सांख्यिकी में अविश्वास के क्या कारण है ? अविश्वास उत्पन्न करने वाली अशुद्धियों के स्रोतों को बताइए। अविश्वास दूर करने के उपाय बताइए। What are the reasons for distrust in statistics? State the sources of inaccuracies that create mistrust. Give ways to remove mistrust.

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समंकों की उपयोगिता के बारे में दो अलग-अलग प्रकार की धारणाएँ हैं। कुछ लोग समंकों पर अधिक विश्वास करते हैं, जबकि कुछ दूसरे लोग समंकों द्वारा प्रस्तुत निष्कर्ष को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं। संक्षेप में इसको निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते हैं

(1) प्रथम मत-इस मत को समर्थकों का विचार है कि सांख्यिकी एक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी विज्ञान है, जिसमें अनेक वैज्ञानिक रीतियों के द्वारा समंकों का संकलन, विश्लेषण एवं निर्वाचन किया जाता है। अतः इनसे जो भी निष्कर्ष निकलते हैं उनमें किसी प्रकार का सन्देह या अविश्वास करना उचित नहीं है। इस मत के लोगों का विश्वास है कि “समंक झूठ नहीं बोलते तथा संख्यात्मक आधार पर निकाले गये निष्कर्ष प्रमाणित रूप से सत्य एवं विश्वसनीय होते हैं।”

(2) द्वितीय मत-जो लोग सांख्यिकीय एवं समंकों को सदैव सन्देह की दृष्टि से देखते हैं उनका विचार है कि “समक कुछ भी सिद्ध कर सकते हैं।” प्रसिद्ध विचारक डिजरायली ने कहा था, “झूठ तीन प्रकार के होते हैं झूठ, सफेद झूठ और समंक।” इसी प्रकार एक अन्य विद्वान का कथन है, “सांख्यिकी के कुछ काले झूठ होते हैं और कुछ बहुरंगी झूठ होते हैं, वास्तव में सांख्यिकी झूठ का इन्द्रधनुष है। प्रो. ला गार्दिया के अनुसार, “आँकड़े उन्माद रोग से पीड़ित की भाँति होते हैं जो किसी भी पक्ष का समर्थन कर देते हैं।”

वास्तव में सांख्यिकी एक सशक्त विज्ञान है जिसके द्वारा कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है। यदि समंकों का उपयोग निःस्वार्थ भाव से किया जाए तो इनके द्वारा जटिल से जटिल समस्याओं का हल खोजा जा सकता है किन्तु जब इस विज्ञान का उपयोग अक्षम या अनभिज्ञ व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तो इनसे प्राप्त निष्कर्ष वास्तविकता से परे होंगे और समंकों के प्रति अविश्वास उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार सर्मकों के द्वारा असत्य कथन को सत्य और सत्य कथन को असत्य सिद्ध किया जा सकता है। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा है कि यदि संसार के सभी सांख्यिक समाप्त कर दिये जायें तो यह बहुत अच्छी बात होगी। इसलिए समंकों के प्रति अविश्वास होना स्वाभाविक ही है।

सांख्यिकी के दुरुपयोग के उदाहरण के (Example Misuse of Statistics) समंकों का दुरुपयोग या तो जान-बूझकर किया जा सकता है या वह सामान्यीकरण की त्रुटियों के कारण उत्पन्न हो सकता है। बहुधा निम्न प्रकार से समंकों का दुरुपयोग होता है

(1) अनुपयुक्त तुलना- तुलना योग्य समंक न होने पर भी तुलना करने से लागत निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं, जिसमें सांख्यिकी को दोषी मानकर उस पर अविश्वास किया जा सकता है। (2) सांख्यिकीय विधियों का अनुचित प्रयोग-सांख्यिकीय विधियों के अनुचित प्रयोग से भी इस विज्ञान का दुरुपयोग होता है। कभी-कभी इन रीतियों के दुरुपयोग द्वारा सही स्थिति छिपाकर गलत स्थिति प्रस्तुत की जा सकती है। एक ही समस्या में विभिन्न प्रकार के माध्यमों का प्रयोग करके दूषित परिणामों पर पहुँचा जा सकता है।

