भारतीय संविधान में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्वों (सिद्धान्तों) की विवेचना कीजिए। Discuss the Directive Principles (Principles) of State Policy mentioned in the Indian Constitution.

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डॉ. अम्बेडकर के अनुसार, “राज्य-नीति के निदेशक तत्व भारतीय संविधान की एक अनोखी और महत्वपूर्ण विशेषता है।” यह विशेषता केवल आयरलैण्ड के संविधान में ही पायी जाती है। भारतीय संविधान के चौथे भाग में अनुच्छेद 36 से लेकर 51 तक में नीति निदेशक तत्वों का समावेश है। ये तत्व राज्य द्वारा नीति बनाने के लिए मार्गदर्शक माने गये हैं।

संविधान निर्माता, भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाना चाहते थे, परन्तु कल्याणकारी राज्य की स्थापना एक ही रात में नहीं हो सकती। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संविधान निर्माताओं ने नीति निदेशक तत्वों के रूप में कुछ ‘आदर्श’ राज्य के सामने रखे जिन्हें वह धीरे-धीरे क्रियान्वित करता जाए। इस आधार पर कहा जा सकता है कि नीति निदेशक तत्व संविधान में अनावश्यक रूप से नहीं रखे गए हैं।

राज्य के यह नीति निदेशक तत्व जिनका पालन करने से भारत को सच्चे कल्याणकारी राज्य बनाने की कामना की गई है, राज्य इनके लिए बाध्य नहीं है, इनका पालन करना आवश्यक नहीं है। राज्य इनकी उपेक्षा भी कर सकता है और विरोध भी, क्योंकि न्यायायल इन तत्वों को क्रियान्वित नहीं कर सकता। संविधान में अनुच्छेद 37 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “इस भाग के लिए किये गये उपबन्ध न्यायपालिका द्वारा क्रियान्वित नहीं किये जा सकते।” इसीलिए तो प्रो. के. टी. शाह ने चुटकी लेते हुए कहा था, “वह एक ऐसा चेक है, जिसका भुगतान बैंक की सुविधा पर छोड़ दिया गया है।” इस प्रकार कहा जा सकता है कि नीति निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए राज्य बाध्यकारी नहीं है, लेकिन शासन को संविधान द्वारा यह साफ-साफ निर्देश दिया गया है कि इन तत्वों का पालन करना शासन का कर्त्तव्य है।

नीति निदेशक तत्वों का वर्गीकरण

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 38 से 51 तक में राज्य के नीति निदेशक तत्वों का वर्णन है। ये तेरह अनुच्छेद नवयुवकों को रोजगार देने और गोवध बन्द करने से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा तक की कामना करते हैं और राज्य के निर्देश देते हैं कि वह इनका पालन करें। डॉ. एम. पी. वर्मा ने इन नीति निदेशक तत्वों को तीन भागों में वर्गीकृत किया है- 1. समाजवादी सिद्धान्त, 2. गाँधीवादी

सिद्धान्त 3. बौद्धिक उदारवादी सिद्धान्त।

1. समाजवादी सिद्धान्त-वे नीति निदेशक तत्व जो एक शोषणयुक्त तथा परस्पर समानता पर आधारित समाज की स्थापना करते हैं, उन्हें समाजवादी नीति निदेशक तत्वों में वर्गीकृत किया गया है। संविधान में इन तत्वों का समावेश श्री नेहरू तथा उनके अन्य समाजवादी साथियों के आग्रह पर हुआ था। ऐसे तत्व निम्नलिखित है

(i) अनुच्छेद 38 में कहा गया है कि जनकल्याण के लिये राज्य सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा करेगा तथा उसका विस्तार करेगा और इसके लिए राज्य जितनी प्रभावशीलता और क्षमता के साथ सम्भव हो, एक सामाजिक व्यवस्था स्थापित करेगा, जिसमें न्याय, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समानता राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं के भाग होंगे 44वें संशोधन के अनुसार राज्य आय की असमानता को कम करेगा तथा सामाजिक स्तर सुविधाओं और अवसरों की असमानता, केवल व्यक्तियों की ही नहीं वरन् समूहों की असमानता भी कम करने का प्रयास करेगा।

