कम्पनी के ऋण प्राप्त करने के अधिकारों के सम्बन्ध में कानूनी प्रावधान बतलाइए। State the legal provisions regarding the rights of the company to get loans.

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कम्पनी के ऋण लेने के अधिकार (Borrowing Powers of the Company)

प्रत्येक कम्पनी को अपने व्यापार के लिए धन उधार लेने तथा अपनी सम्पत्ति को जमानत के रूप में रखने का गर्भित अधिकार होता है। कम्पनी अपने पार्षद सीमानियम अथवा अन्तर्नियम में वर्णित नियमों के अधीन ही धन उधार लेने के अधिकार का प्रयोग कर सकती है। कम्पनी के संचालक पार्षद सीमानियम व अन्तनियम द्वारा निर्धारित सीमाओं के अन्दर ही ऋण ले सकते हैं अर्थात् कम्पनी के पार्षद सीमानियम एवं पार्षद अन्तर्नियम एक सीमा तक ऋण लेने के लिए संचालकों को अधिकार प्रदान करता है और उससे अधिक ऋण लेने के लिए कम्पनी की व्यापक सभा में सहमति लेना आवश्यक होता है।

ऋण लेने की विधियाँ/ साधन (Methods/Modes of Borrowing)

कम्पनियाँ अपने सीमानियम एवं अन्तर्नियमों में उल्लिखित सीमाओं में ऋण लेने का अधिकार रखती हैं। कम्पनियाँ इन प्रलेखों में ऋण लेने तथा जमानत रखने योग्य सम्पत्तियों का भी स्पष्ट वर्णन कर देती हैं। कम्पनियाँ सामान्यतः अग्रलिखित विधियों से ऋण प्राप्त कर सकती हैं–

(i) बैंक अधिविकर्ष द्वारा।

(ii) विनिमय साध्य विलेखों जैसे विनियम विपत्रों, प्रतिज्ञापत्रों आदि के आधार पर।

(iii) सम्पत्तियों को गिरवी या बन्धक रखकर |

(iv) वाणिज्यिक पत्र (Commercial paper) जारी करके।

(v) अयाचित पूँजी पर प्रभार उत्पन्न करके |

(vi) पुस्तकीय ऋणों पर प्रभार उत्पन्न करके।

(vii) पेटेन्ट अधिकार, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट आदि पर प्रभार उत्पन्न करके।

(viii) ऋणपत्रों के निर्गमन द्वारा।

(ix) सार्वजनिक जमाएँ आमन्त्रित करके।

(x) बैंकों से नकद उधार प्राप्त करके |

ऋण लेने के अधिकार सम्बन्धी प्रावधान (Provisions Regarding Right of Borrowing)

कम्पनियों को ऋण लेने का अधिकार होता है किन्तु उनकी भी कुछ सीमाएँ है। उन पर कुछ प्रतिबन्ध हैं। ये सीमाएँ एवं प्रतिबन्ध कम्पनी अधिनियम एवं न्यायालय द्वारा निर्णीत मामलों के आधार पर निर्धारित हैं। इनको निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है–

(1) व्यापारिक कम्पनियों को गर्मित अधिकार प्रत्येक व्यापारिक कम्पनी को ऋण प्राप्त करने का गर्मित अधिकार होता है, चाहे उसके सीमानियम एवं अन्तनियमों में स्पष्ट अधिकार न दिया गया हो। ऐसी कम्पनियों अपने मूल एवं सहायक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ऋण प्राप्त करने का गर्भित अधिकार रखती है। यदि अन्तर्नियमों या सीमानियम के अन्तर्गत संचालकों के इस अधिकार पर निषेध लगा दिया हो तो संचालक मण्डल ऋण प्राप्त करने के अधिकार का उपयोग नहीं कर सकते हैं।

(2) गैर व्यापारिक कम्पनियों को ऋण लेने का गर्भित अधिकार नहीं गैर व्यापारिक कम्पनियाँ वे होती है जिनका उद्देश्य धर्म, कला, वाणिज्य, विज्ञान आदि के विकास के लिए कार्य करना तथा प्राप्त लाभों को उन्हीं उद्देश्यों के लिए खर्च करना होता है। ऐसी कम्पनियाँ तब तक धन उधार नहीं ले सकती है जब तक कि इनके सीमानियम तथा अन्तर्नियमों द्वारा इन्हें धन उधार लेने का स्पष्ट अधिकार न दिया गया हो।

