समामेलित नियोजन का अर्थ बताइए। इसकी मुख्य विशेषताएँ क्या है ? क्या भारत में समामेलित नियोजन सफल रहा है ? Explain the meaning of integrated planning. What are its main features? Has amalgamated planning been successful in India?

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निगमीय नियोजन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Corporate Planning)

निगमीय नियोजन को नियोजन की एक व्यवस्थित एवं विस्तृत प्रक्रिया के रूप में परिभाषित कया जा सकता है जो कि संगठन के संसाधनों एवं शक्ति का हिसाब रखती है तथा वातावरण, जिसमें संगठन को संचालित कर एक पूर्ण निगमीय इकाई के रूप में अन्वेषित करना है। निगमीय नियोजन के अन्तर्गत सम्पूर्ण संगठन इकाई के मतो को ध्यान में रखकर आधारभूत उद्देश्यों, योजनाओं तथा सम्पूर्ण संगठन हेतु व्यूह रचना की जाती है। निगमीय नियोजन का सार कम्पनी के संसाधनों को आकरने एवं उनका सर्वश्रेष्ठ उपयोग करने से दृष्टिगोचर होता है।

डेविड हसे (David Hussey) के अनुसार, “निगमीय नियोजन के अन्तर्गत उद्देश्यों की स्थापना, संगठित कार्य एवं लोगों तथा उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उपयोगी व्यवस्था नियोजन प्रक्रिया द्वारा अभिप्रेरण तथा नियोजन द्वारा योजना प्रदर्शन को परखना एवं प्रगति को नियन्त्रित करना एवं अधिक बेहतर निर्णय क्षमता द्वारा मानवीय संसाधन का विकास, स्पष्ट लक्ष्यों, प्रगति के प्रति अधिक सन्वद्धता तथा सचेत होने को सम्मिलित किया जाता है।”

स्टोनियर (Stonier) के अनुसार, “समामेलित नियोजन संगठन के मुख्य उद्देश्य निर्धारित करने तथा इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नीतियाँ एवं रणनीतियाँ बनाने की प्रक्रिया है ताकि संसाधनों की प्राप्ति, प्रयोग तथा बँटवारे को नियन्त्रित किया जा सके।

” ई. एफ. एल. ग्रीच (E.F.L. Breech) के अनुसार, निगमीय नियोजन एक व्यापक योजना है जिसमें उस पर्यावरण की नियमित समीक्षा शामिल है जिसके अन्तर्गत संस्था कार्यरत है एवं इसमें यह निश्चित किया जाता है कि कम्पनी का मुख्य उद्देश्य क्या है तथा इसे प्राप्त करने की उसमें कितनी क्षमता है।”

निगमीय नियोजन का उद्देश्य विनियोग एवं विपणन हेतु नए क्षेत्रों की खोज करना तथा निर्दिष्ट योजनाओं को विकसित करना है। निगमीय नियोजन में नवीन प्रारम्भिक कार्यों का क्रियान्वयन उपलक्षित रहता है। अतः नवप्रवर्तन इन योजनाओं का हृदय है। निगमीय नियोजन यह भी निश्चित करता है कि कम्पनी के दीर्घकालीन लाभों एवं बाजार के उद्देश्यों के अनुरूप प्रबन्धक निरन्तर उनके प्रदर्शन का निरीक्षण करें।

निगमीय या समामेलित नियोजन की विशेषताएँ (Characteristics of Corporate Planning)

निगमीय या समामेलित नियोजन की प्रमुख विशेषताएँ या लक्षण निम्न है

(1) दीर्घकालीन नियोजन-समामेलित नियोजन दीर्घकालीन नियोजन होता है। वारेन (Warren) के अनुसार, “दीर्घकालीन नियोजन वह प्रक्रिया है जो भविष्य को ध्यान में रखते हुए वर्तमान निर्णयों का मार्गदर्शन करती है तथा यह भावी निर्णयों को शीघ्रता, मितव्ययता तथा न्यूनतम अवरोधों से लेने का साधन है।” सामान्यतः दीर्घकालीन नियोजन पाँच वर्ष अथवा इससे अधिक की अवधि के लिए होता है। भारतीय परिस्थितियों के सन्दर्भ में सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र की समामेलित संस्थाओं का नियोजन समान न होकर अलग-अलग होता है।

