संचालक मण्डल के अधिकार, कर्तव्य और दायित्व का वर्णन कीजिए। संचालकों के धरों पर कौन-से प्रतिबन्ध है ? Describe the rights, duties and responsibilities of the Board of Directors. What are the restrictions on the properties of the operators?

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संचालकों के अधिकार (Rights of Directors)

कम्पनी अधिनियम में संचालकों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है जो भी अधिकार संचालक प्रयोग करते हैं वे संचालक मण्डल के अधिकार होते हैं। अतः संचालक के अधिकार का आशय संचालक मण्डल के अधिकारों से है। संचालकों के अधिकारों को दो भागों में बाँटा जा सकता है–

(I) सामान्य अधिकार- सामान्य अधिकारों में निम्न को शामिल किया जा सकता है–

(1) प्रबन्ध सम्बन्धी समस्त अधिकार संचालक मण्डल को कम्पनी के प्रबन्ध सम्बन्धी समस्त अधिकारों का प्रयोग करने का अधिकार प्रदान किया गया है जो पार्षद सीमानियम एवं पार्षद अन्तनियम में वर्णित है।

(2) लेखा पुस्तकों के निरीक्षण का अधिकार कम्पनी के प्रत्येक संचालक को लेखा पुस्तकें, वैधानिक पुस्तकें एवं अन्य प्रपत्रों का निरीक्षण करने का अधिकार है।

(3) सभाओं की सूचना पाने का अधिकार संचालकों को कम्पनी की समस्त सभाओं की सूचना पाने का अधिकार है, यह सूचना लिखित में होनी चाहिए। ऐसी सूचना उनके पंजीकृत पते पर भेजी जायेगी।

(4) अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर नियन्त्रण का अधिकार-कम्पनी के संचालकों का कम्पनी के सचिव, कोषाध्यक्ष, प्रबन्धक तथा कर्मचारियों पर नियन्त्रण करने का पूर्ण अधिकार होता है साथ ही संचालक मण्डल इन अधिकारियों को विशेष निर्देश भी दे सकता है।

(5) पारिश्रमिक पाने का अधिकार-कम्पनी के प्रत्येक संचालक को कम्पनी अधिनियम एवं अन्तनियम के अनुसार प्रदान की जाने वाली अपनी सेवाओं के बदले पारिश्रमिक रूप में वेतन एवं ताप्राप्त करने का अधिकार है।

(6) अन्य सामान्य अधिकार संचालक मण्डल की सभाओं में भाग लेना, इस सभा में प्रस्तुत किसी मामले पर विचार प्रकट करना, कम्पनी द्वारा नियुक्त समितियों की सभाओं में उपस्थित होना एवं अपने अधिकारों का प्रयोग करना आदि संचालकों के अन्य सामान्य अधिकार है।

(II) विशिष्ट अधिकार-निम्न अधिकार केवल संचालक मण्डल द्वारा तथा संचालकों की सभा में प्रभावशील किये जा सकते हैं–

(A) अंशो पर अन्त धन के लिए अंशधारियों से माँग करना।

(B) ऋण-पत्रों का निर्भमन करना।

(C) ऋऋण-पत्रों के अतिरिक्त अन्य किसी रूप में ऋऋण लेना।

(D) कम्पनी के धन को विनियोग करना।

(E) ऋण लेना।

उपके अतिरिक्त कार्य भी संचालकों द्वारा अपनी सभाओं में सम्पन्न किये जाते हैं–

(A) रिक्त स्थान की पूर्ति-यदि आकस्मिक रूप से कोई स्थान रिक्त होता है तो उसकी पूर्ति नये संचालक की नियुक्ति करके की जाती है।

(B) मैनेजर को नियुक्त करना संचालक किसी भी व्यक्तिको मैनेजर नियुक्त कर सकते हैं।

(C) सुरक्षा कोष में अंशदान-संचालक राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में अंशदान दे सकते हैं और इसका लेखा लाभ -हनी खाते में करो सकते हैं।

(D) प्रवन्ध संचालक नियुक्त करना संचालक किसी भी ऐसे व्यक्ति को कम्पनी में प्रबन्ध संचालक नियुक्त कर सकते हैं जो पहले से ही किसी कम्पनी में प्रबन्ध संचालक है।

