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अनाधिकृत कार्यों के सिद्धान्त से आप क्या समझते हैं ? अनाधिकृत कार्यों के क्या परिणाम होते हैं ?

इस सम्बन्ध में आनन्द बिहारी लाल बना दिनसा एण्ड कम्पनी (1942) का है। इसम्पनी के एकाउण्टेन्ट मे कम्पनी की कुछ सम्पत्ति वादी के नाम हस्तान्तर न्यायालय ने इस छावहार को पर्व साना क्योंकि ऐसा करना एकाउण्टेण्ट के प्रत्यक्ष के बाहर था।

(4) जालसाजी-रुबिन बनाम डोट फिंगाल कंसोलिडेटेड कम्पनी (1906) के बाद में द निर्णयानुसार यदि कम्पनी के नाम में किये गये कार्य जालसाजीपूर्ण या कपटमय है तो आन्तरिक का सिद्धान्त लागू नहीं होगा। इस बाद में कम्पनी के सचिव ने जाली अंश प्रमाण-पत्र के पर धारित अंशों के सम्बन्ध में रजिस्टर्ड होने का दावा किया। न्यायालय ने अंश प्रमाण व्यर्थ घोषित करते हुए यह कहा कि जाली अंश प्रमाण-पत्र के अधीन धारक को कोई मिलता।

बैंक ऑफ लीवरपूल (1924) के बाद में दिये गये

लापरवाही-अण्डरवुड बनाम यदि कम्पनी के साथ व्यवहार करने वाले बाहरी पक्षकार अनियमितताओं का पता लग असावधानी दिखाते हैं, तो उन्हें आन्तरिक प्रबन्ध के सिद्धान्त का लाभ पाने का अधिकार (6) अन्तर्नियमों की अनभिज्ञता-जब किसी व्यक्ति ने सीमानियम व अन्तर्नियमों को अथवा समझा नही हो अथवा उन पर ध्यान न देकर अनुबन्ध किया हो तो न्यायालय साम आन्तरिक प्रबन्ध के सिद्धान्त को लागू नहीं करता है। इस सम्बन्ध में लक्ष्मी रतन लाल कॉटन बनाम जी. के. जूट मिल्स कम्पनी का वाद महत्वपूर्ण है।

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(7) जाँच-पड़ताल आयोजित करना- जब सौदे की रकम इतनी ज्यादा है या परिस्थितियों है जोकि अन्तर्नियम की पूर्ति के सम्बन्ध में पूछताछ करना स्वाभाविक हो जाता है तब भी यह वि लागू नहीं होगा। जैसे कोई व्यक्ति ₹ 20 लाख के बॉण्ड खरीदता है, तो उसको स्वभावतः यह पूछ करनी चाहिये कि क्या कम्पनी की साधारण सभा में आवश्यक प्रस्ताव पारित हो गया है। (8) कम्पनी के साधारण व्यवसाय से अवगत हो यदि कम्पनी के साथ किया गया

व्यवहार कम्पनी के व्यवसाय से सम्बन्धित नहीं है अथवा अनाधिकृत है तो उपर्युक्त सिद्धान्तला नहीं होगा। (9) जब कार्य प्रारम्भ से ही व्यर्थ हो- यदि कोई कार्य कम्पनी के अधिकारों के बाहर होने के

कारण प्रारम्भ से ही व्यर्थ हो तो कोई भी आन्तरिक प्रबन्ध के अधीन संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता है।

(10) जब कार्य कम्पनी अधिनियम द्वारा वर्जित हो-यदि कोई व्यक्ति किसी कम्पनी के सा

ऐसा कार्य करने का अनुबन्ध करता है जिसे कम्पनी अधिनियम के अनुसार किया ही नहीं जा सकता है तो अनुबन्ध का पक्षकार इस सिद्धान्त के अधीन संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता है। प्रश्न 11. अनाधिकृत कार्यों के सिद्धान्त से आप क्या समझते हैं ? अनाधिकृत कार्यों के क्या परिणाम होते हैं ?

लिए अनावश्यक होते हैं। परन्तु ऐसे कार्यों का अवैध अथवा सार्वजनिक हित या लोकनीति के विरुद्ध होना आवश्यक नहीं है। ये कार्य केवल कम्पनी के उद्देश्यों के विरुद्ध अथवा उद्देश्य से परे होते हैं।

