कम्पनी के प्रविवरण से आप क्या समझते है ? कम्पनी के प्रविवरण में क्या-क्या विवरण दिये जाते हैं ? समझाइए। What do you understand by company prospectus? What details are given in the prospectus of the company? explain.

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प्रविवरण का आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Prospectus)

एक सार्वजनिक कम्पनी को व्यापार प्रारम्भ करने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के साथ-साथ अपनी पूँजी एकत्रित करनी होती है। यह कार्य सामान्य जनता को प्रविवरण निर्गमित करके दिया जाता है। विधान के अनुसार एक सार्वजनिक कम्पनी के लिए प्रविवरण निर्गमित करना अनिवार्य है। तभी वह जनता से पूँजी प्राप्त कर सकती है। प्रविवरण एक ऐसा प्रपत्र है जिसके द्वारा एक सार्वजनिक कम्पनी जनता को अपने अंश, ऋण-पत्र खरीदने या निक्षेप जमा करने हेतु आमन्त्रित करती है। इसमें निवेशकों और ऋणदाताओं की सुरक्षा हेतु कम्पनी द्वारा आवश्यक जानकारी प्रदान की जाती है।

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 (70) के अनुसार, “प्रविवरण आशय ऐसे प्रपत्र से है, जिसे प्रविवरण के रूप में वर्णित या निर्गमित किया गया हो तथा इसमें धारा 32 में उल्लिखित रेड हैटिंग प्रविवरण या धारा 31 में उल्लिखित शैल्फ-प्रविवरण या कोई सूचना पत्र, गश्तीफा, विज्ञापन या अन्य प्रपत्र शामिल है, जो जनता से किसी निगमित संस्था की प्रतिभूतियों के अभिदान या क्रय के लिए प्रस्ताव आमन्त्रित करता है।

टापहम एवं टापहम के अनुसार, प्रविवरण से आशय ऐसे परिपत्र से है, जो प्रवर्तकों के द्वारा कम्पनी के समामेलन के पश्चात् उसके अंशों को खरीदने के लिए जनता को प्रेरित करने हेतु प्रकाशित किया जाता है। ”

इस प्रकार स्पष्ट है कि “कोई भी प्रपत्र जिसके द्वारा कम्पनी के लिए निक्षेप अथवा अंशों या ऋण-पत्रों का क्रय करने के लिए जनता से प्रस्ताव आमन्त्रित किया जाता है, प्रविवरण कहलाता है।”

प्रविवरण की विशेषताएँ (Characteristics of Prospectus)

प्रविवरण की प्रमुख विशेषताओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है–

(1) प्रविवरण एक लिखित प्रलेख या दस्तावेज होता है।

(2) यह किसी सूचना-पत्र, परिपत्र या विज्ञापन के रूप में हो सकता है।

(3) यह किसी सार्वजनिक कम्पनी द्वारा जारी किया जा सकता है।

(4) यह किसी निजी कम्पनी द्वारा जारी नहीं किया जा सकता है।

(5) यह किसी सार्वजनिक कम्पनी द्वारा जनता को दिया गया निमन्त्रण है।

(6) प्रविवरण पर तिथि लिखी होती है जिसे प्रविवरण जारी करने की तिथि माना जाता है।

(7) प्रविवरण पर प्रत्येक संचालक या प्रस्तावित संचालक के हस्ताक्षर होने आवश्यक है।

प्रविवरण के उद्देश्य (Objects of Prospectus)

प्रविवरण निर्गमन के प्रमुख उद्देश्यों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है–

(1) जनता को कम्पनी के अंश तथा ऋण-पत्र क्रय करने के लिए आमन्त्रित करने के लिए

(2) जनता के अंश तथा ऋण-पत्र क्रय करने के लिए दी गयी शर्तों एवं छूटों का लेखा करने के लिए

(3) प्रविवरण में लिखी बातों के लिए संचालक उत्तरदायी है, इस बात की घोषणा करना।

(Who can Issue Prospectus) प्रविवरण का निर्गमन निम्नलिखित में से कोई कर सकता है

(1) किसी भी सार्वजनिक कम्पनी द्वारा।

(2) ऐसी कम्पनी की ओर से किसी भी व्यक्ति द्वारा।

(3) कम्पनी के निर्माण से सम्बन्धित या निर्माण में हित रखने वाले किसी भी व्यक्ति द्वारा।

(4) कम्पनी के निर्माण से सम्बन्धित या निर्माण में हित रखने वाले किसी व्यक्ति की ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा |

(5) उस व्यक्ति या संस्था द्वारा जिसे कम्पनी ने अपनी प्रतिभूतियाँ इस आशय से आवंटित की हैया करने का व्हराव किया है कि उन्हें जनता को पुनः प्रस्तावित किया जायेगा।

क्या प्रविवरण का निर्गमन आवश्यक है ? (Is the Issue of Prospectus Compulsory ?)

