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प्रवर्तको के कार्यों, अधिकारों एवं दायित्वों का वर्णन कीजिए।

वर्तन कम्पनी के निर्माण की प्रथम सीढ़ी है, जिसमें एक कम्पनी स्थापित करने का विचा उत्पन्न होता है और इसे कार्य रूप में परिणित करने के लिए आवश्यक कार्यवाही की जाती है। इस प्रकार कम्पनी के प्रवर्तन का कार्य नवीन विचार उत्पन्न होने से प्रारम्भ होता है और तब तक चलता रहता है, जब तक कि वैधानिक रूप से कम्पनी की स्थापना न हो जाये। इसके अन्तर्गत यह भी विचा किया जाता है कि कम्पनी का व्यवसाय क्षेत्र क्या होगा, इसकी आवश्यक सामग्री कहाँ से प्राप्त होगी इसके लिए पूँजी किन-किन स्रोतों से प्राप्त होगी, इसकी स्थापना के लिए कौन-कौन सी वैधानिक कार्यवाहियाँ करनी पड़ेगी ? आदि। के अनुसार व्यापार सम्बन्धको की जाती है और लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से पूजी सम्पति एवं प्रबन्धकता का गठन किया जाता है। एवंग के अनुसार, न उस विचारधारा के साथ आरम्भ होती है जिससे किसी का विकास किया जाना है और इसका कार्य तब तक चलता रहता है जब तक कि वह एकचालू संस्था के रूप में अपना कार्य पूर्णरूप से प्रारम्भ करने के लिए तैयार नहीं हो

प्रवर्तक का आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Promoter)

प्रवर्तक का आशय ऐसे व्यक्तियों से है जो कम्पनी के निर्माण सम्बन्धी विचार अपने मस्तिष्क लाकर आवश्यक खोजबीन करके एक निश्चित योजना के अनुसार कम्पनी का निर्माण करते हैं। दूसरे शब्दों में, प्रवर्तक से आशय ऐसे व्यक्तियों से है जो व्यापार सम्बन्धी अनुसन्धान करते हैं और ● किसी निश्चित योजना के अनुसार कम्पनी का निर्माण करते हैं, आवश्यक सामग्री को एकत्र करते हैं और कम्पनी के संचालन की रूपरेखा तैयार करते हैं। कम्पनियों के निर्माण एवं विकास में प्रवर्तकों का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। प्रवर्तक एक व्यक्ति, व्यक्तियों का समूह या फर्म या कम्पनी हो सकती है। (1) लाई ब्लेकबर्न (Lord Blacburn) के अनुसार, “प्रवर्तक शब्द उन व्यक्तियों को सम्बोधित करने का संक्षिप्त एवं सुविधापूर्ण ढंग है जो कि उस मशीन को चालू करते हैं जिसके द्वारा कम्पनी अधिनियम उनको एक समामेलित कम्पनी का निर्माण करने के योग्य बना देता है।”

(2) सर फ्रांसिस पामर (Sir Francis Palmer) के अनुसार, प्रवर्तक वह व्यक्ति होता है, जो कम्पनी के निर्माण की योजना बनाता है, पार्षद सीमानियम तथा अन्तर्नियम तैयार करवाता है, उनकी रजिस्ट्री करवाता है और प्रथम संचालकों को चुनता है, प्रारम्भिक अनुबन्धों एवं प्रविवरण की शर्तों को तय करता है तथा प्रविवरण को प्रकाशित करने तथा पूँजी एकत्र करने का प्रबन्ध करता है। ”

(3) कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 (69) के अनुसार, “प्रवर्तक से आशय उस व्यक्ति से है जिसका नाम प्रविवरण में प्रवर्तक के रूप में लिखा या समांकित किया गया है अथवा जिसकी पहचान कम्पनी की वार्षिक विवरणी में प्रवर्तक के रूप में करायी गई है अथवा जिसका अंशधारी या संचालक या अन्य किसी रूप में कम्पनी के कार्यकलापों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियन्त्रण हो अथवा जिसकी सलाह या निर्देशों के अनुसार कम्पनी का संचालक मण्डल कार्य करने का अभ्यस्त है।

किन्तु यदि कोई व्यक्ति अपनी पेशेवर क्षमता में सलाह या निर्देश देता है, तो उसे प्रवर्तक नहीं माना जायेगा।” (4) गुथमैन एवं डूगल (Guthman and Daugal) के अनुसार, “प्रवर्तक वह व्यक्ति है जो कम्पनी के निर्माण की योजना बनाता है एवं कम्पनी को एक कृत्रिम व्यक्ति के रूप में अस्तित्व में लाता है।”

