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कम्पनी की निगमित अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। इसके लाभ-दोषों की विवेचना कीजिए।

एक कम्पनी का अस्तित्व उसके निगमन या समामेलन से होता है। निगमन होते ही कम्पनी कि अस्तित्व ग्रहण कर लेती है और उसे अपने सदस्यों से पृथक् निगमीय व्यक्तित्व प्राप्त हो ता है। निगमीय व्यक्तित्व प्राप्त होने के कारण कम्पनी कृत्रिम व्यक्तित्व की श्रेणी में आ जाती है। नके परिणामस्वरूप व्यवसाय की समस्त सम्पत्तियों पर कम्पनी का स्वयं का स्वामित्व हो जाता है र वह स्वयं अपने नाम से किसी पर वाद प्रस्तुत कर सकती है और अन्य पक्षों द्वारा उसके विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया जा सकता है। वह अपने नाम से सम्पत्ति खरीद सकती है और बेच सकती है, ने नाम से बैंक में खाता खोल सकती है और अनुबन्ध कर सकती है। इस प्रकार निगमन के चात् कृत्रिम व्यक्ति के रूप में एक कम्पनी वे समस्त कार्य करने में सक्षम हो जाती है जो कि एक पुष्य या व्यावसायिक व्यक्तिकर सकता है। इसे कम्पनी के निगमीय व्यक्तित्व के सिद्धान्त के नाम जाना जाता है।

कम्पनी के इस निगमीय व्यक्तितव के सिद्धान्त को कम्पनी अधिनियम में मान्यता दी गई है न्तु न्यायालयों द्वारा इस सिद्धान्त को मान्यता काफी पहले ही प्राप्त हो चुकी थी। इंग्लैण्ड में 1867 में ओक्स बनाम तरक्वेण्ड एण्ड हार्डिंग के बाद में कम्पनी के निगमीय व्यक्तित्व के सिद्धान्त। लाईस-सदन (House of Lords) द्वारा मान्यता दी गई। 1897 में सालोमन बनाम सालोमन . लि. के बाद में इस सिद्धान्त को दृढ़ता के साथ स्थापित एवं पुष्ट किया गया। यह वाद इस क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध हुआ और अत्यन्त लोकप्रिय हुआ।

सालोमन नाम का एक व्यक्ति जूतों का व्यापार करता था। उसका व्यापार अच्छी स्थिति में: उसने अपने व्यापार को और अधिक बढ़ाने के लिए सालोमन एण्ड कम्पनी लिमिटेड’ नाम से एक कम्पनी की स्थापना की। सालोमन ने अपना व्यापार कम्पनी को 38,782 पौण्ड में बेच दिया। कम्पनी के पास सालोमन को देने के लिए नकद रुपया नहीं था। अतः विक्रय मूल्य के भुगतान रूप में 20,000 पौण्ड के पूर्णदत्त अंश एवं 10,000 पौण्ड के जमानती ऋणपत्र दिये। शेष राशि भुगतान नकद किया गया। 10,000 पौण्ड का सालोमन ने जो ऋण दिया और ऋणपत्र प्राप्त किये उस ऋण की सुरक्षा के लिए कम्पनी की सम्पत्ति सालोमन के प्रति बन्धक कर दी गई थी। सालो एण्ड कम्पनी के सभी सदस्य एक ही परिवार के थे। सालोमन, उसकी पत्नी, पुत्री व 4 पुत्र प्रकार एक ही परिवार के 7 सदस्यों द्वारा कम्पनी का निर्माण हुआ। कम्पनी के संचालक मण्डल सालोमन व उसके दो पुत्रों को सम्मिलित किया गया। सालोमन को प्रबन्ध संचालक एवं उसके दो बड़े पुत्रों को संचालक नियुक्त किया गया। चमड़े के व्यवसाय में हड़ताल के कारण कुछ समय पश्चात् ही कम्पनी को काफी हानि उठानी पड़ी और कम्पनी का समापन करना पड़ा। समापन के समय कम्पनी

