प्रबन्ध से आप क्या समझते हैं ? इसकी प्रकृति को समझाइए What do you understand by management? explain its nature

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प्रबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Management)

वर्तमान जटिल व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा के युग में प्रबन्ध को अनेक अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है। वास्तव में प्रबन्ध दूसरों से काम लेने की युक्ति है। किसी उपक्रम में काम करने वाले श्रमिकों के लिए प्रबन्ध सोचता है कि किस प्रकार श्रमिकों से अच्छे ढंग से काम लिया जा सकता है। प्रबन्ध ही यह निर्णय लेता है कि ‘वास्तव में क्या करना है और उसे करने का उत्तम तरीका क्या है ? इस प्रकार प्रबन्ध का अभिप्राय दूसरे व्यक्तियों से कार्य सम्पन्न कराना है जिससे पूर्व निर्धारित उद्देश्यों या लक्ष्यों को निर्धारित समयावधि में प्राप्त किया जा सके।

(1) जेम्स एल. लुण्डी (James L. Lundy) के अनुसार, “प्रबन्ध मुख्य रूप से विशिश्ट उद्देश्यों के की प्राप्ति के लिए दूसरों के प्रयत्नों को नियोजित, समन्वित, प्रेरित तथा नियन्त्रित करने का कार्य है।”

(2) एफ. डब्ल्यू, टेलर (F. W. Taylor) के अनुसार, “प्रबन्ध यह जानने की कला है कि आप

लोगों से क्या कराना चाहते हैं, तत्पश्चात् यह देखना कि वे इसे सर्वोत्तम एवं मितव्यवितापूर्ण ढंग से

कर रहे है अथवा नहीं।”

(3) हेनरी फेयोल (Henry Fayol) के अनुसार, “प्रबन्ध करने से आशय पूर्वानुमान लगाना एवं योजना बनाना, संगठन करना, आदेश एवं निर्देश देना, समन्वय करना तथा नियन्त्रण करने

से है। ”

(4) क्लॉग (Clough) के अनुसार, “प्रबन्ध निर्णय लेने और नेतृत्व करने की कला और

विज्ञान है।”

(5) जे. एन. शुल्जे (J. N. Schulze) के अनुसार, “प्रबन्ध वह शक्ति है, जो पूर्व निर्धारित

लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संगठन का नेतृत्व, मार्गदर्शन एवं संचालन करता है। ”

प्रबन्ध की प्रकृति या स्वभाव (Nature of Management)

प्रबन्ध की प्रकृति बहु-दिशायी है। प्रबन्ध को विभिन्न विद्वान् भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखते हैं अतः इसकी प्रकृति या स्वभाव से स्पष्ट नहीं हो पाता है। फिर भी प्रबन्ध की अवधारणाओं एवं विशेषताओं के आधार पर इसकी प्रकृति के सम्बन्ध में निम्नांकित पहलू प्रतिपादित किये जा सकते हैं

(1) प्रबन्ध एक जन्मजात या अर्जित प्रतिभा है-प्राचीन समय में अधिकांश लोगों की यह धारणा रही है कि ‘प्रबन्ध एक जन्मजात प्रतिभा है’ अर्थात् ‘प्रबन्धक पैदा होते हैं, उन्हें बनाया नहीं जा सकता’। इस धारणा के पीछे यह मान्यता थी कि कुशल प्रबन्ध करने के लिए जिन गुणों व विशेषताओं • की आवश्यकता होती है, वे कुछ व्यक्ति विरासत में लेकर पैदा होते हैं, किन्तु ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं प्रशिक्षण की सुविधाओं के विकास ने इस विचारधारा को परिवर्तित कर दिया। आज व्यवसाय का स्वामित्व तथा प्रबन्ध अलग-अलग हो गये हैं। प्रबन्धकों का स्थान प्रशिक्षित तथा पेशेवर लोग ग्रहण करने लगे हैं। ऐसी स्थिति में प्रबन्ध को जन्मजात प्रतिभा नहीं कह सकते हैं। वर्तमान समय में ऐसे

