प्राथमिक एवं द्वितीयक समकों में अन्तर समझाइए। द्वितीयक समकों के संग्रहण के विभिन्न स्रोतों का वर्णन कीजिए। द्वितीयक समंकों के उपयोग से पहले क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए ? Explain the difference between primary and secondary equations. Describe the various sources of collection of secondary data. What precautions should be taken before using secondary data?

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सांख्यिकीय अनुसन्धानों में समकों का संकलन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। संग्रहित आंकड़े सांख्यिकीय विवेचन की आधारशिला होते हैं। अशुद्ध तथा अविश्वसनीय आंकड़ों से परिणाम भी गलत प्राप्त होते हैं, संग्रहीत समंक मौलिक रूप से सांख्यिकीय विवेचन के लिये कच्ची सामग्री होते हैं। इसीलिये प्रो. बाउले का मत है कि “समंक संकलन में सामान्य विवेक की प्रमुख आवश्यकता है और अनुभव मुख्य शिक्षक है।” प्राथमिक समक संकलन में धन तथा समय अधिक लगते हैं तथा इसमें गलती होने की सम्भावना पायी जाती है। इनसे बचने के लिये द्वितीयक समंक का सहारा लिया जाता है।

द्वितीयक समक वे समंक हैं जिन्हें पूर्व में किन्हीं व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा एकत्रित किया गया है तथा सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग उनके द्वारा किया जा चुका है। जब कोई अनुसन्धानकर्ता इन आंकड़ों का प्रयोग अपने अनुसन्धान में करता है तो ये आंकड़े उसके लिये द्वितीयक समंक हो जाते हैं। उदाहरणार्थ, ग्रामीण ऋणग्रस्तता का अध्ययन करने के लिये इस विषय पर प्रकाशित रिजर्व बैंक के आंकड़ों का प्रयोग किया जाता है तो यह द्वितीयक सामग्री होगी। इसलिये कहा जाता है कि द्वितीयक समंक वे हैं जिनका संग्रह किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा पहले किया गया है तथा प्रयोग अनुसन्धानकर्ता द्वारा अपने शोध में किया जा रहा है।

प्राथमिक एवं द्वितीयक समंक में अन्तर (Difference between Primary and Secondary Data) प्राथमिक एवं द्वितीयक समंक में अन्तर को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) प्राथमिक समंक वे समंक हैं, जो अनुसन्धानकर्ता द्वारा स्वयं अपने प्रयोग के लिए मौलिक रूप से एकत्रित किये जाते हैं। इसके विपरीत द्वितीयक समंक वे समंक है जो अनुसन्धान कर्ता द्वारा स्वयं संकलित नहीं किये जाते बल्कि पहले से संकलित होते हैं।

(2) प्राथमिक समंक मौलिक होते हैं, क्योंकि इनका प्रयोग अनुसन्धानकर्ता द्वारा प्रथम बार किया जाता है। इसके विपरीत, द्वितीयक समंकों में मौलिकता नहीं पायी जाती है, क्योंकि द्वितीयक समंक सांख्यिकीय यन्त्रों से लेकर एक बार गुजर चुकते हैं।

(3) प्राथमिक समंक अनुसन्धान के उद्देश्य के प्रतिकूल होते हैं, जबकि द्वितीयक समक अनुसन्धान के उद्देश्य के पूर्णतया अनुकूल नहीं होते हैं, क्योंकि द्वितीयक समंक किसी अन्य उद्देश्य से एकत्रित किये जाते हैं।

(4) प्राथमिक समंक अनुसन्धानकर्ता द्वारा किसी भी रीति से स्वयं संकलित किये जाते हैं, क्योंकि द्वितीयक समंक अन्य अनुसन्धानकर्ता द्वारा किसी भी रीति से स्वयं संकलित किये जाते हैं, क्योंकि द्वितीयक समंक अन्य अनुसन्धानकर्ता द्वारा पहले से ही संकलित रहते हैं।

(5) प्राथमिक समंक के संकलन में समय, धन एवं श्रम का अधिक व्यय होता है, जबकि द्वितीयक समंक कम व्यय से आसानी से पत्र-पत्रिकाओं और अन्य प्रकाशनों में उपलब्ध हो जाते हैं।”

द्वितीयक समंकों के संकलन की रीतियाँ (Methods of Collecting Secondary Data) द्वितीयक समंक के प्राप्त करने के प्रायः दो स्रोत पाये जाते हैं—(i) प्रकाशित होत तथा अप्रकाशित खोत । अधिकांश अनुसन्धानकर्ता प्रकाशित समंकों का ही उपयोग करते हैं। इसके प्राप्त होने के मुख्य स्रोत निम्न प्रकार पाये जाते हैं