प्रत्येक कम्पनी के लिये प्रविवरण का निर्गमन आवश्यक नहीं है। एक निजी कम्पनी जनता को प्रविवरण निर्गमित ही नहीं कर सकती एक सार्वजनिक कम्पनी को जनता से पूँजी एकत्रित करने के लिए प्रविवरण निर्गमित करना आवश्यक है। लेकिन एक सार्वजनिक कम्पनी को निम्न दशाओं में प्रविवरण का निर्गमन करना आवश्यक नहीं है

1. यदि आवेदन-पत्र किसी ऐसे व्यक्ति के यथार्थ निर्गमन के सम्बन्ध में निर्गमित किया गया हो, जो कि अंशों या ऋण-पत्रों के लिये कम्पनी के साथ अभिगोपन का अनुबन्ध करता हो।

2 यदि अंशों या ऋण-पत्रों का निर्गमन केवल विद्यमान अंशधारियों अथवा ऋणपत्रधारियों को ही किया जाना हो।

3. यदि ऐसे अंशों या ऋण-पत्रों का निर्गमन होता है, जो कि पहले निर्गमित किये गये अंशों या ऋण-पत्रों से पूर्णतया मिलते-जुलते हो और जिनमें किसी प्रमाणित स्कन्ध विपणि में व्यवहार किया जाता हो।

4. यदि अंशों व ऋण-पत्रों के लिये जनता को आमन्त्रित करना वर्जित हो ।

प्रविवरण की विषय-सामग्री (Contents of the Prospectus)

प्रविवरण कम्पनी का एक महत्वपूर्ण प्रलेख होता है जो जनता को कम्पनी की व्यावसायिक योजनाओं और उसकी लाभप्रदता के सम्बन्ध में जानकारी देकर जनता को कम्पनी में अपना धन विनियोजित करने के लिए आकर्षित करता है। इसलिये आवश्यक है कि प्रविवरण में कम्पनी के वास्तविक स्थिति का सही चित्र प्रस्तुत किया जाये और उसमें कम्पनी से सम्बन्धित समस्त महत्वपूर्ण बातों का वर्णन हो। कम्पनी अधिनियम 2013 के प्रावधानों के अनुसार प्रविवरण की विषय-सामग्री निम्नलिखित बातों को शामिल करना आवश्यक है

1. विथि- प्रत्येक प्रविवरण पर तिथि अंकित होगी। यह अंकित तिथि ही प्रविवरण के प्रकाशन की तिथि मानी जायेगी।

2. हस्ताक्षर – प्रत्येक प्रविवरण पर उन सभी व्यक्तियों के हस्ताक्षर होंगे जिनके नाम का उल्लेख प्रविवरण में किया गया है।

3. सूचनाएँ- प्रत्येक कम्पनी के प्रविवरण में निम्नलिखित सूचनाएँ होंगी–

A. कम्पनी का नाम, कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय का पता, कम्पनी सचिव, मुख्य वित्तीय अधिकारी, अंकेक्षकों, विधि परामर्शदाताओं, बैंकों तथा निर्धारित किये गये अन्य व्यक्तियों के नाम |

B. निर्गम के खुलने एवं बन्द होने की तिथि |

C. निर्धारित किये गये समय में आवंटन-पत्र जारी करने तथा रिफण्ड भेजने सम्बन्धी घोषणा |

D. अनुसूचित बैंक में पृथक बैंक खाते के सम्बन्ध में विवरण-यह विवरण इस आशय का होगा कि निर्गम से प्राप्त समस्त धनराशि इस खाते में अन्तरित की जायेगी। इसके अतिरिक्त यह घोषण भी की जायेगी कि इस निर्गम से प्राप्त राशि के साथ-साथ पूर्ववर्ती निर्गमों से प्राप्त राशि में से प्रयुक राशि तथा अप्रयुक्त राशि तथा निर्धारित की गयी रीति से प्रकटीकरण किया जायेगा।

E. अभिगोपन का विवरण-प्रविवरण में अभिगोपकों के नाम, पते, टेलीफोन नम्बर, फैक्स नम्बर तथा ई-मेल के पते तथा उनके द्वारा अभिगोपित राशि का उल्लेख किया जायेगा।