इस प्रकार प्रवर्तक से आशय उन व्यक्तियों से हैं जो किसी कम्पनी के निर्माण की योजना बनाते हैं एवं उसको वास्तविक रूप प्रदान करने हेतु अनेक कार्यों को सम्पन्न करते हैं।

प्रवर्तकों की वैधानिक स्थिति (Legal Position of Promoters)

प्रवर्तक कम्पनी के प्रवर्तन से लेकर उसके व्यापार प्रारम्भ करने की स्थिति तक सभी का करता है। अतः एक प्रवर्तक की सभी सेवाएँ कम्पनी निर्माण के कार्य में असाधारण होती हैं ।। प्रवर्तक की सेवाएँ असाधारण होते हुए भी कम्पनी के साथ एक प्रवर्तक की वैधानिक स्ि विश्वासाश्रित सम्बन्धों की होती है अर्थात् यह माना जाता है कि कम्पनी के साथ उसका सम् विश्वास पर आधारित है और उसने जो भी कार्य किया है, उस पर समामेलन होने के पड कम्पनी व उसके अंशधारियों को विश्वास करना होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता प्रवर्तक कम्पनी के निर्माण की कल्पना से लेकर उसकी विधिवत स्थापना तक के सभी का सम्पन्न करते हैं, जिससे कम्पनी में उनकी महत्वपूर्ण स्थिति होती है। वैधानिक दृष्टि से वे प्रत्यासी (Trustees) होते हैं और न ही प्रतिनिधि (Agent) क्योंकि प्रवर्तन की कम्पनीका कोई वैधानिक अस्तित्व नहीं होता है। प्रवर्तकों एवं कम्पनी सम्बन्ध पाया जाता है। कम्पनी में प्रवर्तक की स्थिति को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा 1. प्रवर्तक कम्पनी के एजेन्ट नहीं है यद्यपि प्रवर्तक कम्पनी के निर्माण सम्बन्धी सम करता है, किन्तु फिर भी प्रवर्तक कम्पनी का एजेन्ट नहीं हो सकता है। इसका कारण कम्पनी प्रवर्तक द्वारा किये गये कार्यों का पुष्टिकरण नहीं कर सकती है। पुष्टिकरण द्वारा ए स्थापित हो सकती है जबकि प्रधान अनुबन्ध करने के समय अस्तित्व में हो। परन्तु प्रवर्तक करता है या अनुबन्ध करता है तब कम्पनी का अस्तित्व ही नहीं होता है, अर्थात् समामल पाता है परिणामस्वरूप कम्पनी प्रवर्तक द्वारा किये गये अनुबन्धों का पुष्टिकरण नहीं कर और कम्पनी और प्रवर्तक के बीच एजेन्सी का सम्बन्ध भी स्थापित नहीं हो सकता है। इसीलिए

महत्वपूर्ण निर्णयों में इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि प्रवर्तक कम्पनी का एजेन्ट नहीं 2. प्रवर्तक कम्पनी के प्रत्यासी नहीं होते है प्रवर्तक कम्पनी का प्रत्यासी (Trustee) होता है। इसका कारण भी वही है जो एजेण्ट नहीं होने के सम्बन्ध में दिया गया है। दूसरे शाल कम्पनी जब तक अस्तित्व में नहीं आ जाती है तब तक वह अपने प्रन्यासी को भी नियुक्त उ सकती है। अतः प्रवर्तक के प्रन्यासी के रूप में भी कोई दायित्व उत्पन्न नहीं हो सकते हैं।

3. प्रवर्तक का कम्पनी के साथ विश्वासाश्रित सम्बन्ध होता है प्रवर्तक उसके द्वारा

कम्पनी का न तो एजेण्ट होता है और न प्रन्यासी हो। उसका कम्पनी के साथ केवल विश्वास सम्बन्ध होता है। यह उल्लेखनीय है कि विश्वासाश्रित सम्बन्ध से तात्पर्य विश्वास, भरोसे एवं के सम्बन्ध से है। अतः प्रवर्तक द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य पूर्ण पारदर्शी, न्यायोचित एवं सद्भ हो । यद्यपि प्रवर्तक न तो कम्पनी के एजेण्ट होते हैं तथा न प्रन्यासी ही, किन्तु उसकी स्थिति उन के समान ही होती है। अतः जिस प्रकार एजेण्ट एवं प्रन्यासी के सभी कार्य पारदर्शी एवं न्यायोचित चाहिये, ठीक उसी प्रकार प्रवर्तक के कार्य भी पारदर्शी एवं न्यायोचित होने चाहिये। इस प्रकार प्रवर्तक न तो कम्पनी का एजेण्ट होता है और न प्रन्यासी ही किन्तु उसका के साथ विश्वासाश्रित सम्बन्ध होता है। इस सम्बन्ध को निम्न तथ्यों से स्पष्ट किया जा सकता (i) प्रवर्तकों द्वारा गुप्त लाभ अर्जित न करना-प्रवर्तकों का महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि कम्प प्रवर्तन अवस्था में वे किसी सौदे के सम्बन्ध में गुप्त लाभ अर्जित न करें और यदि ऐसा लाभ कमाया तो कम्पनी को इसका हिसाब तथा लाभ की रकम लौटानी पड़ेगी। (ii) अनुबन्ध के लिए बाध्य करना- कम्पनी निर्मित होने के बाद कम्पनी संचालकों को प्र किसी भी ऐसे अनुबन्ध से बाध्य कर सकते हैं जो कम्पनी के प्रवर्तन की स्थिति में किये गये। (iii) प्रवर्तकों का व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी न होना- यदि प्रवर्तकों ने उचित सावधानी ईमानदारी से अपने अधिकारों के अन्तर्गत कम्पनी के हित में कार्य किया है तो वे कम्पनी के प्रति हानियों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होते हैं जो कम्पनी ने उनकी त्रुटियों या भू कारण उठायी हों।

