प्रशासनिक प्रबन्ध के क्षेत्र में हेनरी फेयोल के योगदान की विवेचना कीजिए। Discuss the contribution of Henri Fayol in the field of administrative management.

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प्रबन्ध विज्ञान में हेनरी फेयोल का योगदान (Henry Fayol’s Contribution in Managerial Science)

हेनरी फेयाल प्रबन्ध विज्ञान के क्षेत्र में प्रक्रिया अथवा कार्यात्मक दृष्टिकोण (Process Functional Approach) के प्रतिपादक रहे हैं। इनका जन्म सन् 1841 में फ्रांस के कान्सटेण्टीनोपा (Constantinopole) नामक स्थान पर हुआ था। सन् 1860 में खदान इंजीनियरिंग की शिक्ष समाप्त करने के पश्चात् वे कोयला खानों के प्रबन्धक नियुक्त हो गए। सन् 1888 में वे इसी संस्था जनरल मैनेजर नियुक्त किये गये। उन्होंने लगभग 30 वर्ष तक इस पद पर कार्य किया और अप लगन तथा परिश्रम से संस्था को विकास की चरम सीमा तक पहुँचा दिया। 1918 में वे इस कम्पनी सेवा से निवृत्त हो गए तथा फिर 1925 तक कम्पनी के संचालक रहे। इस अवधि में उन्होंने अप अधिकांश समय प्रबन्ध तथा प्रशासन के सिद्धान्तों को खोजने में लगाया। दिसम्बर 1925 ‘औद्योगिक प्रबन्ध के आधुनिक सिद्धान्तों के पिता’ फेयोल का देहावसान हो गया।

प्रबन्ध के क्षेत्र में फेयोल के योगदान का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया सकता है

(1) लेखन कृतियाँ-हेनरी फेयोल ने प्रबन्धकीय पहलुओं पर कई पुस्तकों की रचना की अ अधिकांश पुस्तकें फ्रेंच भाषा में थीं उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति ‘General and Industri Administration’ है, जो मूल रूप से सन् 1916 में फ्रेंच भाषा, सन् 1929 में अंग्रेजी में प्रकाशि हुई।

(2) प्रबन्ध की सार्वभौकिमकता पर बल (Emphasis on Universality of Management) फेयोल ने अपने लेखों तथा पुस्तकों में बार-बार इस बात पर बल दिया है कि प्रबन्ध सार्वभौमिक है। वाणिज्य, व्यापार, उद्योग, धर्म, राजनीति आदि सभी क्रियाओं में प्रबन्ध तथा उसके सिद्धान्त सर्वव्यापक हैं। कोई भी वर्ग, समुदाय या देश इससे अपने आपको अनभिन्न नहीं रख सकता।

(3) व्यावसायिक क्रियाओं का विभाजन (Classification of Business Activities)-फेयोल ने व्यावसायिक संस्थाओं से सम्बन्धित समस्त क्रियाओं को निम्न 6 वर्गों में विभक्त किया है

(i) तकनीकी क्रिया – इसमें इत्पादन व निर्माण की विशिष्ट तकनीकी को सम्मिलित किया जाता है।

(ii) वाणिज्य क्रियाएँ- इसमें क्रय विक्रय तथा विनिमय सम्बन्धी क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है।

(iii) वित्तीय क्रियाएँ–इसमें पूंजी की प्राप्ति के साधन तथा इनका सर्वोत्तम उपयोग सम्बन्धी विधि को सम्मिलित किया जाता है।

(iv) सुरक्षात क्रियाएँ-इसमें मानव, मशीन व माल की सुरक्षा सम्बन्धी याओं को सम्मिलित किया जाता है।

(v) लेखांकन क्रियाएँ-इसमें स्टॉक मूल्यांकन, चिठ्ठा बनाना, लागत नियन्त्रण तथा सांख्यिकी सम्बन्धी क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है।

(vi) प्रबन्ध क्रियाएँ-इसमें नियोजन, संगठन, निर्देशन, नियन्त्रण के समन्वय आदि क्रियाओं को सम्मिलित किया है।

(4) प्रबन्ध के तत्व (Elements of Management) क्रियाओं को पाँच भागों में विभाजित किया है हेनरी फेयोल ने प्रबन्ध विज्ञान की

(i) नियोजन- भविष्य का अध्ययन करके क्रियाओं की योजना तैयार करना।

(ii) संगठन-व्यवसाय में मानवीय और भौतिक संगठन का निर्माण करना।

(iii) समन्वय-सभी क्रियाओं को एकीकृत करना।

(iv) आदेश-स्टॉफ से कार्य लेने के साधन का प्रयोग करना।

(v) नियन्त्रण–यह देखना कि तैयार कार्य निर्धारित नियमों और निर्देशों के अनुसार हो रहा है अथवा नहीं।