F. संचालकों, अंकेक्षकों, निर्गम बैंकों, विशेषज्ञ तथा अन्य निर्धारित किये गये व्यक्तियों की सहमति-प्रविवरण में प्रन्यासियों, सोलिसिटर्स या एडवोकेट्स, निर्गम मर्चेन्ट बैंकर्स, निर्गम रजिस्ट्रार उधारदाताओं, विशेषज्ञों की सहमति भी सम्मिलित की जायेगी।

G. प्रतिभूतियों के आवंटन एवं निर्गमन की प्रक्रिया एवं समय-सारणी |

H. संचालकों का विवरण जिसमें उनकी नियुक्ति तथा पारिश्रमिक, कम्पनी में उनके हित की प्रकृति एवं सीमा तथा निर्धारित की गयी अन्य बातों का विवरण भी होगा।

I. प्रवर्तक के अंशदान के स्रोत के सम्बन्ध में निर्धारित की गयी रीति से प्रकटीकरण।

J. कम्पनी के प्रमुख उद्देश्य एवं कम्पनी का वर्तमान व्यवसाय तथा इसका स्थान, परियोजना क्रियान्वयन की समय-सारणी।

K. न्यूनतम अभिदान, जिसमें प्रीमियम के रूप में देय राशि, नकद के अतिरिक्त प्रतिफल पर निर्गमित अंशों का विवरण भी होगा।

4. परियोजना का विवरण-प्रविवरण में परियोजना से सम्बन्धित निम्न विवरण दिया जायेगा

(a) परियोजना के विशिष्ट जोखिम तत्वों के सम्बन्ध में प्रबन्धकों का नजरिया या विचार |

(b) परियोजना का गर्भकाल |

(C) परियोजना की प्रगति की सीमा |

(d) परियोजना को पूर्ण करने की अन्तिम तिथि |

5. मुकदमों का विवरण-प्रविवरण में परिवादों या कानूनी कार्यवाहियों का विवरण भी दिया जायेगा।

6. प्रतिवेदन प्रत्येक प्रविवरण में वित्तीय सूचनाओं के उद्देश्यों से निम्नांकित प्रतिवेदनों को लगाया जायेगा —

(i) कम्पनी के लाभों एवं हानियों, सम्पत्तियों एवं दायित्वों तथा अन्य निर्धारित किये गये विषयों के सम्बन्ध में अंकेक्षकों का प्रतिवेदन |

(ii) प्रविवरण जारी करने के वित्तीय वर्ष के पूर्ववर्ती 5 वर्षों में से प्रत्येक वर्ष के लाभों एवं हानियों से सम्बन्धित प्रतिवेदन, जिसमें सहायक कम्पनियों के ऐसे ही प्रतिवेदन भी होंगे। ये प्रतिवेदन निर्धारित रीति से तैयार किये जायेंगे।

7. घोषणा-प्रविवरण में एक घोषणा इस आशय की भी सम्मिलित की जायेगी कि विवरण को तैयार करने में कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों का पालन कर लिया गया है।

8. अन्य कोई भी सामग्री-प्रविवरण में निर्धारित की गयी अन्य सामग्री एवं प्रतिवेदन भी सम्मिलित किये जायेंगे। इनमें से कुछेक प्रमुख बातें निम्नानुसार हैं

1. निर्गम गृह (Issue house) द्वारा विक्रय हेतु प्रस्ताव में अतिरिक्त विषय-वस्तु-निर्गम गृह द्वारा जारी किये जाने वाले विक्रय हेतु प्रस्ताव (प्रविवरण) में निम्नांकित बातों का समावेश किया जायेगा

(i) उस प्रस्ताव के लिए प्राप्त या प्राप्त किये जाने वाले प्रतिफल की शुद्ध राशि।

(ii) वह समय एवं स्थान जहाँ उस अनुबन्ध का निरीक्षण किया जा सकता है जिसके अधीन निर्गम गृह को प्रतिभूतियाँ आबंटित की गयी हैं अथवा आबंटित करने का ठहराव किया गया है।

2. प्रविवरण के मुख पृष्ठ पर लिखी जाने वाली विषय-वस्तु प्रत्येक प्रविवरण के मुख पृष्ठ पर निम्नांकित बातों का उल्लेख किया जायेगा–

(i) प्रविवरण की प्रति पंजीयन हेतु रजिस्ट्रार को सुपुर्द कर दी गयी है।

(ii) इस सुपुर्द किये गये प्रविवरण की प्रति के साथ संलग्न किये जाने वाले प्रलेखों का उल्लेख अथवा उस विवरण का उल्लेख जिसमें ये प्रलेख सम्मिलित हैं।