(i) सरकारी प्रकाशन (Government Publication), (ii) समितियों तथा आयोगों की रिपोर्ट (Report of Committee and Commission), (iii) अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रकाशन (Publication of International (iv) विश्वविद्यालयों तथा शोध संस्थाओं के प्रकाशन (Publications of Universities Institutions),and Research Institutions), (v) व्यापारिक संगठनों के प्रकाशन (Publications of Trade Organizations), (vi) गैर सरकारी समंक प्रकाशन (Non Govt. Data Publications), (vii) समाचार पत्र एवं पत्रिकायें (News Paper and Magazines), (viii) व्यक्तिगत शोधकर्त्ता (Individual Researchers ) |

द्वितीयक समंकों के प्रयोग में सावधानियाँ (Precuations before Using Secondary Data) यद्यपि द्वितीयक समंकों का संकलन सरल तथा कम खर्चीला होता है फिर भी इसके उपयोग में सावधानी की आवश्यकता होती है। प्रो. कार्नर का कथन है कि “समंक विशेष रूप से अन्य व्यक्तियों के द्वारा संकलित समंक, यदि सावधानी से प्रयोग में न लाये जायें तो वे प्रयोगकर्ता के लिये अनेक त्रुटियों से पूर्ण होते हैं।” अतः द्वितीयक समंकों के प्रयोग करने के पूर्व निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है

1. पूर्व अनुसन्धान का उद्देश्य (Objective of Previous Investigation),

2. पूर्व अनुसन्धानकर्ता की योग्यता या ख्याति (Ability or Good will of Previous Investigators),

3. समंक संकलन का समय (Time of Data Collection), 4. समंक संकलन की रीति (Method of Data Collection)

5. सन्निकटीकरण की सीमा (Limits of Approximation), 6. विभिन्न समंकों की तुलना (Comparison of Different Data),

7. इकाई की परिभाषा (Definition of Units),

8. परीक्षात्मक जाँच (Experimental Test), 9. शुद्धता का स्तर (Level of Accuracy)।

अतएव द्वितीयक समंकों के उपयोग करने के पूर्व उनकी अच्छी तरह से जाँच किया जाना आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में प्रो. बाउले ने स्पष्ट रूप से कहा है कि “प्रकाशित समंकों को उनका अर्थ एवं उनकी सीमायें ज्ञात किये बिना उनको उसी रूप में मान लेना कभी खतरे से खाली नहीं है।”


Collection of data is very important in statistical research. Collected data is the cornerstone of statistical analysis. Inaccurate and unreliable data also lead to wrong results, the collected data is fundamentally the raw material for statistical analysis. That is why Prof. Baule is of the opinion that “common sense is the main requirement in data collection and experience is the main teacher”. Elementary aggregate compilation takes more time and money and there is a possibility of error in it. To avoid these secondary data is used.

Secondary data are those data which have been collected by some individuals or institutions in the past and have been used by them using statistical methods. When a researcher uses these data in his research, then these data become secondary data for him. For example, to study rural indebtedness, the published RBI data on this subject is used, then it will be secondary material. That is why it is said that secondary data are those which have been collected by another person earlier and are being used by the researcher in his research.

Difference between primary and secondary data The difference between primary and secondary data can be explained as follows

(1) Primary data are those data which are originally collected by the researcher for his own use. In contrast, secondary data are those data which are not collected by the researcher himself but are already collected.

(2) Primary data are original because they are used by the researcher for the first time. In contrast, originality is not found in secondary data, because secondary data has passed through statistical instruments once.

(3) Primary data is contrary to the purpose of research, whereas secondary data is not entirely suitable for the purpose of research, because secondary data is collected for some other purpose.

(4) Primary data is compiled by the researcher himself in any way, because secondary data is compiled by other researcher himself in any way, because secondary data is already compiled by other researcher.

(5) More time, money and labor are spent in the compilation of primary data, whereas secondary data are easily available in magazines and other publications with less expenditure.

Methods of Collecting Secondary Data (Methods of Collecting Secondary Data) There are usually two sources of secondary data – (i) published and unpublished sources. Most researchers use only published data. The main sources of its receipt are found as follows

(i) Government Publication, (ii) Report of Committees and Commissions, (iii) Publications of International Organizations (iv) Publications of Universities and Research Institutions Institutions),and Research Institutions), (v) Publications of Trade Organizations, (vi) Non-Govt. Data Publications, (vii) News Papers and Magazines , (viii) Individual Researchers |

Precautions before Using Secondary Data Although the collection of secondary data is simpler and less expensive, it requires caution in its use. Pro. Corner states that “Data, especially the data collected by other persons, if not used carefully, they are full of many errors for the user.” Therefore, before using secondary data, it is necessary to pay attention to the following points:

1. Objective of Previous Investigation,

2. Ability or Good will of Previous Investigators,

3. Time of Data Collection, 4. Method of Data Collection

5. Limits of Approximation, 6. Comparison of Different Data,

7. Definition of Units,

8. Experimental Test, 9. Level of Accuracy.

Therefore, it is necessary to check the secondary data thoroughly before using them. In this regard Prof. Boule has clearly stated that “it is never safe to treat published data as it is without knowing their meaning and limitations”.

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