निर्णयन से आपका क्या तात्पर्य है ? निर्णयन की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

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निर्णयन का आशय एवं परिभाषा

निर्णयन से आशय निर्णय लेने या किसी निष्कर्ष पर पहुँचने, किसी बात को तय करने आदि से होता है। वर्तमान में प्रबन्धकों को कदम-कदम पर अनेक निर्णय लेने पड़ते हैं। प्रबन्धक निर्णय लेकर ही किसी कार्य को सम्पन्न कर पाते हैं, इसीलिए निर्णय लेने के कार्य को ही निर्णयन कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, “व्यवहार में कार्य करने के विभिन्न वैकल्पिक तरीके, मार्ग या ढंग होते हैं. और इन वैकल्पिक तरीकों, भागों या दंगों में से किसी सर्वोत्तम का चयन ही निर्णयन कहलाता है। ”

1. अर्नेस्ट डेल (Earnest Dale) के अनुसार, “प्रबन्धकीय निर्णयों से आशय उन निर्णयों से है जो कि सदैव सही प्रबन्धकीय क्रियाओं, जैसे-नियोजन, संगठन, कर्मचारियों की भर्ती, निर्देशन, नियन्त्रण नव-प्रवर्तन के दौरान लिये जाते हैं। ”

2. जी. एल. शेकल (G. L. Shackle) के अनुसार, “निर्णय लेना रचनात्मक मानसिक क्रिया का वह केन्द्र बिन्दु होता है जहाँ ज्ञान, विचार, भावना तथा कल्पना कार्यपूर्ति के लिये संयुक्त हो जाते हैं।

3. जार्ज आर. टैरी (George R. Terry) के अनुसार, “निर्णयन कुछ मापदण्डों पर आधारित दो या दो से अधिक सम्भावित विकल्पों में से किसी एक विकल्प का चयन है।”

4. हॉज एवं ऑमिसन (Hodge and Johnson) के अनुसार, “विभिन्न उपलब्ध विकल्पों से एक क्रिया पक्ष का चयन करना ही निर्णयन कहलाता है।”

5. कूण्ट्ज एवं ओ डोनेल (Koontz and O’Donell) के अनुसार, “निर्णयन एक कार्य को करने के विभिन्न विकल्पों में से किसी एक का वास्तविक चयन है, यह नियोजन का अन्तःकरण है।

निर्णयन प्रबन्ध का प्रमुख कार्य है।

(Decision-Making is the Main Function of Management)

वास्तव में निर्णय लेना प्रबन्ध का प्रमुख कार्य है यदि प्रबन्ध के कार्यों में से निर्णय लेने का कार्य पृथक कर दिया जाये तो निश्चय ही प्रबन्ध प्रक्रिया निर्जीव हो जायेगी। निर्णयन से आशय उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करना है। एक प्रबन्धक जो भी काम करता है, पहले उसे करने अथवा न करने के सम्बन्ध में निर्णय लेता है। निर्णय लेकर ही वह अपने अन्य कर्त्तव्यों का निष्पादन करता है। व्यवसाय में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक, सुबह से लेकर शाम तक प्रबन्ध को निर्णय ही निर्णय लेने होते हैं। किसी व्यवसाय की प्रबन्ध योजना उसके लक्ष्यों एवं नीतियों के अनुरूप लिये गये निर्णयों को प्रतीक होती है। उपक्रम के लक्ष्यों एवं नीतियों का निर्धारण करना भी स्वयं में एक निर्णय ही तो है। किसी भी प्रबन्धकीय कार्य को सम्पन्न करने के लिए प्रबन्धकों को निर्णय लेना होता है। निर्णय लेकर ही प्रबन्धक नियोजन करते हैं और समय, पूँजी एवं मानवीय प्रयत्नों की सीमाओं के अन्तर्गत उपक्रम को सफलता की ओर ले जाते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार, निर्णयन का अधिकार होना ही प्रबन्धक होने की कसौटी है। पीटर एफ. इकर के अनुसार, “एक प्रबन्धक जो कुछ भी करता है, वह निर्णयन के द्वारा ही करता है। इसी प्रकार जार्ज आर. टैरी ने कहा है कि, “निर्णयन के अभाव में प्रबन्ध के आधारभूत कार्यों का निष्पादन नहीं किया जा सकता।” व्यवसाय में प्रारम्भ से अन्त तक अनेक कार्यों के सम्बन्ध में निरन्तर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। किसी नये उद्योग की स्थापना के समय प्रवर्तकों को व्यवसाय के नाम, स्थान, प्रकृति, उद्देश्य आदि के सम्बन्ध में निर्णय लेने होते हैं, जबकि व्यवसाय के संचालन में पूँजी, उत्पादन, क्रय विक्रय, कर्मचारियों की भर्ती आदि के सम्बन्ध में निरन्तर निर्णय लिये जाते हैं। जॉन मैक्डोनाल्ड (John McDonald) के अनुसार, ‘व्यावसायिक प्रबन्ध पेशेवर निर्णय लेने वाला व्यक्ति है।” अतः स्पष्ट है कि निर्णयन प्रबन्ध का प्रमुख कार्य है।

