नियन्त्रण अवधारणा क्या है ? इसकी प्रकृति एवं विशेषताओं की विवेचना कीजिए। What is control concept? Discuss its nature and characteristics.

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नियन्त्रण से आशय एवं परिभाषाएँ  (Meaning and Definition of Control)

नियन्त्रण प्रबन्ध का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य है। प्रबन्ध इसके द्वारा ही ज्ञात करता है कि कार्य का निष्पादन पूर्व निश्चित योजना के अनुसार हो रहा है अथवा नहीं और यदि नहीं हो रहा है तो इसके क्या कारण हैं और उसे कैसे सुधारा जा सकता है ? इसके साथ ही नियन्त्रण उत्पादन की मात्रा में वृद्धि, लागत में कमी, किस्म नियन्त्रण एवं कर्मचारियों के विकास में सहायता प्रदान करता है।

1. जॉर्ज आर. टैरी (George R. Terry) के अनुसार, “नियन्त्रण का अर्थ यह निर्धारित करना है कि क्या किया जा रहा है अर्थात् कार्यों का मूल्यांकन करना और आवश्यकता होने पर उनमें सुधार सम्बन्धी कार्यवाही करना है, ताकि योजनानुसार कार्यों का निष्पादन हो सके।”

2. हेनरी फेयोल (Henri Fayol) के अनुसार, “नियन्त्रण का आशय इस बात का मूल्यांकन करने से है कि उपक्रम में समस्त कार्य अपनायी गयी योजनाओं, दिये गये निर्देशों और निर्धारित नियमों के अनुसार हो रहा है अथवा नहीं।

3. बिल ई. गोज (Billy E. Goetz) के अनुसार, “प्रबन्धकीय नियन्त्रण से तात्पर्य घटनाओं को योजनानुसार बनाये रखने से है।

” 4. ई. एफ. एल. बीच (E.F.L. Brech) के अनुसार, “नियन्त्रण का आशय पर्याप्त प्रगति तथा सन्तोषजनक निष्पादन को निश्चित करने के लिए वर्तमान निष्पादन की पूर्व निर्धारित प्रमापों के साथ तुलना करने से होता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि नियन्त्रण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसकी सहायता से प्रबन्ध निर्धारित प्रमापों के अनुसार अपने अधीनस्थों से कार्य का निष्पादन कराता है और यदि प्रमापित तथा वास्तविक कार्य में कोई अन्तर दिखाई दे तो उनका कारण खोजकर भविष्य में उसके सुधार के लिए व्यवस्था करता है।

नियन्त्रण की विशेषताएँ या लक्षण (Characteristics of Control)

नियन्त्रण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं–

(1) नियन्त्रण आगे देखने वाली प्रक्रिया है-नियन्त्रण के द्वारा भविष्य में होने वाली हानियों को रोकने का प्रयत्न किया जाता है। वास्तव में यह एक भविष्य में होने वाली क्रिया है।

(2) नियन्त्रण प्रबन्ध प्रकार्य की अन्तिम प्रक्रिया है नियन्त्रण का आधार नियोजन होता है। प्रत्येक उपक्रम के निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए नियन्त्रण प्रक्रिया का कार्यान्वयन अनिवार्य है।

(3) नियन्त्रण एक गत्यात्मक प्रक्रिया है-नियन्त्रण एक गतिशील प्रक्रिया है क्योंकि व्यवसाय की बदलती हुई परिस्थितियों के साथ इसमें भी परिवर्तन की आवश्यकता होती है।

(4) नियन्त्रण एक सतत् प्रक्रिया है-नियन्त्रण की आवश्यकता उपक्रम में निरन्तर बनी रहती है। जब तक उपक्रम में उत्पादन कार्य चालू रहता है, तब तक नियन्त्रण की आवश्यकता होती है। अतः वह एक सतत् प्रक्रिया है।

(5) नियन्त्रण वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है-नियन्त्रण प्रक्रिया वैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा सांख्यिकीय तत्वों पर आधारित होती है तथा इसको व्यक्तिगत मान्यताओं एवं भावनाओं पर निर्भर नहीं किया जा सकता है।