अनेक प्रबन्धक है जिन्होंने प्रवन्ध विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त विभिन्न उपलब्धियों प्राप्त की, जबकि उनके माता-पिता का प्रबन्ध से कोई सम्बन्ध नहीं रहा। अतः यह कहा जा सकता है कि “प्रबन्ध एक जन्मजात प्रतिभा नहीं है, वरन, अर्जित प्रतिभा भी है।”

(2) प्रबन्ध सार्वभौमिक या सर्वव्यापी है-प्रबन्ध एक सार्वभौमिक क्रिया है, जो प्रत्येक संस्था में, चाहे वह सामाजिक संस्था हो अथवा धार्मिक, राजनैतिक हो अथवा व्यावसायिक, समान रूप से सम्पन्न की जाती है। निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि प्रबन्ध के सिद्धान्त एवं कार्य काफी सीमा तक अपनी सार्वभौमिकता की प्रकृति को दर्शाते हैं, किन्तु संगठन की प्रकृति, आकार एवं पृष्ठभूमि के अनुसार उन्हें लागू करने की परिस्थितियाँ भिन्न हो सकती हैं। प्रबन्ध के सिद्धान्त लोचक एवं किन्हीं भी परिस्थितियों में आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाये जा सकते हैं। (3) प्रबन्ध विज्ञान एवं कला है-प्रबन्ध कला है या विज्ञान अथवा दोनों ही है, इस तथ्य की

सत्यता का पता लगाने के लिए यह आवश्यक है कि प्रबन्ध कला के रूप में तथा प्रबन्ध विज्ञान के

रूप में क्यों है, इसका अलग-अलग अध्ययन करेंगे प्रबन्ध एक विज्ञान है-ज्ञान की किसी भी शाखा का क्रमबद्ध व व्यवस्थित अध्ययन ‘विज्ञान’ कहलाता है। यह ज्ञान का वह स्वरूप है जिसमें अवलोकन व प्रयोग द्वारा सिद्धान्त बनाये जाते हैं एवं कारण व परिणाम में सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। अतः किसी भी प्रकार के व्यवस्थित ज्ञान को विज्ञान कहते हैं जो एक निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित हो अर्थात् ज्ञान का वह स्वरूप जिसमें अवलोकन है, विज्ञान कहलाता है। विज्ञान को हम दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं-(अ) वास्तविक विज्ञान अर्थात् ‘क्या है ?’, तथा (व) आदर्श या नीति प्रधान विज्ञान अर्थात् ‘क्या होना चाहिए ?’ का ज्ञान। वास्तविक विज्ञान में हम वर्तमान अवस्था का ही विश्लेषण करते हैं, जबकि नीति प्रधान विज्ञान में हम आदर्श का निर्धारण करते हैं। जब हम प्रबन्ध को कसौटी पर कसने का प्रयास करते हैं तो सहज ही कई प्रश्न खड़े होते हैं-(i) क्या प्रबन्ध अवलोकन, सर्वेक्षण, प्रयोग एवं कारण व परिणाम के सम्बन्धों पर आधारित है ? (ii) क्या प्रबन्ध के सिद्धान्त सार्वभौमिक हैं ? (iii) क्या प्रबन्ध की कोई सर्वसम्मत विचारधारा है ? इस अवधारणा के प्रवर्तक यह मानते हैं कि प्रबन्ध के कुछ सिद्धान्त तो पूर्णतः विकसित सिद्धान्तों का रूप ले चुके हैं, जबकि कई सिद्धान्त अभी विकास की अवस्था में हैं। प्रबन्ध के सिद्धान्त कारण- परिणाम सम्बन्धों से जुड़े हुए हैं तथा वे व्यापक प्रयोगों, अवलोकनों, परीक्षणों एवं व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित हैं। ये सिद्धान्त सार्वभौमिक भी है और प्रबन्ध की सर्वमान्य, विचारधारा का भी प्रतिनिधत्व करते हैं। दूसरे शब्दों में, एक विज्ञान के रूप में प्रबन्ध अपने नियमों, सिद्धान्तों, तकनीकों, विधियों आदि के साथ नवीन आयामों के साथ सतत् रूप से विकसित हो रहा है।

• निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि प्रबन्ध एक विकासमान व गतिमान विज्ञान है, जो मानवीय व्यवहार से सम्बन्ध रखता है। अतः भौतिक व रासायनिक विज्ञान की तरह यह निश्चित व सही विज्ञान नहीं हो सकता। प्रबन्ध एक सरल एवं लचीला विज्ञान है, जो कठोर नियमों द्वारा बद्ध नहीं किया जा सकता। प्रबन्ध चिकित्सा विज्ञान तथा इंजीनियरिंग के सदृश है, जिनमें सैद्धान्तिक और व्यवहारिक ज्ञान के समन्वित उपयोग की जरूरत होती है।

प्रबन्ध कला भी है-कला का अभिप्राय ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग से होता है। देरी के अनुसार, कुशलतापूर्वक प्रयोग से वांछित परिणाम की प्राप्ति ही कला कला आदर्श विज्ञान द्वारा निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन बतलाती है। कला उन रीतियों एवं विधियों को प्रस्तुत करती है, जिनके माध्यम से आदर्श की प्राप्ति हो और अवांछनीय बातें अलग रह जायें। दूसरे शब्दों में, कला उपलब्ध ज्ञान के व्यावहारिक प्रयोग की एक विधि है। टेलर के शब्दों में, ‘प्रबन्ध’ का तीन-चौथाई ज्ञान व्यावहारिक है और एक-चौथाई सामान्य ज्ञान है। श्रेष्ठ परिणामों की प्राप्ति हेतु सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यावहारिक ज्ञान से पुष्ट करना आवश्यक है और कला यही काम करती है। कला का आशय यह जानना है कि कोई काम किस प्रकार से किया जा सकता है और उसे वस्तुतः उसी प्रकार करना चाहिए।

प्रबन्ध कला तथा विज्ञान दोनों ही है-प्रबन्ध में कला तथा विज्ञान दोनों की विशेषताओं का समावेश है। प्रबन्ध एक सामाजिक विज्ञान है, भौतिक विज्ञान नहीं कला तथा विज्ञान दोनों ही प्रबन्ध

को पूर्णता प्रदान करते हैं और इसलिए दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इसीलिए रॉबर्ट एनि है कि प्रवन्ध क्षेत्र में कला तथा विज्ञान एक सिक्के के दो पहलू है। प्रवन्ध के सिद्धान्त केवल वास्तविक स्थिति का ही विश्लेषण नहीं करते, अपितु आदर्श विधियों की ओर भी संकेत करते हैं प्रयोग से सर्वोत्तम, सर्वाधिक तथा सत्ता उत्पादन सम्भव हो सकता है। प्रवन्ध के सिद्धान्त हमे बतलाते हैं कि आदर्श मजदूरी वा पूर्ण रोजगार के विन्दु तक पहुँचने के लिए हमें किन-किन व्यावहारिक नियमों का पालन करना चाहिए। न्यूनतम लागत पर अधिकतम तथा बेष्ठतम उत्पादन कैसे प्राप्त हो सकता है।

उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि प्रबन्ध विज्ञान ही नहीं, बल्कि कला भी है। प्रवन्ध जहाँ विज्ञान के रूप में सिद्धान्तों एवं नियमों का प्रतिपादन करता है, वहाँ कला के रूप में इन सिद्धान्तों एवं नियमों को प्रतिपादित करता है।