(3) प्रतिशतों का गलत प्रयोग सांख्यिकी में प्रतिशतों का भी बहुत दुरुपयोग होता है; जैसे—यदि कोई ‘A’ नाम के कारखाने में गत वर्ष 500 इकाइयों का उत्पादन हुआ और इस वर्ष 200 इकाइयों का यदि 200 को आधार मानकर उत्पादन में कमी का प्रतिशत निकाला जाये, तो 150% होगी, परन्तु 100% कमी होने पर ही उत्पादन शून्य हो जायेगा। वास्तव में उत्पादन की कमी का आधार 500 इकाई पर देखना चाहिये, जो 60% कमी प्रदर्शित करती है।

(4) अपर्याप्त समंक अपर्याप्त समंक भी अविश्वसनीयता में सहयोग देते हैं। यदि अनुसन्धानकर्ता छोटे नमूने के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालता है, तो उससे भ्रमात्मक निष्कर्ष प्राप्त होते हैं।

(5) एकपक्षीय तर्क कभी-कभी एक पक्षीय तर्क के आधार पर दोषपूर्ण परिणाम निकाले जा सकते हैं, जो वास्तव में असत्य होते हैं, जैसे-यह कहा जाये कि सिगरेट पीने वालों में से 40 प्रतिशत व्यक्तियों की मृत्यु 100 वर्ष पूर्व हो जाती है, इससे यह निष्कर्ष निकाला जाये कि सिगरेट पीना दीर्घ जीवन के लिए अहितकर है, तो यह गलत होगा। सही निष्कर्ष के लिए यह भी जानना जरूरी है कि सिगरेट न पीने वालों में कितने प्रतिशत व्यक्तियों की मृत्यु 100 वर्ष पूर्व हो जाती है। तभी सापेक्षिक रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

समकों के प्रति अविश्वास या दुरुपयोग के कारण (Causes of Distrust about Statistics)

सामान्यतः समंकों के प्रति अविश्वास या दुरुपयोग के निम्नलिखित कारण हैं

(1) विरोधी आँकड़े मिलना-यदि किसी एक ही तथ्य के बारे में विभिन्न स्थानों या प्रकाशनों में परस्पर विरोधी आँकड़े मिलें तो अविश्वास होना स्वाभाविक है।

(2) वास्तविक स्थिति और आँकड़ों में विरोध यदि किसी तथ्य के बारे में वास्तविक स्थिति और आँकड़े मिलें तो अविश्वास होना स्वाभाविक है।

(3) सामूहिक निष्कर्षों को व्यक्तिगत रूप में लागू करना अनेक बार सामूहिक निष्कर्षो को व्यक्तिगत रूप से लागू करने पर भी अविश्वास हो जाता है। उदाहरण के लिए, किसी देश की औसत जीवन आयु 55 वर्ष होने पर हम 57 वर्ष के व्यक्ति को देखकर यह कहें कि औसत जीवन आयु के आँकड़े गलते हैं।

(4) आँकड़ों के संकलन में दोष-आँकड़ों के संकलन में त्रुटि होने पर उनके आधार पर निकाले गये निष्कर्ष भ्रमपूर्ण हो सकते हैं।

(5) स्वार्थी लोगों द्वारा दुरुपयोग कभी-कभी स्वार्थी व्यक्तियों द्वारा समंकों का दुरुपयोग किये जाने पर भी जनसामान्य को समंकों पर अविश्वास हो जाता है।

(6) सांख्यिकी सीमाओं को ध्यान में रखना-सांख्यिकी विज्ञान की कुछ सीमाएँ हैं। यदि उन्हें ध्यान में न रखा जाये तो समंकों का दुरुपयोग हो सकता है।

(7) माध्यों और प्रतिशतों का दुरुपयोग अनेक बार माध्यों और प्रतिशतों का दुरुपयोग होने पर निष्कर्ष गणितीय दृष्टि से शुद्ध होने पर वास्तविक एवं व्यावहारिक दृष्टि से भ्रमपूर्ण हो सकते हैं।