(6) नियन्त्रण प्रत्येक स्तर पर आवश्यक है-प्रबन्ध के प्रत्येक स्तर पर विभिन्न विभागों की क्रियाओं को नियन्त्रित करने के लिए इसकी आवश्यकता होती है। नियन्त्रण प्रक्रिया का प्रयोग विभागों से सम्बन्धित अधिकारियों द्वारा किया जाता है।

नियन्त्रण का क्षेत्र (Area or Scope of Control)

प्रबन्धकीय नियन्त्रण का क्षेत्र बहुत व्यापक है। होल्डन, फिशर एवं स्मिथ ने प्रबन्धकीय नियन्त्रण के क्षेत्र में अग्रलिखित तथ्यों को सम्मिलित किया है–

(1) नीतियों पर नियन्त्रण-इसके लिए एक नीति पुस्तिका का प्रयोग किया जाता है तथा प्रत्येक कर्मचारी से इस पुस्तिका में वर्णित नीतियों के अनुसार चलने की आशा की जाती है।

(2) संगठन पर नियन्त्रण-इसके लिए संगठन चार्ट या पुस्तिका (Organisation Manual or Organisation Chart) आदि का प्रयोग किया जाता है।

(3) कर्मचारियों पर नियन्त्रण उपक्रम की गतिविधियों को प्रभावशाली बनाने के लिए यह देखना भी आवश्यक है कि कर्मचारी सौंपे गये कार्य को निर्धारित ढंग से पूरा कर रहे है अथवा नहीं।

(4) मजदूरी और वेतन पर नियन्त्रण-इसके लिए कार्यों का मूल्यांकन किया जाता है।

(5) लागतो पर नियन्त्रण-इसके लिए मानक लागतों और वास्तविक लागतों की तुलना करनी होती है।

(6) कार्य प्रणाली पर नियन्त्रण विभिन्न विभागों की कार्य प्रणाली पर नियन्त्रण करने के लिए उनका विश्लेषण तथा मूल्यांकन किया जाता है तथा यह देखा जाता है कि प्रत्येक विभाग का प्रत्येक कर्मचारी निर्धारित कार्य प्रणाली के अनुसार कार्य कर रहा है अथवा नहीं।

(7) पूँजी व्ययों पर नियन्त्रण-यह कार्य एक विश्लेषण समिति द्वारा किया जा सकता है। ब्रेक-ईविन चार्ट तकनीकी भी इस प्रकार के नियन्त्रण में सहायक होगी।

(8) उत्पादन पर नियन्त्रण-इसके अधीन विपणि आवश्यकताओं का विश्लेषण करके उन्हें श्रेष्ठतम और सरलतम ढंग से पूरा करने के लिए उत्पादित वस्तुओं में सुधार के लिए सुझाव दिये जाते हैं।

(9) शोध और विकास पर नियन्त्रण-शोध एवं विकास पर नियन्त्रण रखने के लिए, अनुसंधान कार्यों के लिए बजट बनाया जाता है तथा प्रत्येक शोध परियोजना का विस्तृत विश्लेषण एवं मूल्यांकन किया जाता है।

(10) समग्र नियन्त्रण समग्र नियन्त्रण के लिए एक विस्तृत योजना तैयार की जाती है जिसके अन्तर्गत प्रत्येक विभाग की अनेक उपयोजनाएँ भी सम्मिलित की जाती हैं।

नियन्त्रण के सिद्धान्त (Principle of Control)

नियन्त्रण के प्रमुख सिद्धान्तों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है–

(1) उद्देश्यों की सुरक्षा का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार नियन्त्रण प्रक्रिया इस प्रकार की होनी चाहिए जिससे होने वाली त्रुटियों एवं विचलनों का तत्काल व आसानी से पता लग जाए तथा सुधारात्मक क्रिया अपनाकर संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।

(2) प्रमाप का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार कार्य करने के लिए निर्धारित किये गये आवश्यक प्रमाप शुद्ध, उद्देश्यात्मक एवं उपयुक्त होने चाहिए।

(3) अपवाद का सिद्धान्त प्रभावी नियन्त्रण हेतु अपवादजनक स्थितियों में ही प्रबनधकों का ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए तथा छोटी समस्याओं से उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए।

(4) नियन्त्रण की कार्य कुशलता का सिद्धान्त-इसके अनुसार नियन्त्रण प्रणाली को उसी दशा में कार्यक्षम माना जायेगा जबकि यह विचलनों को न केवल तत्काल सामने लाये बल्कि उसे समाप्त भी कर दे।