प्रवर्तकों के कार्य (Functions of Promoters)

यद्यपि प्रवर्तकों के कार्यों के सम्बन्ध में निश्चित रूप से विवेचना करना कठिन है, फिर उनके कुछेक सामान्य कार्यों का विवेचन अवश्य किया जा सकता है (1) निर्माण व सम्भावना को देखना- कम्पनी के निर्माण का विचार करके उसकी विचारधार पूर्ण करने का प्रयास करना। (2) योग्य व्यक्तियों का चयन-संचालकों की नियुक्ति करने के लिये योग्य व्यक्तियों चयन करना।(3) पार्षद सीमानियम एवं अन्तर्नियम तैयार करना पार्षद अन्तर्नियम तैयार करना। कम्पनी के लिए पार्षद सीमानियम

(4) समान प्रमाण पत्र प्राप्त करना कम्पनी की रजिस्ट्री कराकर समामेलन प्रमाण-पत्र प्राप्त करना। “(6) बैंको, अंकेक्षक एवं सलाहकार की नियुक्ति करना-प्रवर्तको द्वारा कम्पनी के लिए बैंकों को निर्धारित करने का कार्य किया जाता है। साथ ही कम्पनी के लिए अंकों एवं वैधानिक सलाहकारों की नियुक्ति की जाती है।

(6) विवरण की व्यवस्था करना-प्रविवरण को बनाकर रजिस्ट्रार के यहाँ भेजकर उसके विज्ञापन की समुचित व्यवस्था करना।

(7) प्रारम्भिक व्ययों का भुगतान करना प्रारम्भिक व्ययों को स्वयं भुगतान करने की व्यवस्था करना।

प्रवर्तकों के अधिकार (Rights of Promoters)

(1) प्रारम्भिक व्यय लेने का अधिकार प्रवर्तकों को यह अधिकार है कि कम्पनी के निर्माण एवं उसके चलाने में जो आवश्यक व्यय किए जायें, उन्हें वह कम्पनी से वसूल कर लें, परन्तु व्ययों को वसूल करने के लिये उन्हें आवश्यक प्रमाणक पेश करने होंगे। परन्तु यह समस्त व्यय अन्तर्नियम के अनुरूप होना आवश्यक है।

(2) सह-प्रवर्तक से आनुपातिक राशि प्राप्त करने का अधिकार किसी कम्पनी के प्रविवरण में मिव्यावर्णन के फलस्वरूप सह प्रवर्तकों में से किसी एक प्रवर्तक द्वारा क्षतिपूर्ति करनी पड़े या वह गुप्त लाभ अर्जित कर ले तो वह प्रवर्तक अन्य सह-प्रवर्तकों से आनुपातिक राशि वसूल कर सकता है।

(3) पारिश्रमिक पाने का अधिकार-चूँकि प्रवर्तक कम्पनियों के निर्माण करने एवं संचालित करने में कठिन परिश्रम करते हैं, अतः कम्पनियाँ इन्हें उनके प्रतिफल के रूप में पारिश्रमिक देती है। प्रवर्तक कम्पनी से निम्न रूपों में पारिश्रमिक प्राप्त कर सकता है- (i) लाभ, (ii) पारिश्रमिक, (iii) कमीशन, (iv) एकमुश्त राशि |

प्रवर्तकों के कर्तव्य (Duties of Promoters)

(1) विश्वासाश्रित सम्बन्ध बनाये रखना-प्रवर्तक का कम्पनी के भावी सदस्यों के प्रति भी विश्वासाश्रित सम्बन्ध होता है जिसे बनाये रखना आवश्यक है उसे विश्वास खण्डन का कोई कार्य नहीं करना चाहिए।