निर्णयन की विशेषताएँ

(Characteristics of Decision-Making)

निर्णयन की प्रमुख विशेषताओं को निम्न प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं

(1) निर्णयन एक बुद्धिमत्तापूर्ण क्रिया है।

(2) निर्णयन प्रबन्ध के सभी कार्यों में समान रूप से उपयोगी है।

(3) निर्णयन प्रबन्ध के सभी स्तरों पर किया जाता है।

(4) निर्णयन के ढंग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।

(5) तर्कपूर्ण विचार-विनिमय के आधार पर ही निर्णयन प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है।

(6) निर्णयन लेने का कार्य अधिशासी वर्ग अर्थात् प्रबन्ध वर्ग द्वारा किया जाता है।

(7) निर्णयन लक्ष्य प्राप्त करने का साधन मात्र है।

(8) निर्णय धनात्मक (positive) अथवा ऋणात्मक (negative) हो सकता है अर्थात् किसी कार्य को करने के लिये निर्णय लिया जा सकता है अथवा किसी कार्य को न करने के लिये भी निर्णय लिया जा सकता है।

(9) निर्णयन द्वारा विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चयन किया जाता है।

(10) निर्णयन के लिए विवेक, ज्ञान एवं अनुभव की आवश्यकता होती है।

 

आधुनिक संगठन में निर्णय का महत्व

(Importance of Decision-Making in Modern Organisation)

 

व्यवसाय का आकार चाहे छोटा हो अथवा बड़ा, प्रबन्धकों को समय-समय पर परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने पड़ते हैं। प्रबन्ध के क्षेत्र में निर्णयों का विशेष महत्व है। जॉन मैक्डोनल्ड (John Me Donald) ने कहा है कि “व्यावसायिक प्रबन्धक पेशेवर निर्णय लेने वाला व्यक्ति है।” निर्णयन के महत्व के सम्बन्ध में पीटर एफ. ड्रकर (Peter F. Drucker) ने कहा है कि प्रबन्ध की प्रत्येक क्रिया निर्णयन पर आधारित होती है। इसी प्रकार प्रो. आर. एस. डावर (R. S. Davar) ने कहा है कि, “एक मनुष्य का जीवन सतत् निर्णय लेने की क्रिया है।” यह कथन सिद्ध करता है कि किसी भी उपक्रम के लक्ष्यों व नीतियों का निर्धारण भी निर्णयों पर ही आधारित होता है। अतः व्यवसाय प्रबन्ध में निर्णय लेने को एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य समझा जाता है। आधुनिक संगठन में निर्णयन के महत्व को हम निम्न तथ्यों द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं

(1) व्यावसायिक नीतियों के निर्माण में सहायक-व्यावसायिक नीतियों के निर्धारण में निर्णयद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उत्पादन की मात्रा निर्धारित करने, कच्चे माल का क्रय करने, मजदूरी अथवा मशीन से उत्पादन करने, लाभ को बढ़ाने, उत्पादन कार्य को चालू रखने अथवा बन्द करने, विक्रय मार्ग का चुनाव करने आदि के सम्बन्ध में नीतियाँ निर्धारित करनी पड़ती हैं और उनके आधार पर निर्णय लेने पड़ते हैं। उचित निर्णय के अभाव में सही नीतियाँ कदापि निर्धारित नहीं की जा सकती है। वास्तव में व्यावसायिक नीतियों के निर्धारण में उचित निर्णय विशिष्ट भूमिका का अदा करते हैं।

