्रियाओं को भिन्न-भिन्न वर्गों में बाँटने की प्रक्रिया को विभागीयकरण कहा जाता है। किसी भी मुख्य कार्य को विभागीयकरण के अन्तर्गत छोटे-छोटे उपकार्यों में बाँटा जाता है। विभागीयकरण के अन्तर्गत उपक्रम के स्वभावों को देखते हुए उसे पृथक-पृथक विभागों में बाँट दिया जाता है। विभागीयकरण का मुख्य उद्देश्य विशिष्टीकरण के लाभों को प्राप्त करना एवं संगठन की कार्यकुशलता में वृद्धि करना है।

कूण्टज एवं ओ’डोनेल (Koontz and ODonnell) के अनुसार, “विभागीयकरण एक विशाल एकात्मक कार्यालय संगठन को छोटी-छोटी एवं लोचपूर्ण इकाइयों में बाँटने की एक प्रक्रिया है।

के. के. गुप्ता (K. K Gupta) के अनुसार, “किसी विशाल क्रियाशील उपक्रम को छोटी-छोटी के स्वतन्त्र, लोचपूर्ण एवं सुविधाजनक इकाइयों में विभाजित करने की प्रक्रिया विभागीयकरण है।

” विलियम एफ. ग्लूक (William F Glueck) के अनुसार, सम्पूर्ण उपक्रम के कार्यों को विभाजित करने तथा उनके कृत्यों के समूह स्थापित करने को ही विभागीयकरण कहते हैं। इसका उद्देश्य उप-इकाइयों का निर्माण करना है जिन्हें विभाग कहते हैं।”

विभागीयकरण की आवश्यकता एवं महत्व (Importance and Need of Departmentation)

विभागीयकरण की आवश्यकता संगठन के बदले आकार से जुड़ी हुई है। इसका महत्व इस तथ्य से प्रकट होता है कि यह संगठन संरचना के समतलीय आयाम की रूपरेखा का निर्धारण करता है। क्रियाओं को संगठनात्मक लक्ष्य की प्राप्ति में एक साधन कहा जा सकता है। इस रूप में विभागीयकरण का महत्व इसलिए है कि इसके अन्तर्गत क्रियाओं को समुचित तरह से परिभाषित, विश्लेषित, समूहीकृत और एकीकृत किया जाता है।

विभागीयकरण संगठनात्मक निष्पादन और प्रभावशीलता को अर्थपूर्ण ढंग से प्रभावित करता है। यह सेविवर्गियों की संख्या, मिश्रण कौशल और क्षमताओं को निर्धारित करने में सहायता करता है और इस तरह से इसकी मानव संसाधन नियोजन व नियन्त्रण में महती भूमिका है। विभिन्न स्तरों पर प्रबन्धकों के लिए अधिकार सत्ता का कितना भारार्पण किया जाना है, यह बहुत कुछ उन क्रियाओं के विस्तार, उसकी मात्रा और महत्ता पर निर्भर है, जिनके लिए वे उत्तरदायी होते हैं। अतः विभागीयकरण इस सीमा तक संगव्य में भारार्पण, सत्ता और निर्णयन केन्द्रों के निर्धारण में सहायक होता है। विभागीयकरण नियोजन, निर्णयन, संचार, नियन्त्रण और समन्वय की प्रक्रियाओं की कुशलता तथा प्रभावशीलता को भी प्रभावित करता है। यह कर्मचारियों और प्रबन्धकों की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण प्रतीत होता है, क्योंकि उनकी संवृद्धि व विकास, उपलब्धि व सन्तुष्टि एक अर्थपूर्ण सीमा तक क्रियाओं के बीच स्थान निर्धारण की प्रकृति और परम्पर मेल-मिलाप की गुंजाइश पर निर्भर करती है।

विभागीयकरण की भूमिका या महत्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है–

