नियोजन प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख पगों की विवेचना कीजिए।

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नियोजन प्रक्रिया का आशय

(Meaning of Planning Process)

योजना चाहे छोटी हो अथवा बड़ी, उसे तर्कसंगत एवं व्यावहारिक बनाने के लिए कुछ आवश्यक कदम उठाने पड़ते हैं, इसे नियोजन प्रक्रिया कहते हैं। नियोजन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए विभिन्न प्रबन्धकीय विद्वानों ने नियोजन के विभिन्न चरणों अथवा कदमों का वर्णन किया है।

“नियोजन मूल रूप में एक चयन प्रक्रिया है तथा नियोजन की समस्या का उदय उस समय होता है जबकि वैकल्पिक उपायों की खोज होती है।” इस कथन की व्याख्या निम्न रूपों में की जा सकती है

(1) “नियोजन मूल रूप में चयन प्रक्रिया है”-प्रबन्ध के कुछ विद्वानों ने नियोजन को चयनात्मक कार्य बताया था। यह कवन पूर्णतः सत्य है क्योंकि नियोजन के अन्तर्गत वैकल्पक उद्देश्यों, नीतियों, पद्धतियों एवं कार्यक्रमों में से श्रेष्ठतम या सर्वोत्तम विकल्प का चयन करना होता है। किसी भी व्यवसाय को प्रारम्भ करते समय प्रवर्तक को अनेक प्रकार के निर्णय लेने पड़ते हैं, जैसे किसी वस्तु का कितनी मात्रा में उत्पादन किया जाये, व्यवसाय एवं संयन्त्र की स्थापना कहाँ की जाये, पर्याप्त पूँजी की मात्रा क्या होनी चाहिए, कच्चा माल कहाँ से उपलब्ध हो सकेगा आदि। इन निर्णयों को लेने तथा व्यवसाय को क्रियाशील करने हेतु अनेक विकल्पों में से सर्वोत्तम का चयन करना पड़ता है और इस प्रकार चयन करना ही नियोजन है। यही नहीं, जब व्यवसाय का विकास व विस्तार किया जाता है तब भी अनेक बातों पर विचार करना पड़ता है और इस प्रकार चयन करना ही नियोजन है। अतः स्पष्ट है कि नियोजन मूलतः चयनात्मक कार्य है।

(2) नियोजन की समस्या का उदय उस समय होता है जबकि वैकल्पक उपायों की खोज होती है’-यदि अमुक कार्य को सम्पन्न करने का एक ही ढंग हो तो चयन का प्रश्न ही नहीं उठता, किन्तु व्यवहार में यह पाया जाता है कि प्रत्येक क्रिया के निष्पादन के अनेक ढंग होते हैं। ऐसी दशा में सर्वोत्तम का चयन करना पड़ता है। ज्ञान व विज्ञान की प्रगति के कारण आज नये-नये उद्देश्य, नवीन रीतियाँ व पद्धतियाँ सामने आती है, फलस्वरूप नियोजन आवश्यक हो जाता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि नियोजन का उद्देश्य किसी कार्य को करने के अनेक विकल्पों में से उपलब्ध साधन विधियों तथा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उनमें सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव करना है। प्रायः प्रत्येक कार्य को करने के पूर्व यह निश्चित करना पड़ता है कि क्या कार्य है ? कैसे, कब, कौन तथा कहाँ उस कार्य को किया जायेगा। इन सबको ध्यान में रखते हुए प्रबन्ध को उस कार्य के लिए कार्य का लक्ष्य निर्धारित करना पड़ता है।

नियोजन प्रक्रिया में निहित आवश्यक कदम

(Essential Steps Involved in Planning Process)

नियोजन प्रक्रिया के प्रमुख कदमों या पगों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) उद्देश्यों को निर्धारित करना (Determination of Objectives) -किसी भी योजना का प्रारम्भ लक्ष्यों के निर्धारण से होता है। अतः सबसे पहले किसी व्यावसायिक उपक्रम की योजना के लक्ष्य निर्धारित किये जाने चाहिए। शरू में समस्त उपक्रम के सामान्य लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं. तथा फिर विभागीय एवं उप-विभागीय लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं।

(2) सूचनाओं का संकलन एवं विश्लेषण (Collection and Analysis of Informations)- नियोजन के उद्देश्यों का निर्धारण होने के पश्चात् उठाया जाने वाला दूसरा कदम नियोजन से सम्बन्धित क्रियाओं के सम्बन्ध में आवश्यक तथ्यों एवं सूचनाओं का संकलन किया जाना है। ये सूचनाएँ आन्तरिक एवं बाहरी स्रोतों से प्राप्त की जा सकती हैं। इस सम्बन्ध में पुराने अभिलेख, फाइलें, अनुभव, प्रतिस्पर्धी संस्थाओं की क्रियाओं का अवलोकन, आदि सहायक सिद्ध हो सकते हैं। सूचनाओं का करने के पश्चात् उनका विश्लेषण करके यह पता लगाया जाना चाहिए कि ये तथ्य एवं सूचनाएँ नियोजन को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है एवं उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