की स्थिति निम्न प्रकार थी सम्पत्तियाँ 6,000 पौण्ड

देनदारियाँ- (i) ऋणपत्र 10,000 पौण्ड (ii) असुरक्षित ऋणदाता (Unsecured Creditors) 7,000 पौण्ड ।

ऋणपत्रधारी को अप्रतिभूत या असुरक्षित ऋणदाता की तुलना में भुगतान में प्राथमिकता प्रदान की जाती है। अतः सालोमन ने अपने ऋण के भुगतान में 6,000 पौण्ड ले लिये और इस प्रकार असुरक्षित ऋणदाताओं के ऋण को चुकाने के लिए कम्पनी के पास कुछ शेष नहीं बचा असुरक्षित ऋणदाताओं ने ऐसी स्थिति में कम्पनी के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया और यह तर्क प्रस्तुत किया कि कम्पनी का कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व नहीं था और सालोमन तथा सालोमन एण्ड कम्पनी के अधिकांश अंश सालोमन के पास थे और अन्य सदस्यों के पास नाम मात्र के अंश थे। सालोमन एवं सालोमन के दो पुत्र संचालक थे जिन पर सालोमन का पूर्ण नियन्त्रण था। कम्पनी सालोमन की एजेण्ट मात्र थी। कम्पनी तो केवल धोखा मात्र थी। अतः सालोमन को सबसे पहले असुरक्षित ऋणदाताओं का भुगतान करना चाहिए। असुरक्षित ऋणदाताओं का पूर्ण भुगतान करने के पश्चात् ही सालोमन द्वारा धारित ऋणपत्रों का भुगतान किया जाना चाहिए। अधीनस्थ न्यायालयों ने असुरक्षित ऋणदाताओं के तर्क को स्वीकार कर लिया और निर्णय उनके पक्ष में तथा सालोमन के विरुद्ध दिया।

अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध सालोमन ने हाउस ऑफ लाईस में अपील की। हाउस ऑफ लार्ड्स ने अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णय को पलट दिया और सर्वसम्मति से सालोमन के पक्ष में निर्णय दिया। लार्ड्स सदन के निर्णय के अनुसार कानून की दृष्टि में कम्पनी का ज्ञापन पत्र पर हस्ताक्षरकर्ताओं से बिल्कुल पृथक् अस्तित्व होता है। यद्यपि यह सम्भव कि निगमन के पश्चात् कम्पनी का कारोबार पहले जैसा रहा हो तथा उसके प्रबन्धक भी वे ही व्यक्ति रहे हों तथा लाभ भी केवल उन्हीं व्यक्तियों ने प्राप्त किया हो, इससे कम्पनी के मूल आशय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः सालोमन को कम्पनी के दायित्वों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया गया और निर्णय दिया गया कि सर्वप्रथम सालोमन द्वारा धारित ऋणपत्रों का भुगतान किया जाये। परिणामस्वरूप सालोमन को कम्पनी की बची हुई समस्त राशि (6,000 पौण्ड) का भुगतान कर दिया गया और सुरक्षित ऋणदाताओं को कुछ भी राशि प्राप्त नहीं हुई।

• भारत में मान्यता – भारत में इस सिद्धान्त को 1886 में ही मान्यता मिल गई जब कण्डोली टी कम्पनी लिमिटेड, रि. बाद में न्यायालय ने निर्णय दिया कि कम्पनी एक पृथक् व्यक्ति है, जो कि अपने अंशधारियों से सर्वथा भिन्न है। कम्पनी द्वारा सम्पत्ति अन्तरित किया जाना ठीक वैसा ही अन्तरण है. जैसे कि एक व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को अन्तरित किया गया हो। इस वाद के तथ्यों के अनुसार कुछ व्यक्तियों ने चाय का बगीचा एक कम्पनी को बेचा। उन्होंने अन्तरण पत्र पर लगने वाले टिकट से इस आधार पर छूट माँगी कि वास्तव में वे ही कम्पनी के अंशधारी थे और अन्तरण उन्हीं को होना था परन्तु न्यायालय ने वादीगण के तर्क को अमान्य कर दिया और कहा कि कानून की नजर में कम्पनी का पृथक् निगमीय व्यक्तित्व है और वह अंशधारियों से पूर्णतः भिन्न है।