(ii) संविधान के अनुच्छेद 39 में कहा गया है कि राज्य अपनी नीति का संचालन प्रकार करेगा कि- (क) स्त्री और पुरुष, सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो (ख) राष्ट्रीय धन का स्वामित्व और नियन्त्रण इस प्रकार किया जाए, जिससे सामूहिक हित की अच्छी से अच्छी व्यवस्था हो सके। (ग) आर्थिक व्यवस्था, इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी केन्द्रीकरण न हो। (घ) पुरुषों और स्त्रियों को समान कार्य के लिए समान वेतन हो। (ङ) श्रमिक पुरुषों और स्त्रियों के स्वास्थ्य और शक्ति तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो। (च) बच्चों को सुविधाएँ दी जाएँगी कि उनका स्वतन्त्रता और स्वाभिमान के वातावरण में स्वस्थ विकास हो सके तथा बचपन और यौवन के शोषण से एवं नैतिक व भौतिक अभाव से रक्षा की जायेगी।

42वें संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 39 (अ) जोड़ा गया है। इसमें सामान्य न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता का प्रावधान किया गया। इसमें कहा गया है कि राज्य इस बात की व्यवस्था करेगा कि कानूनी पद्धति के अवसर की समानता के अधिकार पर सबको न्याय मिले तथा उन लोगों के लिये जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, निःशुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था करेगा। (iii) अनुच्छेद 41 में कहा गया है कि राज्य काम पाने के शिक्षा पाने के तथा बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी आदि की दशाओं में सहायता पाने के अधिकार को क्रियान्वित करने का प्रयत्न करेगा। (iv) अनुच्छेद 42 के अनुसार राज्य काम की यथोचित और मनोवांछित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता की व्यवस्था करेगा। (v) अनुच्छेद 43 में कहा गया है कि राज्य कानून अथवा आर्थिक संगठन द्वारा ऐसी परिस्थिति पैदा करेगा जिससे कृषि-उद्योग तथा अन्य क्षेत्रों में श्रमिकों का कार्य तथा निर्वाह योग्य मजदूरी तथा उत्तम जीवन स्तर और अवकाश तथा सामाजिक व सांस्कृतिक सुअवसर प्राप्त हो ।

42वें संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 43 (अ) जोड़ दिया गया है। इसमें श्रमिकों द्वारा उद्योगों के संचालन में भाग लेने की व्यवस्था की गई है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि शासन इस बात को प्रोत्साहित करेगा कि उद्योगों के संचालन में श्रमिकों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाये। (vi) अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य ऐसा प्रयास करेगा कि भारत के सभी व्यक्तियों के लिए एक समान आचार संहिता बनाई जाए।

निःसंदेह इन नीति-निदेशक तत्वों के क्रियान्वयन से समाजवादी समाज की स्थापना होगी, शोषण समाप्त होगा और समाज में समानता और प्रसन्नता की वृद्धि होगी।

न्यायमूर्ति हेगड़े के अनुसार, “संविधान का अनुच्छेद-38 निदेशक सिद्धान्तों की नींव का पत्थर है। यह अनुच्छेद राज्य के लिए यह आशय का निर्देश है कि वह लोगों के कल्याण के संवर्द्धन के लिए उपयुक्त सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा करने के लिए हमारे संविधान की प्रस्तावना में अभिव्यक्त आशाओं को मूर्त रूप प्रदान करे।”