(2) भारी विनियोजन-निगमीय या समामेलित नियोजन दीर्घकालीन होने के कारण इसके लिए भारी विनियोजन की आवश्यकता होती है जिसमें प्रत्याय (Return) भी लम्बी अवधि के पश्चात् मिलने की सम्भावना रहती है। अवधि जितनी अधिक लम्बी होगी, विनियोजन की जोखिम उतनी ही अधिक होगी।

(3) समामेलित नियोजन के लिए पृथक संगठन-समामेलित नियोजन काल लम्बी अवधि का होने के कारण इसके लिए पृथक संगठन की स्थापना करनी पड़ती है। यह संगठन किसी बड़े अधिकारी के अधीन होता है जो समामेलित नियोजन विभाग की प्रगति एवं प्रसार के लिए पूर्ण रूप से उत्तरदायी होता है। समामेलित नियोजन के अधिकारी द्वारा एक समिति का गठन किया जाता है। इस समिति में कभी विभागों के बड़े अधिकारियों को सदस्य मनोनीत किया जाता है। ये विभागीय अधिकारीगण अपने-अपने विभागों की दीर्घकालीन योजनाएँ प्रस्तुत करते हैं जिन पर विचार-विनिमय होता है एवं उनमें समन्वय स्थापित किया जाता है।

(4) जोखिमयुक्त-समामेलित नियोजन में जोखिम सर्वाधिक होती है। भविष्य अज्ञात है, कल क्या होने वाला है ? इसके बारे में कोई निश्चित रूप में नहीं कह सकता। केवल भविष्यवाणी ही कर सकता है। भविष्यवाणी सही ही निकलेगी, इसकी भी गारण्टी कोई नहीं दे सकता। फिर इसमें पन का विनियोजन भी कहीं अधिक होता है। नियोजन वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है। आज जिस वस्तु की भारी माँग है, यह आवश्यक नहीं कि पाँच साल बाद भी उसकी इसी प्रकार की माँग रहेगी। उदाहरण के लिए, रेडियो के बाजार को ही लीजिए। एक समय था जब रेडियो की भारी माँग थी, किन्तु आज टी. वी. ने रेडियो उद्योग का सारा बाजार ही चौपट कर दिया है।

(5) योजना निर्माण के लाभ-समामेलित नियोजन भावी लाभों को ध्यान में रखकर किया जाता है। सम्भावित लाभ जितने अधिक होंगे, समामेलित नियोजन उतना ही अधिक क्रियाशील एवं प्रभावी होगा।

(6) नीतियों, उद्देश्य एवं लक्ष्यों पर आधारित-निगमीय या समामेलित नियोजन संस्था के नीतियों, उद्देश्यों एवं लक्ष्यों पर आधारित होता है।

निगमीय नियोजन के तत्व (Elements of Corporate Planning)

निगमीय नियोजन में निम्न को शामिल किया जाता है

(1) नीतियुक्त नियोजन-संगठन के उद्देश्यों को निर्धारित करता है तथा जो विस्तृत एवं पूर्ण योजना रखते हैं जिसका उद्देश्य फर्म के नीतिगत लाभों का वातावरण के दावा करने वालों के समक्ष रखना है। बाह्य वातावरण की चुनौतियों के कारण यह संगठन की कमजोरियों एवं ताकत का अनुमान लगाते हैं। किसी भी व्यवसाय को अनिश्चित वातावरण में अधिक समय तक जीवित रहने एवं बढ़ने हेतु प्रभावशील नीतियुक्त नियोजन अत्यन्त आवश्यक है।