(5) नियन्त्रण की लोच का सिद्धान्त-यह सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि नियन्त्रण व्यवस्था लोचपूर्ण होनी चाहिए जिससे कि आवश्यकतानुसार उसमें सुधार किया जा सके।

(6) संगठनात्मक उपयुक्तता का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार संस्था के संगठनात्मक रूप के लिए नियन्त्रण व्यवस्था उपयुक्त होनी चाहिए।

(7) पुनर्विचार का सिद्धान्त-समय-समय पर नियन्त्रण प्रणाली का परीक्षण करना ही इस सिद्धान्त का सार है। यह नियन्त्रण का महत्पूर्ण सिद्धान्त है।

(8) नियन्त्रण के दायित्व का सिद्धान्त नियन्त्रण का दायित्व वास्तव में उच्च प्रशासनिक व प्रबन्ध अधिकारियों का होता है। वे आवश्यकता होने पर विशेषज्ञों से परामर्श ले सकते हैं, किन्तु दायित्व उन्हीं का रहेगा।

नियन्त्रण की प्रकृति (Nature of Control)

नियन्त्रण की प्रकृति के सम्बन्ध में निम्न तथ्य महत्वपूर्ण है

(1) प्रबन्ध की एक आवश्यक क्रिया-नियन्त्रण प्रबन्ध की एक आवश्यक क्रिया है। बिना नियन्त्रण के एक प्रबन्धक अपने कार्य में सफल नहीं हो सकता। इस प्रकार प्रबन्ध स्तर के अनुसार एक प्रबन्धक को नियन्त्रण प्रक्रिया को अपनाना चाहिए।

(2) सतत् प्रक्रिया नियन्त्रण एक चालू रहने वाली प्रक्रिया है। यह संस्था में सर्वव्याप्त होती है। जब तक व्यावसायिक उपक्रम जीवित रहता है, तब तक नियन्त्रण कार्य रहता है।

(3) भावी घटनाओं का ही नियन्त्रण नियन्त्रण भावी घटनाओं के सम्बन्ध में ही हो सकता है, भूतकालीन कार्यों का नहीं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सर्वोत्तम नियन्त्रण वह है जो आवंछनीय घटनाओं के उत्पन्न होने से पूर्व ही उन पर नियन्त्रण रखे।

(4) नियन्त्रण प्रबन्ध के सभी स्तरों पर लागू होता है-प्रबन्ध के प्रत्येक स्तर पर नियन्त्रण की प्रक्रिया व्याप्त रहती है। हाँ, प्रत्येक स्तर पर नियन्त्रण की सीमा में अन्तर हो सकता है। नियन्त्रण का कार्य रेखा अधिकारियों से प्रारम्भ होता है और शीर्ष प्रबन्ध तक चलता है।

(5) नियन्त्रण हस्तक्षेप से भिन्न है-यह एक मिथ्या धारण है कि नियन्त्रण हस्तक्षेप है। नियन्त्रण द्वारा कार्यक्षमता में सुधार किया जा सकता है जबकि हस्तक्षेप से कार्य में बाधा उत्पन्न होती है।

(6) नियन्त्रण नियोजन पर आधारित है-नियोजन के अभाव में नियन्त्रण सम्भव ही नहीं होता। नियोजन भावी क्रियाओं की रूपरेखा तथा उनके प्रभाव को निर्धारित करता है और नियन्त्रण का कार्य यह देखना होता है कि कार्य योजनानुसार प्रमापों के अनुसार हो रहा है अथवा नहीं।

(7) नियन्त्रण तथ्यों पर आधारित प्रक्रिया है-नियन्त्रण व्यक्तिगत मान्यताओं एवं भावनाओं पर आधारित नहीं होता है बल्कि तथ्यों एवं सांख्यकीय आँकड़ों पर आधारित होता है।

नियन्त्रण की सीमाएँ (Limitations of Control)

नियन्त्रण प्रबन्ध के लिए बहुत उपयोगी होते हुए भी इसकी निम्न सीमाएँ है–

(1) प्रमापों के निर्धारण में कठिनाई नियन्त्रण की व्यवस्था तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक आदर्श प्रमापों का निर्धारण न किया जाये। यह प्रमाप पूर्व एवं ठोस तथ्यों पर आधारित होने चाहिए, जिनका मिलना बहुत कठिन है।