2. गांधीवादी सिद्धान्त राष्ट्रीय आन्दोलन में गांधीजी का योगदान सबसे अधिक रहा है। •गाँधीजी ने पिछड़ी हुई जाति और वर्गों को उठाने में अस्पृश्यता समाप्त करने में, कुटीर उद्योगों का प्रसार करने में तथा श्रमिकों के जीवन को स्वच्छ बनाने में अथक परिश्रम किया था। गांधीजी की एक विशिष्ट चिन्तन शैली थी। संविधान के ये नीति निदेशक तत्व जिन पर गांधीजी का चिन्तन शैली का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है, वे इस प्रकार हैं-(i) अनुच्छेद 40 के अनुसार, राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करेगा और उन्हें स्वायत्त शासन की शक्तियाँ देगा। (ii) अनुच्छेद 43 में में कहा गया कि राज्य गाँव में कुटीर उद्योग की स्थापना को प्रोत्साहित करेगा। (iii) अनुच्छेद 46 के अनुसार, राज्य समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से हरिजनों तथा अनुसूचित जातियों की शिक्षा और आर्थिक विकास पर विशेष बल देगा। (iv) अनुच्छेद 47 के अनुसार, राज्य ऐसा प्रयास करे कि लोगों का आहार पौष्टिक तथा जीवन स्तर ऊँचा हो उस उद्देश्य से राज्य हानिकारक मादक पेयों तथा मादक वस्तुओं के सेवन पर प्रतिबन्ध लगायेगा और ऐसी व्यवस्था करेगा कि इन मादक वस्तुओं का सेवन केवल चिकित्सा के उपयोग में हो। (v) अनुच्छेद 48 के अनुसार, राज्य कृषि एवं पशुपालन का वैज्ञानिक ढंग से संचालन करेगा, गोवंश की रक्षा करेगा, विशेषकर बछड़ों, दूध देने वाले तथा भारवाही पशुओं की रक्षा करेगा और वध को बन्द करेगा (गोवध बन्द करायेगा)। इन सिद्धान्तों के क्रियान्वयन से निश्चित ही एक गांधीवादी समाज की स्थापना को बल मिलता है।

3. उदारवादी सिद्धान्त-भारतीय समाज को स्वस्थ और प्रसन्न बनाने के लिए कुछ उदारवादी तत्वों का भी समावेश किया गया है, वे इस प्रकार हैं-(i) अनुच्छेद 45 के अनुसार, चौदह वर्ष तक के सभी बच्चों को राज्य की ओर से अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था राज्य करेगा। (ii) अनुच्छेद 48 के अनुसार, राज्य कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में वैधानिक पद्धति को प्रोत्साहित करेगा।

42वें संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 48(अ) जोड़ दिया गया है। इसके अनुसार राज्य पर्यावरण को शुद्ध बनाये रखने का प्रयास करेगा और देश के वर्षों तथा वन्य पशुओं की रक्षा का प्रयास करेगा। (iii) अनुच्छेद 49 में कहा गया है कि राज्य का यह कर्त्तव्य होगा कि वह प्रत्येक कलात्मक, ऐतिहासिक इमारत अथवा वस्तु की रक्षा करे जो राष्ट्र के लिये महत्त्वपूर्ण हो तथा वह नष्ट होने से, टूटने-फूटने से एवं उसके हटने या लुप्त होने से उसकी रक्षा करेगा। (iv) अनुच्छेद 50 में कहा गया है

कि राज्य यह प्रयत्न करेगा कि न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् किया जाए। (v) अनुच्छेद 51 में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा के लिए कुछ सिद्धान्त सुझाये गये हैं। इनमें कहा गया है कि अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में राज्य को ये प्रयत्न करने चाहिए-(क) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा के प्रयत्न (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाये रखने के प्रयत्न (ग) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने के प्रयत्न राज्य के ये नीति निदेशक तत्व उदारवादी कहे जा सकते हैं।

नीति निदेशक तत्वों का मूल्यांकन तथा महत्व-

1. नीति निदेशक तत्व अनावश्यक हैं-संविधान में तो यह साफ-साफ कहा गया है कि नीति निदेशक तत्वों को न्यायालय की मान्यता प्राप्त नहीं है। न्यायपालिका उसका पालन नहीं करवा सकती। आलोचकों का मत है, ऐसी अवस्था में राज्य के नीति निदेशक तत्व अनावश्यक और निरर्थक बन जाते हैं। उनका उपयोग ही क्या है, ये केवल “शुभ इच्छाएँ” और “नैतिक उपदेश” हैं। इनका उचित स्थान संविधान में नहीं है।