(2) क्रियात्मक नियोजन-दिन-प्रतिदिन की क्रियाओं में व्यवहार करता है तथा तत्कालीन परिस्थितियों में व्यवसाय के स्निग्ध संचालन से सम्बन्ध रखता है। उदाहरणार्थ, क्रियात्मक नियोजन इस तथ्य को स्थिर करता है कि उत्पाद हेतु बाजार की परिस्थितियों में आए परिवर्तन की फर्म की लाभ कमाने की क्षमता को विपरीत रूप से प्रभावित नहीं करते हैं। क्रियात्मक नियोजन नीतिगत, नियोजन की तुलना में छोटे पैमाने पर लागू होता है। क्रियात्मक नियोजन का सारभूत लक्षण यह है कि यह विद्यमान, उत्पाद, बाजार एवं सुविधाओं में व्यवहार करता है, पर किसी इकाई का नीतिगत नियोजन अनिश्चित परिस्थितियों से मिलने वाली चुनौतियों का सामना करना हेतु किया जाता है।

(3) प्रारूपीय नियोजन-यह प्रारूप को सफलतापूर्वक पूर्ण करने से सम्बन्धित है। जिसके अन्तर्गत देश का पूर्ण परिणाम नवीन उत्पादन से परिचय एवं नए यन्त्रों की स्थापना शामिल हैं।

(4) नीतिगत नियोजन-यह प्रारूप प्रदान करता है। जिसके अन्तर्गत कम्पनी में भविष्य में होने वाली क्रियाओं को संचालित किया जाता है। नीतिगत नियोजन के अन्तर्गत निर्णयन में, प्रारूपीय नियोजन की तुलना में, अत्यधिक समय व्यय होता है। अनिश्चितताओं एवं सदृश जोखिम का अंश भी अत्यधिक होता है एवं इसे व्यवहार में लाने का निर्णय अधिक महत्वपूर्ण होता है।

भारत में समामेलित नियोजन (Corporate Planning in India)

भारत में समामेलित नियोजन को पर्याप्त सफलता नहीं मिली है, क्योंकि यहाँ पर औद्योगिक क्षेत्र के पास न तो इतने व्यापक साधन हैं, न दूरदर्शिता और न ही आधुनिक तकनीक है। भारत में समामेलित नियोजन की असफलता के प्रमुख कारणों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) भारत प्राचीन समय से विक्रेताओं का बाजार है।

(2) भारतीय व्यापारियों के पास दीर्घकालीन योजनाओं के लिए पर्याप्त साधन नहीं है।

(3) हमारे देश के कर्मचारी प्रबन्ध की नीतियों में अधिक कमियाँ हैं, जो दीर्घकालीन योजनाओं के निर्माण में बाधक है।

(4) भारतीय व्यापारी शीघ्र लाभ प्राप्ति की आशा करता है और रातोंरात करोड़पति बनना चाहता है।

(5) देश में बड़े उद्योगों की स्थापना पर अनेक सरकारी प्रतिबन्ध है।

(6) देश में उद्यमिता का अभाव है।


Meaning and Definition of Corporate Planning

Corporate planning can be defined as a systematic and detailed process of planning that takes into account the resources and power of the organization and the environment in which the organization is to operate and explore as a complete corporate entity. Under corporate planning, keeping in mind the views of the entire organization unit, the basic objectives, plans and strategies for the entire organization are prepared. The essence of corporate planning is reflected in the coming and best use of the company’s resources.

According to David Hussey, “Corporate planning includes setting up of objectives, organized work and people and useful arrangements to achieve the objectives, by the planning process, by motivation and planning, to test the performance and to control the progress and to have better decision making ability.” It involves the development of human resources, clear goals, greater concern for progress and being conscious.

According to Stoneier, “Integrated planning is the process of determining the main objectives of the organization and formulating policies and strategies to achieve these objectives so as to control the acquisition, use and distribution of resources”.