(5) प्रबन्धकीय योग्यता एवं प्रशिक्षण (Managerial ability and Training)-फेयोल के अनुसार प्रबन्धक में निम्न योग्यताओं का होना आवश्यक है

(i) शारीरिक विशेषताएँ-स्वास्थ्य, शील और स्फूर्ति।

(ii) मानसिक विशेषताएँ-समझने एवं सीखने की योग्यता, विवेकशील एवं सतर्कता।

(iii) समाचार सम्बन्धी विशेषताएँ-उत्तरदायित्व स्वीकार करने की क्षमता, पहल करने की क्षमता, सदाचारी

(iv) सामान्य ज्ञान-अपने कार्य विशेष से प्रत्यक्ष सम्बन्ध न रखने वाली बातों के सम्बन्ध में भी जानकारी रखना।

(v) विशिष्ट ज्ञान-अपने कार्य से प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखने वाली बातों का विस्तृत ज्ञान ।

(vi) अनुभव-किसी कार्य को दीर्घावधि तक करने के कारण प्राप्त ज्ञान।

(6) प्रबन्ध के सिद्धान्त (Principles of Management) हेनरी फेयोल ने अपने ज्ञान व अनुभव के आधार पर प्रबन्ध के निम्नलिखित 14 सिद्धान्त बताये है

(i) अनुशासन-प्रबन्ध के अनुशासन के बिना कार्य सम्भव नहीं होता, अनुशासन से नियमों का पालन होता है तथा लोग पूरे परिश्रम से कार्य करते हैं। एक स्थान पर फेयोल ने लिखा है कि, • “बुरा अनुशासन एक बुराई है जो प्रायः बुरे नेतृत्व से आती है जबकि अच्छा अनुशासन अच्छे प्रबन्ध की कुंजी है।”

(ii) कार्य विभाजन-प्रबन्ध की सफलता विशिष्टीकरण के सिद्धान्त में निहित है। इसमें कार्य का विभाजन कर्मचारियों की योग्यता के अनुसार विभाजित कर दिया जाता है जिनसे न केवल श्रेष्ठ वस्तुओं का उत्पादन होता है बल्कि कर्मचारियों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। कार्य विभाजन का यह सिद्धान्त सभी क्रियाओं में, चाहे वे प्रबन्धकीय हों अथवा तकनीकी, समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।

(iii) आदेश की एकता प्रबन्ध को सदैव आदेश की एकता का ध्यान रखना चाहिए अर्थात् एक कर्मचारी को केवल एक ही अधिकारी से आदेश मिलने चाहिए। आदेश की एकता के अभाव में कर्मचारी न केवल कार्य को ही भली प्रकार से निष्पादित कर सकेगा अपितु उसके मन में असन्तोष की भावना जागृत होगी।

(iv) पदाधिकारी सम्पर्क श्रृंखला-संस्था के समस्त पदाधिकारियों के मध्य सीधा सम्पर्क होना चाहिए। आदेश देने व लेने के मार्ग स्पष्ट होने चाहिए।

(v) कर्मचारियों में स्थायित्व का होना-इस सिद्धान्त के अनुसार संस्था के कर्मचारियों को नित्य प्रति बदलना नहीं चाहिए, तभी वांछित लक्ष्यों की प्राप्ति सुगमता के साथ की जा सकेगी।

(vi) प्रेरणा-कर्मचारियों को उचित प्रेरणा देने की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि वे अपने अनुभव के आधार पर नई-नई योजनाएँ प्रस्तुत कर सकें तथा उन्हें सफल बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगा सकें।

(vii) अधिकार व उत्तरदायित्व- प्रत्येक अधिकारी को उत्तरदायित्व सौंपते समय पर्याप्त अधिकार भी देना चाहिए जिससे वह अपने अधीन कर्मचारियों से कार्य ले सके एवं उनकी क्रियाओं पर नियन्त्रण रख सके।

(viii) कर्मचारियों को पुरस्कार-वर्तमान औद्योगिक जगत् में यह स्वीकार कर लिया गया है कि श्रम, उत्पादन का सबसे सक्रिय अंग है अतः उसे सन्तुष्ट रखना परम आवश्यक है। इसके लिए हमें उसे वेतन के साथ-साथ अच्छे कार्य पर पुरस्कार देने की व्यवस्था होनी चाहिए।

(ix) निर्देश की समानता-कार्य की कुशलता व शीघ्र करने के लिए यह नीति आवश्यक है कि कर्मचारियों को दिये जाने वाले निर्देश में समानता हो। दूसरे शब्दों में, किसी एक उद्देश्य की पूर्ति हेतु की जाने वाली क्रियाओं के समूह का संचालन केवल एक व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए तथा उसकी एक योजना होनी चाहिए।