(E) अनुबन्ध करना-संचालकों को कम्पनी के साथ क्रय-विक्रय, सामान की पूर्ति, अंशों का अभिगोपान आदि करने का अधिकार प्राप्त होता है।

संचालकों या संचालक मण्डल के अधिकारों पर प्रतिबन्ध (Restriction on the Power of Directors)

ये प्रतिबन्ध निम्नलिखित है–

(1) सामान्य सभा में अनुमति कम्पनी की सामान्य सभा में स्वीकृति के बिना किसी भी सार्वजनिक कम्पनी या उसकी सहायक निजी कम्पनी का संचालक मण्डल निम्न कार्य नहीं कर

सकता है, इसलिए इन्हें संचालक मण्डल के अधिकारों पर प्रतिबन्ध कहा जाता है–

(i) कम्पनी के समस्त या लगभग पूर्ण कारोबार को बेचना, पट्टे पर उठाना या अन्य किसी प्रकार से देना।

(ii) किसी संचालक के ऋण को पूरा ही समाप्त कर देना या भुगतान के लिए अधिक समय देना। यह नियम एक बैंकिन कम्पनी द्वारा साधारण व्यवसाय के दौरान संचालक को दिए गये अग्रिम के नवीनीकरण या चालू रखने में लागू न होगा।

(iii) कम्पनी द्वारा प्राप्त क्षतिपूर्ति की राति, जो उसने भवन, सम्पत्ति या उपक्रम के अनिवार्य रूप से लिए जाने के फलस्वरूप प्राप्त हुई है, को ट्रस्ट प्रतिभूतियों के अतिरिक्त अन्य किसी में विनियोजित करना।

(IV) कम्पनी की चुकता पूँजी और सामान्य कोष के योग से अधिकार ऋण लेना। इस ऋण में अल्प अवधि के ऋणों को शामिल नहीं किया जाता है। यहाँ अल्प अवधि के ऋणों का आशय ऐसे ऋणों से है जो माँग पर देय हो या 6 माह में देव हो |

(2) राजनीतिक दलों को चन्दा-एक सार्वजनिक कम्पनी का संचालक मण्डल इस अधिनियम के शुरू होने के पश्चात् बिना कम्पनी की सहमति के ऐसे दान कोष या अन्य कोष जो कम्पनी के व्यवसाय से प्रत्यक्ष रूप या कर्मचारियों के कल्याण से सम्बन्धित न हों, किसी भी वित्तीय वर्ष में उस राति से अधिक न दे सकेंगे जो ₹50,000 या उस वर्ष के पहले वाले 3 वित्तीय वर्ष के शुद्ध लाभों के औसत लाभ से अधिक हो संचालक मण्डल यह राशि दान देने के उद्देश्य से दे सकते हैं। इसका उल्लंघन होने पर कम्पनी पर दान की राशि के 5 गुने के बराबर अर्यदण्ड लगाया जा सकता है और कम्पनी के दोषी अधिकारों का 6 माह तक के कारावास व दान की राशि का 5 गुना अर्थदण्ड लगाया जा सकता है।

(3) राष्ट्रीय सुरक्षा कोच में दान देना कम्पनी का संचालक मण्डल या उसके अधिकारों का प्रयोग करने वाला व्यक्तिया साधारण सभा द्वारा कम्पनी राष्ट्रीय सुरक्षा कोष या राष्ट्रीय सुरक्षा द्वारा निर्मित केन्द्रीय सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कोष में उचित राशि दे सकती है। परन्तु यह राशि उसी वर्ष के लाभ-हानि खाते में दिखायी जानी चाहिए।

(4) सदस्य न हटाने का अधिकार-संचालक मण्डल अपने अन्तर्नियमों में परिवर्तन करके किसी सदस्य को नहीं हटा सकते हैं चाहे उसके बाद असाधारण सभा में विशेष प्रस्ताव ही पास क्यों न किया जा चुका है।

