एक सार्वजनिक कम्पनी के निर्माण हेतु प्रवर्तन से लेकर व्यवसाय प्रारम्भ तक एक प्रवर्तक के रूप में आप क्या-क्या कदम उठायेगे, सोप में वर्णन कीजिए। Describe in the soap what steps you will take as a promoter for the formation of a public company from incorporation to commencement of business.

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कम्पनी निर्माण विधि या प्राक्रिया (Procedure of Formation of Company)

कम्पनी के निर्माण की विधि में दे सब कार्यवाहियों शामिल हैं जो कि कम्पनी के प्रवर्तन से लेकर उसे व्यापार प्रारम्भ करने योग्य बनाने तक करनी होती है। इस कार्यवाहियों को अग्रलिखित भागों में विभाजित किया गया है–

1. कम्पनी का प्रवर्तन (Promotion of Company)

यह कम्पनी के निर्माण या स्थापना की प्रथम अवस्था है, क्योंकि इसके द्वारा ही एक कम्पनी अपना जीवन ग्रहण करती है। प्रवर्तन से आशय व्यापार सम्बन्धी सुविधाओं एवं सुअवसरों की खोज करना तथा व्यापारिक संस्थान से लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य के लिए पूँजी, सामग्री, सम्पत्ति एवं प्रबन्ध क्षमता को एकत्रीकरण करता है। इस प्रकार कम्पनी के निर्माण के सम्बन्ध में किये जाने वाले प्रारम्भिक कार्यों को ही प्रवर्तन कहते हैं। ये व्यक्ति को कम्पनी का प्रवर्तन करते हैं, ‘प्रवर्तक’ कहलाते है। प्रवर्तन की कार्यविधि को निम्न प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं

(1) विचार की खोज तथा प्रारम्भिक अनुसन्धान इसके प्रवर्तक अपने मस्तिष्क में कम्पनी के निर्माण के समबन्ध में विचारों की गहन जाँच करता है और उसको साकार रूप प्रदान करने के लिए वह प्रारम्भिक अनुसन्धान प्रारम्भ कर देता है तथा कम्पनी की स्थापना की सम्भावना का पता लगाया जाता है।

(2) विस्तृत जाँच-पड़ताल करना- विचार को कार्य रूप देने के लिए विस्तृत रूप से जाँच-पड़ताल की जाती है। विस्तृत जाँच करते समय प्रवर्तक अपने विचार अवता अनुसन्धान में छिपी हुई कमजोरियों को जानने का प्रयत्न करता है। वह यह मालूम करता है कि कितनी पूंजी की आवश्यकता होगी, व्यय कितना हो सकता है तथा अनुमानित लाभ क्या होना आदि।

(3) आवश्यक सामान एकत्रित करना-प्रारम्भिक अनुसन्धान एवं विस्तृत जाँच-पड़ताल कर लेने के पश्चात् प्रवर्तक कम्पनी के निर्माण के लिए आवश्यक सामान एकत्रित करना प्रारम्भ कर देता है। इस कार्य के लिए यह विभिन्न विशेषज्ञ तथा संस्थाओं से सम्पर्क स्थापित करता है तथा आवश्यक अनुवन्ध आदि करता है।

(4) वित्तीय प्रबन्ध करना-वह प्रविवरण द्वारा पूँजी एकत्र करने का प्रयत्न करता है तथा पूँजी एकत्र करने में वह अभिगोपकों की मदद लेता है तथा अन्य आवश्यक कार्यवाहियाँ करता है।

(5) प्रारम्भिक अनुबन्ध करना-प्रारम्भिक अनुबन्ध से अभिप्राय उन अनुबन्धों से है जो कि कम्पनी की ओर से तथा उसके लाभ के लिए प्रवर्तक विभिन्न पक्षों के साथ कम्पनी के समामेलन से पहले करता है, जैसे-विक्रेताओं और कम्पनी के प्रवर्तकों के मध्य सम्पत्ति खरीदने का अनुबन्ध। चूँकि यह अनुबन्ध कम्पनी के निर्माण से पहले किये जाते हैं, अतः इनके लिए कम्पनी के प्रवर्तक व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होते हैं।

2. कम्पनी का समामेलन (Incorporation of Company)