(x) केन्द्रीयकरण- यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें सभी प्रमुख अधिकार किसी एक व्यक्ति अथवा विशिष्ट पद के साथ सुरक्षित रहते हैं अर्थात् अधिकारों का अधीनस्थों में भारार्पण नहीं कया जाता। अधिकारों का केन्द्रीयकरण बहुत कुछ उपक्रम की निजी परिस्थितियों पर निर्भर करता है परन्तु अधिकारों का केन्द्रीकरण उसी सीमा तक किया जाना चाहिए जिससे श्रमिकों की योग्यताओं का अधिकतम लाभ मिले।

(xi) व्यक्तिगत हितों की अपेक्षा सामान्य हित की भावना-कुशल प्रबन्ध को सामान्य हितों व व्यक्तिगत हितों समन्वित रखना चाहिए। यदि कभी इन दोनों में टकराव हो तो सामान्य हितों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए।

(xii) प्रबन्ध की एकता प्रबन्ध में एकता लाने के लिए यह आवश्यक है कि एक ही उद्योग की सामान्य लक्ष्य वाली विभिन्न क्रियाओं को जहाँ तक सम्भव हो, एक ही प्रबन्ध के अन्तर्गत रखा जाना चाहिए ताकि उनके कार्यों में समन्वय स्थापित किया जा सके।

(xiii) न्याय अथवा समता-इसके अन्तर्गत प्रबन्धकों को कर्मचारियों के साथ न्याय एवं समता का व्यवहार करना चाहिए तथा उनके प्रति उदारता की भावना रखनी चाहिए।

(xiv) सहयोग-उपक्रम के निर्धारित लक्ष्यों को सुगमता से तभी प्राप्त किया जा सकता है जब उपक्रम के ही घटकों में सहयोग और सद्भावना हो।

(7) अन्य योगदान-उपरोक्त के अतिरिक्त फेयोल के योगदान के सम्बन्ध में निम्न बातें भी स्मरणीय है

(i) फेयोल की दृष्टिकोण मानवतावादी रहा है।

(ii) इन्होंने वित्तीय प्रेरणाओं की अपेक्षा अवित्तीय प्रेरणाओं पर अधिक बल दिया है।

(iii) प्रबन्धकीय शिक्षा के महत्व को स्पष्ट कर फेयोल ने सिद्ध कर दिया है कि प्रबन्धक पैदा नहीं होते वरन बनाये जाते हैं।

(iv) इन्होंने भारार्पण के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया।

(v) प्रबन्ध प्रक्रिया के विधिवत् विश्लेषण का श्रेय भी फेयोल को है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि हेनरी फेयोल ने प्रबन्ध विज्ञान के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, उन्होंने सामान्य प्रबन्ध की धारणा विकसित की और स्पष्ट किया कि प्रबन्ध के सिद्धान्त सर्वव्यापी है तथा प्रबन्ध के प्रत्येक क्षेत्र में लागू हो सकते हैं। उन्होंने उच्च प्रबन्ध के नियोजन कार्य पर महत्व दिया, अधिकार अन्तरण की महत्वपूर्ण समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया, निर्देशन की एकता और आदेश की एकता के सिद्धान्तों पर जोर डाला तथा गैर-वित्तीय प्रेरणाओं के महत्व को स्पष्ट किया।


Henry Fayol’s Contribution in Managerial Science

Henri Fayal has been the exponent of Process Functional Approach in the field of management science. He was born in 1841 at a place called Constantinopa, France. After completing his education in mine engineering in 1860, he became the manager of coal mines. In 1888, he was appointed General Manager of this institution. He worked in this position for about 30 years and with his dedication and hard work, took the organization to the peak of development. In 1918, he retired from the service of this company and then remained the director of the company till 1925. During this period he spent most of his time in discovering the principles of management and administration. December 1925 Fayol, the ‘father of modern principles of industrial management’, passed away.

Fayol’s contribution in the field of management can be studied under the following heads:

(1) Writing works – Henri Fayol wrote many books on managerial aspects, most of the books were in French language, his most important work is ‘General and Industry Administration’, which was originally French in 1916, English in 1929. Published in

(2) Emphasis on Universality of Management Fayol has repeatedly emphasized in his writings and books that management is universal. Management and its principles are ubiquitous in all activities like commerce, trade, industry, religion, politics etc. No class, community or country can separate itself from it.

(3) Classification of Business Activities – Fayol has divided all the activities related to business entities into the following 6 classes

(i) Technological action – In this, the specific technology of production and manufacture is included.

