“प्रबन्ध वह शक्ति है जो संगठन को पूर्व निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करने में नेतृत्व सहायता एवं निर्देशन करता है।” इस कवन को समझाइए और प्रबन्ध का महत्व तथा सीमाएँ समझाइए “Management is the power that guides and assists the leadership in achieving the predetermined objectives of the organization.” Explain this statement and explain the importance and limitations of management.

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प्रस्तुत कथन कि “प्रबन्ध वह शक्ति है जो पूर्व निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी संगठन का नेतृत्व सहायता और निर्देशन करती है।” प्रो. जे. एन. शुल्जे (J. N. Schulze) द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इस कथन के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि प्रबन्ध वास्तव में क्या है? इस कथन के अनुसार प्रबन्ध को एक ऐसी शक्ति माना गया है जिसके द्वारा संस्था के पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संस्था में कार्यरत व्यक्तियों का इस प्रकार नेतृत्व किय जाता है, जिससे उन्हें अपने कार्य करने के लिए आवश्यक सहायता एवं निर्देशन प्राप्त होता है। दूसरे शब् में, प्रबन्ध एक ऐसी शक्ति या सुव्यवस्थित प्रक्रिया है, जो किसी व्यावसायिक संस्थान की नीतियों के निर्धारण, क्रियाओं के समन्वय और नीतियों के क्रियान्वयन हेतु वैयक्तिक एवं सामूहिक प्रयासों के नियोजन, नेतृत्व, अभिप्रेरण, निर्देशन एवं नियन्त्रण से सम्बन्ध रखती है।

उपर्युक्त कथन को विश्लेषणात्मक अध्ययन की दृष्टि से निम्नलिखित तीन भागों में विभक कर सकते हैं

(1) प्रबन्ध एक शक्ति है—–प्रबन्ध एकऐसी शक्ति है, जिसे स्वयं को तो नहीं वरन् इसके प्रभा को नेत्रों के द्वारा देखा व मस्तिष्क के द्वारा समझा जा सकता है। प्रबन्धकीय शक्ति समाज में उपलब्ध साधनों का उपयोग सर्वोत्तम ढंग से समाज तथा संस्था के हित में करती है। जिन संस्थाओं में प्रदर कीय शक्ति अधिक प्रभावपूर्ण होती है, उन संस्थाओं का निरन्तर विकास होता जाता है। वे संस्थाएँ एवं समाज आज अधिक विकसित, साधन सम्पन्न एवं खुशहाल दृष्टिगोचर होती हैं, जिनकी प्रबन्ध शक्ति बढ़ी-चढ़ी है। स्पष्ट है कि प्रबन्ध शक्ति संस्थागत उद्देश्य एवं सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति में सहयोग करती है।

(2) पूर्व निर्धारित उद्देश्य-आर. सी. डेविस के अनुसार, “प्रबन्ध एक मानसिक क्रिया है, जिसका सम्बन्ध कार्य के नियोजन, संगठन और सामूहिक पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु अन्य व्यक्तियों के नियन्त्रण से होता है।” डेविस की यह परिभाषा भी यही स्पष्ट करती है कि प्रबन्ध किसी संस्था के उन उद्देश्यों की पूर्ति के कार्यों से सम्बन्ध रखने वाली मानसिक क्रिया है जो पहले से ही निर्धारित किये होते हैं और ऐसे उद्देश्य सामान्य अर्थात् सामूहिक उद्देश्य होते हैं, किन्तु पूर्व निर्धारित उद्देश्यों के कथन का यह अर्थ नहीं होता है कि प्रबन्ध उद्देश्यों का निर्धारण नहीं कर सकता। वस्तुतः सच्चाई तो यह है कि प्रबन्ध की प्रक्रिया लक्ष्यों के निर्धारण के साथ ही प्रारम्भ होती है। प्रबन्ध प्रक्रिया का यात्रा पथ निरुद्देश्य नहीं होता है।