(8) न्यादर्श की अपर्याप्तता-सांख्यिकी में अनेक निष्कर्ष न्यादर्श के आधार पर लिये जाते हैं, लेकिन अपर्याप्त या दोषपूर्ण न्यादर्श के आधार पर निकाले गये निष्कर्ष गलत हो सकते हैं।

उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समंकों पर अविश्वास के लिए समंक नहीं, वरन् समंकों का प्रयोग करने वाले दोषी हैं। इसलिए बाउले ने लिखा है कि “अक्षम व्यक्तियों के हाथ में सांख्यिकीय रीतियाँ बहुत भयानक हथियार की तरह हैं। सांख्यिकी ऐसे विज्ञान में से एक है, जिनका प्रयोग करने वाले में एक कलाकार का आत्मसंयम होना चाहिए।”

अविश्वास दूर करने के उपाय (Measures to Remove Distrust)

सांख्यिकी के सम्बन्ध में होने वाले अविश्वास को रोकने की दृष्टि से अग्रलिखित सावधानियों पर ध्यान दिया जाना चाहिए

(1) समको का निष्पक्ष प्रयोग-सांख्यिकी समकों का एकत्रीकरण उन्ही व्यक्तियों द्वारा किया जाना चाहिए जो उनका निष्पक्षता से प्रयोग कर सकें, उनमें आत्मसंयम हो तथा प्राप्त निष्कर्षों को सत्य एवं सही रूप में व्यक्त कर सकें।

(2) सांख्यिकी की सीमाओं का ज्ञान-सांख्यिकीय निष्कर्षों को निकालने और समझने में सांख्यिकी की सीमाओं को ध्यान में रखना चाहिए।

(3) स्वतन्त्र विचार-विमर्श-सांख्यिकी समकों एवं निष्कर्षो की विश्वसनीयता की दृष्टि से स्वतन्त्र विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।

(4) सांख्यिकी रीतियों का उचित प्रयोग-सांख्यिकीकार की बिना पक्षपातपूर्ण या के सत्य की खोज से सांख्यिकी रीतियों का प्रयोग करना चाहिए।

(5) अन्य सावधानियाँ-सांख्यिकी के प्रयोग में प्रत्येक पग पर सावधानी बरतनी चाहिए, जैसे-समंक एक निश्चित उद्देश्य के लिये एकत्र किये जाने चाहिए तथा उनका विश्लेषण विवेकपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए। समंकों का विश्लेषण एवं निर्वाचन उन्हीं व्यक्तियों द्वारा किया जाना चाहिए, जिन्हें सांख्यिकीय रीतियों का पूर्ण ज्ञान हो।

इस प्रकार निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि यदि समंकों का प्रयोग सावधानी एवं सतर्कता से किया जाये तो इसमें व्याप्त अविश्वास को समाप्त किया जा सकता है। प्रो. किंग ने ठीक ही कहा है, “सांख्यिकी विज्ञान एक अत्यन्त उपयोगी सेवक है, परन्तु इसका मूल्य केवल उन्हीं लोगों के लिए है जो इसका उचित प्रयोग जानते हैं।


There are two different types of assumptions about the usefulness of data. Some people place more faith in the data, while others view the conclusions presented by the data with skepticism. In short it can be expressed as follows

(1) First Vote – Supporters of this view believe that statistics is an important and useful science, in which data is collected, analyzed and selected through many scientific methods. Therefore, it is not proper to have any kind of doubt or disbelief in whatever conclusions come from them. People of this view believe that “the data do not lie and the conclusions drawn on numerical basis are certifiably true and reliable.”

(2) Second opinion – Those who always look at statistics and statistics with suspicion, their view is that “the statistics can prove anything.” The famous theorist Disraeli said, “There are three kinds of lies, lies, white lies and data.” Similarly, another scholar has said, “There are some dark lies of statistics and some are multicolored lies, in fact statistics is a rainbow of lies. support either side.”