(ii) Commerce Activities- In this activities related to purchase, sale and exchange are included.

(iii) Financial Activities – In this, the means of obtaining capital and the method related to its best use are included.

(iv) Safeguarding Activities- In this, actions related to the safety of human, machine and goods are included.

(v) Accounting Activities- In this, activities related to stock valuation, balance sheet preparation, cost control and statistics are included.

(vi) Management Activities- It includes activities like planning, organization, directing, coordinating control etc.

(4) Elements of Management The activities have been divided into five parts. Henry Fayol studied the science of management.

(i) Planning- preparing a plan of actions by studying the future.

(ii) Organization – To create human and physical organization in the business.

(iii) Coordination – Integrating all the activities.

(iv) To use means of taking work from command-staff.

(v) Control – To see whether the finished work is being done according to the prescribed rules and instructions.

(5) Managerial ability and training – According to Fayol, it is necessary to have the following qualifications in a manager.

(i) Physical characteristics – health, modesty and vigor.

(ii) Mental characteristics – Ability to understand and learn, prudence and alertness.

(iii) Characteristics related to news – ability to accept responsibility, ability to take initiative, virtuous

(iv) General Knowledge-Knowing about things that are not directly related to your particular work.

(v) Specialized knowledge – Detailed knowledge of things that are directly related to their work.

(vi) Experience – Knowledge gained by doing a work for a long period of time.

(6) Principles of Management Henry Fayol has given the following 14 principles of management on the basis of his knowledge and experience.

(i) Discipline – Without the discipline of management, work is not possible, rules are followed by discipline and people work with full diligence. At one point Fayol wrote that, • “Bad discipline is an evil that often comes from bad leadership while good discipline is the key to good management.”

(ii) The success of division of work-management lies in the principle of specialisation. In this, the division of work is divided according to the abilities of the employees, which not only produce the best goods but also increase the efficiency of the employees. This principle of division of work should be applied equally to all activities, whether managerial or technical.

(iii) Unity of Order Management should always take care of unity of command i.e. an employee should get orders from only one officer. In the absence of unity of command, the employee will not only be able to perform the work well, but a feeling of dissatisfaction will arise in his mind.

(iv) Officers Contact Chain – There should be direct contact between all the office bearers of the organization. The routes for giving and receiving orders should be clear.

(v) Stability in the employees – According to this principle, the employees of the organization should not change their copy every day, only then the desired goals can be achieved with ease.

(vi) Motivation – There should be a system of giving proper motivation to the employees so that they can present new plans on the basis of their experience and can put their full power in making them successful.

(vii) Rights and Responsibility – While assigning responsibility to every officer, adequate authority should also be given so that he can take work from the employees under him and keep control over their actions.

(viii) Rewards to employees – In the present industrial world it has been accepted that labor is the most active part of production, so it is absolutely necessary to keep it satisfied. For this, we should have a system to reward him for good work along with salary.

(ix) Equality of instructions – For the efficiency and speed of work, it is necessary that there should be equality in the instructions given to the employees. In other words, a set of actions to be performed for the fulfillment of a single objective should be carried out by only one person and should have a plan.

(x) Centralization- It is a situation in which all the major rights are reserved with one person or a specific position, that is, the authority is not delegated to the subordinates. Centralization of rights Much depends on the individual circumstances of the enterprise, but the centralization of rights should be done to the extent that maximum benefit is given to the abilities of the workers.

(xi) Efficient management should keep common interests and individual interests in sync with the sense of common interest rather than individual interests. If there is ever a conflict between these two, then common interests should be given priority.

(xii) Unity of Management In order to bring unity in management, it is necessary that as far as possible different activities of the same industry with common goal should be kept under the same management so that co-ordination can be established in their work.

(xiii) Justice or Equality – Under this, the managers should treat the employees with justice and equality and should have a sense of generosity towards them.

(xiv) Cooperation – The set goals of the undertaking can be easily achieved only when there is cooperation and goodwill among the constituents of the enterprise itself.

(7) Other contributions – In addition to the above, the following things are also worth remembering about Fayol’s contribution.

(i) Fayol’s approach has been humanistic.

(ii) They have laid more emphasis on non-financial motivations than on financial ones.

(iii) By explaining the importance of managerial education, Fayol has proved that managers are not born but made.

(iv) He propounded the principles of weighting.

(v) Fayol is also credited with the systematic analysis of the management process.

It is clear from the above description that Henry Fayol has made important contribution in the form of management science, he developed the concept of general management and clarified that the principles of management are universal and can be applied in every field of management. He emphasized the planning function of top management, drew attention to the important problem of transfer of authority, emphasized the principles of unity of direction and unity of command, and explained the importance of non-financial motivations.

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