(3) उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु नेतृत्व सहयोग एवं निर्देशन-प्रबन्ध की यह अदृश्य शक्ति प्रबन्धक वर्ग के रूप में पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संगठन का नेतृत्व मार्गदर्शन और निर्देशन करती है। संगठन का निर्माण उन व्यक्तियों के समूह से होता है जो स्वैच्छिक तौर से किन्हीं सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उनके साधनों एवं उनकी सेवाओं को एकीकृत करते हैं। इस प्रकार संगठन की मानवीय शक्ति का नेतृत्व करता है, उसका पथ-प्रदर्शन करता है और उसके प्रयत्नों को निर्देशित करता है। नेतृत्व एवं निर्देशन प्रबन्ध के प्रमुख कार्यों में से हैं। नेतृत्व एक ऐसी कला है जो व्यक्तियों के विशेष गुणों का परिणाम होता है और अन्य व्यक्तियों की क्रियाओं का संचालन करती है, उनको दिशा बोध कराती है और मार्गदर्शन प्रदान करती है। स्पष्ट है कि प्रबन्ध शक्ति नेतृत्व के माध्यम से संगठन के सामूहिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संगठन की मानवीय शक्तियों एवं प्रयत्नों को एकता प्रदान करती है, प्रयत्नों को उद्देश्यों से सम्बन्धित करती है तथा संगठन के सदस्यों को प्रेरणा प्रदान करते हुए उनका बहुमूल्य मार्गदर्शन करती है।

प्रबन्ध का महत्व (Importance of Management)

व्यवसाय के कुशल संचालन तथा उत्पत्ति के भौतिक एवं मानवीय साधनों के सर्वोत्तम उपयोग के लिए स्वस्थ प्रबन्ध अति आवश्यक है। प्रबन्ध व्यवसाय के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए एक सुनियोजित योजना बनाकर संगठन के प्रयासों का निर्देशन, नियन्त्रण एवं समन्वय करता है। वर्तमान समय में प्रबन्ध का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। प्रबन्ध के बढ़ते हुए महत्व को निम्नलिखित तर्कों द्वारा अधिक स्पष्ट किया जा सकता है

(1) तीव्र प्रतियोगिता का सामना-वर्तमान समय में व्यवसाय काफी जटिल एवं प्रतिस्पर्द्धात्मक हो गया है। व्यापार राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किया जाने लगा है। एक ही वस्तु के अनेक उत्पादक होते हैं। कुशल प्रबन्ध के बिना इस तीव्र एवं गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा का सामना नहीं किया जा सकता।

(2) उत्पत्ति के विभिन्न साधनों में समन्वय-वर्तमान समय में उत्पादन अनेक साधनों के सहयोग के द्वारा ही सम्भव है और उत्पत्ति के सभी साधनों में समन्वय बिना कुशल प्रबन्ध के सम्भव नहीं है। अतः साधनों में समन्वय स्थापित करने के दृष्टिकोण से प्रबन्ध का महत्व निरन्तर बढ़ता जा रहा है।

(3) नवीन आविष्कार एवं प्राचीन रीतियों में समन्वय-स्वचालित यन्त्रों के आविष्कार से वस्तुओंका उत्पादन अधिकाधिक मात्रा में किया जाने लगा है। पहले प्रत्येक मशीन के संचालन के लिए अनेकश्रमिकों की आवश्यकता पड़ती थी, किंतु अब बटन दबाते ही सारा कारखाना व संयंत्र कार्य करने लगते हैं। नवीन पद्धतियों को अपनाना ही सफलता की आवश्यकता शर्त नहीं है।

(4) व्यक्तियों के विकास के लिए प्रबन्ध वस्तुओं का निर्देशन नहीं बल्कि व्यक्तियों का विकास है। वर्तमान समय में प्रत्येक संस्था उपयुक्त प्रशिक्षण एवं अन्य प्रबन्धकीय तकनीकों के माध्यम से अपने कर्मचारियों को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करती है।