 

(2) प्रबन्धकीय कार्यों का कुशल निष्पादन-प्रबन्ध के प्रमुख कार्यों, जैसे-संगठन, नियोजन, नियन्त्रण, निर्देशन, समन्वय आदि को सफलतापूर्वक निष्पादित करने के लिए निर्णय लेना आवश्यक हो जाता है। निर्णय के अभाव में प्रबन्ध का एक भी कार्य पूरा नहीं हो सकता। टैरी ने इस सम्बन्ध में कहा है, “निर्णयन के बिना प्रबन्ध के आधारभूत कार्यों का निष्पादन नहीं किया जा सकता।”

 

(3) कुशलता तथा अकुशलता मापने का आधार-जो प्रबन्धक योग्य एवं कुशल होते हैं उनके निर्णय सटीक तथा समस्याओं की कसौटी पर खरे उतरते हैं। यदि प्रबन्धकों के निर्णय ठीक नहीं होते तो उपक्रम को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। प्रबन्धकों को अपने जीवन में प्रत्येक कदम पर निर्णय लेने पड़ते हैं। इस प्रकार निर्णय प्रबन्धकों की कुशलता अथवा अकुशलता मापने का एक महत्वपूर्ण आधार है।

(4) निर्णयन प्रबन्धकीय कार्यों का आधार है-प्रबन्ध में निर्णय पग-पग पर लेना पड़ता है। दिना निर्णयन के कोई भी प्रबन्ध आगे नहीं बढ़ सकता है। प्रबन्ध के प्रत्येक कार्य, जैसे- नियोजन, संगठन, निर्देशन, समन्वय आदि सभी में निर्णयन की आवश्यकता पड़ती है, इसीलिये निर्णयन को प्रबन्ध की आत्मा कहा गया है।

 

(5) व्यवसाय का कुशल संचालन व्यवसाय में कुशल संचालन के लिए निर्णय एक आधारभूत कार्य होता है। प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को अपनी स्थिति तथा परिस्थितियों के अनुसार कुशलतम संचालन के लिए प्रबन्धकीय निर्णय पूर्णतः जिम्मेदार होते हैं। इसी के द्वारा संस्था के कर्मचारियों तथा प्रबन्धक वर्ग के मध्य वांछित सम्बन्ध बनाये जा सकते हैं। व्यावसायिक संस्था में अनेक प्रकार के कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। यदि निर्णय लेने में किसी प्रकार की देरी हो जाती है तो कार्य को समय पर पूरा करना कठिन होता है।

(6) निर्णयन की व्यापकता-यद्यपि प्रबन्धशास्त्रियों द्वारा अभी तक निर्णयन को प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण कार्य नहीं माना गया है, परन्तु फिर भी अन्य सभी कार्यों का संचालन निर्णयन पर निर्भर करता है। व्यवसाय में ही नहीं, मनुष्य को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भी तत्पर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। पीटर एफ. ड्रकर के शब्दों में, “एक प्रबन्धक जो कुछ भी क्रिया करता है, वह निर्णय द्वारा ही करता है।” एक कम्पनी के प्रवर्तन से लेकर कम्पनी के समापन तक हर समय निर्णय लेने पड़ते हैं। अतः कहा जा सकता है कि निर्णयन का क्षेत्र अत्यन्त ही व्यापक है।

(7) तकनीकी परिवर्तन एवं जटिलता का सामना-वर्तमान युग में दिन-प्रतिदिन नवीन तकनीकी का विकास होता जा रहा है। निरन्तर होने वाले परिवर्तनों तथा प्रबन्धकीय जटिलताओं के कारण भी इसका महत्व बढ़ गया है। एक संस्था में लिये गए निर्णय परिस्थितियों के अनुकूल होते हैं। बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप ही कार्य करने के लिए निर्णय लिये जाते हैं।

