अंशों के आबण्टन से आप क्या समझते हैं ? कम्पनी अधिनियम, 2013 के अन्तर्गत अंशों के आबण्टन सम्बन्धी प्रावधानों का वर्णन कीजिए। What do you understand by allotment of shares? Explain the provisions relating to allotment of shares under the Companies Act, 2013.

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अंशों के आवण्टन से आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Allotment of Shares)

अंशों के आवण्टन का अर्थ किसी व्यक्तिको संचालक मण्डल द्वारा निश्चित संख्या के अंशों का नियोजन करना है जिनके लिए उसने आवेदन पत्र दिया है। अंशों के आवण्टन करने का अर्थ यह होता है कि कम्पनी ने उस प्रस्ताव को स्वीकार करके एक अनुबन्ध उस व्यक्तिके साथ किया है जिसने आवेदन-पत्र दिया है। आवण्टन शर्त रहित होना चाहिए। आवेदक के पास आवण्टन की सूचना उचित समय भेजनी चाहिए। आवण्टन से पूर्व आवेदक कभी भी अपने अंशों के प्रस्ताव को वापस ले सकता है। आवण्टन उन्हीं शर्तों के अनुरूप होना चाहिए जो आवेदन-पत्र में दी गयी हैं।

प्रो. पामर (Palmer) के अनुसार, “अंश आबण्टन से अभिप्राय संचालक मण्डल द्वारा पास किये गये प्रस्ताव के आधार पर किसी व्यक्ति को, जिसने अंशों के लिए आवेदन पत्र भेजा है, निश्चित संख्या में वितरण करना है।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि कम्पनी के संचालकों द्वारा जनता से प्राप्त अंशों के क्रय प्रस्ताव स्वीकार करने की प्रक्रिया को अंशों का आवण्टन कहते हैं। यह स्मरण रखना चाहिए कि कम्पनी द्वारा हरण किये गये अंशों को जारी करना आवण्टन नहीं है।

अंशों के आबण्टन के सम्बन्ध में प्रावधान (Provisions/Conditions as to the Allotment of Shares)

अंशों के आवण्टन के सम्बन्ध में लागू होने वाली व्यवस्थाओं का निम्न प्रकार अध्ययन किया जा सकता है–

I. सामान्य व्यवस्थाएँ (General Provisions)

आवेदकों के आवेदन-पत्रों पर स्वीकृति देना ही आबण्टन कहलाता है और उसके परिणामस्वरूप ही कम्पनी तथा आवेदकों के बीच अनुबन्धात्मक सम्बन्धों का जन्म होता है। अतः वैध अनुबन्धात्मक सम्बन्धों की स्थापना के लिए अंशों के आवेदन पत्रों पर स्वीकृति (अर्थात् अंशों को आवण्टन) उचित रूप में किया जाना चाहिए। इस हेतु अंशों का आवण्टन करते समय निम्न नियमों या शर्तों का पालन करना अनिवार्य है

1. आवण्टन उचित अधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए (Allotment must be made by Proper Authority)- अंशों का आवण्टन कम्पनी के उचित एवं अधिकार प्राप्त व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह द्वारा ही किया जाना चाहिए। सामान्यतः अंशों का आवण्टन करने का अधिकार संचालक मण्डल का है किन्तु अन्तर्नियमों में व्यवस्था हो तो संचालक मण्डल अंश आवण्टन का अधिकार संचालकों की समिति को सौंप सकता है।

2. अंशों का आबण्टन उचित समय में किया जाना चाहिए (Allotment must be made within Reasonable time) – भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 6 में कहा गया है कि स्वीकृति उचित समय में दी जानी चाहिए। यह बात अंशों के आवेदन पत्रों की स्वीकृति (आवण्टन) के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यदि कम्पनी अंशों को आवण्टन उचित समय पर नहीं करती है तो कम्पनी आवेदकों को उन अंशों को लेने के लिए बाध्य भी नहीं कर सकती है।