(4) प्रबन्ध एक पेशा है-वर्तमान युग में प्रबन्ध का नया स्वरूप सामने आया है। प्रबन्ध एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति न रहकर एक विशिष्ट विज्ञान के रूप में विकसित हुआ है जिसमें विशेष ज्ञान एवं चातुर्य की आवश्यकता होती है इसलिए प्रबन्ध पेशे के रूप में विकसित हुआ है। पेशा वास्तव में निश्चित प्रतिफल के बदले विशिष्ट तकनीकी ज्ञान एवं योग्यता के आधार पर लोगों की सेवा के उद्देश्य से किया जाने वाला एक धन्धा है। प्रबन्ध में भी पेशों के समान निश्चित ज्ञान एवं तकनीकी योग्यता की आवश्कयता होती है और इसको प्राप्त करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाता है। वर्तमान समय में बिना प्रवन्ध विज्ञान की जानकारी के सफलता पाना कठिन है। अतः आज के युग में प्रवन्ध पेशे के रूप में विकसित हुआ है।

(5) प्रबन्ध एक जटिल एवं सतत् सामाजिक कार्य-विधि है-कार्य-विधि का रूप निश्चित कर देने से अर्थात् हमें कौन-सा कार्य कैसे करना चाहिए और दूसरों से क्या अपेक्षा करनी चाहिए यह निर्धारित कर देने से ही उद्देश्य में सफलता नहीं मिलती है, वरन पुराने ढंग त्यागकर उनके स्थान पर नये ढंग अपनाये जा सकते हैं। प्रबन्ध भी एक कार्यविधि है क्योंकि इसके अन्तर्गत एक के बाद एक ऐसे अनेक कार्य करने पड़ते हैं जो निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होते हैं। अतः प्रबन्ध एक कार्य-विधि है। मानवीय आचरणों एवं पारस्परिक सम्बन्धों से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण यह सामाजिक कार्य-विधि है। प्रबन्ध एक जटिल कार्य है क्योंकि हमारा मस्तिष्क इसके सभी पक्षों को एक साथ ग्रहण करने में असमर्थ रहता है।

(6) प्रबन्ध का सामाजिक उत्तरदायित्व होता है-अपने महत्व के कारण प्रबन्ध आज समाज का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया है। यह कहा जाने लगा है कि प्रबन्ध केवल एक नियोक्ता का प्रतिनिधि नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधि है। ‘प्रबन्ध’ केवल अपने स्वामी के प्रति ही उत्तरदायी नहीं होता, वरन सम्पूर्ण समाज के प्रति उसका उत्तरदायित्व होता है। अतः वह ऐसा कार्य नहीं कर सकता जो समाज की आशाओं, भावनाओं तथा आवश्यकताओं के प्रतिकूल हो। प्रबन्ध के ग्राहकों, कर्मचारियों, पूर्तिकत्ताओं, नियोक्ता, सरकार तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व होते हैं। निष्कर्ष रूप में प्रबन्ध का उत्तरदायित्व बहुदिशायी है, उसे एक प्रन्यासी या ट्रस्टी के रूप में काम करना चाहिए जिससे कि समाज के विभिन्न वर्गों के प्रति प्रबन्ध अपने उत्तरदायित्व का पालन कर सके।

(7) प्रबन्ध एक प्रणाली है-प्रबन्ध एक प्रणाली है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रबन्ध किसी एक पहलू के स्थान पर सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करने पर बल देता है। अर्थात् इसमें किसी एक भी भाग के अध्ययन के स्थान पर समग्र रूप से सभी भागों का अध्ययन किया जाता है। उदाहरणार्थ, हर एक संगठन में काम करने वाले व्यक्तियों का समूह होता है, जिनमें परस्पर औपचारिक सम्बन्ध होते हैं। इस समूह का हर एक व्यक्ति स्वतन्त्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए काम नहीं करता, अपितु संगठन के सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही काम करता है। अतः प्रबन्धकों को संगठन के प्रत्येक व्यक्ति की क्रिया को एक अंग के रूप में और सभी क्रियाओं को सम्मिलित रूप में ‘एक प्रणाली’ के रूप में स्वीकार करना चाहिए और तदानुसार प्रबन्ध का कार्य करना चाहिए।