(5) अधिकारों की समाप्ति-यदि कम्पनी का ऐच्छिक समापन प्रारम्भ हो जाए तो संचालकों के सभी अधिकार स्वयं ही समाप्त हो जायेंगे। उनका केवल यही अधिकार रह जायेगा कि वह नियुक्त जस्तारक की नियुक्ति की सूचना रजिस्ट्रार को दे। कम्पनी यदि चाहे तो साधारण सभा द्वारा या विस्तारक संचालकों के अधिकार बने रहने की स्वीकृति दे सकती है।

(6) लेनदारों द्वारा समापन होने पर लेनदारों के ऐडिक समापन पर निस्तारक की नियुक्ति पर संचालकों के अधिकार समाप्त हो जाते हैं। यदि जाँच समिति चाहे वह संचालकों के अधिकार बने रहने की स्वीकृति दे सकती है। यदि कम्पनी में जाँच समिति नियुक्त नहीं की गयी है। लेदार साधारण सभा में ऐसे अधिकारों की स्वीकृति दे सकते हैं।

संचालकों के कर्त्तव्य (Duties of Directors)

संचालकों की कर्तव्यों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा गया है–

(1) अन्तनियमों के अनुसार प्रायः संचालकों के कर्तव्य का उल्लेख कम्पनी के अन्तनियमों में दिया हुआ होता है इसलिए संचालकों को अन्तनियम के अनुसार अपने अधिकार क्षेत्र के अन्दर ही कार्य करना चाहिए।

(II) कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत कर्तव्य

इस अधिनियम के अन्तर्गत संचालकों के निम्न कर्तव्यों को शामिल किया जाता है–

(1) प्रविवरण की सत्यता का देखना और उस पर हस्ताक्षर करना।

(2) संचालकों द्वारा स्वयं धारण किये गये अंशों पर आवेदन तथा आवण्टन राशि का भुगतान करना।

(3) कम्पनी के लिए व्यापार प्रारम्भ का प्रमाण-पत्र पाने के लिए यह घोषणा करनी चाहिए कि सब वैधानिक कार्यवाहियाँ पूरी हो चुकी हैं।

(4) वार्षिक प्रत्यय पर हस्ताक्षर करना।

(5) नियुक्तिकी तिथि के 2 माह के अन्दर योग्यता अंश लेना।

(6) संचालक बनने की लिखित सहमति देना।

(7) 3 माह में कम से कम एक बार संचालक मण्डल की सभा अवश्य बुलाना।

(8) संचालक को अपना स्वार्थ प्रकट करना चाहिए।

(9) कम्पनी की वार्षिक सामान्य सभा बुलाना।

(10) विधान के अनुसार असाधारण सभा बुलाना।

(11) कम्पनी की लेखा-पुस्तकें तथा अन्य वैधानिक पुस्तकों को लिखित प्रकार से तैयार करके रखना।

(12) वार्षिक खातों को तैयार करना।

(13) कम्पनी के विद्वे तथा लाभ-हानि खाते को प्रमाणित करना।

(14) लाभांश की सिफारिश घोषणा तथा भुगतान का प्रबन्ध करना।

(15) अन्तिम खातों की 3 प्रतियाँ रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत करना।

(III) न्यायाधीशों के निर्णय के आधार पर कर्तव्य

व्यायाधीशों के निर्णय के आधार पर संचालक के निम्नलिखित कर्तव्य है–

(i) ईमानदारी, सतर्कता, कुशलता एवं परिश्रमी होगा।

(ii) सामान्य ज्ञान व अनुभव से अपने कार्य को करना |

(iii) संचालकों को प्रत्येक सभा में उपस्थित होकर कम्पनी कार्य में रूचि लेना।

(iv) संचालकों को यह देखना कि कोई कर्मचारी जिसे व्यवसाय के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किये गये हैं, गलत रूप से प्रयोग तो नहीं कर रहा है।

संचालकों को चेक पर हस्ताक्षर करने से पूर्व उन्हें उसके विषय में आवश्यक बातों को ज्ञात कर लेना चाहिए जिससे कम्पनी को कोई हानि न उठानी पड़े।

संचालकों के दायित्व (Liabilities of Directors)