(3) व्यापार प्रारम्भ करने का अधिकार प्राप्त होने से पूर्व ऋण नहीं- एक सार्वजनिक कम्पनी व्यापार करने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के बाद तथा निजी कम्पनी समामेलन का प्रमाण-पत्र मिलने पर ही ऋण प्राप्त कर सकती है। किन्तु वह अंशों व ऋणपत्रों को एक साथ जनता को क्रय करने के लिए प्रस्तावित कर सकती है।

(4) पूँजी व कोषों से अधिक ऋण नहीं-एक सार्वजनिक कम्पनी व्यापक सभा की सहमति के बिना अपनी प्रदत्त पूँजी व स्वतन्त्र कोषों के कुल योग की राशि से अधिक ऋण नहीं ले सकती।

यदि ऋण ली जाने वाली राशि और पहले से ऋण ली हुई राशियों का जोड़ कम्पनी की चुकता पूंजी और स्वतन्त्र संचय के जोड़ से अधिक होता है तो इस आधिक्य के लिए कम्पनी की साधारण सभा से स्वीकृति लेना आवश्यक है। बिना इस प्रकार की स्वीकृति के इस आधिक्य की राशि का ऋण नहीं लिया जा सकता है। साथ ही इस प्रस्ताव में उस राशि का उल्लेख अवश्य होना चाहिए जिस तक संचालक मण्डल ऋण ले सकते हैं।

(5) पार्षद सीमानियम व पार्षद अन्तर्नियम के अधीन ऋण-यद्यपि कम्पनी को ऋण लेने का गर्भित अधिकार है किन्तु सीमानियम व अन्तर्नियम के नियमों के विरुद्ध कम्पनी ऋण नहीं ले सकती है और ऐसा ऋण अधिकारों के बाहर माना जायेगा।

(6) अस्थायी ऋण ऋणों में सम्मिलित नहीं-अस्थायी या अल्पकालीन ऋण या माँग पर देय जो छ माह की अवधि के भीतर देय हों, उन्हें ऋणों में सम्मिलित नहीं किया जाता है। ऐसे ऋण मिलों को भुनाकर, नकद, साख खाता खोलकर प्राप्त किये जा सकते हैं। ऐसे ऋणों का उपयोग कार्यशील पूंजी के लिए ही किया जाना चाहिए न कि पूँजीगत खर्चों की पूर्ति के लिए।

(7) ऋण प्राप्ति के अधिकार के उपयोग का समय कोई भी कम्पनी ऋण प्राप्ति के अधिकार का उपयोग तभी कर सकती है जबकि उसे व्यवसाय प्रारम्भ करने का प्रमाण पत्र प्राप्त हो गया हो। किन्तु एक निजी कम्पनी अपने समामेलन का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद से ही ऋण प्राप्त करने के अधिकार का उपयोग कर सकती है।

(8) प्रतिभूति या जमानत देने का अधिकार कम्पनी ऋण प्राप्त करने के लिए अपनी वर्तमान एवं भावी सम्पत्तियों को गिरवी या बन्धक भी रख सकती है। जमानत किन-किन सम्पत्तियों को रख जा सकता है, यह कम्पनी अन्तनियमों में उल्लेख रहता है।

अधिकारों के बाहर ऋण लेने का आशय (Meaning of Ultra Vires Borrowings)

अधिकारों के बाहर ऋण से तात्पर्य ऐसे ऋण से है जो कम्पनी के अधिकारों की सीमा के बाहर जाकर लिया गया हो। कम्पनी की ऋण प्राप्ति की अधिकार-सीमा कम्पनी अधिनियम में निर्धारित की गई है जिसे कम्पनी की साधारण सभा में प्रस्ताव पारित करके बढ़ाया जा सकता है। कम्पनी के सीमानियम एवं अन्तनियमों में व्यवस्था करके भी कम्पनी की अधिकार-सीमा को निर्धारित किया जा सकता है। इन सीमाओं के बाहर जाकर लिया गया ऋऋण अधिकारों के बाहर कहलाता है।

कई बार कम्पनी को तो ऋण प्राप्ति का अधिकार होता है किन्तु उस अधिकार को संचालकों को दिया हुआ नहीं होता है। ऐसी दशा में यदि संचालक अपने अधिकारों की सीमा के बाहर जाकर ऋण लेते हैं तो यह संचालकों के अधिकारों के बाहर ऋण कहलाता है।