(2) व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के निर्धारण में कठिनाई यद्यपि नियन्त्रण पद्धति के अन्तर्गत अधिकारों एवं उत्तरदायित्वों का प्रत्यायोजन कर दिया जाता है तो भी अनेक त्रुटियाँ ऐसी होती है जिनके लिए किसी एक को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।

(3) खर्थों में वृद्धि-आधुनिक नियन्त्रण तकनीकें इतनी जटिल तथा महँगी होती है कि एक साधारण संस्था तो उन्हें अपना ही नहीं सकती। अनेक बार कुछ संस्थाएँ नियन्त्रण व्यवस्था अपना तो लेती है, लेकिन खर्च देखकर बाद में उसे धीमा कर देती है।

(4) अधीनस्यों द्वारा विरोध-अधीनस्थ नियन्त्रण पद्धति का सबसे अधिक विरोध करते हैं, क्योंकि इसके अन्तर्गत मानवीय कार्यों और विचारों में हस्तक्षेप किया जाता है, जिसे कर्मचारी सहन नहीं कर पाते हैं।

(5) सुधारात्मक कार्यवाही की सीमाएँ-यह भी निश्चित नहीं है कि सभी विचलनों अथवा त्रुटियों को इस प्रकार सुधारा जा सकता है कि परिणाम पूर्वनियोजित लक्ष्य के अनुसार ही हों।

(4) निष्पादनों की प्रमापों से तुलना-नियन्त्रण प्रक्रिया के इस महत्त्वपूर्ण कदम के अन्तर्गत वास्तविक निष्पादनों की निर्धारित प्रमापों से तुलना करके विचलनों को ज्ञात किया जाता है। इसमें यह ज्ञात करने की चेष्टा की जाती है कि जो विचलन सामने आये है, उनके क्या कारण है ? योजना बनाने में क्या गलती हुई है, या योजना के क्रियान्वयन में क्या कमी रह गयी।

(5) सुधारात्मक कार्य-यह नियन्त्रण प्रक्रिया का अन्तिम चरण है। जब वास्तविक कार्यों का निष्पादन और प्रमापों के मध्य विचलन की एक सीमा से अधिक हो, तब सुधारात्मक कार्य करना पड़ता है। सुधारात्मक कार्य की प्रवृत्ति न केवल विचलन के सुधार के सम्बन्ध में होनी चाहिए वरन इस प्रवृत्ति की तरफ भी हो कि भविष्य में इस प्रकार के विचलन की पुनरावृत्ति न हो सके। इसके साथ ही यह सुधारात्मक कार्य प्रबन्ध के विभिन्न कार्यों को प्रभावित करता है तो ऐसी स्थिति में आपसी विचार-विमर्श के बाद ही यह कार्य करना चाहिए।

प्रभावी नियन्त्रण व्यवस्था के लिए उठाये जाने वाले कदम (Steps to be taken for an Effective Control System)

एक प्रभावशाली नियन्त्रण प्रतिबन्धात्मक न होकर सुधारात्मक ही होना चाहिए। किसी उपक्रम में प्रभावी नियन्त्रण व्यवस्था के लिए निम्न कदम उठाये जाने चाहिए–

(1) उद्देश्य एवं लक्ष्यों की स्पष्ट व्याख्या-प्रभावी नियन्त्रण की स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि व्यावसायिक उपक्रम द्वारा निर्धारित उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की स्पष्ट एवं पूर्ण व्याख्या की जाये, ताकि उनकी प्राप्ति के लिए आवश्यक कदम सरलता से उठाये जा सकें। इन उद्देश्यों एवं लक्ष्यों से सम्बन्धित उपक्रम की क्रियाओं के प्रत्येक महत्वपूर्ण एवं प्राथमिक पहलू का समावेश होना चाहिए। छोटी से छोटी क्रिया की भी विस्तृत रूप में व्याख्या की जानी चाहिए।