संचालकों के दायित्व को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है–

(A) बाह्य या तीसरे पक्षकारों के प्रति दायित्व (Liabilitics towards Outsiders) संचालक कम्पनी की ओर से कम्पनी के एजेण्ट की स्थिति में कार्य करते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत रूप से बाह्य पक्षकारों के प्रति तब तक उत्तरदायी नहीं ठहराये जा सकते, जब तक कि अपने अधिकारों के अन्दर रहकर कार्य करते हैं। अतः संचालक निम्न परिस्थितियों में ही तृतीय पक्षकारों के प्रति व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे–

(1) अधिकारों को बाहर कार्य करने पर दायित्व-जब वे अपने अधिकारों के बाहर कार्य करते हैं, किन्तु दूसरों को यह प्रकट करते हैं कि उनके द्वारा किये गये कार्य उनके अधिकारों के अन्तर्गत आते हैं, तो ऐसी दशा में वे अन्य पक्षकारों के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

(2) प्रविवरण में मिथ्या वर्णन-प्रविवरण में मिथ्या वर्णन होने पर अंशधारियों की हानि के लिए संचालक जिम्मेदार होंगे।

(3) अपने नाम में अनुबन्ध करने पर कम्पनी के स्थान पर अपने नाम में अनुबन्ध करने पर संचालक उत्तरदायी माने जाते हैं।

(4) आवण्टन नियमों में उल्लंघन करने पर जानबूझकर आवण्टन के नियमों का पालन न करने पर संचालकगण अंशधारियों के प्रति उत्तरदायी माने जायेंगे।

(5) आवण्टन न होने पर धन वापस करना-यदि प्रविवरण के निर्गमित होने के 30 दिन के | अन्दर आवण्टन नहीं किया गया है तो प्राप्त धनराशि आगामी 15 दिन के भीतर वापस कर देनी | चाहिए, अन्यथा धन लौटाने के लिए संचालकगण संयुक्तया पृथक् रूप से उत्तरदायी होंगे।

(B) कम्पनी के प्रति दायित्व (Liabilities towards Company)

इसमें निम्नलिखित दायित्व सम्मिलित हैं–

(1) लापरवाही हेतु दायित्व-यदि संचालक की लापरवाही के कारण कोई हानि होती है तो संचालक उत्तरदायी होगा।

(2) कपट के लिए दायित्व- यदि संचालक जान-बूझकर कोई त्रुटि करता है तो यह कपट कहलायेगा जिसके लिए वह उत्तरदायी ठहराया जायेगा।

(3) कर्तव्य भंग करना- यदि संचालक अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता और कम्पनीको

(1) लापरवाही हेतु दायित्व-यदि संचालक की लापरवाही के कारण कोई होती है तो

(2) कपट के लिए दायित्व दिनकर कोई त्रुटि करता है तो यह कपट

कोई क्षति होती है तो उसके लिए वह जिम्मेदार माना जायेगा। उदाहरणस्वरूप दिशा न्यूनतम अभिप्राप्त किये अंशों का आवण्टन करना, कपट द्वारा व्यापार प्रारम्भ करने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करना अवयस्क के अंशों को आवण्टन करना आदि कर्तव्य भंग के मामले हैं।

(4) प्रन्यास तोड़ने पर दायित्व संचालक प्रन्यासी की भाँति होता है, यदि यह प्रयास के नियमों का पालन नहीं करता है तो हानि के लिए उत्तरदायी होगा। उदाहरणार्थ, यदि कोई संचालक गुप्त लाभ कमाता है तो उसे लौटाना होगा।

(6) अधिकारों के बाहर कार्य के लिए दायित्व-यदि संचालक अपने अधिकारों के बाहर कार्य करता है तो उसे कम्पनी की क्षतिपूर्ति करनी होगी।

(C) विधान के अन्तर्गत दण्डनीय दायित्व (Criminal Liability Under the Act) सापराध कार्यों के लिए दायित्व के मुख्य नियम निम्नलिखित है ₹50,000 का जुर्माना

(1) प्रविवरण में असत्य कथन होने पर दो वर्ष तक का कारावास अथवा अथवा दोनों ही।

(2) कपटपूर्ण तरीके से कम्पनी में धन विनियोग करने हेतु प्रोत्साहन करने पर-पाँच वर्ष तक का कारावास अथवा ₹1,00,000 तक का जुर्माना अथवा दोनों ही।

