वैश्वीकरण के दौर में सभी संस्कृतियाँ एक-दूसरे को किस तरह प्रभावित कर रही है? How are all cultures affecting each other in the era of globalization?

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संस्कृति समाजव्यापी होती है। संस्कृति समाज के हर पक्ष को छूती है। समाज में होने वाली विभिन्न अन्तःक्रियाओं के अंचल एक-दूसरे से आबद्ध होते हैं। संस्कृति ही उन्हें जोड़ती है और समाज और राष्ट्र को एकता प्रदान करती है।

संस्कृति समाज की अर्थव्यवस्था, सामाजिक संगठन, राजतन्त्र, धर्म और अन्धविश्वास, साहित्य और कला आदि विभिन्न पक्षों का कुल योग ही नहीं होती वह इन विभिन्न पक्षों को एक-दूसरे के साथ जिस प्रकार से गूँथती और एकत्र करती है उससे ही समाज की विशिष्ट छवि उभरकर आती है यही कारण है कि समाज की जनसंख्या में वृद्धि होती है तो उसका प्रभाव अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है और शिक्षा व्यवस्था पर भी यदि अप्रवासियों की संख्या बढ़ती है उसका प्रभाव न केवल शहरी विकास पर पड़ता है वरन उस समुदाय की भाषा, रहन-सहन, भोजन की पसन्द आदि पर भी पड़ता है। यह अप्रवास का ही प्रतिफल है कि आज हमारे देश में कई धर्मों के मानने वाले लोग हैं। एक राष्ट्रभाषा होते हुए भी कई भाषाओं के बोलने वाले लोग हैं, भोजन के व्यंजनों में इतनी विविधता पाई जाती है और कई प्रादेशिक और अन्तर्राष्ट्रीय पसन्दीदा व्यंजन अखिल भारतीय होते जा रहे हैं। दक्षिण भारत में परम्परागत खाये जाने वाले डोसा इडली-साँभर को चाव से खाने वाले लोगों की संख्या उत्तर भारत में बढ़ रही है। यही हाल तब्दूर में पकने वाले मूल रूप से पंजाबी व्यंजनों का है। तब्दूरी रोटी और तन्दूरी चिकन दक्षिण भारत में भी लोकप्रिय है और विदेशों में भारतीय रेस्तराओं की विशेषता बन गये हैं। इतालवी वित्सा और स्पेग्हेटी का प्रचलन भी भारत में बढ़ रहा है। मेक्डोनाल्ड केन्टकी फ्राइड चिकन, कोका कोला अब भारत में रहने वालों की भी पसन्द बन गये हैं। इन नयी चीजों के स्वीकार से ये भी परिवर्तन भारतीय संस्कृति के अंग बनते जा रहे हैं।

संस्कृति को जब हम उसके व्यापक अर्थ में एक सम्बोधन के रूप में प्रयोग करते हैं तो हमारा परिप्रेक्ष्य समाज वैज्ञानिक हो जाता है। इस दृष्टि से संस्कृति को धर्म का पर्याय नहीं गिना जा सकता। अन्य पक्षों की भाँति धर्म भी संस्कृति का एक अंग मात्र है। बहुधर्मी समाजों की संस्कृति समन्वित संस्कृति होती है। जब हम संस्कृति बहुल समाज की बात करते हैं तब हमारा अभिप्राय होता है ऐसी संस्कृति से जो अनेक उप-संस्कृतियों का संगम होती है। उप-संस्कृतियों के समागम और बाहर की संस्कृतियों से आयातित तत्वों के समागम की सम्मिलित प्रक्रिया से ही संस्कृतियाँ विषयम स्वरूप धारण कर लेती हैं। वैश्वीकरण के आज के दौर में यह प्रक्रिया संसार की सभी संस्कृतियों को प्रभावित कर रही है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि परिवर्तनों के पर्यावरण में पहचान बनाये रखने की क्षमता ही संस्कृति को समुत्थान शक्ति प्रदान करती है, उन्हें लचीला बनाती है। जो संस्कृतियाँ परिवर्तन का स्वागत नहीं करतीं वे टूट जाती हैं। उनमें प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। प्रगति और परिवर्तन के स्रोत आभ्यांतरित भी होते हैं और बाह्य भी समाज के सदस्य भी परिवर्तन में योग देते हैं और बाहरी समाजों से भी परिवर्तन की प्रेरणाएँ मिलती हैं। समाजों के आपसी सम्पर्क बढ़ने से उनमें बहुलता आने लगती है। बाहर से आकर बसे लोग धीरे-धीरे अपने नये परिवेश के अनुकूल ढल जाते हैं और अपने देश की संस्कृति के कई तत्वों को ग्रहण कर लेते हैं। इस प्रकार इन लोगों की जीवन-विधि का जो स्वरूप निखरता है उसमें अपने पूर्वज, समाज और पोषण समाज की संस्कृतियों का अद्भुत मिश्रण होता है।


Culture is social. Culture touches every aspect of the society. The zones of various interactions taking place in the society are bound to each other. Culture connects them and provides unity to society and nation.

Culture is not only the sum total of various aspects of society, social organization, monarchy, religion and superstition, literature and art etc. It emerges, this is the reason that if the population of the society increases, then it also affects the economy and if the number of migrants increases on the education system, it not only affects the urban development but also the language, living and living of that community. It also affects tolerance, choice of food, etc. It is the result of immigration that today there are people of many religions in our country. Despite being a national language, there are people speaking many languages, so much diversity is found in the cuisines of food and many regional and international favorite dishes are becoming pan-India. The number of people who eat traditional dosa idli-sambar in South India with fervor is increasing in North India. Same is the case with the originally Punjabi cuisine cooked in Tabur. Tabdoori roti and tandoori chicken are also popular in South India and have become a specialty of Indian restaurants abroad. The popularity of Italian Vitsas and Spaghetti is also increasing in India. McDonald’s Kentucky Fried Chicken, Coca Cola have now become the favorite of the people living in India too. With the acceptance of these new things, these changes are also becoming a part of Indian culture.

When we use culture as an address in its broadest sense, then our perspective becomes social scientific. From this point of view, culture cannot be considered synonymous with religion. Like other aspects, religion is also a part of culture. The culture of multi-religious societies is an integrated culture. When we talk of a culture-dominated society, we mean a culture that is the amalgamation of many sub-cultures. Cultures take on a thematic form only through the combined process of mingling of sub-cultures and elements imported from outside cultures. In today’s era of globalization, this process is affecting all the cultures of the world.

Thus we see that it is the ability to maintain identity in the environment of changes that gives the culture the resilience, makes them resilient. Cultures that do not welcome change tend to crumble. The path of progress gets blocked in them. The sources of progress and change are also internal and external also the members of the society also contribute in the change and the inspirations of change also come from the external societies. With the increase in the interaction of societies, plurality starts coming in them. The people who come from outside gradually adapt to their new environment and absorb many elements of the culture of their country. In this way, the way of life of these people flourishes, there is a wonderful mixture of the cultures of their ancestors, society and nurture society.

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