1. विशेषज्ञता (Specialisation)-जब क्रियाओं को कार्य के प्रकार के अनुसार समूहीकृत किया जाता है तब सभी क्रियाएँ केवल एक प्रकार से सम्बन्धित होती हैं। इसीलिए, विशेषज्ञ और पेशेवर कुशल व्यक्तियों को उन क्रियाओं के पर्यवेक्षण के लिए नियुक्त किया जा सकता है। इससे कुशलता और विशेषज्ञता आती है।

2. सुविधाजनक पर्यवेक्षण (Easy Supervision) पर्यवेक्षक निष्पादित किए जाने वाले कार्य के प्रकार के साथ परिचित (Familiar) हो जाता है क्योंकि सभी क्रियाकलाप केवल एक कार्य से सम्बन्धित होते हैं। परिणामस्वरूप वह उन क्रियाओं का निष्पादन कर रहे कर्मचारियों का पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन कर सकता है।

3. सुविधाजनक समन्वय (Easy Coordination)- इसमें विभाग एक-दूसरे पर परस्पर आश्रित होते हैं जिससे अभिप्राय है कि एक विभाग की क्रियाएँ दूसरे विभागों के कार्य निष्पादन पर निर्भर करती हैं। उदाहरण के लिए, उत्पादन विभाग कच्चे माल के लिए क्रय विभाग पर निर्भर करता है। विक्रय विभाग अन्तिम उत्पादन के लिए उत्पादन विभाग पर निर्भर करता है इत्यादि। यह परस्पर आश्रय विभिन्न विभागों के बीच समन्वय लाता है।

4. प्रबन्धकीय कुशलता को बढ़ाने में सहायता (Helps in Increasing Managerial Efficiency)-एक विभाग के प्रबन्धक बार-बार एक ही प्रकार के कार्य का निष्पादन करते हैं जो उन्हें विशेषज्ञ बनाता है और उनकी कुशलता को बढ़ाता है।

5. प्रभावी प्रशिक्षण (Effective Training)- यह कर्मचारियों के प्रशिक्षण को अधिक आसान बनाता है क्योंकि वे सीमित प्रकार के कौशल में प्रशिक्षित किए जाते हैं अर्थात् उत्पादन विभाग के कर्मचारियों को केवल उत्पादन तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाता है।

6. परिवर्तन को अपनाना (Adoption to Change)-जब भी व्यावसायिक वातावरण में कोई परिवर्तन होते हैं तब संगठन कार्य की सहायता से इन परिवर्तनों को व्यवस्थित ढंग से अपनाया जा सकता है क्योंकि संगठन कार्य विभिन्न विभागों का सृजन और प्रत्येक विभाग के अन्तर्गत सम्बन्धित क्रियाओं का समूहीकरण करता है। इसके साथ, परिवर्तन केवल उसी क्षेत्र में अपनाए जा सकते हैं जो इन परिवर्तनों द्वारा प्रभावित होते हैं और इन विभागों के माध्यम से इन परिवर्तनों को आसानी से सम्पूर्ण संगठन को सम्प्रेषित किया जा सकता है।

7. विस्तार और वृद्धि (Expansion and Growth)-उचित कार्य विभाजन और विभागीकरण के साथ, कम्पनियों आसानी से चुनौतियों का सामना कर सकती हैं और एक नियोजित ढंग से अपनी क्रियाओं का विस्तार कर सकती हैं।

8. संसाधनों का इष्टतम उपयोग (Optimum Utilization of Resources) संगठन कार्य में कार्य की पुनरावृत्ति के बहुत कम अवसर होते हैं क्योंकि कार्य विभेदीकरण दस्तावेज में कार्य के स्पष्ट रूप से वर्णन द्वारा विभिन्न व्यक्तियों को कार्य सौंपे जाते हैं। इसीलिए इसके कोई अवसर नही है कि समान कार्य दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा निष्पादित किया जाता है।

विभागीयकरण के आधार या प्रकार (Types or Basis of Departmentation)