(2) महत्वपूर्ण बिन्दुओं की स्थापना-प्रभावी नियन्त्रण की स्थापना की दिशा में उठाया जाने वाला महत्वपूर्ण कदम व्यावसायिक उपक्रम में विभिन्न स्थानों पर उन महत्वपूर्ण बिन्दुओं की स्थापना किया जाना है जहाँ पर कि नियन्त्रण व्यवस्था की स्थापना की जा सके। महत्वपूर्ण बिन्दुओं से आशय उन बिन्दुओं से है जहाँ पर कि त्रुटियों के होने की अपेक्षाकृत अधिक सम्भावना रहती है। यदि इन बिन्दुओं पर प्रभावी नियन्त्रण स्थापित कर लिया जाये तो फिर त्रुटियों के होने की सम्भावना लगभग समाप्त हो जाती है।

(3) जाँच विधि की स्थापना-उपक्रम की क्रियाओं के प्रत्येक क्षेत्र की जाँच करने हेतु एक ऐसी वैज्ञानिक विधि की स्थापना की जानी चाहिए कि जिससे जाँच का कार्य स्वतः ही नियमित रूप में सुचारू रूप से निरन्तर चलता रहे, ताकि प्रभावी नियन्त्रण की स्थापना करना सुगम हो जाए।

(4) समय नियन्त्रण का तत्व होना नियन्त्रण को प्रभावी बनाने के लिए समय का भारी महत्व है। यदि समस्त आवश्यक सूचनाएँ ठीक समय पर, ठीक मात्रा में, ठीक व्यक्ति को, ठीक स्थान पर दी जायें तो उनका निर्धारित उपयोग करके लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकेगी। इससे नियन्त्रण को भारी समर्थन मिलेगा। विचलन होने पर समय रहते ही आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाया जाना सम्भव होगा। इस प्रकार प्रबन्ध की क्रियाओं के निष्पादन में समय का ध्यान रखा जाता है, वहाँ प्रायः नियन्त्रण भी प्रभावी बना रहता है।

(5) संगठन योजना के कमजोर बिन्दुओं को सुदृढ़ किया जाना प्रभावी नियन्त्रण व्यवस्था की दिशा में उठाया जाने वाला कदम उपक्रम की संगठन संरचना के कमजोर बिन्दुओं को सुदृढ़ बनाना है। इसका कारण यह है कि संगठन के माध्यम से ही नियन्त्रण व्यवस्था चलती है और यदि वह कमजोर होगा तो फिर नियन्त्रण कौन स्थापित करेगा ? प्रमापों के द्वारा विचलनों का पता लगता है तथा विचलनों के द्वारा संगठन के कमजोर बिन्दुओं का पता लगता है। यदि हम संगठन के इन कमजोर बिन्दुओं को सुदृढ़ बना देंगे तो फिर एक ओर से विचलन होना काफी सीमा तक रुक जायेगा तथा दूसरी ओर प्रभावी नियन्त्रण की स्थापना हो जायेगी।

(6) संगठन संरचना के अनुरूप-चूँकि संगठन संरचना द्वारा ही प्रबन्ध का समस्त कार्य सम्पन्न होता है। अतः नियन्त्रण व्यवस्था संगठन संरचना के अनुरूप होनी चाहिए, उससे भिन्न नहीं बी पीटर एफ. हूकर के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति के लिए लक्ष्य निर्धारित कर दिये जाने चाहिए और उसी व्यक्ति पर नियन्त्रण का दायित्व भी डाल दिया जाना चाहिए जिसे पीटर एफ. ड्रकर ने ‘स्वयं नियन्त्रण’ के नाम से पुकारा है। उन्होंने आगे कहा है कि नियन्त्रण उच्च पदाधिकारी द्वारा निम्न स्तर के कर्मचारी पर लागू की गई कोई प्रविधि नहीं है।

(7) वास्तविक निष्पादन का अभिलेख रखना-प्रभावी नियन्त्रण की स्थापना की दिशा में उठाया जाने वाला महत्वपूर्ण कदम उपक्रम में सम्पन्न हुई विभिन्न क्रियाओं में वास्तविक निष्पादन का आवश्यक अभिलेख रखना है। यह कार्य विभिन्न प्रकार के प्रतिवेदनों के द्वारा सम्पन्न किया जाता है; जैसे–