प्रविवरण में असत्य एवं कपटपूर्ण विवरण (Untrue and Fradulent Statement in Prospectus)

प्रविवरण ऐसा प्रपत्र है जो जनता को अपना धन कम्पनी में विनियोग करने हेतु आकर्षित करता है। कोई भी व्यक्ति प्रविवरण में दी हुई बातों के आधार पर ही कम्पनियों के अंश तथा ऋण-पत्र खरीदने को प्रेरित होता है। असत्य कथन एवं कपट का आशय केवल असत्य कथन से ही नहीं है अपितु किसी भूल से भी है जो तथ्यों के सम्बन्ध में जनता को भ्रम में डाल सकती है। स्पष्ट शब्दों में इसका अभिप्राय किसी भी ऐसे कवन अथवा भूल से है जो जनता के मस्तिष्क पर वास्तविक तथ्यों के सम्बन्ध में एक असत्य प्रभाव डाल सकती है, किसी महत्वपूर्ण तथ्य का छिपाद भी इसी के अन्तर्गत आता है। प्रविवरण की विषय-सामग्री लिखते समय ‘सुनहरे नियम को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। इस नियम के अनुसार प्रविवरण निर्गमन करने वालों को प्रत्येक विषय सही एवं उचित ढंग से लिखना चाहिये। अतः प्रविवरण निर्गमन करने वालों की यह जिम्मेदारी है कि प्रचिवरण में किसी महत्वपूर्ण बात को न छिपाया जाये, कोई असत्यवान प्रकाशित किया जाये जिससे विनियोगकर्त्ता को धोखा हो और यदि ऐसा होता है तो सभी व्यक्ति दोषी ठहराये जायेंगे जिन्होंने प्रविवरण के निर्माण में भाग लिया है।

कम्पनी अधिनियम के अनुसार (i) प्रविवरण में सम्मिलित विवरण असत्य माना जाता है। यदि यह विवरण जिस प्रसंग में तथा जिस रूप में प्रयोग हुआ है, धोखे में डालने वाला है अर्थात् अलग से यह विवरण सत्य हो सकता है पर जिस प्रसंग में दिया गया है उसके साथ पढ़ने में धोखा देता है तो इसे सत्य होते हुए भी असत्य माना जाता है। (ii) यदि प्रविवरण में कोई बात लिखने में छूट गई है और ऐसा न होने से इसके पढ़ने वालों को धोखा हुआ है तो भी प्रविवरण असत्य विवरण माना जायेगा।

प्रविवरण में असत्य एवं कपटपूर्ण विवरण के परिणाम (Consequences of Untrue and Fradulent Statement in Prospectus)

प्रत्येक ऐसे व्यक्ति, जिसने प्रविवरण में दिये गये असत्य कथन एवं विवरण के आधार पर कम्पनी के अंश अथवा ऋण-पत्र क्रय किये हैं, को अग्रलिखित दो अधिकार प्राप्त है–

(I) कम्पनी के विरुद्ध अंशधारियों को अधिकार

इसके अन्तर्गत प्रविवरण में दिये गये असत्य कथनों के लिए कम्पनी के विरुद्ध अंशधारी के निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हो जाते हैं–

(1) अनुबन्ध के परित्याग करने का अधिकार (Right of Re scision of Contract) एक अंशधारी किसी भी ऐसे अनुबन्ध का परित्याग कर सकता है जिसे उसने प्रविवरण के मिथ्यावर अथवा असत्य लेख को सत्य मानकर किया हो, चाहे यह असत्य वर्णन अज्ञानवश हो अवदा कपटमय, ऐसे व्यक्ति को अनुबन्ध परित्याग करने एवं अपने अंशों को वापस करने का अधिका है और वह उनके बदले में कम्पनी से रुपया भी ले सकता है। पीड़ित अभिदाता अपने इस अधिकार का उपयोग निम्नलिखित शर्तों के अधीन कर सकता है —

(i) प्रविवरण कम्पनी द्वारा अथवा कम्पनी की ओर से किसी व्यक्ति द्वारा निर्गमित किया गया हो।

(ii) प्रविवरण में दिया गया कथन या विवरण असत्य होना चाहिए अथवा उसमें दिये विवरण में किसी बात को छिपाने का प्रयास किया गया हो। उदाहरण-यदि कोई कम्पनी प्रविवरण लिखती है कि उसने पिछले 5 वर्षों में 20% लाभांश वितरित किया है जबकि वास्तव में इस कम्पनी पिछले 5 वर्षों में हानि ही हुई है, लाभ नहीं हुआ है। कम्पनी पिछले संचित लाभों में से लाभांश का भुगतान करती रही है। किन्तु इस तथ्य को प्रविवरण में नहीं लिखा। यहाँ इस महत्वपूर्ण बात छिपाने का प्रयास किया गया है। अतः यह कपटपूर्ण कार्य है।