एक उपक्रम या संस्था में विभागीयकरण निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है 1. कार्यों के आधार पर विभागीयकरण की यह सबसे प्रचलित एवं लोकप्रिय विधि है। इस पद्धति में संस्था को कार्यों के आधार पर विभिन्न विभागों; जैसे-क्रय, उत्पादन, वित्त, विक्रय आदि भागों में बाँट दिया जाता है।

गुण-कार्यों के आधार पर विभागीयकरण करने से निम्न लाभ प्राप्त होते हैं–

(1) विशिष्टीकरण को बढ़ावा मिलता है।

(2) संस्था के सभी विभागों में समन्वय रहता है।

(3) इससे मानवीय साधनों का श्रेष्ठतम उपयोग सम्भव होता है।

(4) इसमें सर्वोच्च प्रबन्ध का कम्पनी पर नियन्त्रण बना रहना सम्भव होता है।

दोष-कार्यों के आधार पर विभागीकरण करने से निम्न दोष इंगित किये गये हैं–

(1) इसमें निर्णय लेने में विलम्ब होता है।

(2) विभिन्न विभागों के मध्य आन्तरिक दुश्मनी एवं संघर्ष उत्पन्न हो जाते हैं।

(3) इसमें नियन्त्रण की प्रभावी व्यवस्था नहीं हो पाती।

2. उत्पादन के आधार पर क्रियाओं का उत्पाद या उत्पाद श्रृंखला के अनुसार विभागीयकरण बृहत्स्तरीय एवं बहुसंख्यक उत्पादन वाले उपक्रमों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसीलिए 1920 के दशक में इस विभागीयकरण की विधि को सर्वप्रथम यू. एस. ए. की दो ख्याति प्राप्त कम्पनियों ड्यू पॉट (Du Pont) तथा जनरल मोटर्स (General Moters) ने अपनाया। इस विधि को अपनाने वाली अधिकांश कम्पनियाँ प्रारम्भ में कार्यानुसार विभागीयकरण कर रही थीं, परन्तु फर्म के विकास के परिणामस्वरूप जब विभिन्न विभागीय प्रबन्धकों को कठिनाई का अनुभव हुआ तथा प्रबन्ध कार्य जटिल होने लगा तो फर्म का उत्पादन के आधार पर विभागीयकरण किया गया। इस प्रकार के विभागीयकरण में किसी संस्था में जितने प्रकार की वस्तुएँ या सेवाएँ तैयार की जाती हैं। उसे उतने ही अलग-अलग भागों में बाँट देना चाहिए। उदाहरणस्वरूप, एक ऑटोमोबाइल कारखाने में ट्रक, कार, जीप, स्कूटर आदि के लिए अलग-अलग विभागों की स्थापना की जा सकती है।

गुण- (1) इसमें तकनीकी कुशलता का अधिकतम उपयोग होता है।

(2) इसमें प्रवन्धकीय विकास आसानी से किया जा सकता है।

(3) इसमें प्रबन्धकों पर लाभ कमाने के लिए उत्तरदायित्व का आसानी से पता लगाया जा सकता है।

(4) इसमें प्रबन्धकों को अपनी योग्यता दिखाने का अच्छा अवसर मिलता है।

दोष – (1) इसमें उच्च प्रबन्धकों पर नियन्त्रण की समस्या बनी रहती है।

(2) इसमें सामग्रियों व प्रयासों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है।

(3) इस प्रणाली में प्रबन्धकीय लागत अधिक आती है।

3. क्षेत्रीय आधार पर जहाँ संस्था का कारोबार दूर-दूर तक फैला हुआ हो, वहाँ व्यावसायिक क्रियाओं को क्षेत्रीय आधार पर बाँटा जा सकता है। उदाहरणस्वरूप, सामान्य बीमा निगम ने अपने बड़े व्यापार को देखते हुए अनेक क्षेत्रीय एवं मण्डलीय कार्यालयों में व्यापार को बाँट रखा है। इसी प्रकार जीवन बीमा निगम ने भी अपने पूरे देश के कारोबार को अनेक क्षेत्रीय इकाइयों में बाँट रखा है। इस आधार पर विभागीयकरण करने से प्रबन्ध कार्य में सुविधा रहती है तथा लगात व्यय में कमी आती है।