(i) श्रम समय प्रतिवेदन। (iii) विक्रय-विश्लेषण प्रतिवेदन | (ii) वास्तविक लागत प्रतिवेदन। (iv) सामग्री उपभोग प्रतिवेदन। (v) अन्तरिम तथा अन्तिम उत्पादन प्रतिवेदन (vi) विचलन प्रतिवेदन आदि।

इन प्रतिवेदनों की जाँच की जाती है तथा इनका पूर्ण अभिलेख रखा जाता है।

(8) उद्देश्यों एवं प्रमापों से विचलन-समय-समय पर प्रत्येक व्यक्ति के वास्तविक निष्पादन का उपक्रम द्वारा निर्धारित उद्देश्यों एवं प्रमापों के साथ मिलान करते रहना चाहिए।

(9) लोच का होना-नियन्त्रण की व्यवस्था में पर्याप्त लोच होनी चाहिए, ताकि उसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन करना सम्भव हो। नियन्त्रण एक गतिशील प्रक्रिया है। हेमन के अनुसार, “एक अच्छी (प्रभावी) नियन्त्रण व्यवस्था को गत्यात्मक व्यावसायिक जगत में होने वाले सतत् परिवर्तनों से समता बनाये रखनी चाहिए।”

(10) सुधारात्मक कदम उठाये जाने की व्यवस्था प्रभावी एवं स्वस्थ नियन्त्रण व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है उसमें सम्भावित विचलन हेतु तुरन्त सुधारात्मक कदम उदाये जाने का प्रावधान हो, ताकि भावी परिस्थितियों की गम्भीरता से बचा जा सके। प्रत्येक नियन्त्रण व्यवस्था में सुधारात्मक कदम भी निहित होना चाहिए।

नियन्त्रण का श्रमिकों द्वारा विरोध (Employees Object to Control)

नियन्त्रण के द्वारा कार्य करने की स्वतन्त्रता को एक सीमा तक सीमित करने के प्रयास किये जाते हैं, ताकि न्यूनतम लागत पर श्रेष्ठतम एवं अधिकतम कार्य सम्पन्न किया जा सके। चूँकि नियन्त्रण से कर्मचारियों के कार्य करने की स्वतन्त्रता में कमी आती है, फलस्वरूप कर्मचारियों द्वारा नियन्त्रण का विरोध किया जाता है। आमतौर पर कर्मचारी नियन्त्रण को अपने ऊपर जबरदस्ती, बलप्रयोग अथवा स्वतन्त्रता में रुकावट मानते हैं। नियन्त्रण के प्रति आलोचनात्मक रुख के कारण ही कर्मचारी अपने प्रबन्धकों के साथ सहयोग का व्यवहार नहीं करते और इस प्रकार सारी नियन्त्रण व्यवस्था असफल हो जाती है। अतः मानवीय स्वभाव के कारण कर्मचारियों द्वारा नियन्त्रण का विरोध किया जाता है, जिसके कारण उत्पादकता में गिरावट आती है।


Meaning and Definitions of Control

Control is a very important function of management. Management knows only by this whether the work is being executed according to the predetermined plan or not and if it is not happening then what are the reasons for it and how can it be improved? Along with this, control helps in increasing the quantity of production, reduction in cost, variety control and development of employees.

1. George R. According to Terry (George R. Terry), “Controlling means determining what is being done, that is, evaluating the work and taking corrective action when necessary, so that the work can be performed according to the plan.”

2. According to Henry Fayol, “Controlling means evaluating whether all the work in the undertaking is being done according to the plans adopted, the instructions given and the rules laid down or not.

3. According to Bill E. Goetz, “Managerial control refers to keeping events as planned.

4. According to E.F.L. Brech, “control refers to the comparison of current performance with predetermined parameters to ensure adequate progress and satisfactory performance.”

It is clear from the above definitions that control is such a process with the help of which the management gets its subordinates to perform the work according to the prescribed standards and if any difference is seen between the standard and actual work, then after finding their reason and making arrangements for its improvement in future. Is.

Characteristics of Control

Following are the main features of control:

(1) Control is a forward-looking process – an attempt is made to prevent future losses through control. In fact it is a future action.

(2) Control is the last process of management function, the basis of control is planning. Implementation of the control process is essential for the fulfillment of the set goals of every enterprise.

(3) Controlling is a dynamic process- Controlling is a dynamic process because with the changing circumstances of the business it also requires changes.