प्रत्येक कम्पनी का समामेलन कराना अनिवार्य होता है। बिना समामेलन कराये कम्पनी किसी भी कार्य को नहीं कर सकती है। जिस राज्य में कम्पनी का प्रधान कार्यालय स्थित हो उसी राज्य के कम्पनियों के रजिस्ट्रार के कार्यालय में समामेलन कराया जाता है। कम्पनी के समामेलन या रजिस्ट्रेशन के लिए किये जाने वाले कार्यों को निम्न प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं

(A) प्रारम्भिक क्रियाएँ (Preliminary Steps)-कम्पनी के समामेलन से पूर्व जो प्रारम्भिक क्रियाएँ की जाती हैं वे निम्नलिखित हैं

1. कम्पनी का प्रकार निर्धारित करना-प्रवर्तक को सर्वप्रथम अपनी कम्पनी का प्रकार निर्धारित करना होता है। कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत सार्वजनिक कम्पनी तथा निजी कम्पनी के पंजीयन का प्रावधान है। अब कोई भी भारत का नागरिक एवं निवासी व्यक्ति ‘एक व्यक्ति कम्पनी’ (OPC) का भी पंजीयन करवा सकता है। किन्तु ऐसी कम्पनी को एक निजी कम्पनी के रूप में ही पंजीकृत करवाया जा सकता है। ये सभी कम्पनियाँ अंशों द्वारा सीमित अथवा गारण्टी द्वारा सीमित दायित्व वाली हो सकती है।

2. रजिस्टर्ड कार्यालय का स्थान निर्धारित करना-सर्वप्रथम उस स्थान का निश्चय किया जाना चाहिए जिस स्थान पर कम्पनी का पंजीकृत कार्यालय स्थापित किया जायेगा। यदि स्थान निश्चय नहीं हो पाता तो उस राज्य का नाम अवश्य निश्चित करना होगा जिस राज्य में रजिस्टाई कार्यालय रखना है।

3. प्रस्तावित संचालकों द्वारा पहचान संख्या प्राप्त करना कोई भी व्यक्ति जो कम्पनी का संचालक बनना चाहता है अथवा जो किसी प्रस्तावित कम्पनी में संचालक के रूप में नियुक्ति को स्वीकार करने की सहमति देने वाला है, को ‘संचालक पहचान संख्या’ (Director Identification. Number or DIN) प्राप्त करना होता है। इस हेतु ऐसे व्यक्ति को केन्द्रीय सरकार के पास आवेदन करना होता है। केन्द्रीय सरकार आवेदन प्राप्ति के 30 दिनों के भीतर संचालक पहचान संख्या आवंटित कर देती है।

4. ‘डिजीटल सिगनेचर’ प्राप्त करना-अब कम्पनियों को पंजीयन हेतु ‘ऑन-लाइन’ आवेदन की व्यवस्था है। ऐसे आवेदन फाइल करने हेतु ‘डिजीटल सिगनेचर करने होते हैं। अतः प्रस्तावित कम्पनी के प्रवर्तकों / प्रस्तावित संचालकों या कम्पनी सचिव को किसी अधिकृत व्यक्ति से ‘डिजीटल सिगनेचर प्राप्त करना एवं उसका प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता है।

5. कम्पनी के नाम का चयन एवं आरक्षण करना- कम्पनी का समामेलन कराने के लिए प्रस्तावित कम्पनी के नाम का चयन एवं निर्धारण करना एवं रजिस्ट्रार से उस नाम का कम्पनी के लिए आरक्षण करवाना पड़ता है। नाम निर्धारित एवं आरक्षित करवाने के लिए प्रवर्तक को रजिस्ट्रार के पास एक आवेदन करना पड़ता है। यह आवेदन-पत्र फॉर्म नं. INC-1 में होना चाहिये तथा आवेदन के साथ निर्धारित शुल्क भी जमा करवाना चाहिये।

6. सीमानियम एवं अन्तर्नियमों के मसौदे तैयार करना-प्रवर्तक द्वारा कम्पनी के सीमानि एवं अन्तर्जियों के मसौदे तैयार करते हैं। इस कार्य के लिए प्रवर्तकों को अपने वकील, कम्प सचिव आदि की सहायता लेनी चाहिए।