कम्पनी की प्रकृति (Nature of Company)

कानून के अन्तर्गत व्यक्तियों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है- (1) प्राकृतिक व्यक्ति, जैसे मनुष्य, तथा (2) कृत्रिम व्यक्ति जैसे-कम्पनी, जो कानूनी प्रक्रिया से निर्मित होती है। कानूनी व्यक्ति, मनुष्य अथवा कोई अन्य हो सकता है। किन्तु प्रत्येक स्थिति में उसके अधिकारों एवं कर्त्तव्यों का निर्धारण कानून द्वारा किया जाता है। मनुष्य आजीवन कानूनी व्यक्ति बना रहता है। यद्यपि मनुष्य एक कानूनी व्यक्ति होता है, किन्तु प्रत्येक कानूनी व्यक्ति के लिये मनुष्य होना आवश्यक नहीं। कम्पनी या निगम को गैर-मानवीय कानूनी व्यक्ति कहते हैं तथा उसका जन्म प्राकृतिक नियमों के अनुसार न होकर, कानूनी प्रक्रिया द्वारा होता है।

कम्पनी का अस्तित्व केवल कानून की दृष्टि में है, उसका अपना कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता Lord Lindley के अनुसार, “कम्पनी कई ऐसे व्यक्तियों का एक संगठन है जो रुपये अथवा समान मूल्य का अंशदान एक सामान्य कोष में जमा करते हैं। सामान्य कोष का उपयोग व्यापार अथवा व्यवसाय (अर्थात् समान उद्देश्य के लिये किया जाता है। ये व्यक्ति सामान्य व्यापार से उत्पन्न लाभ अथवा हानि का आपस में बँटवारा करते हैं। सामान्य कोष को प्रचलित मुद्रा, अर्थात् रुपयों में प्रकट किया जाता है। यह कोष कम्पनी की पूँजी होता है। सामान्य कोष के लिए अंशदान करने वाले व्यक्ति सदस्य कहलाते हैं। पूँजी के जिस अनुपात पर किसी एक सदस्य का अधिकार होता है, उसे उस सदस्य का शेयर (अंश) कहते हैं। सामान्यतया शेयर हस्तान्तरणीय होते हैं, यद्यपि अधिकतर स्थितियों में हस्तान्तरण का अधिकार प्रतिबन्धित किया जाता है।” समामेलन के बाद कम्पनी समामेलित संस्था अथवा निगम कहलाती है। कम्पनी निगम मुद्रा तथा शाश्वत् उत्तराधिकार से युक्त होती है। कम्पनी का व्यक्तित्व उसके सदस्यों से सर्वथा भिन्न होता है। इसी कारण उसका सदस्य किसी एक समय पर कम्पनी का शेयरधारी तथा लेनदार, दोनों हो सकता है। निगमीय व्यक्तित्व की प्रकृति को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. पृथक् वैधानिक अस्तित्व (Separate Legal Entity), 2. पृथक सम्पत्ति (Separate Property ),

3. शाश्वत अथवा स्थायी उत्तराधिकार (Perpetual Succession), 4. सीमित दायित्व (Limited Liability),

5. अंशों की हस्तान्तरणीयता (Transferability of Shares),

6. वाद प्रस्तुत करने का अधिकार (Right to Sue), 7. केन्द्रीयकृत प्रबन्ध (Centralised Management),

8. पर्याप्त वित्त की उपलब्धता (Availability of Adequate Finance), 9. सदस्यों की असीमित संख्या।

निगमीय व्यक्तित्व के लाभ

(Advantages of Corporate Personality) कम्पनी का एक निगमीय व्यक्तित्व है। निगमीय व्यक्तित्व के कारण व्यवसाय के अन्य प्रारूपों की तुलना में कम्पनी को अनेक लाभ प्राप्त हैं। प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं (1) विस्तृत वित्तीय साधन (Immence Financial Resources) कम्पनी को अधिक मात्रा