(4) Control is a continuous process – the need for control remains constant in the enterprise. As long as the production work continues in the enterprise, there is a need for control. So it is a continuous process.

(5) Control is based on scientific principles- Control process is based on scientific principles and statistical elements and it cannot be depended on individual beliefs and feelings.

(6) Control is necessary at every level – It is needed to control the activities of different departments at every level of management. The control process is exercised by the concerned officers of the departments.

Area or Scope of Control

The scope of managerial control is very wide. Holden, Fisher and Smith have included the following facts in the field of managerial control-

(1) Control over policies- A policy book is used for this and every employee is expected to follow the policies described in this book.

(2) Control over the organization – For this, Organization Manual or Organization Chart etc. is used.

(3) Control over the employees In order to make the activities of the enterprise effective, it is also necessary to see whether the employees are completing the assigned work in the prescribed manner or not.

(4) Control over wages and salaries – for this the work is evaluated.

(5) Control of Costs – For this, standard costs and actual costs have to be compared.

(6) Control over the working system To control the working system of different departments, they are analyzed and evaluated and it is seen that every employee of each department is working according to the prescribed working method or not.

(7) Control over capital expenditure – This work can be done by an analysis committee. The break-even chart technique will also help in this type of control.

(8) Control of production – Under this, after analyzing the marketing needs, suggestions are made to improve the goods produced to meet them in the best and easiest way.

(9) Control over research and development – To keep control over research and development, budget is made for research work and detailed analysis and evaluation of each research project is done.

(10) Overall control A detailed plan is prepared for overall control, under which many sub-schemes of each department are also included.

Principle of Control

The main principles of control can be explained as follows-

(1) Principle of Protection of Objectives- According to this principle, the control process should be in such a way that errors and deviations are detected immediately and easily and by adopting corrective action, the objectives of the organization can be achieved.

(2) The principle of standard – According to this principle, the necessary parameters determined to work are pure, Must be objective and appropriate.

(3) Principle of exception For effective control, the attention of the managers should be attracted only in exceptional situations and they should not be disturbed by small problems.

(4) The principle of efficiency of control – According to this, the control system will be considered efficient if it not only brings the deviations to the fore immediately but also eliminates them.

(5) Theory of Elasticity of Control- This principle emphasizes that the control system should be flexible so that it can be improved as per the need.

(6) Principle of organizational suitability- According to this principle, the control system should be suitable for the organizational form of the organization.

(7) The principle of reconsideration – The essence of this principle is to test the control system from time to time. This is an important principle of control.

(8) Principle of Responsibility of Control The responsibility of controlling is actually of higher administrative and management officers. They can consult experts if required, but the responsibility will remain with them.

Nature of Control

The following facts are important with respect to the nature of control.

(1) An essential function of management – ​​Control is an essential function of management. Without control a manager cannot be successful in his work. Thus according to the management level a manager should adopt the control process.

(2) Continuous process control is an ongoing process. It pervades the organization. As long as the business undertaking is alive, the control function continues.

(3) Control of future events can be controlled only in relation to future events, not past actions. Thus it can be said that the best control is that which controls the undesirable events before they arise.

(4) Control is applicable at all levels of management – ​​The process of control prevails at every level of management. Yes, the extent of control may vary at each level. The function of control starts with the line officers and continues till the top management.

(5) Control is different from interference – it is a false belief that control is interference. Efficiency can be improved by control whereas interference is hindered in work.

(6) Control is based on planning – control is not possible in the absence of planning. Planning determines the outline of future actions and their effect and the function of controlling is to see whether the work is being done according to the standards according to the plan or not.

(7) Control is a process based on facts – Control is not based on personal beliefs and feelings but on facts and statistical data.

Limitations of Control

Despite being very useful for control management, it has the following limitations-

(1) Difficulty in the determination of standards The system of control cannot be completed unless ideal standards are determined. These standards should be based on prior and concrete facts, which are very difficult to find.

(2) Difficulty in the determination of individual responsibility Although rights and responsibilities are delegated under the control system, there are many errors for which no one can be held responsible.

(3) Increase in expenses – Modern control techniques are so complex and expensive that even an ordinary organization cannot adopt them. Sometimes some organizations adopt a control system, but after seeing the expenditure slows it down.