(3) आवण्टन विवरण प्रस्तुत करने पर रजिस्ट्रार को कम्पनी के अंशों के आवण्टन का विवरण 30 दिन में प्रस्तुत नहीं किया जाता है तो इसके बाद जब तक त्रुटि जारी रहती है तब तक ₹5,000 प्रतिदिन तक जुर्माना

(4) अश प्रमाण-पत्र तैयार न रहने पर यदि निर्धारित अवधि में अश प्रमाण-पत्र सुपुर्द किये नहीं जाते हैं तो त्रुटि की अवधि में प्रतिदिन ₹ पाँच हजार तक का जुर्माना

(5) वार्षिक प्रत्याय प्रस्तुत न करने पर यदि उचित समय में वार्षिक प्रत्याय Annual Return) रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत नहीं की जाती है तो त्रुटि जारी रहने तक र पाँच सौ प्रतिदिन का जुर्माना।

(6) वार्षिक सामान्य सभा न बुलाने पर यथासमय सभा न बुलाने पर र पाँच हजार तक का जुर्माना। यदि त्रुटि जारी रहती है तो प्रथम दिन को छोड़कर आगे के सभी दिनों के लिए जब तक टि जारी रहती है, के लिए र पच्चीस सौ प्रतिदिन तक का जुर्माना

(7) विशेष प्रस्तावों की प्रति रजिस्ट्रार को प्रस्तुत न करने पर जब तक त्रुटि जारी रहती है तब तक ₹ दो सौ प्रतिदिन तक का जुर्माना |

(8) घोषित लाभांश निर्धारित अवधि में वितरित न करने पर यदि घोषित लाभांश 30 दिनों में वितरित नहीं किया जाता है तो सात दिन का साधारण कारावास तथा जुर्माना

(9) अन्तिम खाते प्रस्तुत न करने पर वार्षिक साधारण सभा में अन्तिम खाते प्रस्तुत न करने पर छ माह तक का कारावास अथवा दस हजार तक का जुर्माना अथवा दोनों

(10) अकेक्षको को सूचनाएँ उपलब्ध न करने पर-छ माह तक का कारावास अथवा र पचास हजार तक का जुर्माना अथवा दोनों।

(11) कम्पनी की शोधन क्षमता की झूठी घोषणा करने पर-छ माह तक का कारावास अथवा ₹ पचास हजार तक का जुर्माना अथवा दोनों ही

(12) कपटपूर्ण उद्देश्य से व्यवसाय का संचालन करने पर दो वर्ष तक का कारावास अथवा ₹ पचास हजार तक का जुर्माना अथवा दोनों |

(13) संचालक की नियुक्ति के दो माह में योग्यता अश नहीं लेने पर ₹ पाँच सौ प्रतिदिन तक का जुर्माना |

(14) पन्द्रह से अधिक कम्पनियों का संचालक बने रहने पर ₹ पचास हजार प्रतिदिन तक का जुर्माना |

(15) झूठी गवाही देने पर दो वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना।


Rights of Directors

In the Companies Act, the directors do not have any rights, whatever rights the directors exercise are the rights of the board of directors. Therefore, the authority of the director means the rights of the board of directors. The rights of the operators can be divided into two parts-

(I) General Rights- Common rights can include-

(1) All the rights related to management The Board of Directors has been given the right to exercise all the rights related to the management of the company which are mentioned in the Councilor’s Memorandum and the Councilor’s Article.

(2) Right to inspect the books of account Every director of the company has the right to inspect the books of accounts, statutory books and other forms.

(3) Right to get information of meetings The directors have the right to get information of all the meetings of the company, this information should be in writing. Such intimation will be sent to their registered address.

(4) Power of control over the officers and employees- The directors of the company have full right to control the secretary, treasurer, manager and employees of the company, as well as the board of directors can also give special instructions to these officers.

(5) Right to remuneration – Every director of the company has the right to receive salary and salary in return for his services rendered in accordance with the Companies Act and the Articles of Association.

(6) Other General Rights To participate in the meetings of the Board of Directors, to express views on any matter presented in this meeting, to attend the meetings of the committees appointed by the company and to exercise their powers etc. are other general rights of the directors.