गुण (1) क्षेत्रीय ग्राहकों के लिए सुविधाजनक है।

(2) लागत को न्यूनतम किया जा सकता है।

(3) क्षेत्रीय बाजार पर पूर्ण नियन्त्रण रहता है।

(4) क्षेत्रीय लोगों का सहयोग एवं सहानुभूति प्राप्त की जा सकती है।

दोष-(1) यह पद्धति अधिक खर्चीली है।

(2) क्षेत्रीय ग्राहकों के असन्तुष्ट होने पर समस्याएँ पैदा हो सकती है।

(3) यह पद्धति बड़े व्यवसायों के लिए अनुपयुक्त है।

4. समय के आधार पर विभागीयकरण की वह अत्यन्त प्राचीन प्रक्रिया है। इस पद्धति का उपयोग निम्न स्तर पर किया जाता है। जिन संस्थाओं में पालियों में कार्य करने की व्यवस्था है, उन संस्थाओं में यह पद्धति अत्यधिक लोकप्रिय होती जा रही है।

5. ग्राहकों के आधार पर विभागीयकरण की इस पद्धति में विशेष ध्यान उत्पाद या क्षेत्र पर न देकर क्रेता पर केन्द्रित होता है। इसे अधिकतर विपणन क्रियाओं के सम्बन्ध में अपनाया जाता है। उदाहरणार्थ, उन तैयार कपड़ों का विक्रेता अपने विभाग को दो भागों में विभक्त कर सकता है जिसके अन्तर्गत एक विभाग में स्त्रियों के कपड़े और दूसरे विभाग में पुरुषों के कपड़े विक्रय करने की व्यवस्था कर सकता है। ग्राहकों के आधार पर विभागीयकरण करने से ग्राहकों को सुविधा होती है। वे उपक्रम में अपना अनुभव करते हैं। साथ ही व्यवसाय को भी विशिष्टीकरण के लाभ प्राप्त होते हैं।

6. विधियों के आधार पर इस पद्धति के अन्तर्गत एक व्यावसायिक संस्था को विभिन्न भागों में प्रत्येक विभाग द्वारा सम्पादित की जाने वाली विधि के आधार पर विभाजित कर दिया जाता है। उदाहरणार्थ- एक वस्त्र उद्योग को कताई, बुनाई, रंगाई, धुलाई, चिह्न एवं पैकिंग आदि विभागों में बाँटा जा सकता है; यद्यपि इस प्रकार के विभागीवकरण से अनेक प्रकार की बचतें होती है, लेकिन निर्माणी संस्थाओं में इसका उपयोग नहीं किया जा सकता।

गुण- (1) विभिन्न विभागों का रख-रखाव सरल होता है। होता है।

(2) विशिष्ट ज्ञान व योग्यता का अधिकतम उपयोग

(3) इसमें विशिष्टीकरण को बढ़ावा मिलता है।

दोष-(1) यह पद्धति अधिक खर्चीली है।

(2) इसमें अधिक पूँजी की आवश्यकता पड़ती है।

(3) यह पद्धति केवल निर्माणी संस्थाओं में प्रयोग हो सकती है।

विभागीयकरण के लाभ (Advantages of Departmentation)

विभागीयकरण के प्रमुख लाभ निम्न है

(1) कर्मचारियों की कार्य-कुशलता में वृद्धि-जब अंशधारियों तथा कर्मचारियों के कार्यों का स्पष्ट विभाजन कर दिया जाता है तो उनकी कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

(2) प्रबन्धकीय क्षमता का विकास सम्भव-विभागीयकरण हो जाने से प्रत्येक विभाग का प्रवन्धक स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने की स्थिति में होता है। इस कारण प्रबन्धकों में प्रवन्धकीय क्षमता का तेजी से विकास सम्भव होता है।