(8) प्रबन्ध एक समग्र विचार है-आधुनिक विचारक यह स्वीकार करने लगे हैं कि प्रबन्ध एक एकीकृत या समन्वित अवधारणा है। यह प्रत्येक समाज, राष्ट्र संस्था तथा समय के सांस्कृतिक आदर्शों के अनुरूप आचरण करती है। इसे केवल नियोजन, संगठन, निर्देशन, समन्वय व नियन्त्रण तक ही

सामाजिक प्रक्रिया के रूप में फेयोल द्वारा प्रतिपादित 14 सिद्धान्तों में बाँधकर प्रणाली के रूप में हो स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रवन्ध का क्षेत्र इन सबसे अधिक व्यापक है। आज प्रवन्ध को एक एकीकृत अभिकरण के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।

प्रबन्ध का क्षेत्र (Scope of Management)

आधुनिक युग के प्रबन्ध का क्षेत्र अनेकानेक संगठित क्रियात्मक गतिविधियों तक विस्तृत हो गया है। प्रबन्ध शिक्षा समिति, लंदन के प्रतिवेदन में प्रबन्ध के क्षेत्र में निम्न क्रियात्मक गतिविधियों को शामिल किया गया है

(1) वित्तीय प्रबन्ध-इसमें आर्थिक पूर्वानुमान लेखांकन, लागत लेखांकन, लागत लेखा विधि, सांख्यिकी नियंत्रण, बजटीय नियंत्रण, बीमा और एक्चुरियल विधि शामिल हैं। (2) उत्पादन प्रबन्ध-इसमें कार्य विश्लेषण, अनुसूचियन, नित्य क्रमण, नियोजन, किस्म

नियंत्रण, समय और विधि अध्ययन शामिल हैं।

(3) विकास प्रबन्ध-इसमें सामग्री, मशीन और एवं व्यावहारिक शोध सम्मिलित हैं। औद्योगिक

प्रक्रियाओं, संयंत्रों आदि में भौतिक विज्ञान के उपभोक्ता

तथा उत्पादन के बीच इन्हें संबंधित

करना। (4) वितरण प्रबन्ध-इसमें विपणन, क्रय-विक्रय उपभोक्ता शोध, विज्ञापन शामिल है। (5) क्रय प्रबन्ध-इसमें निविदा पद्धति, ठेका पद्धति, भण्डारण एवं स्कन्ध नियंत्रण सम्मिलित

है।

(6) परिवहन प्रबन्ध-इसका प्रबन्ध सड़क, रेल, जल एवं वायु परिवहन के साथ-साथ संवेष्टन एवं भण्डारण से है।

(7) अनुरक्षण प्रबन्ध-इसका संबंध भवन, संयंत्र, साज-सामान और सम्पदा कार्य को कार्यशील

बनाये रखने से है।

(8) सेविवर्गीय प्रबन्ध-इसमें सेविवर्गियों का चयन, रोजगार, पदस्थापन, प्रशिक्षण, स्थानान्तरण, पदोन्नति, सेवानिवृत्ति के साथ-साथ कल्याणकारी सेवाएँ तथा सुरक्षा भी शामिल है।

(9) कार्यालय प्रबन्ध- इसमें सम्प्रेषण, अभिलेखन, तथा कार्यालय के आयोजन एवं नियंत्रण के संबंध में सभी प्रकार की व्यवस्था शामिल है।


Meaning and Definition of Management

In the present age of complex business competition, management is used in many senses. In fact, management is a way to get work done from others. For the workers working in an enterprise, the management thinks about how the workers can be managed well. It is the management that decides ‘what exactly is to be done and what is the best way to do it? Thus, the meaning of management is to get the work done by other people so that pre-determined objectives or goals can be achieved in the prescribed time period.

(1) James L. According to Lundy (James L. Lundy), “Management is primarily the act of planning, coordinating, motivating and controlling the efforts of others for the attainment of specific objectives.”