(4) Opposition by subordinates-Subordinates oppose the control system the most, because under it there is interference in human actions and thoughts, which the employees are unable to tolerate.

(5) Limitations of corrective action – It is also not certain that all deviations or errors can be corrected in such a way that the results are in accordance with the pre-planned target.

(4) Comparison of performance with standards- Under this important step of the control process, deviations are found by comparing the actual performance with the prescribed standards. In this, an attempt is made to find out what are the reasons for the deviations that have come to the fore. What was wrong in planning, or what was missing in the implementation of the plan.

(5) Corrective Actions – This is the last step in the control process. When the deviation between the actual performance and the standards exceeds a threshold, then corrective action has to be taken. The tendency for corrective action should be not only with regard to rectification of deviations but also towards such tendency that such deviations should not be repeated in future. Along with this, this corrective work affects the various functions of the management, so in such a situation this work should be done only after mutual consultation.

Steps to be taken for an Effective Control System

An effective control should be corrective, not restrictive. For effective control system in an enterprise, the following steps should be taken-

(1) Clear Explanation of Objectives and Goals – For the establishment of effective control, it is necessary that the goals set by the business enterprise

The stated objectives and goals should be explained clearly and completely, so that necessary steps can be taken easily to achieve them. These objectives and goals should cover every important and primary aspect of the activities of the enterprise. Even the smallest action should be explained in detail.

(2) Establishment of important points – An important step to be taken towards the establishment of effective control is to establish those important points at different places in the business enterprise where the control system can be established. Critical points refer to those points where errors are more likely to occur. If effective control is established on these points, then the chances of errors are almost eliminated.

(3) Establishment of the method of investigation – A scientific method should be established to investigate each area of ​​the activities of the undertaking, so that the work of investigation automatically continues smoothly, so that effective control should be established. Let it be easy

(4) To have an element of time control, time is of great importance to make the control effective. If all the necessary information is given at the right time, in the right quantity, to the right person, at the right place, then the goal can be achieved by using them. This will give a huge support to the control. In case of deviation, it will be possible to take necessary corrective steps in time. In this way, time is taken care of in the execution of the activities of management, there control also remains effective.

(5) Strengthening the weak points of the organization plan The step taken in the direction of effective control system is to strengthen the weak points of the organizational structure of the enterprise. The reason for this is that the control system runs through the organization itself and if it is weak then who will establish the control? The deviations are detected by the standards and the weak points of the organization are identified by the deviations. If we make these weak points of the organization strong, then deviation from one side will be stopped to a great extent and effective control will be established on the other.

(6) According to the organization structure – Since all the work of management is completed by the organization structure itself. Therefore, the control system should be in line with the organizational structure, not different from it B. Peter F. According to Hooker, goals should be set for each person and the responsibility of control should also be placed on the same person whom Peter F. Drucker calls this self-control. He has further said that control is not a method applied by a higher authority to a lower level employee.

(7) Keeping record of actual performance – An important step towards establishing effective control is to keep necessary records of actual performance in various activities carried out in the undertaking. This work is done through various types of reports; As–

(i) Labor Time Report. (iii) Sales Analysis Report. (ii) Actual Cost Report. (iv) Material Consumption Report. (v) Interim and Final Production Report (vi) Deviation Report etc.

These reports are scrutinized and complete records are kept.

(8) Deviation from Objectives and Standards – The actual performance of each individual from time to time should be reconciled with the objectives and standards set by the undertaking.

(9) Having elasticity- There should be enough elasticity in the system of control, so that it is possible to change it as per the requirement. Control is a dynamic process. According to Heyman, “A good (effective) control system must keep abreast of the constant changes taking place in the dynamic business world.”

(10) System to take corrective steps An important fact of an effective and healthy control system is that there should be a provision to take immediate corrective steps for possible deviations, so that the seriousness of future situations can be avoided. Every control system should also include corrective measures.

Employees Object to Control

Efforts are made to limit the freedom to work through control, so that the best and maximum work can be done at minimum cost. Since control reduces the freedom of the employees to work, as a result, control is opposed by the employees. Generally, employees consider control as coercion, use of coercion or obstruction of freedom. Due to the critical attitude towards control, the employees do not behave cooperatively with their managers and thus the whole control system fails. Therefore, due to human nature, there is resistance to control by the employees, due to which there is a decline in productivity.

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