In fact statistics is a powerful science by which anything can be proved. If data is used selflessly, then solutions to complex problems can be found by them, but when this science is used by incompetent or ignorant people, then the conclusions obtained from them will be beyond reality and distrust of data will arise. it happens. In this way, a false statement can be proved to be true and a true statement false by means of transitives. Some people have even said that it would be a very good thing if all the numbers in the world were abolished. So it is natural to have distrust of data.

Example Misuse of Statistics Data can be misused either intentionally or it can arise due to errors of generalization. Data is often misused in the following way

(1) Inappropriate comparison- Comparison can lead to cost inferences even if there is no comparable data, in which statistics can be blamed and distrusted. (2) Improper use of statistical methods- Improper use of statistical methods also leads to misuse of this science. Sometimes misuse of these methods can hide the true position and present the wrong position. Corrupted results can be reached in the same problem by using a variety of means.

(3) Misuse of Percentages Percentages are also misused a lot in statistics; For example, if a factory named ‘A’ produced 500 units last year and this year if the percentage of reduction in production of 200 units is taken as the basis of 200, then it will be 150%, but only if there is 100% reduction. will become zero. In fact, the shortfall in production should be based on 500 units, which shows a reduction of 60%.

(4) Insufficient data Insufficient data also contribute to unreliability. If the researcher draws a conclusion on the basis of a small sample, then he gets delusional conclusions.

(5) One-sided argument Sometimes faulty results can be drawn on the basis of one-sided argument, which are actually untrue, e.g. it is said that 40 percent of the people who smoke cigarettes die before 100 years. To conclude from this that cigarette smoking is injurious to long life, then it would be wrong. For a correct conclusion, it is also necessary to know that what percentage of people who do not smoke cigarettes die before 100 years. Only then can a relative conclusion be drawn.

Causes of Distrust about Statistics

Generally the following are the reasons for mistrust or misuse of data:

(1) Finding conflicting data – If there are conflicting data about the same fact in different places or publications, then it is natural to have distrust.

(2) Conflict between the actual situation and the data If the actual situation and data are found about any fact, then it is natural to have distrust.

(3) Applying group findings individually Many times, even applying group findings individually leads to mistrust. For example, if the average life age of a country is 55 years, we can look at 57 years old and say that the average life age figures are wrong.

(4) Defects in the compilation of data – If there is an error in the compilation of the data, then the conclusions drawn on the basis of them can be illusory.

(5) Misuse by selfish people Sometimes even after selfish people misuse the data, the general public gets distrust of the data.

(6) Keeping in mind the limitations of statistics- There are some limitations of statistical science. If they are not taken into account, the data can be misused.

(7) Misuse of Means and Percentages Many times when the means and percentages are misused, the conclusions can be mathematically correct and misleading in actual and practical terms.

(8) Inadequacy of the sample – In statistics, many conclusions are taken on the basis of the sample, but the conclusions drawn on the basis of inadequate or faulty sample may be wrong.

It is clear from the above analysis that it is not the data for mistrust on the data, but those who use the data are guilty. That’s why Boule wrote that “Statistical methods are like a terrible weapon in the hands of the disabled. Statistics is one of the sciences in which an artist must have the self-restraint to use it.”

Measures to Remove Distrust

With a view to prevent mistrust in relation to statistics, the following precautions should be taken into account

(1) Fair use of data – Statistical data should be collected by only those persons who can use them impartially, have self-restraint and can express the obtained conclusions in a true and correct form.

(2) Knowledge of the limitations of statistics – In drawing and understanding statistical conclusions, the limitations of statistics should be kept in mind.

(3) Independent discussion – There should be independent discussion from the point of view of statistical data and the reliability of the conclusions.

(4) Proper use of statistical methods – Statistical methods should be used without bias or search for truth.

(5) Other precautions- Care should be taken at every step in the use of statistics, e.g. data should be collected for a definite purpose and they should be analyzed judiciously. The analysis and selection of data should be done by only those persons who have complete knowledge of statistical methods.

Thus, as a conclusion, it can be said that if the data is used with care and caution, then the mistrust prevailing in it can be eliminated. Pro. King has rightly said, “Statistics is a very useful servant, but it is of value only to those who know its proper application.

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