(II) Specific rights- The following rights can be given effect only by the Board of Directors and in the meeting of Directors-

(A) To demand from the shareholders for the end money on the shares.

(B) Dissolution of debentures.

(C) Taking loans in any form other than debentures.

(D) Appropriation of company’s money.

(E) Taking loan.

Apart from this, the works are also done by the directors in their meetings.

(A) Filling of the vacancy – If any vacancy occurs accidentally, it is filled by appointing a new director.

(B) Appointment of manager The director can appoint any person as manager.

(C) Contribution to Security Fund – Operators can contribute to the National Security Fund and account it in profit-honey account.

(D) Appointing Managing Director The director can appoint any person as the managing director in the company who is already a managing director in a company.

(E) Contracting – Operators get the right to buy and sell, supply goods, underwrite shares etc. with the company.

Restriction on the Power of Directors

These restrictions are as follows-

(1) The Board of Directors of any public company or its subsidiary private company shall not do the following work without the approval in the general meeting of the company.

Therefore, they are called restrictions on the rights of the Board of Directors.

(i) the sale, lease or otherwise of the whole or almost the whole of the business of the company.

(ii) to liquidate the debt of an operator in full or to allow more time for payment. This rule shall not apply to the renewal or continuation of an advance made by a banking company to an operator in the course of ordinary business.

(iii) to appropriate the amount of compensation received by the company as a result of compulsorily taking over the building, property or undertaking, other than trust securities.

(IV) Taking rights loan out of the sum of the company’s paid-up capital and general fund. Short term loans are not included in this loan. Here short term loans mean such loans which are payable on demand or due in 6 months.

(2) Contributions to political parties—The Board of Directors of a public company shall, after the commencement of this Act, without the consent of the company, donate funds or other funds not directly related to the business of the company or to the welfare of the employees. The Board of Directors can give this amount for the purpose of giving donations in a financial year more than that night which exceeds the average profit of ₹ 50,000 or the net profits of the 3 financial years preceding that year. In case of violation of this, a fine equal to 5 times the amount of the donation can be imposed on the company and the guilty rights of the company can be punished with imprisonment of up to 6 months and 5 times the amount of the donation.

(3) To donate to the national security coach, the Board of Directors of the company or the person exercising its powers or the general body may give a suitable amount to the company’s National Security Fund or a fund recognized by the Central Government created by the National Security Fund. But this amount should be shown in the profit and loss account of the same year.

(4) Right not to remove a member – The Board of Governors cannot remove any member by changing its Articles, even if after that a special resolution has been passed in the Extraordinary Assembly.

(5) Termination of rights – If the voluntary winding up of the company starts, then all the rights of the directors will automatically cease. His only right will remain to inform the Registrar about the appointment of the appointed Zastrak. If the company so desires, by general meeting or allow the continuance of rights of extension operators.

(6) On winding up by the creditors, the rights of the operators cease to exist on the appointment of the liquidator on the additional winding up of the creditors. If the Inquiry Committee so desires, it may approve the continuance of the powers of the Directors. If an inquiry committee has not been appointed in the company. The creditors can approve such rights in the general assembly.

Duties of Directors

The duties of the operators are divided into the following three parts-

(1) According to the Articles, the duties of the Directors are often mentioned in the Articles of the Company, so the Directors should act within their jurisdiction as per the Articles of Association.

(II) Duties under the Companies Act

The following duties of directors are included under this Act-

(1) To see and sign the prospectus for the correctness of it.

(2) Application and payment of allotment amount on the shares held by the directors themselves.

(3) In order for the company to obtain a certificate of commencement of business, a declaration must be made that all statutory proceedings have been completed.

(4) Signing the annual credit.

(5) To take qualifying share within 2 months from the date of appointment.

(6) Giving written consent to become director.

(7) The meeting of the Board of Directors must be called at least once in 3 months.

(8) The director should express his selfishness.

(9) to call the annual general meeting of the company.

(10) To call an extraordinary assembly according to the law.

(11) To prepare in writing the books of account and other statutory books of the company.

(12) Preparation of annual accounts.

(13) To certify the profit and loss account of the company.

(14) To make arrangements for the recommendation, declaration and payment of dividend.

(15) To produce 3 copies of the final accounts before the Registrar.