अधिकारों के बाहर का सिद्धान्त यह कहता है कि कोई कम्पनी अपने सीमानियम द्वारा प्रदत्त अधिकार सीमा के बाहर कोई कार्य अथवा अनुबन्ध करती है तो वह कार्य व्यर्थ होता है। अधिकारों के बाहर किये जाने वाले कार्यों तथा अनुबन्धों से कम्पनी का कोई वैधानिक दायित्व उत्पन्न नहीं होता है। अनुबन्धों को बाद में किसी भी प्रकार से वैध भी नहीं बनाया जा सकता है और न इन कार्यों तथा अनुबन्धों की पुष्टि या अनुसमर्थन (ratification) ही किया जा सकता है। इतना ही नहीं, यदि कम्पनी के सभी सदस्य मिलकर सर्वसम्मति से ‘अधिकारों के बाहर के कार्यों का पुष्टिकरण या अनुसमर्थन करने का संकल्प भी पारित करें तो भी उन कार्यों को वैध नहीं बनाया जा सकता है। अधिकारों के बाहर कार्यों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है

(1) पार्षद सीमानियम द्वारा अनाधिकृत कार्य-यदि कम्पनी अपने पार्षद सीमानियम के बाहर कोई ऐसा कार्य करती है जिसके लिए वह अधिकृत नहीं है तो वह अधिकारों के बाहर माना जायेगा भले ही अधिनियम के अन्तर्गत हो; जैसे-कम्पनी के उद्देश्य वाक्य के बाहर कार्य करना, अधिकृत पूँजी से अधिक पूँजी का निर्गमन करना आदि। इस सम्बन्ध में एशबरी रेलवे केरिज एण्ड आयरन कम्पनी लि. बनाम रिके का मामला है। इस मामले के तथ्यों के अनुसार कम्पनी के उद्देश्य वाक्य में लिखा था कि “कम्पनी का उद्देश्य रेल के डिब्बे तथा रेल की मशीनें बनाना, बेचना तथा किराये पर देना, मैकेनिक इन्जीनियर्स तथा जनरल कान्ट्रेक्टर्स का कार्य करना।” इस कम्पनी ने रिके (Riche) नामक रेलवे ठेकेदार से बेल्जियम में रेल की पटरी बिछाने के लिए धनराशि देने का अनुबन्ध कर लिया। बाद में कम्पनी ने इस अनुबन्ध के अन्तर्गत धनराशि नहीं दी और यह कहा कि उसके अधिकारों के बाहर का अनुबन्ध है। रिके ने कम्पनी पर अनुबन्ध भंग का वाद प्रस्तुत किया तथा न्यायालय से क्षतिपूर्ति करवाने की प्रार्थना की। रिके ने तर्क दिया कि कम्पनी के नाम के साथ लगे ‘जनरल कान्ट्रेक्टर्स’ शब्द से प्रकट होता है कि कम्पनी इस कार्य को करने के लिए अधिकृत थी। किन्तु न्यायालय ने जनरल कान्ट्रेक्टर्स शब्द का तात्पर्य उन अनुबन्धों के लिए ही माना जो मैकेनिकल इन्जीनियरिंग से ही सम्बन्धित हों। अतः वह अनुबन्ध अधिकारों के बाहर है। लॉर्ड चान्सलर केयर्न्स ने निर्णय में लिखा है कि अधिकारों के बाहर किया गया अनुबन्ध व्यर्थ होता है और उसका अंशधारियों की सर्वसम्मति से भी अनुसमर्थन नहीं किया जा सकता है।

(2) अन्तर्नियमों द्वारा अनाधिकृत कार्य-यदि कम्पनी कोई ऐसा कार्य करे जो पार्षद सीमानियम के अधिकार क्षेत्र में हो परन्तु कम्पनी के अन्तर्नियमों के बाहर हो तो ऐसे कार्यों को अन्तर्नियमों द्वारा अनाधिकृत कार्य कहते हैं, जैसे निश्चित दर से अधिक ब्याज देना, अन्तर्नियमों में व्यवस्था न होने पर अंशों का अपहरण करना आदि। यदि कोई कार्य अन्तर्नियमों से बाहर है तो कम्पनी आवश्यक प्रस्ताव पारित करके ऐसा अधिकार प्राप्त कर सकती है और यदि यह कार्य पार्षद सीमानियम के अधिकार क्षेत्र में है तो कम्पनी आवश्यक कार्यवाही करके ऐसे कार्यों का अनुमोदन कर सकती है।

(3) कम्पनी अधिनियम द्वारा अनाधिकृत कार्य-यदि कोई कम्पनी ऐसा कार्य करती है जो कम्पनी अधिनियम की व्यवस्थाओं के विपरीत है अथवा प्रदत्त अधिकारों के बाहर है तो ऐसे कार्यों को कम्पनी अधिनियम द्वारा अनाधिकृत कार्य कहते हैं; जैसे-पूँजी में से लाभांश बाँटना, वैधानिक कार्यवाही पूर्ण होने से पूर्व पूँजी में परिवर्तन करना, कम्पनी द्वारा स्वयं अंश खरीदना आदि।