में पूँजी एकत्र करने की सुविधा होती है। इसके तीन कारण हैं–(i) सदस्यों की अधिकतम संख्या पर प्रतिबन्ध न होना, (ii) सीमित दायित्व का होना, (iii) विभिन्न प्रकार के अंश पत्रों व ऋण-पत्रों का निर्गमन करना। इन तीन सुविधाओं के कारण विभिन्न आर्थिक स्थितियों तथा मनोवृत्ति वाले व्यक्तियों को अपनी पूँजी विनियोजित करने के लिए सुरक्षित साधन मिल जाता है। इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा करके अधिक मात्रा में पूँजी एकत्रित हो जाती है जिसके द्वारा भीमकाय उद्योगों को प्रोत्साहन मिलता है।

इसके विपरीत, साझेदारी संस्था में सदस्यों की संख्या सीमित किन्तु दायित्व असीमित होने के कारण

पूँजी की मात्रा सीमित रहती है। (2) स्थायी जीवन (Stable Life) कम्पनी अविच्छिन्न उत्तराधिकार वाली कृत्रिम व्यक्ति है। इसका जीवन स्थायी होता है। साझेदारी की तरह सदस्यों के पागल, दिवालिया या मृत्यु होने पर सदस्यों, संचालकों तथा प्रबन्धकों में परिवर्तन होने पर कम्पनी समाप्त नहीं होती। अंशधारियों आवागमन बराबर बना रहता है। परन्तु कम्पनी ययावत कार्य करती रहती है। कम्पनी का यह कम्पनी को दीर्घकालीन अनुबन्ध कराने योग्य बनाता है जिसके फलस्वरूप कम्पनी दीर्घकाली योजनायें बनाकर अधिक लाभ अर्जित करने में समर्थ होती है। (3) सीमित दायित्व (Limited Liability) कम्पनी के अंशधारियों का दायित्व उनके द्वार

क्रय किये गये अंशों के अंकित मूल्य तक सीमित होता है। इसका लाभ यह होता है कि थोड़ी आय वाले

विनियोक्तागण भी कम्पनी में अपनी पूँजी लगाने में संकोच नहीं करते। इसके फलस्वरूप कम्पर्क

को अधिक मात्रा में पूजी प्राप्त हो जाती है। (4) कर सम्बन्धी रियायते (Relief of Taxation) आयकर अधिनियम के अन्तर्गत एक एकाकी एवं साझेदारी व्यवसाय की अपेक्षा कम्पनी को कुछ विशेष रियायतें भी प्रदान की जाती है। (5) कुशल प्रबन्धक (Efficient Management) कम्पनी के पास असीमित साधन होते हैं। फलस्वरूप कम्पनी को योग्य, कुशल एवं अनुभवी विशेषज्ञों की सेवाओं का लाभ उठाना सरल होता है।

जिससे प्रबन्ध में कुशलता आ जाती है।

(6) आधुनिकतम उत्पादन विधियों का प्रयोग (Use of Modern Production Technique)-अधिक पूँजी तथा बड़े पैमाने का उत्पादन होने के कारण कम्पनी आधुनिकतम यन्त्र तथा संयन्त्रों का प्रयोग कर सकती है। यह विवेकीकरण को अधिक सीमा तक अपना सकती है। (7) जनता का विश्वास (Confidence of Public) कम्पनी अधिनियम में यह प्रावधान है कि

कम्पनी के वार्षिक खातों का प्रकाशन किया जाय। इससे जनसाधारण का विश्वास बढ़ता है और

कम्पनी में विनियोग को प्रोत्साहन मिलता है।

(8) जोखिम का विभाजन (Division of Risk) एक कम्पनी में सदस्यों की संख्या अत्यधिक

होने के कारण जोखिम कम हो जाती है। इसलिए कम्पनी अधिक जोखिमपूर्ण कार्यों को करने में समर्थ

होती है जबकि एकाकी एवं साझेदारी व्यापार के अन्तर्गत जोखिम कार्यों को करना, इतना अधिक

सरल नहीं होता है।

(9) अंश हस्तान्तरण की सुविधा (Transferability of Shares) कम्पनी के अंश बाजार में सुगमता से खरीदे व बेचे जा सकते हैं। इसका स्वतन्त्रतापूर्वक हस्तान्तरण होता रहता है। यह सुविधा अन्य प्रकार की संस्थाओं में नहीं होती है। (10) विनियोग सुविधाएँ (Investment Opportunities) जनसाधारण में छोटी-छोटी