(III) Duty on the basis of judges’ decision

On the basis of the decision of the judges, the operator has the following duties-

(i) Honesty, alertness, skill and hard-working.

(ii) Doing your work with common sense and experience.

(iii) To take interest in the company’s business by attending every meeting of the directors.

(iv) To see to the operators that any employee who has been given important rights in relation to the business, is not using it wrongly.

Before signing the check, the operators should know the necessary things about it so that the company does not suffer any loss.

Liabilities of Directors

The liability of the operators can be divided into three parts-

(A) Liabilities towards Outsiders Operators act on behalf of the company as an agent of the company. In such a situation, they cannot be held personally liable to outside parties, as long as they act within their rights. Therefore, the operator will be personally liable to third parties only in the following circumstances-

(1) Liability for acting out of rights – When they act outside their rights, but reveal to others that the acts done by them fall within their rights, then in such case they are liable to other parties. are liable.

(2) Misstatement in the prospectus – The operator shall be responsible for the loss of the shareholders in the case of misstatement in the prospectus.

(3) On contracting in his own name, instead of the company, the directors are held liable for contracting in their own name.

(4) The directors will be held liable to the shareholders for the willful non-compliance of the allotment rules for contravention of the allotment rules.

(5) Refund of money in case of non-allotment – if within 30 days from the date of issue of return. If allotment is not done within, then the amount received should be returned within next 15 days. Otherwise, the operators will be jointly or severally responsible for the refund of money.

(B) Liabilities towards Company

It includes the following responsibilities-

(1) Liability for Negligence – If there is any loss due to the negligence of the operator, the operator shall be liable.

(2) Liability for fraud – If the operator willfully commits any error, it shall be called fraud for which he shall be held liable.

(3) Breach of duty- If the director does not perform his duty and the company

(1) Liability for Negligence – If any is caused by the negligence of the operator,

(2) Liability for fraud If Dinkar commits any error, the fraud

If any damage occurs, he will be held responsible for the same. For example, allotment of minimum acquired shares, obtaining certificate of commencement of business by fraud, allotting shares to minors, etc. are cases of breach of duty.

(4) The liability for breach of trust is the same as that of the director of the trust, if it does not follow the rules of the effort, then it will be liable for loss. For example, if an operator makes a secret profit, it has to be returned.

(6) Liability for acts outside rights- If the director acts outside his rights, he will have to indemnify the company.

(C) Criminal Liability Under the Act The following are the main rules of liability for criminal acts, a fine of ₹ 50,000

(1) Imprisonment for two years, or both, in case of false statement in the statement.

(2) For fraudulently encouraging investment of money in the company – Imprisonment up to five years or fine up to ₹ 1,00,000 or both.

(3) If the details of allotment of shares of the company are not furnished to the Registrar within 30 days after furnishing the allotment details, thereafter fine up to ₹5,000 per day as long as the error continues.

(4) If the certificate is not produced within the prescribed period, then a fine of up to five thousand rupees per day during the period of error.

(5) If the annual return is not presented before the registrar within a reasonable time, then a fine of five hundred per day till the error continues.

(6) A fine of up to five thousand for not calling the annual general meeting in due time. If the error continues, fine up to and twenty-five hundred per day for all subsequent days except the first day for so long as it continues

(7) A fine of up to two hundred per day for non-submission of a copy of the special resolutions to the Registrar as long as the error continues.

(8) If the declared dividend is not distributed within the prescribed period, if the declared dividend is not distributed within 30 days, then simple imprisonment for seven days and fine.

(9) Non-presentation of final accounts shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to six months, or with fine which may extend to ten thousand, or with both.

(10) Failure to provide information to auditors – Imprisonment for a term which may extend to six months or fine which may extend to fifty thousand or with both.

(11) For making false declaration of solvency of the company – Imprisonment up to six months or fine which may extend to fifty thousand or both

(12) The conduct of business with a fraudulent purpose shall be punishable with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, or with fine which may extend to fifty thousand, or with both.

(13) Fine up to ₹ five hundred per day for not taking the qualifications within two months of the appointment of the operator.

(14) Fine up to ₹ fifty thousand per day for being the director of more than fifteen companies.

(15) Imprisonment for two years and fine for giving false evidence.

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