(8) अच्छे औद्योगिक सम्बन्धों को कायम करने में सहायता-अगर प्रबन्धक निर्णय विवेकपूर्ण ढंग से लें तो संस्था के उपलब्ध साधनों का सदुपयोग होता है और इससे अच्छे औद्योगिक सम्बन्धों को कायम करने में मदद मिलती है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जिस प्रकार मनुष्य को जीने के लिए हवा, पानी की आवश्यकता हर समय होती है, ठीक उसी प्रकार प्रबन्ध को जीवित रखने के लिए निर्णयन की सदैव आवश्यकता होती है। प्रबन्ध का कोई भी कार्य क्यों न हो, उसमें निर्णयन का सहारा लिया जाता है।

निर्णयन की प्रकृति

(Nature of Decision-making)

निर्णय प्रक्रिया के अन्तर्गत पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये अनेक विकल्पों में से किसी एक सर्वश्रेष्ठ विकल्प चुनने की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है। निर्णय प्रायः किसी नीति, नियम, आदेश अथवा निर्देश के रूप में व्यक्त होता है। कभी-कभी निर्णय किसी समस्या पर विचार न करने या देरी से विचार करने के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है। निर्णयन की प्रकृति के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं

(1) निरन्तरता की प्रक्रिया (Process of Continuity)- प्रत्येक भूत, वर्तमान एवं भावी घटनायें किसी न किसी रूप में निर्णय को अवश्य प्रभावित करती हैं। भूतकाल में कोई समस्या उदय होती है, वर्तमान समय में उस समस्या के समाधान के लिये वैकल्पिक विधियों पर विचार किया जाता है और सर्वोत्तम विधि का चयन निर्णय से अन्य निर्णयों का जन्म होता है। इसलिये कहा जा सकता है निर्णयन निरन्तरता की प्रक्रिया है।

(2) वचनबद्धता (Commitment)-निर्णय लेने के पश्चात् निर्णयकर्त्ता वचनबद्ध हो जाता है और उसे अपने निर्णय के अनुसार ही समस्त नियोजन कार्य सम्पन्न करना पड़ता है तथा समस्त व्यावसायिक क्रियायें भी उसी निर्णय के अनुरूप ही सम्पन्न की जाती हैं।

(3) मूल्यांकन (Evaluation)-निर्णयन की प्रक्रिया में लिये गये निर्णयों का मूल्यांकन करना नितान्त आवश्यक है क्योंकि निर्णय के परिणाम का मूल्यांकन करके अपेक्षित परिणामों से उसकी तुलना की जाती है और निर्णय की सार्थकता का पता लगाया जाता है।

(4) मूल्यांकन (Evaluation)-अनेक निर्णय इस प्रकार के होते हैं जिनके कारण कभी-कभी नये-नये निर्णय लेने पड़ते हैं। कभी-कभी पहले लिये गये निर्णयों की कमियों को दूर करने के लिये नये निर्णय लेने पड़ते हैं।

(5) विवेकपूर्णता (Rationality)- निर्णयन की प्रक्रिया एक मानसिक प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत निर्णयकर्त्ता को विवेकपूर्ण ढंग से विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चयन करना होता है और यह कार्य केवल मनुष्य के द्वारा ही सम्पन्न किया जा सकता है।

शीघ्र एवं सही निर्णय लेने की प्रक्रिया

(Process of Early and Correct Decision-making)

व्यावसायिक प्रबन्धक किसी समस्या के सम्बन्ध में सही एवं शीघ्र निर्णय लेने हेतु अग्र प्रक्रिया अपनाते हैं

(1) समस्या को परिभाषित करना-निर्णय लेने की वैज्ञानिक पद्धति के अन्तर्गत सबसे पहला कार्य समस्या को स्पष्ट करना होता है क्योंकि किसी भी बीमारी का इलाज उसी समय सम्भव है जबकि बीमारी का ठीक-ठाक पता लग जाए। यदि व्यावसायिक क्षेत्र में भी समस्या का स्पष्टीकरण किये बिना ही उसको दूर करने के उपाय अपनाये जाते हैं तो संस्था को इसका लाभ न हो सकेगा। उदाहरण के लिए, उत्पादन में कमी होने का कारण कच्चे माल की कमी अथवा मशीनों की गड़बड़ी कहा जा सकता है, परन्तु केवल इसी अनुमान के आधार पर उत्पादन बढ़ाने के प्रयत्न केवल अटकलबाजी के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं कहे जा सकते क्योंकि उत्पादन घटने के पीछे केवल यही दो कारण नहीं, अपितु कर्मचारियों की कार्य क्षमता में कमी अथवा प्रबन्धकीय नियन्त्रण की कमी भी हो सकती है। अतः निर्णय लेने की वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार सबसे पहले समस्या के सही रूप को समझना आवश्यक होता है तभी उसके सम्बन्ध में कोई निर्णय लिया जाना सम्भव है।