7. मसौदों की रजिस्ट्रार से जाँच करवाना-सीमानियम एवं अन्तर्नियमों के मसौदों की रजिस्ट्रा से जाँच करा लेनी चाहिए। ऐसा करने से इनकी त्रुटियों को उनके मुद्रण से पहले ही दूर किया ज सकता है और समामेलन में देरी को टाला जा सकता है।

8. सीमानियम एवं अन्तर्नियमों का मुद्रण कराना-रजिस्ट्रार द्वारा सीमानियम एवं अन्तर्निया के मसौदों की जाँच कर लेने के बाद उनको मुद्रित करवाया जाता है। आजकल कम्प्यूटर द्वारा लेना प्रिन्ट की भी मान्यता मिल गई है। अतः इस तरीके से भी मुद्रण करवाया जा सकता है।

9. मुद्रांक लगाना एवं तिथि अंकित करना-मुद्रण के पश्चात् पार्षद सीमानियम एवं पा अन्तनियमों पर आवश्यक मुद्रांक लगाये जाते हैं तत्पश्चात् इन प्रलेखों पर तिथि भी अंकित करने पड़ती है। यह तिथि मुद्रांक लगाने की तिथि के बाद की होनी आवश्यक है।

10. अभिदाताओं के हस्ताक्षर करवाना कम्पनी के सीमानियम में अभिदाताओं का खण्ड होट है जहाँ पर अभिदाताओं के हस्ताक्षर करवाने होते हैं। सार्वजनिक कम्पनी की दशा में कम से कम तथा निजी कम्पनी की दशा में कम से 2 अभिदाताओं के हस्ताक्षर कराने आवश्यक होते हैं। एक व्यक्ति कम्पनी की दशा में केवल एक ही अभिदाता द्वारा हस्ताक्षर करने होते हैं। यदि अभिदाता स्व हस्ताक्षर करने के लिए उपलब्ध न हो तो हस्ताक्षर उसके किसी अधिकृत व्यक्ति से करवाये जा सकते है। इस खण्ड में अभिदाता का नाम, पता, व्यवसाय आदि का भी उल्लेख किया जाता है।

11. कानूनी अपेक्षाओं की पूर्ति सम्बन्धी घोषणा करना-प्रवर्तक को कम्पनी का समामेल प्रा करवाने के लिए कानूनी अपेक्षाओं की पूर्ति सम्बन्धी घोषणा भी करनी होती है। दूसरे शब्दों में, प्रवर्तक क को इस आशय की घोषणा करनी होती है कि कम्पनी के पंजीयन तथा आनुषंगिक मामलों के सम्बन में कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों एवं उसके अधीन बनाये गये नियमों की सभी अपेक्षाओं का पालन प्र कर लिया गया है।

12. अभिदाताओं का विवरण प्राप्त करना-प्रवर्तक को अभिदाताओं का विवरण भी प्राप्त करना ता है। इनके विवरण में उनका पारिवारिक नाम, निवास का पता, राष्ट्रीयता आदि सम्मिलित हैं।

13. संचालको, प्रबन्ध संचालकों का विवरण तैयार करना- यदि प्रवर्तक कम्पनी के संचालकों, कालीन संचालक, प्रबन्ध संचालकों या प्रबन्धक आदि की नियुक्ति करना चाहते हैं तो उन्हें इनके क्षम, पते आदि के विवरण तथा इनके साथ किये जाने वाले ठहरावों की प्रतिलिपि भी तैयार करवानी हिए।

14. संचालकों की सहमति प्राप्त करना-प्रवर्तकों को उन व्यक्तियों को लिखित सहमति भी प्राप्त करनी होती है जो कम्पनी के प्रथम संचालक बनने को राजी हुए हैं तथा जिनका नाम कम्पनी • अन्तर्जियमों में उल्लिखित है। ऐसी सहमति निर्धारित प्रारूप एवं रीति से प्राप्त करनी पड़ती है।

(B) रजिस्ट्रार को प्रपत्रों की सुपुर्दगी-प्रारम्भिक क्रियायें करने के पश्चात् सम्बन्धित कम्पनी रजिस्ट्रार के पास निम्नलिखित प्रलेख भेजने चाहिए

1. पत्राचार हेतु पते की सूचना प्रत्येक कम्पनी को समामेलन के समय रजिस्ट्रार को उस स्थान के पते की सूचना का प्रलेख सुपुर्द करना चाहिये जिस पर कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय की स्थापना के समय तक पत्रव्यवहार किया जा सके।