जाता है। इन कार्यों को किसी तो यह कार्य सेना तिनका है। के बाहर जाकर एक मिल भी

संचालित किया कम्पनी ने एक व्यक्ति से मूल्य प्राप्त कर प्रेषित (Consigne एक कंपनी ने अपने अधिकारों की किस्म के कारण बहुत ही भारी हानि पर बेचना पड़ा। कम्पनी के संच उचित को हानि की भरपाची का वचन दे दिया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि क की भरपाची के लिए उत्तरदायी नहीं है क्योंकि चावल का व्यापार करना कम्पनी के के बाहर है। 2. अनुरामर्थन सम्भव नही अनाधिकृत कार्य पूर्णतः व्यर्थ होते हैं। अतः अनाधिकृत

अर्थात् कार्यों का अंशधारियों की सर्वसम्मति से भी पुष्टिकरण या अनुसमर्थन नहीं किया

सकता है। 3. जब कोई कम्पनी अपने अधिकारों के बाहर कार्य करती है तो उसका कोई सदस्य न्यायालय से प्रार्थना करके निषेधाज्ञा जारी करवा सकता है। न्यायालय द्वारा निषेधाज्ञा करने पर कंम्पनी द्वारा अधिकारों के बाहर किये जा रहे कार्यों को रोक देना पड़ता है।

4. कम्पनी का कोई दायित्व नही-चूँकि सीमानियम के बाहर किये गये कार्य तथा अनु होते हैं, अतः उन कार्यों तथा अनुबन्धों से किसी भी प्रकार का कोई दायित्व भी उत्पन्न नहीं होता है। अतः न तो कम्पनी ही किसी बाह्य पक्षकार पर वाद प्रस्तुत कर सकती है और न बाह्य पक्षकार ह कम्पनी पर वाद प्रस्तुत कर सकता है।

5. संचालकों का कम्पनी के प्रति व्यक्तिगत दायित्व-जब कम्पनी के संचालक कोई ऐसा कार्य या अनुबंध करते हैं जो सीमानियम के बाहर अनाधिकृत) है तो संचालकों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। ऐसे कार्यों तथा अनुबन्धों से उत्पन्न होने वाली हानि की पूर्ति करवाने के लिए कम्पनी का कोई भी सदस्य संचालकों पर न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर सकता है।

6. अधिकारों के बाहर प्राप्त सम्पत्ति पर अधिकार यदि कोई कम्पनी कभी अपने अधिकारों तथा

शक्तियों के बाहर कुछ सम्पत्ति खरीदती है तो भी उस सम्पत्ति पर कम्पनी का अधिकार सुरक्षित रहता

है, क्योंकि वह सम्पत्ति कम्पनी की पूँजी से ही खरीदी जाती है। 9. उधार लिया गया धन वसूला नहीं जा सकता-यदि किसी बैंक या किसी व्यक्ति ने किसी कम्पनी को अधिकारों के बाहर के कार्यों के लिए धन उधार दिया तो वह उस धन को वसूल नहीं कर सकता है। परन्तु यदि कम्पनी अपनी इच्छा से भुगतान करना चाहे तो कर सकती है। यदि कम्पनी एक बार इस राशि का भुगतान कर देती है तो वह उसे पुनः वसूल नहीं कर सकती है।

10. दुष्कार्य के लिए कम्पनी का दायित्व नहीं- यदि कोई कम्पनी अधिकारों के बाहर कार्य करती है और उसके परिणामस्वरूप कोई दुष्कार्य (Tort) हो जाता है तो कम्पनी को उस दुष्कार्य के लिए उत्तरदायी नहीं व्हराया जा सकता है। दुष्कार्य के लिए कम्पनी को तभी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है कि जबकि वह दुष्कार्य सीमानियम में उल्लिखित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किसी कर्मचारी द्वारा अपनी सेवा के दौरान किया गया हो। अधिकारों के बाहर कार्यों के अपवाद (Exceptions)

• अधिकारों के बाहर कार्य सामान्यतः व्यर्थ होते हैं, किन्तु निम्नलिखित परिस्थितियों में ये कार्य प्रवर्तित भी करवाये जा सकते हैं 1. अन्तनियमों के बाहर के कार्यों की पुष्टि- यदि कोई कार्य अन्तर्नियमों के बाहर है, किन्तु

सीमाजियम के भीतर है तो उस कार्य की कम्पनी की साधारण सभा में पुष्टि की जा सकती है। अतः इस प्रकार अनाधिकृत कार्य भी वैध बनाया जा सकता है।

संचालकों अधिकारों बाहर के कार्यों की संचालक कुछ अधिकारों के बाहर किन्तु कम्पनी के अधिकारों के भीतर कम्पनी साधारण सकती और उन्हें वैध बनाया जा सकता है।

कम्पनी सद्भाव से किये गये कार्यों के दायित्व मुक्ति-संचालक वह कार्य सामान्यतः व्यर्थ होता ऐसे कार्यों उत्तरदायी होते हैं। किन्तु संचालक यह सिद्ध कर देते उन्होंने ध्यान में रखकर किये हैं तो अपने व्यक्तिगत दायित्व

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