(2) समस्या का विश्लेषण करना समस्या को सही रूप से निर्धारित करने के बाद उसका गहन विश्लेषण किया जाता है। इस विश्लेषण के अन्तर्गत समस्या की प्रकृति, उसके कारण एवं उनके उत्तरदायी व्यक्तियों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त की जाती है। व्यावसायिक रूप में समस्या के गहन विश्लेषण में उससे सम्बन्धित तथ्यों की जानकारी प्राप्त करना बड़ा कठिन होता है। अतः जो तथ्य उपलब्ध न हों उनके सम्बन्ध में अनुमानित सूचनाओं से ही कार्य चलाना पड़ता है। समस्या के विश्लेषण द्वारा सर्वश्रेष्ठ निर्णयों तक पहुँचने में प्रबन्धकों को बड़ी आसानी हो जाती है, क्योंकि उन्हें अपना ध्यान समस्याओं के केवल उन्ही बिन्दुओं पर केन्द्रित करना होता है जहाँ सुधार की आवश्यकता है।

(3) विभिन्न वैकल्पिक हलों पर विचार करना किसी समस्या के निदान के लिए विभिन्न विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। व्यावसायिक प्रबन्धक सभी सम्भावित विकल्पों के सम्बन्ध में विचार करते हैं, जैसे-यदि संस्था में उत्पादन की मात्रा निरन्तर घटती जा रही हो और इसका कारण कर्मचारी प्रशिक्षण की कमी हो तो इसके लिए निम्नलिखित विकल्पों पर विचार किया जा सकता है–(i) वर्तमान कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना, (ii) नये प्रशिक्षित कर्मचारियों की नियुक्ति करना तथा पुराने कर्मचारियों को हटा देना, (iii) ऐसी स्वचालित मशीनों की स्थापना करना जिनमें कम कर्मचारियों की आवश्यकता पड़े। अन्तिम निर्णय लेने से पूर्व इन सभी विकल्पों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए क्योंकि ये विकल्प ही सही निर्णय लेने की भूमिका तैयार करते हैं।

(4) सीमित करने वाले घटकों का सिद्धान्त अपनाना-जहाँ किसी समस्या के सभी विकल्पों के हलों पर विचार किया जाना व्यावहारिक न हो, वहाँ इस सिद्धान्त की सहायता द्वारा केवल महत्वपूर्ण घटकों पर ही ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी समस्या के मूल घटकों पर ही प्रबन्ध अपना ध्यान केन्द्रित करता है तथा अनावश्यक एवं कम महत्वपूर्ण घटकों को छोड़ दिया जाता है।

(5) सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव करना विभिन्न विकल्पों पर विचार करने के पश्चात् सर्वश्रेष्ठ विकल्पों का चुनाव करने के लिए उनका तुलनात्मक मूल्यांकन किया जाता है, जिसमें निम्नलिखित तथ्य आँके जाते हैं

(i) प्रत्येक सम्भावित हल द्वारा प्राप्त होने वाले लाभ एवं हानियों का मूल्यांकन, (ii) प्रत्येक विकल्प में लगने वाले प्रयत्नों की मात्रा, (iii) वर्तमान परिस्थितियों में प्रत्येक विकल्प की उपयुक्तता आदि।

(6) निर्णय को कार्यान्वित करना-निर्णय लेने के पश्चात् उसे कार्य रूप प्रदान करना आवश्यक होता है। इसके लिए उन सभी व्यक्तियों के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है जो इसके कार्यान्वयन में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेते हैं। अतः सभी सम्बन्धित व्यक्तियों को निर्णय की सूचना समय दी जानी चाहिए तथा उनकी स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। वे उसे अपना ही निर्णय मझकर सफल बनाने में टीम भावना के साथ कार्य करें।