अधिकारों के बाहर ऋण लेने के परिणाम (Consequences of Ultra Vires Borrowings)

यदि संचालक अधिकार सीमा के बाहर ऋण लेते हैं तो उसके निम्न परिणाम हो सकते हैं–

(1) सीमानियम के बाहर ऋण अनाधिकृत एवं व्यर्थ कम्पनी के सीमानियम की सीमा के बाहर लिये गये ऋण अनाधिकृत ऋण कहलाते हैं तथा ऐसे अनुबन्ध व्यर्थ (Void) होते हैं। परिणामस्वरूप ऐसे ऋण देने वाले व्यक्ति का कम्पनी के विरुद्ध वैधानिक एवं न्यायिक कोई अधिकार नहीं होता है। लिए ऋणदाता

(2) कम्पनी के विरुद्ध कोई वाद नही कम्पनी के अधिकारों के बाहर के ऋणों के पर कोई वाद प्रस्तुत नहीं कर सकता है।

(3) कम्पनी द्वारा दी गई जमानत प्रभावहीन- यदि कम्पनी के संचालकों ने कम्पनी के सीमानियम एवं अन्तर्नियमों के बाहर ऋण लिया है और उस ऋण के लिए कोई सम्पत्ति जमानत के रूप में रखी है तो ऋणदाता उस सम्पत्ति पर जमानती अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता है।

ऋणदाता को प्राप्त उपचार (Remedies Availables to the Lender)

कम्पनी के अधिकारों के बाहर ऋण प्रदान करने वाले ऋणदाता को कम्पनी के विरुद्ध वाद प्रस्तुत करने का अधिकार तो नहीं होता है, किन्तु ऋणदाता को निम्नलिखित उपचार प्राप्त हो सकते हैं–

(1) निषेधाज्ञा का अधिकार-यदि कम्पनी को ऋण के रूप में दी गई राशि अभी कम्पनी द्वारा खर्च नहीं की गई है तो ऋणदाता इस राशि को खर्च करने से रोकने के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकता है।

(2) ऋणदाताओं का स्थान ग्रहण करना- यदि कम्पनी ने किसी ऋणदाता से अधिकारों के बाहर लिये गये ऋण की रकम को अपने लेनदारों को भुगतान कर दी है तो ये ऋणदाता उस लेनदार का स्थान ग्रहण कर सकता है अर्थात् उस लेनदार के सारे अधिकार प्राप्त कर लेगा।

(3) पहचान होने पर सम्पत्ति की प्राप्ति-ऋणदाता को यह अधिकार है कि यदि उसके द्वारा दिये गये ऋण से ली हुई कोई सम्पत्ति पहचानी जा सकती है तो वह कम्पनी से उसे वापस ले सकता है।

(4) संचालकों के विरुद्ध कार्यवाही-अधिकारों के बाहर ऋण देने वाला ऋणदाता उन संचालको पर दावा कर सकता है, जिन्होंने अधिकारों की सीमा से बाहर ऋण लिया है।

(5) क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार-यदि कम्पनी के पार्षद सीमानियम एवं अन्तर्नियम से यह स्पष्ट नहीं होता कि संचालकों को ऋण लेने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं तो ऋणदाता संचालकों से क्षतिपूर्ति पाने का दावा कर सकता है।


Borrowing Powers of the Company

Every company has the implied right to borrow money for its business and to keep its assets as security. The company can exercise its right to borrow money only subject to the rules mentioned in its memorandum or Articles of Association. The directors of the company can take loans only within the limits prescribed by the memorandum and Articles of Association, that is, the company’s councilor memorandum and the councilor’s memorandum give the right to the operators to take loans up to a limit and to take loans beyond that, in the general assembly of the company. Consent is required.

Methods/Modes of Borrowing

Companies have the right to take loans within the limits specified in their memorandum and articles. Companies also clearly describe the assets to be taken loan and collateral in these documents. Companies can generally get loans through the following methods-

(i) By bank overdraft.

(ii) On the basis of exchangeable instruments like bills of exchange, promissory notes etc.

(iii) By mortgage or mortgage of the properties.

(iv) By issuing commercial paper.

(v) By generating a charge on the uncalled capital.

(vi) By generating charges on book loans.

(vii) By generating charge on patent rights, trademarks, copyrights etc.