(2) F. According to W, Taylor (F. W. Taylor), “Management is the art of knowing that you

What do you want people to do, then see that they do it in the best and most economical way?

doing it or not.”

(3) According to Henry Fayol, “Management means to anticipate and plan, to organize, to command and to direct, to coordinate and to control”.

is from. ,

(4) According to Clough, “Management is the art of decision making and leadership and

is science.”

(5) J. N. According to Schulze (J. N. Schulze), “Management is that power which is predetermined.

Leads, guides and guides the organization to achieve the goals. ,

Nature of Management

The nature of management is multi-directional. Different scholars look at management from different points of view, hence its nature or nature is not clear. Nevertheless, on the basis of the concepts and characteristics of management, the following aspects can be propounded regarding its nature:

(1) Management is an innate or acquired talent – In ancient times, it has been the belief of most people that ‘management is an innate talent’ i.e. ‘managers are born, they cannot be made’. The belief behind this belief was that some individuals are born with the qualities and characteristics that are needed for efficient management, but the development of knowledge, science, technology and training facilities changed this ideology. done. Today the ownership and management of business have become separate. Managers are being replaced by trained and professional people. In such a situation, management cannot be called an innate talent. at the present time such

There are many managers who achieved various achievements after getting education in management science, while their parents had no relation with management. Therefore it can be said that “Management is not an innate talent, but an acquired talent as well.”

(2) Management is universal or universal – Management is a universal action, which is carried out equally in every organization, whether it is a social institution or religious, political or commercial. In conclusion, it can be said that the principles and functions of management reflect the nature of their universality to a great extent, but the circumstances of their implementation may be different according to the nature, size and background of the organization. The principles of management are flexible and can be applied under any circumstances as per the requirement. (3) Management is science and art – management is art or science or both, the fact that

To ascertain the truth, it is necessary that management as an art and as a science of management.

Why it is in the form, it will be studied separately. Management is a science – systematic and systematic study of any branch of knowledge is called ‘science’. It is that form of knowledge in which theories are made by observation and experiment and the relationship between cause and effect is established. Therefore, any type of systematic knowledge is called science which is based on a certain principles, that is, the form of knowledge in which observation is there, it is called science. We can divide science into two categories – (a) real science i.e. ‘what is it?’, and (v) ideal or policy based science i.e. ‘what should be?’ knowledge of. In real science we analyze the present state only, whereas in policy based science we determine the ideal. When we try to test management, many questions naturally arise- (i) Is management based on observation, survey, experiment and cause and result relationship? (ii) Are the principles of management universal? (iii) Is there a consensus view of management? The promoters of this concept believe that some principles of management have taken the form of fully developed theories, while many theories are still in the stage of development. The principles of management are related to cause-effect relationships and they are based on extensive experiments, observations, experiments and practical experiences. These principles are also universal and also represent the universally accepted ideology of management. In other words, management as a science is continuously evolving with new dimensions with its rules, principles, techniques, methods etc.

• As a conclusion we can say that management is a developing and dynamic science

which is related to human behavior. Therefore, like physical and chemical science, it cannot be a definite and correct science. Management is a simple and flexible science, which cannot be bound by rigid rules. Management is akin to medical science and engineering, which require the coordinated use of theoretical and practical knowledge.

Management is also an art – Art refers to the practical use of knowledge. According to the delay, the attainment of the desired result through skillful use, the art of art shows the means to achieve the goal set by the ideal science. Art presents those methods and methods, through which the ideal is achieved and the undesirable things are kept aside. In other words, art is a method of practical application of available knowledge. In the words of Taylor, three-fourth of the knowledge of ‘management’ is practical and one-fourth is general knowledge. To get the best results, it is necessary to reinforce theoretical knowledge with practical knowledge and this is what art does. The meaning of art is to know how a work can be done and in fact it should be done that way.