उचित समय परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है, किन्तु सार्वजनिक निर्गम (Public issue) द्वारा अंशों का आवण्टन करने की दशा में ‘सेबी’ के दिशा-निर्देशों का पालन करना पड़ता है। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, वर्तमान में कम्पनियों को निर्गम बन्द होने के 15 दिनों के भीतर आवण्टन कर देना पड़ता है। यदि कम्पनी निर्गम बन्द होने के 15 दिनों के भीतर आवण्टन पत्र अथवा धन वापसी आदेश भेजने में त्रुटि करती है तो कम्पनी को उसके बाद आवेदन शुल्क पर 15 प्रतिशत ब्याज चुकाना पड़ता है।

3. आबण्टन का संवहन होना चाहिए (Allotment must be Communicated) कम्पनी जब अंशों का आबण्टन कर देती है तो उसे आवण्टन की सूचना आवेदक के पास अवश्य भेजनी चाहिए। यह नियम इस बात पर आधारित है कि ‘स्वीकृति का संवहन आवश्यक है। केवल ‘मानसिकता स्वीकृति’ को स्वीकृति नहीं माना जा सकता। यदि आवेदक को आवण्टन की सूचना नहीं भेजी जाती है, तो वह आबण्टन से बद्ध नहीं होता तथा वह अंशधारी के रूप में उत्तरदायी भी नहीं व्हराया जा सकता है।

4. आवण्टन शर्त रहित होना चाहिए (Allotment must be Unconditional)-कम्पनी द्वारा अंशों का आवण्टन पूर्ण तथा शर्त रहित होना चाहिए। यद्यपि आवेदक अपने आवेदन-पत्र के साथ आवण्टन की शर्तें लगा सकते हैं, किन्तु कम्पनी आवण्टन के सम्बन्ध में कोई विशेष शर्त नहीं लगा सकती है। यदि कम्पनी आवण्टन में कोई शर्त लगा देती है तो वह आवण्टन व्यर्थ होता है।

.5 अंश लेने के प्रस्ताव तथा आबण्टन का खण्डन (Revocation of Proposal to take Share and Revocation of Allotment)- भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 5 के अनुसार किसी भी प्रस्ताव अथवा स्वीकृति का खण्डन किया जा सकता है। इस धारा के अनुसार किसी भी प्रस्ताव का प्रस्तावक के विरुद्ध स्वीकृति का संवहन पूरा होने से पहले किसी भी समय प्रस्ताव क खण्डन किया जा सकता है, जबकि स्वीकृति का खण्डन स्वीकर्ता के विरुद्ध स्वीकृति का संवहन पू होने से पहले किसी भी समय किया जा सकता है।

II. कम्पनी अधिनियम की व्यवस्थाएँ: आबण्टन पर प्रतिबन्ध (Provisions of the Company Act: Restrictions on Allotment)

कम्पनी अधिनियम द्वारा सार्वजनिक कम्पनियों के अंशों के आवण्टन पर कुछ प्रतिबन्ध लगा गये हैं। अतः जब कोई सार्वजनिक कम्पनी प्रविवरण जारी करके पहली बार जनता को अपने अं क्रय करने के लिए आमन्त्रित करती है तो उस कम्पनी को अंशों के आवण्टन से पूर्व कम्पन अधिनियम के अग्र प्रतिबन्धों / व्यवस्थाओं/शर्तों का पालन करना पड़ता है–

1. प्रविवरण का पंजीयन जब कम्पनी अपने अंशों के क्रय के लिए जनता को आमन्त्रि करती है तो उस कम्पनी को एक निर्धारित प्रारूप में विवरण तैयार करके कम्पनी के रजिस्ट्रार के समक्ष पंजीयन हेतु प्रस्तुत करना पड़ता है। इस पर उन सभी व्यक्तियों के हस्ताक्षर होने आवश्यक है जिनका नाम प्रविवरण में संचालकों अथवा प्रस्तावित संचालकों के रूप में दिया गया है।

2. न्यूनतम अभिदान की प्राप्ति–कोई भी सार्वजनिक कम्पनी तब तक अंशों का आवण्टन नहीं। कर सकती है जब तक कि प्रविवरण में उल्लिखित ‘न्यूनतम अभिदान राशि प्राप्त नहीं हो जाती है। प्रविवरण जारी करने वाली कम्पनी को ‘सेबी’ के दिशा-निर्देशों के अनुसार अपने सार्वजनिक निर्गम के कुल निर्गम मूल्य के 90% के बराबर राशि न्यूनतम अभिदान के रूप में प्राप्त करनी पड़ती है।