(3) नियोजन के आधारों का निर्धारण करना (Establishment of Planning Bases) नियोजन का तीसरा कदम उसके आधारों की स्थापना, उपयोग पर सहमति तथा जटिल नियोजन आधारों का विश्लेषण करना है। नियोजन के आधार भविष्य के अनुसार होते हैं तथा भावी परिस्थितियों के सम्बन्ध में तथ्यपूर्ण सूचनाएँ देते हैं। अतः नियोजन की सफलता में आधारों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। भविष्य में किस प्रकार का बाजार होगा, विक्रय की मात्रा कितनी होगी, क्या मूल्य होंगे, क्या उत्पादन होगा, क्या लागत होगी, क्या मजदूरी होगी, करों की दरें एवं नीतियों क्या होंगी, किन नये संयन्त्रों की स्थापना होगी, विस्तार कार्यक्रमों का वित्तीय प्रबन्ध किस प्रकार से होगा, लाभांश के सम्बन्ध में नीति होगी इत्यादि का पूर्वानुमान करना आवश्यक होता है। इन पूर्वानुमानों के आधार पर ही नियोजन के आधारों का निर्धारण होता है।

(4) वैकल्पिक तरीकों का निर्धारण करना (Determining Alternative Courses) नियोजन का चतुर्य कदम किसी कार्य को करने के लिए वैकल्पिक तरीकों की तलाश करना एवं उनका परीक्षण करना है। अतः इन विकल्पों की तलाश करने तथा उपयोगिता के आधार पर उनकी संख्या सीमित करने के उपरान्त उनका परीक्षण करना चाहिए। एक बड़ी योजना के लिए परीक्षण करने का कार्य बहुत जटिल हो सकता है। इसके लिए लागत एवं आय के पूर्वानुमानों, रोकड़ की स्थिति तथा अनेक अन्य पहलुओं पर विस्तृत रूप में विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है।

(5) वैकल्पक तरीकों का मूल्यांकन करना (Evaluating Alternative Courses)- किसी कार्य करने के वैकल्पिक तरीकों की तलाश एवं उनका परीक्षण करने के उपरान्त नियोजन प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण कदम विकल्पों का तुलनात्मक मूल्यांकन करना है। यह कार्य आधार एवं लक्ष्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी कार्य को करने का तरीका किसी एक दृष्टि से सर्वोत्तम प्रतीत होता है तथा दूसरा कार्य करने का तरीका किसी अन्य दृष्टि से सर्वोत्तम प्रतीत होता है। ऐसी दशा में उसका तुलनात्मक मूल्यांकन करना कठिन होता है। इतना होते हुए भी वैकल्पिक कार्य के तरीकों का तुलनात्मक मूल्यांकन तो करना ही होगा, तभी सफल नियोजन का निर्माण करना सम्भव हो सकेगा।

(6) कार्य करने के सर्वश्रेष्ठ तरीके का चयन (Selecting the Best Course of Action) किसी कार्य को करने के विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करने के पश्चात् उनमें से सर्वोत्तम तरीके का चयन: किया जाता है। यही एक ऐसा बिन्दु है जिस पर निर्णय लिया जाता है तथा यहीं से योजना का निर्माण होता है। कभी-कभी विकल्पों के मूल्यांकन से यह निर्णय भी निकल सकता है कि योजना के लक्ष्य की पूर्ति के लिए कोई एक तरीका उपयुक्त न होकर अनेक तरीकों का संयोग अधिक उपयुक्त सिद्ध हो। ऐसी दशा में किसी एक सर्वोत्तम तरीके के स्थान पर अनेक तरीकों के संयोग का चयन किया जाना अधिक हितकर होता है।

(7) योजना तैयार करना (Formulating a Plan) कार्य करने के सर्वोत्तम तरीके अथवा विकल्प का चयन करने के पश्चात् नियोजन का अगला कदम योजना को तैयार करना एवं उसे अन्तिम रूप देना होता है। इस कदम के अन्तर्गत योजना के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाता है।

(8) आवश्यक उप-योजनाओं का निर्माण करना (Formulating Necessary Derivative sub Plans)- किसी व्यावसायिक उपक्रम की अन्तिम योजना बन जाने के पश्चात् उसे कार्यान्वित करने के लिए अन्य आवश्यक उप-योजनाओं का निर्माण करना पड़ता है। ध्यान रहे कि ये उप-योजनाएँ पूर्ण रूप में स्वतन्त्र योजनाएँ न होकर उक्त मूल योजना का ही एक अंग होती है तथा एक-दूसरे से सम्बन्धित होती हैं।

(9) क्रियाओं का समय एवं क्रम निर्धारित करना (Establishing the Timings and the Sequence of Activities)-योजना एवं उप-योजनाओं के तैयार हो जाने के बाद उसको व्यावहारिक रूप देने के लिए उसके अन्तर्गत की जाने वाली विभिन्न क्रियाओं का समय एवं क्रम निर्धारित किया जाना चाहिए, ताकि उसको क्रियान्वित करने एवं निर्धारित लक्ष्यों की यथा-समय प्राप्ति करने में किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव न हो।

(10) रणनीति पर विचार करना (Considering the Strategy) नियोजन के क्रियान्वयन में रणनीति का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इस दृष्टि से विभिन्न रणनीतियों पर विचार किया जाना | नियोजन प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। अतएव नियोजन प्रक्रिया के अन्तर्गत उठाया जाने वाला अगला कदम नियोजन के लिए उपयुक्त रणनीति तैयार किया जाना एवं उस पर अमल करना है।


 

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