(iii) असत्य कथन या छिपाव किसी ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य के सम्बन्ध में होना चाहिए प्रतिभूतियों के अभिदान करने अथवा नहीं करने के निर्णय को प्रभावित करने वाला हो। उदाह के लिए, एक कम्पनी के प्रविवरण में यह लिखा था कि 2 बड़े ख्याति प्राप्त व्यवसायी कम्पनी संचालक बनने को सहमत हो गये हैं। वास्तविकता यह थी कि उन दोनों ने कम्पनी की मद करने की इच्छा प्रकट की थी। निर्णय दिया गया कि प्रविवरण में महत्वपूर्ण तथ्य मिथ्याकथना अतः अभिदाता अनुबन्ध निरस्त करने के हकदार हैं।

(iv) अभिदाता के प्रविवरण में प्रविवरण के असत्य कथन पर विश्वास करके ही या उसक से प्रेरित होकर ही प्रतिभूतियों का अभिदान किया हो। यदि कोई अभिदाता प्रविवरण देखें पढ़े बिना ही प्रतिभूतियों का अभिदान करता है तो वह अनुबन्ध को निरस्त करने का हकदार होता है।

(v) अनुबन्ध के निरस्तीकरण का हक केवल मूल अभिदाताओं/आबंटियों को ही होता है। कोई व्यक्ति स्कन्ध विनिमय केन्द्र से अंश खरीदता है तो वह प्रविवरण में मिथ्यावर्णन का सहारा ले अनुबन्ध का परित्याग नहीं कर सकता है।

(vi) अनुबन्ध के निरस्तीकरण के अधिकार का उपयोग उचित समय के भीतर तथा कम्पनी का समापन प्रारम्भ होने से पहले ही कर देना चाहिये।

(2) क्षतिपूर्ति प्राप्त करना (To Receive the Compensation)-असत्य कथन के आधार पर अनुबन्ध को समाप्त करने के पश्चात् कम्पनी से हजीना भी वसूल किया जा सकता है, परन्तु यह अधिकार अनुबन्ध की समाप्ति के बाद ही वसूल किया जा सकता है।

क्षतिपूर्ति कराने हेतु उसे निम्नलिखित तथ्यों को सिद्ध करना होगा–

(i) उसने भ्रामक / असत्य प्रविवरण पर विश्वास करके ही कम्पनी की प्रतिभूतियों का अभिदान किया था।

(ii) वह प्रविवरण कम्पनी द्वारा अथवा कम्पनी की ओर से किसी व्यक्ति द्वारा ही जारी किया गया था।

(II) संचालकों, प्रवर्तकों, विशेषज्ञों आदि के विरुद्ध अधिकार (Right against Directors, Promoters, Experts etc)

अधिनियम में उन व्यक्तियों की सूची दी गयी है जो भ्रामक/ असत्य प्रविवरण के लिए उत्तरदायी है। वे निम्नानुसार है–

(i) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो प्रविवरण जारी करने के समय कम्पनी के संचालक है।

(ii) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जिन्होंने कम्पनी के प्रविवरण में कम्पनी के संचालक के रूप में नाम अंकित करने हेतु अनुमति दी है अथवा कम्पनी का संचालक बनने हेतु अपनी सहमति दी है।

(iii) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो कम्पनी का प्रवर्तक है।

(iv) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जिसने प्रविवरण जारी करने का अधिकार दिया है।

(v) प्रत्येक विशेषज्ञ जो कम्पनी के निर्माण, प्रवर्तन या प्रबन्ध से सम्बन्धित एवं हितधारी है अथवा रहा है।

संचालकों, प्रवर्तकों, विशेषज्ञों के दायित्व को निम्न दो वर्गों में बाँटा जा सकता है–

A. दीवानी या सिविल दायित्व (Civil Liability)-कम्पनी के संचालक, प्रवर्तक, विशेषज्ञ आदि सभी (उपर्युक्त वर्णित सभी) का उन अभिदाताओं के प्रति दीवानी/नागरिक दायित्व है जिन्होंने भ्रामक / असत्य प्रविवरण पर विश्वास कर कम्पनी की प्रतिभूतियों के लिए अभिदान किया है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक पीड़ित अभिदाता को ऐसे संचालकों आदि के विरुद्ध निम्नलिखित उपचार प्राप्त है