(2) प्रन्यासी की भाँति कार्य करना-प्रवर्तक को प्रन्यासी की भाँति कार्य करना होगा तथा कम्पनी के लाभार्थ ही कार्य करना होगा।

(3) सत्यता प्रकट करना-प्रवर्तक को कम्पनी की समस्त सत्य बातों को प्रकट कर देना चाहिए।

(4) जानकारी गुप्त न रखना- कम्पनी के प्रवर्तन के सम्बन्ध में कोई भी जानकारी गुप्त रखनी चाहिए। जानकारी गुप्त रखना मिथ्यावर्णन है। इसी प्रकार अपूर्ण स्पष्टीकरण हुआ होता तो छुपाय विश्वास खण्डन कहलाता है।

(5) अर्जित लाभ का प्रकट न करना-अर्जित लाभ का प्रकट न करना अवैध एवं वर्जित है। सालोमन बनाम सालोमन एण्ड कम्पनी के निर्णय के अनुसार पूर्व प्रकटीकरण के आधार पर कमाया गया लाभ वैध है।

प्रवर्तकों के दायित्व (Liabilities of Promoters)

प्रवर्तक के कुछ प्रमुख दायित्व निम्नानुसार हैं 1. समामेलन हेतु झूठी सूचनाएँ देने पर दायित्व-कभी-कभी कम्पनी के समामेलन के उपरान्ता यह सिद्ध हो जाता है कि कम्पनी का समामेलन निम्नांकित में से किसी भी कारण से हुआ है

(i) किसी झूठी या असत्य सूचना या तथ्यों के प्रस्तुतीकरण के कारण।

(1) प्रस्तुत किये गये किसी प्रलेख में किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने या प्रकट नहीं करने (iii) प्रस्तुत की गई घोषणा में किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने या प्रकट नहीं करने के क (iv) किसी अन्य कपटपूर्ण कार्य के कारण।

कारण।

ऐसी दशा में कम्पनी के प्रवर्तक धारा 447 के अधीन कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होगा।

धारा के अधीन दोषी को कारावास की सजा एवं जुर्माने से दण्डित करने का प्रावधान है।

2. भ्रामक प्रविवरण की दशा में दायित्व-कभी-कभी कोई व्यक्ति किसी भ्रामक प्रविवरण विश्वास कर उस कम्पनी की प्रतिभूतियों के लिए अभिदान कर देता है। उसके कारण उसे (अभिदा) को) क्षति उठानी पड़ती है। ऐसी दशा में प्रवर्तक उस प्रत्येक व्यक्ति की क्षति की पूर्ति के उत्तरदायी होगा जिसे ऐसे भ्रामक प्रविवरण के कारण क्षति उठानी पड़ी है। उसका यह दायित्व । अधिनियम के अधीन सामान्य दण्ड के अतिरिक्त होगा।

3. विशेष कार्य की प्रत्येक मद का प्रकटीकरण करने में असमर्थ रहने पर दायित्व-कभी-क कम्पनी की साधारण सभा में कोई विशेष कार्य भी किया जाता है। ऐसी दशा में, उस सभा में कि जाने वाले विशेष व्यवसाय/कार्य की प्रत्येक मद के लिए महत्वपूर्ण तथ्यों का विवरण उस सभा सूचना के साथ संलग्न किया जाना चाहिये। यदि इस प्रावधान का पालन करने में चूक की जाती है कम्पी का प्रत्येक प्रवर्तक तथा अन्य दोषी अधिकारी पर ₹50,000 तक अथवा ऐसे प्रवर्तक या दोन अधिकारों या उनके नातेदारों को होने वाले लाभ की राशि को 5 गुना तक की राशि का जुर्माना कि जा सकेगा।

4. धनराशि या सम्पत्ति लौटाने में असफल रहने पर दायित्व-कभी-कभी संवीक्षा / छान बीन दौरान अथवा रुग्ण कम्पनी के पुनर्वास की योजना के क्रियान्वयन के दौरान अधिकरण को यह लग है कि कम्पनी या रुग्ण कम्पनी के प्रवर्तन से जुड़े किसी प्रवर्तक ने निम्न अपराध या कार्य किये है. (i) उस कम्पनी की किसी राशि या सम्पत्ति का उसने गलत उपयोग किया है

(ii) वह उसके साथ दुराचार या भ्रष्टाचार करने या प्रन्यास भंग करने का दोषी है।

ऐसी दशा में अधिकरण आदेश जारी कर उस राशि या सम्पत्ति को लौटाने का प्रवर्तक निर्देश दे सकता है अथवा उस रुग्ण कम्पनी या उस पर हकदार को क्षतिपूर्ति के रूप में जितनी उचित समझे, उतनी राशि का अंश दान देने का निर्देश प्रवर्तक को दे सकता है।