उत्तर मानवशास्त्रियों ने यह स्थापित किया कि कोई भी समाज संस्कृतिविहीन नहीं होता। मानवशास्त्र की यह मान्यता रही है कि सांस्कृतिक तत्वों को अच्छा या बुरा कहना भ्रामक है क्योंकि अच्छे या बुरे की सांस्कृतिक परख होती है, जिसे एक संस्कृति वाले अच्छा मानते हैं, वहीं दूसरी संस्कृति की मूल्य प्रणाली के हिसाब से बुरा हो सकता है। उदाहरण के लिए, शाकाहारिता को कुछ लोग पिछड़ेपन की निशानी मानते हैं तो शाकाहारी मांसाहारिता को बर्बरता की। वैसे मांसाहारी भी हर प्रकार का माँस नहीं खाते। जैसे मुसलमान सुअर के गोश से परहेज रखते हैं तो पश्चिम के लोग कुत्ते के गोश्त से, कोरिया के लोग दोनों ही प्रकार का माँस खाते हैं। इसी प्रकार हिन्दू माँसाहार गौ-माँस नहीं। खाते क्या खाया जा सकता है और क्या नहीं, यह संस्कृति पर आधारित होता है, इसलिए उसका औचित्य भी संस्कृति ही निर्धारित करती है।


Anthropologists established that no society is cultureless. Anthropology has held that it is misleading to call cultural elements good or bad because good or bad is culturally judged by what is considered good by one culture and may be bad according to the value system of another culture. For example, vegetarianism is considered by some to be a sign of backwardness while vegetarian non-vegetarianism is considered barbaric. By the way, non-vegetarians also do not eat all types of meat. Just as Muslims abstain from pig meat, Westerners eat both types of meat from dog meat, while Koreans eat both types of meat. Similarly, Hindu non-vegetarian food is not beef. What can be eaten and what cannot be eaten, it is based on the culture, so its justification also determines the culture itself.

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