2. प्रगति विरोधी प्रो. जैनिंग्स ने इन नीति निदेशक तत्वों को प्रगति विरोधी कहा है। यह सिद्धान्त एक समय विशेष में बनाये गये हैं। हो सकता है पचास वर्षों के पश्चात् ये एकदम पुराने और असामयिक प्रतीत हों। नई परिस्थितियों, नये संदर्भों और नई आवश्यकताओं के वह प्रतिकूल सिद्ध हों। उस समय ये नीति निदेशक तत्व एकदम प्रतिगामी प्रतीत होंगे।

3. तारतम्य का अभाव-ऐसा प्रतीत होता है कि संविधान का निर्माण करते हुए भारत के भविष्य की कल्पना करते हुए संविधान निर्माताओं के मन में जो भी शुभ विचार आये, वे उन्हें राज्य के नीति निदेशक तत्वों में रख दिये। इन शुभ इच्छाओं में कोई परस्पर तारतम्य नहीं है। गाँव में पंचायत की स्थापना से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में शान्ति की कामना ये तत्व करते हैं। एक ओर अत्याधुनिक सिद्धान्त है तो दूसरी ओर एकदम परम्परागत प्रो. श्रीनिवासन के अनुसार, “इनमें नये और पुराने तत्वों का बेतुका मिश्रण तथा विवेकपूर्ण एवं भावुकतापूर्ण तत्वों का मिश्रण है।”

4. संवैधानिक अन्तर्विरोध-नीति निदेशक तत्वों के कारण संविधान के पालन के सम्बन्ध में अन्तर्विरोध उत्पन्न हो सकता है। यदि निदेशक तत्व और मौलिक अधिकार में विरोध हो तो न्यायपालिका के लिए एक असमंजस्य की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उदाहरणार्य भारत का संविधान सभी व्यक्तियों को नागरिक स्वतन्त्रता भी प्रदान करता है, साथ ही नीति निदेशक तत्व यह भी कहते हैं कि भारत में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक जैसे कानून बनाये जाएँ। दोनों बातों में विरोधाभास है।

5. अव्यावहारिक-राज्य के नीति निदेशक तत्व एक दृष्टि से अव्यावहारिक हैं। भारत को एक प्रजातान्त्रिक देश बनाया गया है। इसमें कभी एक दल का शासन होगा, तो कभी दूसरे का एक ही समाज के बारे में एक की कल्पना अलग होगी, दूसरे की अलग। वे अलग-अलग मार्गों से निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहेंगे। नीति निदेशक तत्व उनके लिए अव्यावहारिक बंधन ही होंगे। राज्य के नीति निदेशक तत्वों की उपर्युक्त आलोचना काफी प्रभावशाली है, तो भी आलोचकों के कई तर्कों का खण्डन किया जाता है और यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है कि संविधान में नीति निदेशक तत्वों के समावेश का पर्याप्त औचित्य है।

डॉ. ओम नागपाल के शब्दों में, “नीति निदेशक तत्वों का कानूनी रूप से क्रियान्वयन न हो तो भी किसी शासन के लिए इन नीति निदेशक तत्वों की उपेक्षा करना सम्भव नहीं है, क्योंकि इनके पीछे जनमत की अनुशस्ति है।”


According to Dr. Ambedkar, “Directive Principles of State Policy is a unique and important feature of the Indian Constitution.” This feature is found only in the constitution of Ireland. Articles 36 to 51 in the fourth part of the Indian Constitution include the Directive Principles of Policy. These elements are considered to be the guides for making policy by the state.

The framers of the Constitution wanted to make India a welfare state, but the establishment of a welfare state cannot be done in one night. In order to reach this goal, the framers of the constitution put forward some ‘ideal’ state policy in the form of directive principles, which it should implement gradually. On this basis, it can be said that the Directive Principles of Policy are not unnecessarily placed in the Constitution.