“According to E.F.L. Breech, corporate planning is a comprehensive plan that involves regular review of the environment under which the organization operates and determines what the main objective of the company is and what it should be What capacity does he have to achieve?”

The purpose of corporate planning is to find new areas for investment and marketing and to develop specified plans. In corporate planning, the implementation of new preparatory works remains important. So innovation is the heart of these plans. Corporate planning also ensures that managers constantly monitor their performance in line with the company’s long-term profits and market objectives.

Characteristics of Corporate Planning

The main features or characteristics of corporate or amalgamated planning are as follows:

(1) Long Term Planning – Integrated planning is long term planning. According to Warren, “Long-term planning is the process which guides the present decisions keeping in view the future and it is the means of taking future decisions with speed, economy and minimum constraints.” Generally, long-term planning is five years or so. In the context of Indian conditions, the planning of amalgamated institutions of public and private sector is not the same but differs.

(2) Heavy Appropriation – Corporate or amalgamated planning being long term, it requires heavy investment, in which return is also likely to be received after a long period. The longer the period, the higher the risk of appropriation.

(3) Separate organization for amalgamated planning – Due to the long duration of amalgamated planning, a separate organization has to be established for this. This organization is under a senior officer who is fully responsible for the progress and expansion of the integrated planning department. A committee is constituted by the officer of amalgamated planning. Sometimes senior officers of the departments are nominated as members in this committee. These departmental officers present long-term plans of their respective departments, which are discussed and coordinated.

(4) Risky – Risk is highest in integrated planning. The future is unknown, what is going to happen tomorrow? One cannot say for sure about this. One can only predict. No one can guarantee that the prediction will turn out to be correct. Then the investment of water in it is also much more. Planning is done keeping in mind the current situation. A commodity which is in great demand today, it is not necessary that even after five years there will be a similar demand for it. Take, for example, the radio market. There was a time when there was a huge demand for radio, but today TV has ruined the entire market of the radio industry.

(5) Benefits of planning – Integrated planning is done keeping in mind the future benefits. The higher the potential benefits, the more efficient and effective the amalgamated planning will be.

(6) Based on policies, objectives and goals – Corporate or amalgamated planning is based on the policies, objectives and goals of the organization.

Elements of Corporate Planning

Corporate planning involves the following

(1) Strategic planning – determines the objectives of the organization and has a detailed and complete plan whose objective is to present the policy benefits of the firm to the claimants of the environment. They estimate the weaknesses and strengths of the organization due to the challenges of the external environment. Effective strategic planning is very necessary for any business to survive and grow for a long time in an uncertain environment.

(2) Functional planning – deals in day-to-day activities and deals with the smooth running of business under the prevailing circumstances. For example, action planning establishes the fact that changes in market conditions for a product will inversely affect the firm’s profit-making ability.

do not impress. Action planning is applied on a smaller scale than policy planning. The essential characteristic of action planning is that it deals with existing products, markets and facilities, but the strategic planning of an entity is done to meet the challenges posed by uncertain situations.

(3) Draft planning- It is related to the successful completion of the draft. Under which the complete results of the country are included in the introduction of new production and installation of new machines.

(4) Strategic planning – It provides the format. Under which the future activities of the company are conducted. Decision making under policy planning consumes a lot of time as compared to formal planning. The degree of uncertainties and corresponding risk is also high and the decision to implement it is more important.

Corporate Planning in India

Integrated planning has not got enough success in India, because the industrial sector here does not have such extensive resources, nor foresight nor modern technology. The main reasons for the failure of integrated planning in India can be explained as follows:

(1) India has been a seller’s market since ancient times.

(2) Indian businessmen do not have sufficient resources for long term plans.

(3) There are many shortcomings in the policies of employee management of our country, which is a hindrance in the formulation of long-term plans.

(4) Indian businessman hopes for quick profit and wants to become a millionaire overnight.

(5) There are many government restrictions on the establishment of big industries in the country.

(6) There is lack of entrepreneurship in the country.

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