1. असत्य कवन या तथ्यों के विलोप के लिए क्षतिपूर्ति प्रत्येक अभिदाता जिसने असत्य या भ्रामक प्रविवरण (जिसमें कुछ तथ्यों को सम्मिलित नहीं किया गया है। तथ्यों का विलोप किया है) पर विश्वास करके प्रतिभूतियों के लिए अभिदान किया है, वह कम्पनी के संचालकों आदि से वह समस्त हानियों वसूल कर सकता है जो उसे अभिदान के कारण हुई है।

2. कपटपूर्ण प्रविवरण के लिए असीमित व्यक्तिगत दायित्व-कभी-कभी यह सिद्ध कर दिया जाता है कि कोई प्रविवरण प्रतिभूतियों के आवेदकों या किसी अन्य व्यक्ति के साथ कपट करने की | जीवत से जारी किया था अथवा किसी कपटपूर्ण उद्देश्य से जारी किया था। ऐसी दशा में प्रत्येक संचालक, प्रवर्तक, विशेषज्ञ आदि का असीमित रूप से व्यक्तिगत दायित्व होगा। वे उस प्रत्येक व्यक्ति द्वारा उठाई गई क्षति के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे जिसने ऐसे प्रविवरण के आधार पर प्रतिभूतियों का अभिदान किया था।

B. दण्डनीय दायित्व (Criminal Liability) -यदि कोई असत्य प्रविवरण जारी किया, प्रसारित किया या वितरित किया जाता है तो उस प्रविवरण के निर्गमन को अधिकृत करने वाला प्रत्येक व्यक्ति उत्तरदायी होगा। कपट के लिए दोषी पाया गया कोई भी व्यक्ति कम-से-कम 6 माह की तथा अधिकतम 10 वर्ष तक के कारावास की सजा से दण्डित किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त, उसे कम-से-कम कपट में निहित राशि से तथा अधिकतम कपट में निहित राशि से 3 गुना तक की राशि के अर्थदण्ड से भी दण्डित किया जा सकेगा। यदि किसी कपट में सार्वजनिक हित का प्रश्न भी निहित है तो कारावास की सजा 3 वर्ष से कम नहीं होगी।

(iii) उसे उस भ्रामक या असत्य प्रविवरण के कारण वास्तव में क्षति उठानी पड़ी है।


Meaning and Definition of Prospectus

A public company has to collect its capital along with obtaining the certificate of commencement of business. This work is given to the general public by issuing prospectus. As per the law it is mandatory for a public company to issue prospectus. Only then can it get capital from the public. A prospectus is a form by which a public company invites the public to purchase its shares, debentures or deposit deposits. In this, necessary information is provided by the company for the protection of investors and lenders.

As per Section 2(70) of the Companies Act, 2013, “Statement” means a form described or issued in the form of a prospectus and contains a red hatting prospectus referred to in section 32 or a shelf-statement referred to in section 31 or Any notice, patrol, advertisement or other form soliciting an offer from the public to subscribe or purchase the securities of an incorporated entity.

According to Topham and Topham, prospectus means such circular which is published by the promoters to induce the public to buy the shares of the company after its amalgamation. ,

It is thus clear that “Any form by which an offer is invited from the public for deposits or for the purchase of shares or debentures for the company is called a prospectus.”

Characteristics of Prospectus

The salient features of the prospectus can be explained as follows-

(1) A prospectus is a written document or document.

(2) It may be in the form of a notice, circular or advertisement.

(3) It may be issued by a public company.

(4) It cannot be issued by a private company.

(5) It is an invitation made by a public company to the public.

(6) The date is mentioned on the prospectus which is considered to be the date of issue of the prospectus.

(7) The prospectus must be signed by every director or proposed director.

Objects of Prospectus

The main objectives of prospectus issue can be explained as follows:-

(1) To invite the public to buy shares and debentures of the company

(2) To account for the conditions and exemptions given for purchasing public shares and debentures.

(3) To declare that the director is liable for the things contained in the prospectus.

(Who can Issue Prospectus) Prospectus can be issued by any of the following

(1) by any public company.

(2) by any person on behalf of such company.

(3) By any person connected with the formation of the company or having an interest in the formation.

(4) by any other person on behalf of any person connected with the formation of the company or having interest in the formation.

(5) By the person or entity to whom the company has allotted or pretends to have its securities with the intention that they will be re-offered to the public.

Is issue of prospectus required? (Is the Issue of Prospectus Compulsory ?)

It is not necessary for every company to issue a prospectus. A private company cannot issue prospectus to the public. A public company is required to issue prospectus to collect capital from the public. But a public company is not required to issue prospectus in the following cases

1. If the application is issued in connection with the actual issue of any person who has entered into an underwriting agreement with the company for shares or debentures.