These Directive Principles of State Policy, following which it has been desired to make India a true welfare state, the state is not bound by them, it is not necessary to follow them. The state can ignore and even oppose them, because the court cannot implement these elements. Article 37 of the Constitution clearly states, “Provisions made in this part cannot be carried out by the judiciary.” That’s why Prof. Of. T. Shah quipped, “It is a check, the payment of which has been left at the convenience of the bank.” Thus it can be said that the state is not obliged to implement the Directive Principles of Policy, but the government has been clearly instructed by the constitution that it is the duty of the government to follow these principles.

Classification of Directive Principles of Policy

Articles 38 to 51 in the Indian Constitution describe the Directive Principles of State Policy. These thirteen articles wish to provide employment to youth and stop cow slaughter to international peace and security and direct the state to follow them. Dr. M. P. Verma has classified these Directive Principles into three parts- 1. Socialist Principles, 2. Gandhian

Theory 3. Intellectual Liberal Theory.

1. Socialist Principles- Those Directive Principles of Policy which establish an exploitative and mutually based society are classified in Directive Principles of Socialist Policy. The inclusion of these elements in the constitution was done on the insistence of Nehru and his other socialist companions. Following are such elements

(i) Article 38 states that for the welfare of the people, the state shall protect and expand the social order and for this the state shall establish a social order with as much effectiveness and capacity as possible, in which justice, social, economic, political Equality shall be a part of all institutions of national life. According to the 44th amendment, the state shall reduce inequality of income and inequalities of social status, facilities and opportunities, not only of individuals but also of groups.

(ii) Article 39 of the Constitution states that the state shall conduct its policy in such a way that- (a) men and women, all citizens equally have the right to an adequate means of livelihood (b) of national wealth Ownership and control should be done in such a way that the best arrangement for the collective interest can be done. (c) The economic system should be run in such a way that there is no centralization of wealth and means of production to the detriment of the common man. (d) Equal pay for equal work for men and women. (e) the health and strength of working men and women and the tender age of children are not abused. (f) Children shall be given facilities so that they may develop healthy in an atmosphere of freedom and self-respect and shall be protected from exploitation of childhood and youth and from moral and material deprivation.

Article 39 (A) has been added to the Constitution by the 42nd Amendment. It provided for general justice and free legal aid. It has been said that the state shall make arrangements that justice is given to all on the right of equality of opportunity of the legal system and shall provide free legal aid to those people whose economic condition is not good. (iii) Article 41 states that the State shall endeavor to implement the right to work, to education and to assistance in cases of unemployment, old age, disease, etc. (iv) According to Article 42, the State shall provide just and desired conditions of work and maternity assistance. (v) Article 43 states that the State shall, by law or economic organization, create such conditions as to ensure that workers in agriculture and other sectors get work and subsistence wages and a good standard of living and leisure and social and cultural opportunities.

Article 43 (A) has been added to the Constitution by the 42nd Amendment. In this, arrangements have been made for the workers to participate in the operation of industries. It has been said in this article that the government shall encourage that the workers should be given fair representation in the operation of industries. (vi) According to Article 44, the State shall endeavor to make a uniform code of conduct for all persons in India.

Undoubtedly, with the implementation of these directive principles, socialist society will be established, exploitation will end and equality and happiness will increase in the society.

According to Justice Hegde, “Article 38 of the Constitution is the foundation stone of the Directive Principles. This article is intended to be a direction to the state to do what is appropriate for the promotion of the welfare of the people.

To give concrete shape to the hopes expressed in the Preamble of our Constitution to safeguard the social order.