3. न्यूनतम अभिदान राशि नकद में प्राप्त होना-न्यूनतम अभिदान राशि नकद में प्राप्त होना आवश्यक है। यदि वह किसी अन्य रूप में जैसे सम्पत्ति, अंश आदि से प्राप्त की जाती है तो न्यूनतम अभिदान की पूर्ति में योगदान नहीं होगा किन्तु चेक, बैंक ड्रॉफ्ट, ‘स्टॉक इन्वेस्ट’ इत्यादि भुगतान प्रलेख से धन प्राप्त किया जाता है तो वह भी नकद भुगतान ही माना जायेगा।

4. आवेदन राशि-कोई भी सार्वजनिक कम्पनी तब तक अपने अंशों का आवण्टन नहीं कर सकती है जब तक कि उसे अंशों के आवेदन पर अंशों के अंकित मूल्य का कम से कम 5% नकद में प्राप्त नहीं हो जाता है।

5. स्कन्ध विनिमय केन्द्र में लेन-देन हेतु आवेदन करना-जो कम्पनी प्रविवरण द्वारा जनता को अंशों का निर्गमन करना चाहती है उसे ऐसे निर्गमन से पूर्व उस मान्यता प्राप्त स्कन्ध विनिमय केन्द्र में लेन-देन की अनुमति के लिए प्रार्थना पत्र देना होगा, जिसमें कम्पनी अपने अंर्शो या ऋण पत्रों के लेन-देन का इरादा रखती हो।

6. प्रविवरण में उल्लेख करना-प्रत्येक कम्पनी को अपने प्रविवरण में उन स्कन्ध विनिमय केन्द्रों के नामों का भी उल्लेख करना होगा जिनमें उस कम्पनी ने अपने अंशों एवं ऋणपत्रों के लेन-देन के लिए आवेदन किया है।

7. आवेदन राशि अनुसूचित बैंक में जमा रखना प्रत्येक सार्वजनिक कम्पनी के अंशों के आवेदन पर प्राप्त राशि को तब तक किसी अनुसूचित बैंक में अलग खाते में जमा रखना चाहिए जब तक कि–

(i) कम्पनी को व्यापार करने का प्रमाण-पत्र नहीं मिल जाता है; अथवा

(ii) यदि ऐसा प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लिया है तो न्यूनतम अभिदान की राशि प्राप्त नहीं हो जाती है अथवा।

(iii) स्कन्ध विनिमय केन्द्र से अंशों के लेन-देन की अनुमति प्राप्त कर अंशों का आबण्टन नहीं कर दिया जाता है।

यदि उक्त प्रावधान का उल्लंघन किया जाता है तो इसके उल्लंघन के लिए उत्तरदायी प्रत्येक प्रवर्तक, संचालक या अन्य व्यक्ति को ₹ पचास हजार तक का अर्थदण्ड दिया जा सकता है।

8. अनुसूचित बैंक में जमा आवेदन राशि का उपयोग अनुसूचित बैंक में अलग खाते में जमा आवेदन राशि का उपयोग निम्नांकित उद्देश्यों के अतिरिक्त किसी भी उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता है–

(i) यदि अंशों के लेन-देन के लिए स्कन्ध विनिमय केन्द्र की अनुमति मिल गई है तो अंशों के आबण्टन पर देय राशि के समायोजन के लिए।

(ii) यदि स्कन्ध विनिमय केन्द्र से अंशों के लेन-देन की अनुमति नहीं मिली हो या कम्पनी किसी भी कारण से अंशों का आवण्टन करने में असमर्थ हो तो आवेदन राशि की वापसी के लिए।

9. न्यूनतम अभिदान राशि प्राप्त करने की अवधि कोई भी कम्पनी न्यूनतम अभिदान प्राप् करने के लिए अधिक से अधिक 30 दिनों तक की प्रतीक्षा कर सकती है। यदि प्रविवरण के जारी करने की तिथि के 30वें दिन तक भी न्यूनतम राशि प्राप्त नहीं होती तो निश्चित दिनों के भीतर आवेदकों से प्राप्त आवेदन राशि लौटा देनी चाहिए।