2 If the issue of shares or debentures is to be made only to existing shareholders or debenture holders.

3. If there is an issue of shares or debentures which are completely identical to the shares or debentures issued earlier and which are dealt with in a certified stock market.

4. If inviting public for shares and debentures is prohibited.

Contents of the Prospectus

Prospectus is an important document of the company which attracts the public to invest their money in the company by giving information about the company’s business plans and its profitability. That is why it is necessary that a true picture of the actual position of the company should be presented in the prospectus and all the important things related to the company should be described in it. As per the provisions of the Companies Act 2013, the contents of the prospectus are required to contain the following:

1. Method – Date will be mentioned on each return. This marked date shall be deemed to be the date of publication of the prospectus.

2. Signature – Every prospectus shall bear the signatures of all persons whose names are mentioned in the prospectus.

3. Information – The prospectus of every company shall contain the following information-

A. Name of the Company, Address of the Registered Office of the Company, Name of the Company Secretary, Chief Financial Officer, Auditors, Legal Consultants, Banks and other persons as may be prescribed.

B. Date of opening and closing of the issue.

C. Announcement regarding issue of allotment letter and sending refund within the stipulated time.

D. Statement in respect of a separate bank account in a scheduled bank – This statement will be to the effect that all the money received from the issue will be transferred to this account. Apart from this, it will also be announced that the amount received from this issue as well as the amount received from the previous issuance will be used and unutilized amount and will be disclosed in the prescribed manner.

E. Details of undercover – The details of the undercover will be mentioned in the details like name, address, telephone number, fax number and e-mail address and the amount recorded by them.

F. Consent of Trustees, Solicitors or Advocates, Issue Merchant Bankers, Issue Registrar Lenders, Experts shall also be included in the consent statement of Directors, Auditors, Issue Banks, Experts and other designated persons.

G. Procedure and time table for allotment and issue of securities.

H. Details of directors including their appointment and remuneration, nature and extent of their interest in the company and other such matters as may be prescribed.

I. Disclosure in the manner prescribed in respect of the source of the promoter’s contribution.

J. Main objectives of the company and present business of the company and its location, schedule of project implementation.

K. Minimum subscription, which shall include the amount payable as premium, the details of the shares issued on consideration in addition to cash.

4. Details of the project – The following details related to the project will be given in the description

(a) The view or view of the managers regarding the specific risk elements of the project.

(b) The gestation period of the project.

(C) extent of progress of the project.

(d) Last date for completion of the project.

5. Details of cases – Details of complaints or legal proceedings will also be given in the prospectus.

6. Reports In each statement for the purposes of financial information, the following reports shall be substituted –

(i) Report of the auditors in respect of the profits and losses, assets and liabilities and other matters of the company.

(ii) reports relating to profits and losses for each of the five years preceding the financial year in which the return is issued, including similar reports of the subsidiaries. These reports shall be prepared in the prescribed manner.

7. Declaration – A declaration shall also be included in the statement to the effect that the provisions of the Companies Act have been complied with in the preparation of the statement.

8. Any other material – Other materials and reports prescribed in the prospectus will also be included. Some of the main points are as follows

1. Additional subject matter in the offer for sale by the issue house – The following things will be included in the offer for sale (details) to be issued by the issue house

(i) the net amount of consideration received or to be received for that offer.

(ii) the time and place at which inspection of the contract under which the securities have been allotted to the issue house or the arrangement to be allotted is made.

2. The subject matter to be written on the front page of the prospectus The following things shall be mentioned on the front page of each prospectus-

(i) A copy of the prospectus has been handed over to the Registrar for registration.

(ii) a mention of the documents to be attached to the copy of the statement submitted or the particulars in which these documents are included.

Untrue and Fradulent Statement in Prospectus

A prospectus is a form that attracts the public to invest their money in the company. Any person is motivated to buy shares and debentures of companies only on the basis of the things given in the prospectus. False statement and fraud do not mean only false statement but also any mistake which can mislead the public regarding the facts. In clear words, it means any such statement or mistake which can have an untrue effect on the mind of the public in relation to the real facts, the concealment of any important fact also comes under this. While writing the content of the prospectus, the ‘golden rule’ must be kept in mind. According to this rule, those issuing the prospectus should write each subject correctly and properly. Therefore, it is the responsibility of the issuers of the prospectus that nothing material should be concealed in the prospectus, anything untrue should be published so as to deceive the appropriator and if this happens then all the persons who have participated in the preparation of the prospectus will be held guilty.