बचतों को प्रोत्साहित करने के लिए कम्पनी संगठन का प्रारूप बहुत ही लाभदायक है। कम्पनी के

अंशों का अधिमान मूल्य कम होता है, इसी कारण छोटे विनियोक्ता भी अपनी बचतों को अंश अथवा

ऋणपत्रों में विनियोग कर सकते हैं।

निगमीय व्यक्तित्व की हानियाँ (Disadvantages of Corporate Personality)

अनेक लाभ होते हुए भी कम्पनी व्यवस्था में कुछ दोष भी हैं। निगमीय व्यक्तित्व के इन दोषों को निगमीय व्यक्तित्व या समामेलन के आवरण को हटाने के सिद्धान्त द्वारा काफी हद तक दूर किया जा सकता है। दोष निम्नलिखित हैं

1. निगमीय व्यक्तित्व के कारण कम्पनी का पृथक् वैधानिक अस्तित्व होता है। कृत्रिम व्यक्तित्व होने के बावजूद कम्पनी का कारोबार कुछ सजीव व्यक्तियों द्वारा व्यक्तियों के एक समूह के लाभ के लिए किया जाता है। इस प्रकार विधान द्वारा स्वतन्त्र पृथक् अस्तित्व प्राप्त होते हुए भी कम्पनी ऐसे व्यक्तियों का संघ है जो कम्पनी के कोषों का उपयोग लाभ अर्जित करने के लिए करते हैं। ऐसे व्यक्तियों द्वारा इन कोषों का दुरुपयोग सम्भव है।

2. निगमीय व्यक्तित्व का निर्माण करने के लिए अनेक वैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करना पड़ता है जिसमें काफी समय लगता है। प्रवर्तन, समामेलन, पूँजी अभिदान एवं व्यापार प्रारम्भ आदि कम्पनी के निर्माण की विभिन्न अवस्थाओं के लिए विभिन्न औपचारिकताएँ पूरी करनी होती हैं। और विभिन्न प्रपत्र तैयार करने पड़ते हैं। कम्पनी के समापन की कार्यवाही भी काफी जटिल व लम्बी होती है।

3. कम्पनी के कार्य क्षेत्र की सीमाएँ सीमानियम द्वारा निर्धारित होती हैं जिनसे बाहर कम्पनी नहीं जा सकती। इससे कम्पनी की प्रगति में रुकावट आती है।

4. स्वामित्व एवं प्रबन्ध में पृथकता के कारण अंशधारी लाभांश अथवा नियमित प्रत्याय में ही रुचि रखते हैं। कम्पनी के वास्तविक प्रबन्ध से उनका कोई सरोकार नहीं होता। यहाँ तक कि वे कम्पनी की वार्षिक सभाओं में उपस्थित होना भी आवश्यक नहीं समझते। इसके परिणामस्वरूप कम्पनी के संचालक प्रति पुरुष पद्धति से अनुपस्थित अंशधारियों के मतों का उपयोग अपने निजी हितों के लिए भी करते हैं।

5. कम्पनी के निर्माण के समय विभिन्न प्रपत्र, जैसे- पार्षद सीमानियम, पार्षद अन्तर्नियम, प्रविवरण आदि तैयार करने एवं रजिस्ट्रेशन शुल्क आदि पर काफी राशि व्यय करनी पड़ती है। वैधानिक अनिवार्यता के कारण इस व्यय से बचा नहीं जा सकता।

6. निगमीय व्यक्तित्व का एक दोष यह भी है कि एक अंशधारी अपनी पूँजी का आहरण सरलता से नहीं कर सकता। कम्पनी द्वारा जब तक अंशों के पुनः क्रय का निर्णय नहीं लिया जाता, कोई भी अंशधारी कम्पनी को अंश वापस लौटाकर अपनी राशि प्राप्त नहीं कर सकता। यह अवश्य सम्भव है कि अंशधारी अपने अंशों का हस्तांतरण अन्य व्यक्ति के पक्ष में कर दे।