10. प्रविवरण या स्थानापन्न प्रविवरण का पंजीयन कराये बिना आवण्टन पर जुर्माना यदि कोई प्रविवरण या स्थानापन्न प्रविवरण का पंजीयन कराये बिना ही अंशों का आवण्टन कर देता है तो कम्पनी तथा कम्पनी के प्रत्येक अधिकारी पर, र पचास हजार तक का जुर्माना किया जा सकता है।

11. संचालकों का क्षतिपूर्ति के लिए दायित्व यदि कम्पनी का कोई संचालक जानबूझकर आवण्टन सम्बन्धी प्रावधानों की अवहेलना करता है, अथवा जानबूझकर उन प्रावधानों का उल्लंघन करने का अधिकार या आज्ञा प्रदान करता है तो वह संचालक कम्पनी तथा आवण्टी की किसी भी हानि, क्षति तथा खर्चे की पूर्ति के लिए उत्तरदायी होगा। परन्तु इस अधिकार के अन्तर्गत वैधानिक कार्यवाही आवण्टन की तिथि के दो वर्ष के समाप्त होने से पहले ही कर दी जानी चाहिए।

12. स्कन्ध विनिमय केन्द्र से आज्ञा न मिलने पर आबण्टन व्यर्य-यदि प्रविवरण में इस बात का उल्लेख कर दिया जाता है कि अंशों का लेन-देन किसी मान्यता प्राप्त स्कन्ध विनिमय केन्द्र में करने के लिए प्रार्थना पत्र दे दिया गया है तो ऐसी दशा में आवण्टन तब व्यर्थ होगा यदि वह स्कन्ध विनिमय केन्द्र अंशों के लेन-देन की आज्ञा प्रदान नहीं करता है।


Meaning and Definition of Allotment of Shares

The meaning of allotment of shares is the appointment of a certain number of shares by the Board of Directors to a person for which he has applied. Allotment of shares means that the company has accepted the offer and entered into an agreement with the person who has made the application. The allotment should be unconditional. The intimation of allotment should be sent to the applicant in due course. The applicant can withdraw the offer of his shares at any time before the allotment. The allotment should be as per the same conditions as given in the application form.

Pro. According to Palmer, “Allotment of shares means the distribution of a certain number of shares to any person who has sent an application for shares on the basis of a resolution passed by the Board of Directors.”

It is thus clear that the process of accepting the purchase offer of shares received by the directors of the company from the public is called allotment of shares. It should be remembered that issue of forfeited shares by the company is not an allotment.

Provisions/Conditions as to the Allotment of Shares

The arrangements applicable in relation to the allotment of shares can be studied as follows-

I. General Provisions

Approval on the applications of the applicants is called allotment and as a result of this, the contractual relationship between the company and the applicants is born. Therefore, in order to establish a valid contractual relationship, acceptance of shares (ie allotment of shares) should be done in a proper manner. For this it is necessary to comply with the following terms or conditions while allotting the shares

1. Allotment must be made by Proper Authority – Allotment of shares should be done only by proper and empowered person or group of persons of the company. Generally, the Board of Directors has the right to allocate shares, but if there is a provision in the Articles, the Board of Directors can hand over the right of allotment of shares to the Committee of Directors.

2. Allotment of shares must be made within reasonable time – Section 6 of the Indian Contract Act states that the acceptance must be made within reasonable time. This also applies in relation to the acceptance of applications for shares. If the company does not allot the shares on time, then the company cannot compel the applicants to take those shares.

The proper timing may vary according to the circumstances, but in case of allotment of shares by public issue, the guidelines of ‘SEBI’ have to be followed. As per these guidelines, at present companies have to make allotments within 15 days from the date of closure of the issue. If the company commits an error in sending the allotment letter or refund order within 15 days of the closure of the issue, the company has to pay interest of 15% on the application fee thereafter.

3. Allotment must be Communicated. When the company makes allotment of shares, it must send the allotment notice to the applicant. This rule is based on the premise that ‘conveyance of acceptance is necessary. Mere ‘mindset acceptance’ cannot be considered acceptance. If intimation of allotment is not sent to the applicant, he is not bound by the allotment and he cannot be held liable as a shareholder.