(viii) by issue of debentures.

(ix) By inviting public deposits.

(x) By obtaining cash credit from banks.

Provisions Regarding Right of Borrowing

Companies have the right to take loans but they also have some limitations. There are some restrictions on them. These limits and restrictions are determined on the basis of the Companies Act and the cases decided by the Court. These can be clarified as follows-

(1) Hot rights to business companies Every business company has a hot right to get loans, even if the express rights are not given in its memorandum and articles. Such companies have the implied right to obtain loans for the fulfillment of their basic and ancillary objectives. If this right of the directors has been prohibited under the Articles or the Memorandum, then the Board of Directors cannot exercise the right to get the loan.

(2) Non-business companies do not have the implied right to take loans, non-business companies are those whose purpose is to work for the development of religion, art, commerce, science etc. and the profits obtained are to be spent for those purposes. Such companies cannot borrow money unless they have been given a clear right to borrow money by their memorandum and articles.

(3) No loan before right to commence business – A public company can get loan only after getting the certificate of doing business and the private company after getting the certificate of amalgamation. But it can offer shares and debentures together for purchase to the public.

(4) Debt not in excess of capital and funds – A public company cannot borrow more than the sum of its paid-up capital and independent funds without the consent of the general assembly.

If the sum of the loan amount and the amount already taken loan exceeds the sum of the paid-up capital and free reserves of the company, then the approval of the general meeting of the company is necessary for this excess. Without such approval, loan of this excess amount cannot be taken. Also, the proposal must mention the amount up to which the Board of Directors can take the loan.

(5) Loans under the Memorandum of Association and the Articles of Association – Although the company has the implied right to take a loan, the company cannot take a loan against the rules of the memorandum and the Articles of Association and such loan will be considered outside the rights.

(6) Temporary loans not included in loans – Temporary or short term loans or those payable on demand within a period of six months are not included in the loans. Such loans can be availed by redemption of mills, cash, opening of credit accounts. Such loans should be used for working capital only and not for meeting capital expenses.

(7) Time of exercise of the right of availing loan A company can exercise the right of availing loan only after it has received the certificate of commencement of business. But a private company can exercise its right to get loan only after obtaining its certificate of amalgamation.

(8) Right to give security or security The company can also mortgage or mortgage its present and future assets to obtain loans. Which properties can be kept as surety, it is mentioned in the articles of the company.

Meaning of Ultra Vires Borrowings

Debt outside rights means a loan taken outside the limits of the rights of the company. The limitation of the company’s debt receipt has been prescribed in the Companies Act, which can be increased by passing a resolution in the general meeting of the company. By making provision in the memorandum and articles of the company, the extent of the company’s jurisdiction can also be determined. A loan taken outside these limits is said to be out of rights.

Sometimes the company has the right to get the loan but that right is not given to the directors. In such a case if the If the borrower takes a loan outside the limits of his rights, then it is called a loan outside the rights of the operators.

Consequences of Ultra Vires Borrowings

If the operator takes a loan outside the jurisdiction, then it can have the following consequences-

(1) Loans outside the memorandum Unauthorized and void Loans taken outside the limits of the memorandum of the company are called unauthorized loans and such contracts are void. As a result, the person giving such loan has no statutory and judicial rights against the company. lender to

(2) No suit against the company Can not sue for debts outside the rights of the company.

(3) Security given by the company is ineffective – If the directors of the company have taken a loan outside the memorandum and articles of the company and have kept any property as security for that loan, then the lender cannot get the right of surety on that property. .

Remedies Available to the Lender

The lender, who provides the loan outside the rights of the company, does not have the right to file a suit against the company, but the lender can get the following remedies-

(1) Right of injunction- If the amount given as loan to the company has not yet been spent by the company, then the lender can get an injunction to stop the expenditure of this amount.

(2) Taking the place of creditors – If the company has paid the amount of debt taken out of rights from any lender to its creditors, then this creditor can take the place of that creditor i.e. get all the rights of that creditor. Will take

(3) Receipt of property on recognition – The lender has the right to take back from the company any property that is recognizable from the loan given by him.

(4) Proceedings against directors – The lender giving loan out of rights can make a claim on those operators who have taken loan outside the limits of rights.

(5) Right to get compensation – If it is not clear from the memorandum and Articles of Association of the company whether the directors have the right to take loan or not, then the lender can claim compensation from the operators.

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