(5) न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन-वर्तमान समय में प्रबन्ध का महत्व इसलिए भी बढ़ता जा रहा है ताकि प्रबन्ध तकनीकी का उपयोग करके न्यूनतक प्रयासों से अधिकतम, श्रेष्ठतम व सस्ता उत्पादन किया जा सके।

(6) सामाजिक उत्तरदायित्व की पूर्ति वर्तमान समय में व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्वों की पूर्ति की दृष्टि से भी प्रबन्ध का महत्व बढ़ गया है, क्योंकि एक प्रबन्धक ही कुशल प्रबन्ध के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों (जैसे-कर्मचारी, उपभोक्ता, विनियोजक, ऋणदाता, सरकार आदि) के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व की पूर्ति कर सकता है।

(7) अनिश्चितता एवं जोखिम में स्थायित्व-वर्तमान में बड़े पैमाने पर उत्पादन के युग में व्यवसाय एवं उद्योगों के अन्तर्गत काफी जोखिम रहती है तथा आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तनों में तीव्रता के कारण व्यवसायों में अनिश्चितता भी बढ़ गई है। प्रबन्ध अपनी दूरदर्शिता एवं नियोजन आदि के द्वारा अनिश्चितताओं और जोखिम में स्थायित्व ला सकता है।

(8) व्यवसाय के आकार और उसकी जटिलताओं में वृद्धि-आधुनिक युग में व्यवसाय के आकार एवं जटिलताओं में वृद्धि होती जा रही है। अर्थात् नवीन व्यवसाय के निर्माण तथा विद्यमान संस्थाओं के विकास व विस्तार के कार्य में अनेक वैधानिक औपचारिकताओं तथा जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। इनके कारण व्यवसाय के सफल संचालन के लिए प्रभावपूर्ण निर्देशन, संगठन, समन्वय और नियन्त्रण की आवश्यकता होती है। यह सभी कार्य प्रबन्ध द्वारा ही सम्भव हो सकते हैं।

(9) कार्यकुशलता में वृद्धि-वर्तमान समय में प्रबन्ध का महत्व इसलिए भी बढ़ता जा रहा है. ताकि संस्था की कार्यकुशलता बढ़ाई जा सके। कुशल प्रबन्ध के द्वारा उत्पादन के साधनों में समन्वय स्थापित करके, माल व मशीनों के दुरुपयोग रोककर, प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कार्यक्षमता के अनुसार मार्गदर्शन देता है और उन्हें कार्य को अच्छी प्रकार से करने की विधि बताता है। फलस्वरूप उत्पादकता में वृद्धि होती है और संस्था को और अधिक कार्य कुशल बनाने में सहायक होता है।

(10) श्रम पूँजी में मधुर सम्बन्ध-यद्यपि औद्योगिक विस्तार श्रम-समस्याओं को जन्म देता है, किन्तु कुशल प्रवन्ध ऐसे वातावरण का निर्माण करता है जिससे समस्याओं का शीघ्र निदान हो जाता है एवं श्रम व पूँजी के मधुर सम्बन्ध बने रहते हैं।

प्रबन्ध की सीमाएँ

(Limitations of Management)

वर्तमान युग में व्यवसाय का स्वरूप इतना वृहत हो गया है कि उनका संचालन एवं नियन्त्रण बिना कुशल प्रबन्ध के सम्भव नहीं है यही कारण है कि प्रबन्ध का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। प्रबन्ध के द्वारा ही कोई उपक्रम अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में सफल होता है। प्रबन्ध ही किसी कार्य करने के लिये संगठन में लगे हुए व्यक्तियों को प्रेरित करता है, उनका उचित दिशा में सहायक होता है। यह वह कला तथा विज्ञान है जिससे अनेक आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं केहल फेंडे एवं क्रियान्वित किये जा सकते हैं, किन्तु प्रबन्ध तथा इसके उपयोगकर्ताओं की अनेक सीमाएँ हैं जिनके कारण कई बार अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हो पाती है। प्रबन्ध की कुछ प्रमुख सीमाहे निम्न है