4. Allotment must be Unconditional – The allotment of shares by the company must be complete and unconditional. Although the applicant can impose conditions of allotment with his application, but the company cannot impose any special condition regarding the allotment. If the company puts any condition in the allotment, then that allotment is void.

.5 Revocation of Proposal to take Share and Revocation of Allotment – According to section 5 of the Indian Contract Act, any offer or acceptance can be revoked. According to this section an offer can be rebutted against the proposer at any time before the transmission of acceptance of acceptance is completed, whereas acceptance can be revoked against the acceptor at any time before the transmission of acceptance is completed. .

II. Provisions of the Company Act: Restrictions on Allotment

Certain restrictions have been placed on the allotment of shares of public companies by the Companies Act. Therefore, when a public company invites the public to purchase its shares for the first time by issuing a return, then that company has to comply with the following restrictions / arrangements / conditions of the Companies Act before allotment of shares –

1. Registration of Prospectus When a company invites the public for the purchase of its shares, that company has to prepare a statement in a prescribed format and submit it to the Registrar of Companies for registration. It is required to be signed by all those persons whose names have been given in the prospectus as directors or proposed directors.

2. Receipt of Minimum Subscription- No public company will allot shares till then. until the ‘minimum subscription amount’ mentioned in the prospectus is It doesn’t happen. The company issuing the prospectus has to receive an amount equal to 90% of the total issue price of its public issue as minimum subscription as per SEBI guidelines.

3. Minimum subscription amount to be received in cash – Minimum subscription amount must be received in cash. If it is received in any other form such as property, share etc., then it will not contribute towards meeting the minimum subscription, but if money is received through payment document like cheque, bank draft, ‘stock investment’ etc., then that too will be paid in cash only. Will be considered.

4. Application amount – No public company can allot its shares unless it has received in cash at least 5% of the face value of the shares on the application of shares.

5. Applying for transaction in an inventory exchange center – A company which wishes to issue shares to the public by prospectus, shall, before such issue, make an application for permission to transact at the recognized stock exchange center in which The company intends to deal with its shares or debentures.

6. Mention in the prospectus – Every company shall also mention in its prospectus the names of the exchange centers in which that company has applied for the transaction of its shares and debentures.

7. Application money to be deposited in a scheduled bank The amount received on the application of shares of every public company shall be kept in a separate account in a scheduled bank unless-

(i) the company does not get a certificate of doing business; Or

(ii) if such certificate has been obtained, the amount of minimum subscription is not received or

(iii) Allotment of shares is not done after obtaining permission to exchange shares from the stock exchange centre.

If the above provision is contravened, every promoter, operator or other person responsible for its contravention shall be liable to a fine which may extend to fifty thousand rupees.

8. Application money deposited in a scheduled bank Application money deposited in a separate account with a scheduled bank cannot be used for any purpose other than the following purposes-

(i) for adjustment of the amount due on allotment of shares, if permission has been obtained from the Stock Exchange Center for the transaction of shares.

(ii) for refund of application money if the exchange of shares is not permitted from the stock exchange or the company is unable to allot the shares for any reason whatsoever.

9. Period for obtaining minimum subscription A company can wait for a maximum period of 30 days to receive the minimum subscription. If the minimum amount is not received even by 30th day from the date of issue of return, the application money received from the applicants should be returned within the stipulated days.

10. Penalty on allotment without registering the prospectus or officiating return If any person allots shares without registering the prospectus or officiating return, the company and every officer of the company shall be fined up to fifty thousand.

11. LIABILITY OF DIRECTORS FOR COMPENSATION If any director of the company knowingly disregards the provisions of the allotment, or willfully permits or permits to violate those provisions, that director shall be liable for any loss, damage and expenses incurred by the company and the allottee. will be responsible for its fulfillment. But legal action under this right should be taken before the expiry of two years from the date of allotment.

12. Allotment Expenses in case of non-receipt of permission from the Inventory Exchange Center – If it is mentioned in the prospectus that an application has been made to exchange the shares at a recognized Stock Exchange Center, then in such a case The allotment would be void if that stock exchange center does not permit the exchange of shares.

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