(3) कार्यों का उचित मूल्यांकन सम्भव-प्रत्येक विभाग के कार्यों तथा गतिविधियों का अध्ययन करके उसके प्रबन्धकों एवं कर्मचारियों का उचित मूल्यांकन होता रहता है।

(4) विशिष्टीकरण को बढ़ावा विभागीयकरण के कारण संस्था में विशिष्टीकरण को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे कि अधिकतम एवं श्रेष्ठ कार्य सम्भव होता है।

(5) उत्तरदायित्व निश्चित करने में सुविधा-जब प्रत्येक विभाग के कार्य क्षेत्र तथा सीमाओं का स्पष्ट निर्धारण कर दिया जाता है तो प्रत्येक व्यक्ति का उत्तरदायित्व भी आसानी से निश्चित किया जा सकता है।

(6) नियन्त्रण में सुविधा- विभागीय योजनाओं, बजटयें एवं कार्यक्रमों की सहायता से कर्मचारियों की क्रियाओं पर समुचित रूप से नियन्त्रण बनाये रखने में काफी सुविधा होती है।

विभागीयकरण की हानियाँ (Disadvantages of Departmentation)

विभागीयकरण के प्रमुख दोष है–

(1) खर्चों में वृद्धि-व्यावसायिक संगठन में जितने अधिक विभाग बनाये जायेंगे, उसमें प्रशासकीय खर्च भी उतना ही अधिक बढ़ जायेगा।

(2) समन्यय में कठिनाई-विभागीयकरण के कारण प्रत्येक विभाग अपने कार्यों में इतना अधिक व्यस्त हो जाता है कि उसे अन्य विभागों के साथ समन्वय स्थापित करने में कठिनाई होती है। अनेक बार नियन्त्रण स्थापित न होने के कारण विभागों में आपस में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने लगती है।

(3) नीतियों के क्रियान्वयन में कठिनाई-विभागीयकरण के कारण किसी भी संस्था की समान नीतियों को विभिन्न विभागों पर लागू करने में कठिनाई होती है।

(4) अधिकारियों में गतिशीलता की कमी-जब एक ही विभाग में अधिकारी या कर्मचारी कार्य करते रहते हैं तो यह उस विभाग के ही कार्य में दक्षता प्राप्त कर पाते हैं। यदि किसी आकस्मिक परिस्थिति में उन्हें अन्य विभागों में भेजा जाये तो इसमें काफी जोखिम रहती है। इस प्रकार विभागीयकरण के कारण कर्मचारियों में गतिशीलता की कमी हो जाती है।

(5) उपक्रम के मुख्य उद्देश्यों की उपेक्षा विभागीयकरण की प्रक्रिया में विभिन्न विभागों को अधिक व्यक्तिगत स्वतन्त्रता मिल जाती है और वह अपने विभाग के उद्देश्य प्राप्त करने में लगे रहते है। विभिन्न विभागों द्वारा उपक्रम के मुख्य उद्देश्यों की उपेक्षा की जाने लगती है।


Meaning and Definition of Departmentalization

The process of dividing the activities of a business enterprise into different categories is called departmentalisation. Under departmentalization, any main work is divided into smaller sub-tasks. Under departmentalisation, considering the nature of the enterprise, it is divided into different departments. The main objective of departmentalization is to get the benefits of specialization and increase the efficiency of the organization.

According to Koontz and O’Donnell, “Departmentalization is a process of dividing a large unitary office organization into smaller and more flexible units.

Of. Of. According to Gupta (K. K Gupta), “Departmentalization is the process of dividing a large functional enterprise into smaller, independent, flexible and convenient units.

“According to William F. Glueck, divisionalization is the division of the functions of the whole enterprise and the establishment of groups of their functions. Its purpose is to create sub-units which are called departments.”