According to the Companies Act (i) the particulars included in the prospectus are deemed to be false. If this description is deceiving in the context in which and in the form in which it is used, i.e. separately this statement may be true but it deceives in reading it with the context in which it is given, then it is considered false even though it is true. goes. (ii) If any thing has been omitted to write in the prospectus and its readers have been deceived by not doing so, even then the prospectus will be treated as false statement.

Consequences of Untrue and Fradulent Statement in Prospectus

Every person who has purchased shares or debentures of the company on the basis of false statement and statement given in the prospectus, has the following two rights-

(I) Rights of shareholders against the company

Under this, the shareholder’s complaint against the company for the false statements made in the prospectus

The following rights are acquired-

(1) Right of Rescision of Contract: A shareholder may relinquish any contract which he has entered into by taking the false or false article of the prospectus to be true, even if this false statement is due to ignorance or fraud. Such person has the right to renounce the contract and return his shares and he can also take money from the company in return for them. The aggrieved subscriber can exercise this right subject to the following conditions –

(i) the prospectus is issued by the company or by any person on behalf of the company.

(ii) the statement or particulars made in the prospectus must be false or an attempt has been made to conceal anything contained in the particulars therein. Example- If a company writes a statement that it has distributed 20% dividend in the last 5 years, while in reality this company has made a loss in the last 5 years, there is no profit. The company has been paying dividend out of the past accumulated profits. But this fact was not written in the prospectus. An attempt has been made here to hide this important point. So it is a fraudulent act.

(iii) the false statement or suppression must be made with respect to any material fact which is likely to affect the decision to subscribe or not to subscribe to the securities. For example, in the prospectus of a company it was written that 2 big businessmen of repute have agreed to become the directors of the company. The fact was that both of them had expressed their desire to do things for the company. It was held that there is a misstatement of material facts in the prospectus, hence the subscriber is entitled to terminate the contract.

(iv) has subscribed securities only by reason of belief in the statement of the subscriber to be false in the statement or by reason of his being motivated by him. If a subscriber subscribes the securities without reading the prospectus, he is entitled to cancel the contract.

(v) The right of cancellation of the contract lies with the original subscribers/allottees only. If a person buys shares from an inventory exchange center, he cannot abandon the contract by resorting to misstatement in the prospectus.

(vi) The right of termination of the contract should be exercised within a reasonable time and before the commencement of the winding up of the company.

(2) To Receive the Compensation – Hajina can also be recovered from the company after termination of the contract on the basis of untrue statement, but this right can be recovered only after the termination of the contract.

In order to get compensation, he has to prove the following facts-

(i) He had subscribed the securities of the company only on reliance on misleading / false statement.

(ii) the return was issued by the company or by any person on behalf of the company.

(II) Right against Directors, Promoters, Experts etc. (Right against Directors, Promoters, Experts etc.)

The Act gives a list of persons who are liable for misleading/false statements. They are as follows-

(i) every person who is a director of the company at the time of issue of the return.

(ii) every person who has given permission to be named as a director of the company in the prospectus of the company or has given his consent to be a director of the company.

(iii) every person who is a promoter of the company.

(iv) every person authorized to issue a return.

(v) every expert who is or has been a stakeholder in the formation, promotion or management of the company.

The responsibilities of operators, promoters, experts can be divided into the following two categories-

A. Civil Liability – All the directors, promoters, experts etc. of the company (all mentioned above) have civil/civil liability against the subscribers who subscribed for the securities of the company by relying on misleading/false statements Is. In other words, every aggrieved subscriber has the following remedies against such operators etc.

1. Indemnity for false statement or omission of facts Every subscriber who has subscribed for securities by reliance on false or misleading statement (which excludes certain facts. from which he can recover all the losses which have been caused to him on account of subscription.

2. Unlimited Personal Liability for Fraudulent Disclosure – Sometimes it is proved that a prospectus is intended to defraud applicants of securities or any other person. was issued out of existence or for any fraudulent purpose. In such a case, every operator, promoter, specialist etc. will have unlimited personal liability. He shall be personally liable for the damages suffered by each person who subscribed the securities on the basis of such statement.

B. Criminal Liability – If any false statement is issued, disseminated or distributed, then every person authorizing the issue of that statement shall be liable. Any person found guilty of fraud shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to six months and not exceeding ten years. In addition, he may also be punished with a fine of not less than the amount involved in the fraud and with a fine of up to three times the amount involved in the maximum fraud. If public in any fraud If the question of interest is also involved, the punishment of imprisonment shall not be less than three years.

(iii) has actually suffered damages by reason of that misleading or false statement.

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