1. प्रबन्ध के सिद्धान्त में एकरूपता नहीं है-इस विकासोन्मुख अर्थव्यवस्था में प्रबन्ध आवश्यक एवं अग्रणी संस्था के रूप में इसलिये भी उदय नहीं हो सका है, क्योंकि प्रबन्ध के सिद्धान्त मानवीय क्रियाओं से सम्बन्धित होते हैं जो मनुष्य की रूचि एवं योग्यता के अनुसार समय-समय पर बदले रहते हैं अतः जो सिद्धान्त आज उपयोगी है कल वह व्यर्थ सिद्ध हो सकता है। इसलिये प्रत्येक मामले की विचित्रताओं के अनुरूप ही नहीं वरन विभिन्न अवधियों में उसी मामले में बहुत अधिक समायोजन की आवश्यकता पड़ती है।

2. मानवीय आचरण की स्वतन्त्रता प्रबन्ध व्यक्तियों से कार्य लेने की कला है अतः प्रबन्ध के सिद्धान्त मानवीय आचरण से सम्बन्धित होते हैं क्योंकि मानव आचरण स्वतन्त्र प्रकृति का होता है जो परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। अतः मानव आचरण की स्वतन्त्रता प्रबन्ध विज्ञान के विकास में बाधा उत्पन्न करती है। आलीवर शैल्डन के शब्दों में, “जहाँ भी मानव से सम्बन्ध होगा, प्रबन्ध विज्ञान के सिद्धान्त व्यर्व सिद्ध हो सकते हैं।” अर्थात् मानवीय व्यवहार में परिवर्तन प्रबन्ध विज्ञान की स्वतन्त्रता पर रोक लगाता है। स्व० प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कांग्रेस के 55वें अधिवेशन में कहा था कि, “एक ओर जहाँ हम तकनीकी ज्ञान की वृद्धि में आगे बढ़ते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मानवीय तत्व के अध्ययन व उनके विवेचन में हम काफी पिछड़ गये हैं।”

3. लोचशील सिद्धान्त प्रबन्धकीय सिद्धान्त बेलोच नहीं बल्कि लोचशील हैं। स्वयं फेयोल ने लिखा है कि प्रबन्ध के सिद्धान्त लचीले है जिनमें परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन किया जा सकता है। ” फलतः प्रबन्ध के सिद्धान्त ज्यों के त्यों लागू नहीं किये जा सकते हैं। उन्हें परिस्थतियों को विवेक के अनुसार अपनाना पड़ता है। इसी कारण, प्रबन्धकों के सभी समान कार्यों के परिणाम भी एकसमान नहीं होते हैं।

4. परिस्थितियों की जिन्नता प्रत्येक संस्था की परिस्थितियों निरन्तर बदलती रहती हैं। फलतः प्रबन्ध के जो सिद्धान्त एक समय में उपयोगी होते हैं वे उसी संस्था में दूसरी बार भी उपयोगी हो, यह आवश्यक नहीं है। दूसरे शब्दों में, प्रबन्ध के सिद्धान्त सभी परिस्थितियों में समान रूप से लागू नहीं किये जा सकते हैं।

5. संगठनों में भिन्नता-संगठनों में भिन्नता भी पायी जाती है। कुछ व्यावसायिक तथा कुछ गैर-व्यावसायिक संगठन हो सकते हैं तो इनमें से कुछ छोटे तथा कुछ बड़े हो सकते हैं। यद्यपि सभी में प्रचन्ध के सिद्धान्त लागू किये जा सकते हैं, किन्तु सभी संगठनों में समान आधार पर उन सिद्धान्तों को लागू नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक संगठन की आवश्यकता के अनुसार उनमें समायोजन करना पड़ता है।

