संस्कृति और परम्परा में मूलभूत अन्तर क्या है ? उदाहरण सहित समझाइये। What is the fundamental difference between culture and tradition? Explain with example.

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जन्म के समय हर शिशु मात्र एक पशु स्वरूप होता है। संस्कृति उसे संस्कार देती है और वह पशु स्वरूप से परिष्कृत होकर सामाजिक प्राणी बन जाता है। संस्कृति ही उसकी भाषा, उसकी वेशभूषा, उसका भोजन और उसकी भावनाएँ एवं मूल्य निर्धारित करती हैं। इस दृष्टि से संस्कृति अधिजैविक कही जा सकती है।

यह सच है कि मानव ही संस्कृति का सृष्टा है, पर इसकी यह सृष्टि इससे हटकर अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व बना लेती है। ध्यान योग्य बात यह है कि संस्कृति की सृष्टि कोई एक व्यक्ति नहीं कर सकता न ही संस्कृति किसी एक काल-बिन्दु पर सहसा सृजित हो जाती है। संस्कृति उसके सदस्यों द्वारा निरन्तर समृद्ध होती रहती है। उसकी अपनी एक गतिमयता है। वह एक नदी की भाँति है जो अपने उद्गम से लेकर गंतव्य तक अपनी पहचान को बनाये रखती है पर मार्गों में लगातार कई चीजें पीछे छोड़ आती है और कई नई चीजें जोड़ती जाती है।

समाजशास्त्रीय अर्थों में संस्कृति समाज द्वारा सीखे हुए व्यवहार / प्रकारों की उस समग्रता का नाम है जो किसी समाज की विशिष्ट पहचान बनाती है और जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होती जाती है। व्यवहार प्रकार की ऐसी ऐतिहासिक निरन्तरता को बनाए रखने में केवल मानव ही सक्षम है। वही ऐसा प्राणी है जिसके पास चिन्तन योग्य मस्तिष्क है, स्मरण का सामर्थ्य और ध्वनि विन्यास एवं शब्द उच्चारण की अद्भुत क्षमता है। इसीलिए वह बोधगम्य प्रतीकों का निर्माण कर सकता है और अपनी वाचा एवं लेखनी के माध्यम से औरों तक पहुँचा सकता है। आने वाली पीढ़ियाँ वर्षों के संचित अनुभवों को, कार्य करने के ढंग को तथा संगीत, नृत्य, साहित्य की विधाओं को समाज के बड़े-बूढ़ों से सीखती है। लिखित समाजों में यह धरोहर पुस्तकों और दस्तावेजों में संचित होती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती रहती है जो पीढ़ियों से चला आने वाला क्रम है वही “परम्परा संज्ञा पा लेता है और उसमें जो कुछ नया जुड़ता है समाज से ही उद्भूत या अन्य समाजों से आयातित वह नवाचार के रूप में आधुनिकता का अंग हो जाता है।

यह सही है कि संस्कृति प्रत्येक नवाचार को अपनी कसौटी पर नापती-तौलती है और उसी के आधार पर उसका स्वीकार या तिरस्कार तय होता है। नवाचार के स्वीकार की इस प्रक्रिया के साथ-साथ पुरानी परम्पराओं की भी निरन्तर समीक्षा होती रहती है और समय को परिस्थितियों के अनुसार उनका भी परिमार्जन और तिरस्कार होता रहता है। इस प्रकार किसी भी समय बिन्दु पर कोई भी संस्कृति परम्परा और आधुनिकता का युक्तियुक्त सम्मिश्रण होती है।


At birth, every baby is just an animal form. Culture gives him culture and he becomes a social animal after being refined from animal form. Culture determines its language, its dress, its food and its feelings and values. From this point of view, culture can be said to be epibiotic.

It is true that man is the creator of culture, but this creation of it makes its own independent existence away from it. It is worth noting that culture cannot be created by any one person, nor does culture get created suddenly at any one point in time. The culture continues to be enriched by its members. It has a dynamic of its own. It is like a river that maintains its identity from its origin to its destination, but constantly leaves behind many things and adds many new things along the way.

In the sociological sense, culture is the totality of behaviors/types learned by society that make up a particular identity of a society and are passed on from generation to generation. Only human beings are capable of maintaining such historical continuity of behavior type. He is the only creature who has a contemplative mind, the ability to remember, and the amazing ability of sound formation and pronunciation of words. That is why he can create intelligible symbols and convey them to others through his speech and writing. The coming generations learn the accumulated experiences of years, the way of working and the genres of music, dance, literature from the elders of the society. In written societies, this heritage is stored in books and documents and is passed on from generation to generation, which is a sequence of generations, that gets the term “tradition” and whatever new is added to it, originated from the society itself or otherwise. It becomes a part of modernity in the form of innovation imported from societies.

It is true that culture measures every innovation on its own criteria and on that basis decides its acceptance or rejection. Along with this process of acceptance of innovation, old traditions are also constantly reviewed and according to the circumstances, they are also scorched and rejected according to the times. Thus any culture at any point in time is a reasonable amalgamation of tradition and modernity.

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