संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों ने रस को परिभाषित किया है। भरत मनि ने अपनी कृति ‘नाट्यशास्त्र’ में सर्वप्रथम ‘रस’ का उल्लेख किया।

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संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों ने रस को परिभाषित किया है। भरत मनि ने अपनी कृति ‘नाट्यशास्त्र’ में सर्वप्रथम ‘रस’ का उल्लेख किया। उनके अनुसार-विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव के संयोग से ‘रस’ की निष्पत्ति होती है। मम्मट ने इस सूत्र की व्याख्या करते हुए लिखा है कि आलम्बन विभाव से उद्बुद्ध, उद्दीपन से उद्दीप्त, व्यभिचारी भाव से परिपुष्ट तथा अनुभाव से लेपित अभिव्यक्ति से जो चेतना उत्पन्न होती है, उसे ‘रस-दशा’ कहते हैं। यह स्थायी भाव होता है। भरत मुनि ने ‘रस निष्पत्ति’ के लिए नाना भावों के उत्पन्न होने को उत्तरदायी माना है जिसका अर्थ है कि विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव स्थायी भाव के निकट आकर अनुकूलता ग्रहण करते हैं।

विभाव जो व्यक्ति, पदार्थ या बाह्य विकार किसी अन्य व्यक्ति में भावोद्रेक उत्पन्न करता है, उन कारणों को ‘विभाव’ कहा जाता है। विभाव दो प्रकार के होते हैं—आलम्बन तथा उद्दीपन, सूर की गोपियों का आकर्षण कृष्ण के प्रति है। यहाँ कृष्ण आलम्बन विभाव है। कृष्ण मुरली बजाकर आकर्षित करते हैं। मुरली उद्दीपन विभाव के रूप में हैं।

अनुभाव आलम्बन और उद्दीपन विभावों के कारण उत्पन्न होने वाले भावों को प्रकाशित करने वाली प्रक्रिया ‘अनुभाव’ कहलाती है। गोपियों के आकर्षण के साथ संकेत करना, लज्जित होना, कटाक्ष करना आदि ‘अनुभाव’ की श्रेणी में आता है।

व्यभिचारी (संचारी भाव) व्यभिचारी अथवा संचारी भाव स्थायी भावों के लिए सहायक होते हैं। आचार्य भरत ने संचारी भाव में (1) देशकाल अ तथा अवस्था (2) उत्तम, मध्यम तथा अघम प्रकृति के लोग (3) वातावरण के प्रभाव तथा (4) स्त्री, पुरुष के स्वभाव में भेद से जो भाव उत्पन्न होते हैं वे संचारी भाव है। स्थ