6. नौकरशाही का पनपना-बड़ी व्यावसायिक इकाई में प्रबन्ध का केन्द्रीयकरण कुछ उच्च अधिकारियों के हाथों में ही रहता है जिससे नियन्त्रण निरीक्षण एवं संगठन करने की शक्तियाँ एक ही स्थान पर केन्द्रित हो जाती है। इससे उपक्रम में मनमुटाव भेदभाव तथा नौकरशाही जैसे दूषित प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है और संस्था अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहती हैं। यही कारण है कि एक विकासोन्मुख अर्थव्यवस्था में प्रबन्ध अभी महत्वपूर्ण प्रक्रिया के रूप में नहीं पनप सका है।

7. आर्थिक विकास की अवस्था में भिन्नता देश के आर्थिक विकास की अवस्था भी प्रबन्ध के कार्यों तथा व्यवहार को प्रभावित करती है। फलतः प्रबन्ध के जो सिद्धान्त विकसित राष्ट्रों में जिस रूप में अपनाये जा सकते हैं वे सिद्धान्त उसी रूप में विकासशील राष्ट्रों में नहीं अपनाये जा सकते हैं। अतः देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति के अनुसार भी प्रबन्ध के सिद्धान्तों, कार्यों एवं व्यवहार में आवश्यक समायोजन करना पड़ता है।

8. प्रबन्धको की मानसिकता-कई प्रवन्धकों की मानसिकता भी प्रबन्धकीय सिद्धान्तों की सफलता एवं विफलता को प्रभावित करती है। खुले मस्तिष्क वाले प्रबन्धक संकीर्ण विचारों वाले प्रवन्धकों की तुलना में अधिक सफलतापूर्वक प्रवन्ध के सिद्धान्तों को अपना सकते हैं।

9. प्रबन्धकीय कुशलता । के समुचित माप का अभाव-प्रथन्ध की एक बड़ी सीमा यह भी है कि प्रबन्धकों की कुशलता का समुचित मापन करना बहुत कठिन कार्य है। इसके लिए कोई निश्चित आधार तय नहीं है। इनकी कार्यकुशलता के मापन के लिए परिणामात्मक तकनीकों का विकास करना भी कठिन होता है। फलतः सभी प्रबन्धकों को भी कार्यकुशलता के लिए कोई निश्चित मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है।

10. सामाजिक मूल्यों की परिवर्तनशीलता सामाजिक मूल्यों में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। फलतः व्यक्तियों तथा उनके समूह का आचरण भी बदल रहा है। ऐसे में प्रबन्ध के सिद्धान्तों को यथावत् लागू करना कठिन हो जाता है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रबन्ध विज्ञान की सीमायें एक विकासोन्मुख अर्थ व्यवस्था में एक आवश्यक, स्पष्ट एवं अग्रणी संस्था के रूप में प्रबन्ध का उदय होने में बाधक हुई है। यदि हम वास्तव में ऐसी अर्थव्यवस्था में प्रबन्ध के महत्व को बढ़ाना चाहते हैं तो हमें प्रवन्ध विज्ञान की कला को विकसित करना होगा और इसके सिद्धान्तों व नीतियों में एकरूपता लानी होगी। प्रश्न 5. “प्रबन्ध व्यक्तियों का विकास है न कि वस्तुओं का निर्देशन।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।


The statement presented that “Management is the power that leads, assists and directs an organization to achieve a predetermined objective.” has been presented by Prof. J. N. Schulze. Through this statement, he It has been clarified that what is management? According to this statement, management has been considered as such a power by which the people working in the organization are led in such a way to achieve the pre-determined goals of the organization, so that they are able to achieve their goals. In other words, management is such a force or systematic process, which is the planning, leadership of individual and group efforts for the formulation of policies, co-ordination of activities and implementation of policies of a business organization. It deals with motivation, direction and control.