Importance and Need of Departmentation

The need for departmentalization is linked to the changed size of the organization. Its importance is manifested by the fact that it determines the contours of the planar dimension of the organization structure. Activities can be said to be a means in the attainment of organizational goals. The importance of departmentalization in this form is because the activities are properly defined, analysed, grouped and integrated under it.

Departmentalization significantly affects organizational performance and effectiveness. It helps in determining the number, mix skills and capabilities of the personnel and thus has an important role in human resource planning and control. The extent to which authority authority is to be delegated to the managers at different levels depends to a great extent on the extent, extent and importance of the activities for which they are responsible. Therefore, departmentalization helps in determining the allocation, power and decision-making centers in the Sangavya to this extent. Departmentalization also affects the efficiency and effectiveness of the processes of planning, decision making, communication, control and coordination. It also appears to be very important from the point of view of employees and managers, as their growth and development, achievement and satisfaction depend to a significant extent on the nature of the placement between activities and the scope of traditional interaction.

The role or importance of departmentalization can be explained as follows-

1. Specialization – When the activities are grouped according to the type of work, then all the activities are related to only one type. Therefore, experts and professionally skilled persons can be appointed to supervise those activities. This brings skill and expertise.

2. Easy Supervision The supervisor becomes familiar with the type of work to be performed as all the activities are related to only one task. As a result he can supervise and guide the employees performing those activities.

3. Easy Coordination- In this the departments are interdependent on each other which means that the activities of one department depend on the performance of other departments. For example, the production department depends on the purchasing department for raw materials. Sales department depends on production department for final production etc. This mutual shelter brings about co-ordination among the various departments.

4. Helps in Increasing Managerial Efficiency – The managers of a department perform the same type of work again and again which makes them expert and increases their efficiency.

5. Effective Training- It makes the training of the employees more easy as they are trained in limited type of skills i.e. the employees of production department are trained only in the production techniques.

6. Adoption to Change – Whenever there are any changes in the business environment, then with the help of organization work, these changes can be adopted systematically because organization work creates various departments and related activities under each department. grouping of. With this, changes can be adopted only in those areas which are affected by these changes and through these departments these changes can be easily communicated to the whole organization.

7. Expansion and Growth – With proper work division and departmentalisation, companies can easily meet challenges and expand their operations in a planned manner.

8. Optimum Utilization of Resources Organization work has very few opportunities for repetition of tasks as tasks are assigned to different persons by clearly describing the work in the job differentiation document. That is why there is no chance that the same work is performed by two or more persons.

Types or Basis of Departmentation

Departmentalization in an undertaking or institution

1. This is the most popular and popular method of departmentalization on the basis of functions. In this method, on the basis of functions the institution is assigned various departments; For example, purchase, production, finance, sales etc. are divided into parts.

The following benefits are obtained by doing departmentalization on the basis of merits-

(1) Specialization is encouraged.

(2) There is coordination among all the departments of the organization.

(3) It makes the best use of human resources possible.

(4) In this it is possible for the top management to maintain control over the company.

The following defects have been pointed out due to departmentalization on the basis of defect-works-

(1) Delay in decision making.

(2) Internal enmity and conflict arise between different departments.

(3) There is no effective system of control in this.

2. Divisionalization of activities on the basis of production into product or product chain is considered important for large scale and large scale production enterprises. That is why in the 1920s this method of departmentalization was first introduced by U.K. s. A. The two well-known companies of Du Pot and General Motors were adopted. Most of the companies adopting this method were initially doing departmentalization according to the work, but as a result of the growth of the firm, when various departmental managers experienced difficulty and the management work became complicated, then the firm was departmentalized on the basis of production. In this type of departmentalization, the number of types of goods or services are prepared in an organization. It should be divided into equal number of different parts. For example, in an automobile factory, separate departments may be set up for trucks, cars, jeeps, scooters, etc.

Properties- (1) It makes maximum use of technical skill.