Management is both an art and a science – Management includes the characteristics of both art and science. Management is a social science, not a physical science, both an art and a science.

and hence both complement each other. That is why it is Robert Enney that in the field of management, art and science are two sides of the same coin. The principles of management do not only analyze the actual situation, but also indicate the ideal methods, which can be used to produce the best, maximum and power. The principles of management tell us what practical rules we should follow in order to reach the point of ideal wage or full employment. How to get maximum and optimum output at minimum cost.

From the above analysis it is clear that management is not only a science but also an art. Where Prabandha propounds principles and rules in the form of science, it propounds these principles and rules in the form of art.

(4) Management is a profession – a new form of management has emerged in the present era. Management has developed as a special science rather than a psychological tendency, which requires special knowledge and tact, hence management has developed as a profession. Profession is actually a profession done for the purpose of serving people on the basis of specific technical knowledge and ability in return for a fixed return. Management also requires certain knowledge and technical ability like professions and adequate training is given to achieve this. At present, it is difficult to get success without the knowledge of management science. Therefore, in today’s era, management has developed as a profession.

(5) Management is a complex and continuous social process – by deciding the form of the procedure, that is, what work we should do and what we should expect from others, it does not achieve success in the objective. Rather, the old ways can be abandoned and new methods can be adopted in their place. Management is also a procedure because under it, many such tasks have to be done one after the other which are helpful in fulfilling the purpose. Therefore, management is a method. It is a social method because of its close relation with human behavior and interpersonal relationships. Management is a complex task because our mind is unable to handle all its aspects at once.

(6) Management has social responsibility – Due to its importance, management has become an important part of society today. It is beginning to be said that management is not the representative of an employer only, but the representative of the whole society. ‘Management’ is not only responsible to its owner, but it is responsible to the whole society. Therefore, he cannot do such work which is against the hopes, feelings and needs of the society. Management has responsibilities towards customers, employees, suppliers, employers, government and society. In conclusion, the responsibility of the management is multi-directional, it should work as a trustee or trustee so that the management can fulfill its responsibility towards different sections of the society.

(7) Management is a system – Management is a system. This means that management emphasizes on considering all the aspects together rather than on any one aspect. That is, instead of studying any one part, all the parts are studied as a whole. For example, in every organization there is a group of people working in which there is a formal relationship with each other. Every individual in this group does not work for the fulfillment of an independent objective, but works only for the fulfillment of the general objectives of the organization. Therefore, the managers should accept the actions of each person in the organization as a part and all the activities collectively as ‘a system’ and should do the work of management accordingly.

(8) Management is a holistic idea – Modern thinkers have started accepting that management is an integrated or integrated concept. It behaves according to the cultural ideals of every society, nation, institution and time. It is only about planning, organizing, directing, coordinating

up to control

As a social process, it cannot be accepted as a system by binding to the 14 principles propounded by Fayol. The scope of management is the most extensive of these. Today the management has been recognized as an integrated agency.

Scope of Management

The scope of modern era management has expanded to a number of organized functional activities. The following functional activities in the field of management have been included in the report of Management Education Committee, London

(1) Financial Management- It includes economic forecasting accounting, cost accounting, cost accounting method, statistical control, budgetary control, insurance and actuarial method. (2) Production Management – ​​It includes job analysis, scheduling, routine sorting, planning, variety

Includes control, time and method studies.

(3) Development Management – ​​It includes material, machine and practical research. industrial

Consumers of physics in processes, plants, etc.

and related them between production Doing. (4) Distribution Management – It includes marketing, buying and selling, consumer research, advertising. (5) Purchase Management – It includes tender system, contract system, storage and inventory control.

Is.

(6) Transport Management – ​​It is managed by road, rail, water and air transport as well as packaging and storage.

(7) Maintenance Management – It is concerned with keeping the building, plant, furnishings and estate work functional.

is to maintain.

(8) Departmental Management – This includes selection of employees, employment, posting, training, transfer, promotion, retirement as well as welfare services and security.

(9) Office Management- It includes all kinds of arrangements in relation to communication, recording, and organization and control of the office.

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