From the point of view of analytical study, the above statement can be divided into the following three parts:

(1) Management is a power–Management is such a power, which is not only itself but its effect can be seen through the eyes and understood by the mind. The managerial power makes use of the resources available in the society in the best possible way in the interest of the society and the institution. The institutions in which the external energy is more effective, those institutions continue to develop. Today those institutions and societies are more developed, resourceful and happy are visible, whose management power has increased. It is clear that the power of management helps in the achievement of institutional objectives and social goals.

(2) Predetermined Objective-R. According to C. Davis, “Management is a mental activity, which is concerned with the planning, organization of work and the control of other persons to achieve collective predetermined objectives.” This definition of Davis also makes it clear that management is an organization. It is a mental action related to the tasks of fulfillment of those objectives which are already set and such objectives are general ie collective objectives, but the statement of predetermined objectives does not mean that management does not determine the objectives. The fact is that the process of management begins with the setting of goals. The journey path of the management process is not aimless.

(3) Leadership, cooperation and direction for achieving the objectives – This invisible power of management guides and directs the leadership of the organization in the form of a managerial class to achieve the predetermined objectives. Organization is made up of a group of individuals who voluntarily integrate their resources and their services to achieve some common objective. Thus leads the human force of the organization, guides it and directs its efforts. Leadership and direction are among the main functions of management. Leadership is an art which is the result of the special qualities of individuals and conducts the actions of other people, gives them direction and provides guidance. It is clear that through leadership, the power of management provides unity to the human forces and efforts of the organization to achieve the collective objectives of the organization, relates the efforts to the objectives and provides valuable guidance to the members of the organization by providing them inspiration. Is.

Importance of Management

Healthy management is very necessary for efficient operation of business and best use of physical and human means of production. Management directs, controls and coordinates the efforts of the organization by making a well-planned plan to achieve the goals of the business. The importance of management is increasing day by day. The increasing importance of management can be explained more by the following arguments:

(1) Faced with intense competition – In the present time business has become quite complex and competitive. Business is being done at national and international level. There are many producers of the same commodity. This intense and cut-throat competition cannot be faced without efficient management.

(2) Co-ordination between different means of production- In the present time production is possible only through the cooperation of many means and coordination among all the means of production is not possible without efficient management. Therefore, the importance of management is increasing continuously from the point of view of coordinating the resources.

(3) New inventions and co-ordination in ancient customs – With the invention of automatic machines, goods are being produced in more and more quantities. Earlier, many workers were required for the operation of each machine, but now the whole factory and plant starts working as soon as the button is pressed. Adoption of new methods is not a prerequisite for success.

(4) Management for the development of individuals is not the direction of things but the development of individuals. At present, every organization tries to make its employees the best through appropriate training and other managerial techniques.

(5) Maximum production at minimum cost – In the present time, the importance of management is also increasing so that maximum, best and cheapest production can be produced with minimum efforts by using management technology.

(6) social answer Fulfillment of responsibility In the present time, the importance of management has also increased from the point of view of fulfillment of social responsibilities of business, because only one manager is through efficient management of different sections of the society (such as employees, consumers, investors, lenders, government etc.). can fulfill social responsibility towards

(7) Uncertainty and stability in risk – In the present era of mass production, there is a lot of risk within business and industries and due to the intensity of economic and social changes, uncertainty has also increased in businesses. Management through its foresight and planning can bring stability to uncertainties and risks.

(8) Increase in the size and complexities of business – In the modern era, the size and complexities of business are increasing. That is, many legal formalities and complications have to be faced in the work of creation of new business and development and expansion of existing institutions. Due to these, effective direction, organization, coordination and control are required for the successful operation of business. All these things can be possible only through management.

(9) Increase in efficiency – In the present time, the importance of management is also increasing. So that the efficiency of the organization can be increased. By establishing co-ordination in the means of production through efficient management, preventing misuse of goods and machines, guides each person according to his efficiency and tells them how to do the work well. As a result, productivity increases and helps in making the organization more efficient.

(10) Good relations between labor and capital – Although industrial expansion gives rise to labor problems, but efficient management creates such an environment, through which problems are solved quickly and the relations between labor and capital remain cordial.