(7) निर्णय में सुधार करना-प्रबन्ध द्वारा लिये गये निर्णय पूर्ण रूप से सही हो, यह आवश्यक नहीं। इसमें समय एवं परिस्थितियों के अनुसार सुधार की आवश्यकता भी पड़ सकती है। अतः निर्णयों में रह जाने वाली त्रुटियाँ अथवा समय एवं परिस्थिति में आने वाले परिवर्तनों के कारण निर्णयों में सुधार के लिए भी प्रयत्नशील रहना चाहिए।

निर्णयों के प्रकार

(Types of Decisions)

निर्णयों के विभिन्न प्रकारों को निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है

(1) नैत्यिक एवं महत्वपूर्ण निर्णय (Routine and Important Decision)-वे निर्णय जिनके बारे में कम सोच-विचार किया जाता है एवं जो व्यवसाय की सामान्य प्रकृति में बार-बार लिए जाते हैं, नैत्यिक या सामान्य निर्णय कहलाते हैं। व्यवसाय में अधिकांश निर्णय नैत्यिक निर्णय ही होते हैं। मैत्यिक निर्णय क्रियाशील प्रबन्धकों द्वारा लिए जाते हैं। ऐसे निर्णयों को लेने के लिए अतिरिक्त विवेक, विश्लेषण एवं अधिकार की आवश्यकता नहीं होती है। इसके विपरीत आधारभूत या महत्वपूर्ण मामलों के सम्बन्ध में लिये जाने वाले निर्णयों को महत्वपूर्ण निर्णय कहते हैं। इस प्रकार के निर्णयों को लेने के लिए गहन अध्ययन, विश्लेषण एवं विस्तृत अधिकार की आवश्यकता होती है। महत्वपूर्ण निर्णय प्रायः उच्च प्रबन्ध द्वारा लिए जाते हैं।

(2) उपक्रम एवं विभागीय निर्णय (Enterprise and Departmental Decision)-उपक्रम के निर्णय से आशय ऐसे निर्णयों से है जो उसके उच्च प्रबन्ध द्वारा लिए जाते हैं जिनका सम्पूर्ण उपक्रम पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। इन निर्णयों का अनुकरण उपक्रम के सभी कर्मचारियों एवं विभागों को करना पड़ता है। इसके विपरीत सम्बन्धित विभागीय प्रबन्धक द्वारा अपने विभाग के कार्यकलापों के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय विभागीय निर्णय कहलाता है।

(3) एकाकी एवं सामूहिक निर्णय (Individual and Group Decision) एकाकी निर्णय किसी व्यक्ति या अधिकारी द्वारा लिए जाते हैं। जब व्यवसाय का आकार छोटा होता है एवं उस पर एक ही व्यक्ति का स्वामित्व एवं नियन्त्रण होता है, ऐसे व्यवसाय के स्वामी द्वारा लिए गये निर्णय एकाकी निर्णय कहलाते हैं। इसके विपरीत सामूहिक निर्णय वे निर्णय होते हैं जो किसी समूह द्वारा लिए जाते है। सामूहिक निर्णय समितियों की सभाओं, सेमिनारों, संचालक मण्डलों, कार्यदलों द्वारा लिए जाते हैं। ऐसे निर्णय बड़ी-बड़ी संस्थाओं में ही लिए जाते हैं।

(4) निपुण एवं व्यूह रचना निर्णय (Tactical and Strategic Decisions)-निपुण निर्णय वे निर्णय हैं जो सरलता से किन्तु अनुभव के आधार पर लिए जाते हैं। निपुण निर्णय सामान्य प्रकृति के होते हैं। इसके विपरीत व्यूह रचना सम्बन्धी निर्णय वे होते हैं जो अपनी प्रतियोगी संस्थाओं को मात देने के लिए गुप्त रूप से लिए जाते हैं। व्यूह रचना सम्बन्धी निर्णय लेना काफी कठिन होता है, ये सम्पूर्ण संस्था से सम्बन्धित होते हैं तथा इस प्रकार के निर्णय संस्था के भविष्य को प्रभावित करते हैं।

(5) अनौपचारिक एवं नियोजित निर्णय (Informal and Planned Decision)- अनौपचारिक निर्णय वे निर्णय होते हैं जिनके लिए कोई अधिकारिक योजना नहीं होती है। इस प्रकार के निर्णय विशिष्ट अवसर पर तत्काल लिये जाते हैं। इस प्रकार के निर्णयों में परिशुद्धता पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। इसके विपरीत, नियोजित निर्णय वे होते हैं जो किसी निश्चित योजना पर आधारित होते हैं अर्थात् ये ठोस तथ्यों पर आधारित होते हैं। इस प्रकार के निर्णयों को लेने में पूर्ण औपचारिकता बरती जाती है।