(2) Managerial development can be done easily in this.

(3) In this the responsibility for making profit can be easily ascertained on the managers.

(4) In this, the managers get a good opportunity to show their ability.

Defect – (1) In this, the problem of control over the top managers remains.

(2) In this, the materials and efforts are not fully utilized.

(3) Managerial cost is high in this system.

3. On the regional basis, where the business of the organization is spread far and wide, then the business activities can be divided on the regional basis. For example, the General Insurance Corporation, in view of its large business, has divided the business into many regional and divisional offices. Similarly, Life Insurance Corporation has also divided its entire country’s business into many regional units. Due to departmentalization on this basis, there is convenience in the management work and there is a reduction in the cost.

Properties (1) Convenient for regional customers.

(2) Cost can be minimized.

(3) There is complete control over the regional market.

(4) Cooperation and sympathy of regional people can be obtained.

Defect- (1) This method is more expensive.

(2) Problems may arise when regional customers are dissatisfied.

(3) This method is unsuitable for large businesses.

4. It is a very ancient process of departmentalization on the basis of time. This method is used at low level. In the institutions where there is a system of working in shifts, this method is becoming very popular in those organizations.

5. In this method of customer-based departmentalization, the focus is on the buyer rather than on the product or region. It is mostly adopted in relation to marketing activities. For example, a seller of those ready-made clothes can divide his department into two parts, under which he can arrange to sell women’s clothes in one department and men’s clothes in the other department. Departmentalization on the basis of customers brings convenience to the customers. They put their own experience in the undertaking. At the same time, the business also gets the benefits of specialization.

6. On the basis of methods, under this method, a business organization is divided into different parts on the basis of the method to be executed by each department. For example- a textile industry can be divided into spinning, weaving, dyeing, washing, marking and packing departments; Although this type of departmentalization leads to many types of savings, but it cannot be used in manufacturing institutions.

Properties- (1) Maintenance of different departments is easy. it happens.

(2) optimum utilization of specialized knowledge and ability

(3) It encourages specialisation.

Defect- (1) This method is more expensive.

(2) It requires more capital.

(3) This method can be used only in manufacturing institutions.

Advantages of Departmentalization

The main advantages of departmentalization are as follows:

(1) Increase in the efficiency of the employees – When the work of the shareholders and the employees is clearly divided, then their efficiency increases.

(2) Development of managerial capacity is possible – with departmentalization, the manager of each department is in a position to take decisions independently. Due to this rapid development of managerial capacity is possible in the managers.

(3) Proper evaluation of works is possible – After studying the functions and activities of each department, proper evaluation of its managers and employees is done.

(4) Promotion of specialization due to departmentalisation

Specialization is encouraged in the place, so that maximum and best work is possible.

(5) Convenience in fixing responsibility – When the work area and boundaries of each department are clearly determined, then the responsibility of each person can also be easily fixed.

(6) Facility in Control- With the help of departmental plans, budgets and programs, there is a lot of convenience in maintaining proper control over the actions of the employees.

Disadvantages of Departmentation The major drawbacks of departmentalization are-

(1) Increase in expenses- The more departments that are created in the business organization, the more will be the administrative expenditure in it.

(2) Difficulty in coordinating – Due to departmentalisation, each department becomes so busy in its work that it finds it difficult to coordinate with other departments. Many a times, due to lack of control, competition amongst the departments starts increasing.

(3) Difficulty in implementation of policies – Due to departmentalisation, it is difficult to implement the same policies of any organization on different departments.

(4) Lack of mobility among officers – When officers or employees keep working in the same department, then they are able to achieve efficiency in the work of that department. If in any emergency situation they are sent to other departments, then there is a lot of risk in it. Thus, due to departmentalisation, there is a lack of mobility among the employees.

(5) Neglecting the main objectives of the enterprise, in the process of departmentalization, different departments get more personal freedom and they are engaged in achieving the objectives of their department. The main objectives of the undertaking are neglected by various departments.

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