Limitations of Management

(Limitations of Management)

In the present era, the nature of business has become so vast that its operation and control is not possible without efficient management, that is why the importance of management is increasing day by day. It is only through management that an enterprise becomes successful in achieving its goals. Management itself motivates the people engaged in the organization to do some work, it helps them in the right direction. It is that art and science by which many economic, social, political problems can be solved and implemented, but there are many limitations of management and its users, due to which many times the expected success is not achieved. Some of the major limitations of management are as follows:

1. There is no uniformity in the principles of management – ​​Management has not emerged as a necessary and leading institution in this development-oriented economy because the principles of management are related to human activities, which take time according to the interest and ability of man. They change from time to time, so the theory which is useful today may prove to be useless tomorrow. Therefore a lot of adjustment is required not only according to the peculiarities of each case but also in different periods in the same case.

2. Freedom of Human Conduct Management is the art of taking work from individuals, therefore the principles of management are related to human conduct because human behavior is of free nature which keeps on changing according to the circumstances. Therefore, the freedom of human conduct creates a hindrance in the development of management science. In the words of Oliver Sheldon, “Wherever there is a relationship with human beings, the principles of management science can prove to be in vain.” That is, change in human behavior restricts the freedom of management science. Late Prime Minister Smt. Indira Gandhi had said in the 55th session of the Congress that, “While we are moving ahead in the growth of technical knowledge, on the other hand we have lagged far behind in the study and analysis of the human element.”

3. Flexible Principles Management principles are not flexible but flexible. Fayol himself has written that the principles of management are flexible in which changes can be made according to the circumstances. As a result, the principles of management cannot be applied as they are. They have to adopt the situations according to the discretion. For this reason, the results of all the similar actions of the managers are also not the same.

4. Gentleness of Circumstances The circumstances of every institution keep on changing continuously. As a result, the principles of management which are useful at one time, it is not necessary that they may be useful for the second time in the same organization. In other words, the principles of management cannot be applied equally to all situations.

5. Variation in Organizations: There are also differences in organizations. Some may be commercial and some may be non-commercial organisations, some may be small and some may be large. Although Prachand’s principles can be applied to all, but those principles cannot be applied on equal basis in all organisations. They have to be adjusted according to the requirement of each organization.

6. Growth of bureaucracy- Centralization of management in a large business unit remains in the hands of a few high officials, due to which the powers of controlling, monitoring and organizing are concentrated at one place. This encourages corrupt tendencies like estrangement, discrimination and bureaucracy in the enterprise and the organization achieves its goals.

fail to obtain. This is the reason that management has not yet flourished as an important process in a developing economy.

7. Variation in the Stage of Economic Development The stage of economic development of the country also affects the actions and behavior of the management. As a result, the principles of management which can be adopted in the developed countries, cannot be adopted in the same way in the developing countries. Therefore, according to the condition of the economy of the country, necessary adjustments have to be made in the principles, actions and practice of management.

8. Mindset of Managers- The mindset of many managers also affects the success and failure of managerial principles. Open minded managers can adopt the principles of management more successfully than narrow minded managers.

9. Managerial Efficiency. Lack of proper measurement of management – A major limitation of the management is that it is very difficult to measure the efficiency of the managers properly. There is no definite basis for this. It is also difficult to develop consequential techniques to measure their efficiency. As a result, even all the managers do not get any definite guidance for efficiency.

10. Variability of Social Values ​​There is a continuous change in social values. As a result the behavior of individuals and their group is also changing. In such a situation, it becomes difficult to apply the principles of management consistently.

It is clear from the above discussion that the limitations of management science have hindered the emergence of management as a necessary, clear and leading institution in a developing economy. If we really want to increase the importance of management in such an economy, then we have to develop the art of management science and bring uniformity in its principles and policies. Question 5. “Management is the development of individuals and not the direction of things.” Explain this statement.

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