निर्णयन के सिद्धान्त

(Principles of Decision Making)

निर्णयन प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसे प्रभावी एवं स्पष्ट बनाने के लिए विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। इसके प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं

(1) व्यवहार का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार कोई भी कर्मचारी पहले मानव है और मानव होने के नाते वह सामान्यतः उचित प्रकार से व्यवहार करता है तथा वह आशा करता है कि अन्य व्यक्ति भी उससे मानवतापूर्ण व्यवहार करेंगे। अतः प्रबन्धकों को निर्णय लेते समय मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाकर समस्या का समाधान इस प्रकार करना चाहिए जिससे कि उसके द्वारा लिये गये निर्णय की कोई भयंकर प्रतिक्रिया न हो। उसके समस्त निर्णय उचित मानवीय व्यवहार के सिद्धान्त पर आधारित होने चाहिए।

(2) आनुपातिकता का सिद्धान्त यह सिद्धान्त विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प के चयन में मदद करता है। इसके अनुसार निर्णय लेते समय उपक्रम में प्रत्येक उपलब्ध साधन का आनुपातिक प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे कम लागत पर अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सके।

(3) व्यक्तिगत स्वार्थ का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार प्रबन्धकों को निर्णय लेते समय कर्मचारियों के व्यक्तिगत स्वार्थ, उद्देश्यों व हितों का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के स्वार्थ को दो भागों में-(1) आर्थिक स्वार्थ, (ii) अनार्थिक स्वार्थ में बाँटा जा सकता है। इन दोनों प्रकार के हितों में व्यक्ति सर्वप्रथम उस उद्देश्य की पूर्ति चाहता है जिससे उसे अधिकतम सन्तोष मिले।

(4) पहचान का सिद्धान्त-कभी-कभी एक ही उद्देश्य या समस्या का रूप समय के साथ-साथ परिवर्तित हो जाता है और अलग-अलग प्रबन्धक एक ही समस्या को भिन्न-भिन्न तरीके से देखते हैं इसलिए यह आवश्यक है कि निर्णयन से पूर्व समय चक्र में परिवर्तन तथा अन्य प्रबन्धकों के दृष्टिकोण विचार किया जाये।

(5) जोखिम एवं अनिश्चितता का सिद्धान्त निश्चित दशाओं में निर्णय लेना अपेक्षाकृत आसान होता है, किन्तु अनिश्चित दशाओं में निर्णय लेना भविष्य की अनिश्चिताओं के कारण कठिन होता है। इसीलिए प्रबन्ध विशेषज्ञ अनिश्चित दशाओं में निर्णय लेने में सांख्यिकी विधि सम्भावनाओं के सिद्धान्त का प्रयोग करना उचित मानते हैं।

(6) गतिशीलता का सिद्धान्त-हम अच्छी तरह से जानते हैं कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। किसी भी उपक्रम को भीतरी व बाहरी वातावरण प्रभावित करते हैं। परिवर्तन आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक सभी क्षेत्रों में होते हैं और इन परिवर्तनशील परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही निर्णय लेना चाहिए ताकि संस्था पर अनुकूल प्रभाव पड़े।

(7) सीमित घटकों का सिद्धान्त निर्णय लेने के पूर्व प्रबन्धक को विभिन्न विकल्पों के सम्बन्ध में विचार करना होता है और तत्सम्बन्धी निषेधक या सीमित घटक को पहचानना होता है। निषेधक या सीमित घटक वह है जो कि इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करता है। अतः निर्णय लेते समय प्रबन्धक को इन सीमित साधनों अथवा घटकों को ध्यान में रखना चाहिए।

(8) समय का सिद्धान्त इसका आशय है कि प्रबन्ध के समस्त कार्य (नियोजन, संगठन, नियन्त्रण आदि) समय पर किये जाने चाहिए। उचित समय पर निर्णय न लेने से अवसर हाथ से जा सकते हैं और लाभांशों से वंचित रहना पड़ सकता है |

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