2. Gandhian Theory Gandhi’s contribution to the national movement has been the most. • Gandhiji worked tirelessly in raising the backward castes and classes, in eradicating untouchability, in spreading cottage industries and in making the life of the workers clean. Gandhiji had a distinctive thinking style. These Directive Principles of the Constitution, on which Gandhiji’s style of thinking has had a clear effect, are as follows- (i) According to Article 40, the State shall organize village panchayats and give them the powers of self-government. (ii) Article 43 states that the State shall encourage the establishment of cottage industries in the village. (iii) According to Article 46, the State shall lay special emphasis on the education and economic development of the weaker sections of the society, in particular the Harijans and the Scheduled Castes. (iv) According to Article 47, the State shall endeavor to ensure that the food of the people is nutritious and the standard of living is high, for that purpose the State shall prohibit the consumption of harmful intoxicating drinks and intoxicants and shall make such provision that the consumption of these intoxicants is only for medical purposes. be in use. (v) According to Article 48, the State shall conduct agriculture and animal husbandry in a scientific manner, shall protect the cattle, especially calves, milking and heavy animals and shall stop the slaughter. The implementation of these principles certainly strengthens the establishment of a Gandhian society.

3. Liberal Principles – To make Indian society healthy and happy, some liberal elements have also been included, they are as follows- (i) According to Article 45, all children up to the age of fourteen are required by the state and The state will arrange for free education. (ii) According to Article 48, the State shall promote the legal system in the field of agriculture and animal husbandry.

Article 48 (A) has been added to the Constitution by the 42nd Amendment. According to this, the state will try to keep the environment pure and will try to protect the years and wild animals of the country. (iii) Article 49 states that it shall be the duty of the State to protect every artistic, historical building or thing which is of importance to the nation and from destruction, disintegration and removal or disappearance. will protect him. (iv) Article 50 states

That the State shall endeavor to separate the judiciary from the executive. (v) Article 51 has suggested some principles for international peace and security. It states that in the international world, the state should make efforts to- (a) efforts for international peace and security (b) efforts to maintain just and honorable relations between nations (c) efforts to settle international disputes by arbitration. These Directive Principles of State Policy can be called liberal.

Evaluation and importance of Directive Principles of Policy-

1. Directive Principles of Policy are unnecessary- In the Constitution it is clearly stated that Directive Principles of Policy are not recognized by the Court. The judiciary cannot enforce it. Critics are of the opinion, in such a situation the Directive Principles of State Policy become unnecessary and redundant. What is their use, these are only “good wishes” and “moral precepts”. They do not have their proper place in the Constitution.

2. Anti-Progress Prof. Jennings has called these Directive Principles of Policy Anti-Progress. These principles are made at a particular time. Maybe after fifty years they seem quite old and untimely. He must prove to be hostile to new circumstances, new contexts and new requirements. At that point of time, these Directive Principles of Policy would seem quite regressive.

3. Lack of coherence – It seems that while framing the constitution, imagining the future of India, whatever good thoughts came to the mind of the framers of the constitution, they kept them in the Directive Principles of State Policy. There is no correlation between these auspicious wishes. From the establishment of Panchayat in the village, these elements wish for peace in the international world. On the one hand there is cutting edge theory and on the other hand the very traditional Prof. According to Srinivasan, “there is an absurd mixture of new and old elements and a mixture of rational and sentimental elements.”

4. Constitutional Contradiction – Due to the Directive Principles of policy, contradiction can arise in relation to the observance of the Constitution. If there is a conflict between the Directive Principles and the Fundamental Rights, then a situation of confusion can arise for the judiciary. For example, the Constitution of India also provides civil liberties to all individuals, as well as the Directive Principles of Policy also say that in India, similar laws should be made for people of all religions. There is a contradiction between the two things.

5. Impractical – Directive principles of state policy are impractical from a point of view. India has been made a democratic country. In this, sometimes one party will rule, and sometimes the other’s imagination about the same society will be different, the other will have different. They would like to accomplish the set objectives through different routes. The Directive Principles of Policy would be impractical bindings for them. The above criticism of the Directive Principles of State Policy is quite influential, yet many of the arguments of the critics are refuted and an attempt is made to prove that the inclusion of Directive Principles in the Constitution is not supported.

There is enough justification.

In the words of Dr. Om Nagpal, “Even if the Directive Principles of Policy are not implemented legally, it is not possible for any government to ignore these Directive Principles, because there is permission of public opinion behind them.”

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