2. सीमानियम- प्रत्येक कम्पनी को अपना सीमानियम रजिस्ट्रार के पास फाइल करना होता है। सीमानियम पर कम्पनी के सभी अभिदाताओं के निर्धारित की गयी रीति से हस्ताक्षर होने चाहिये ।

3. अन्तर्नियम-प्रत्येक प्रस्तावित कम्पनी को अपने समामेलन के लिए रजिस्ट्रार के पास अपने अन्तर्नियम भी फाइल करने पड़ते हैं। अन्तर्नियमों पर भी सभी अभिदाताओं के हस्ताक्षर होने चाहिये। इस अधिनियम की अनुसूची I की सारणी F से J तक की तालिकाओं में विभिन्न प्रकार की कम्पनियों के लिए अन्तर्जियमों के प्रारूप दिये गये हैं। प्रत्येक कम्पनी को अपनी प्रकृति के अनुरूप उनमें से किसी एक उपयुक्त प्रारूप में अपने अन्तर्नियम तैयार करने चाहिये।

4. कानूनी अपेक्षाओं की पूर्ति की घोषणा प्रत्येक कम्पनी को अपने समामेलन के समय कानूनी औपचारिकताओं/अपेक्षाओं की पूर्ति सम्बन्धी घोषणा की फाइल करनी होती है। दूसरे शब्दों में, कम्पनी को इस आशय की घोषणा का प्रलेख फाइल करना होता है कि कम्पनी ने कम्पनी के पंजीयन एवं उससे आनुषंगिक मामलों के सम्बन्ध में कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों एवं उसके अधीन बनाये गये नियमों के अधीन औपचारिकताओं को पूरा कर लिया गया है।

5. अभिदाताओं तथा प्रथम संचालकों का शपथ-पत्र- प्रत्येक कम्पनी को अपने सीमानियम के प्रत्येक अभिदाता तथा प्रत्येक ऐसे प्रथम संचालक जिसका नाम अन्तर्नियमों में उल्लिखित है, से शपथ-पत्र प्राप्त कर समामेलन के आवेदन के साथ प्रस्तुत करना होता है।

6. संचालकों की लिखित सहमति-कम्पनी के समामेलन के समय रजिस्ट्रार को उन लोगों की लिखित सहमति भी (फार्म नं DIR-12 में) प्रस्तुत करनी चाहिये जिन्होंने कम्पनी के संचालक के रूप में कार्य करना स्वीकार किया है। यह सहमति निर्धारित की गयी रीति एवं प्रारूप में देनी होती है।

7. नाम आरक्षण की पुष्टि करने वाले पत्र की प्रति कम्पनी को उस पत्र की प्रति भी संलग्न करनी होती है जिसके द्वारा रजिस्ट्रार द्वारा कम्पनी का नाम आरक्षण करने की पुष्टि की गई थी।

8. निर्धारित शुल्क की रसीद-कम्पनी के समामेलन के लिए कुछ शुल्क भी लगता है। यह शुल्क भारत सरकार के खाते में जमा होता है। शुल्क की दरें भारतीय कम्पनी अधिनियम की दसवीं अनुसूची में दे रखी हैं। इन दरों के अनुरूप शुल्क की राशि इलेक्ट्रॉनिक ट्रान्सफर अथवा नकद या बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से जमा करवायी जा सकती है। शुल्क जमा करने हेतु चालान भी इलेक्ट्रॉनिकली प्राप्त किया जाता है। ये सभी प्रपत्र रजिस्ट्रार द्वारा कम्पनी के नाम के आरक्षण के लिए आवेदन करने तिथि के 60 दिनों के भीतर प्रस्तुत करने चाहिये ।

(C) समामेलन प्रमाण पत्र प्राप्त करना-जब रजिस्ट्रार को निश्चित शुल्क सहित आवश्यक प्रपत्र प्राप्त हो जाते हैं, तब वह इन प्रपत्रों की गहन जाँच करता है। यदि रजिस्ट्रार को यह संतोष हो जाता है कि कम्पनी के समामेलन से सम्बन्धित सभी वैधानिक कार्यवाहियाँ पूर्ण हो गयी हैं, तो वा कम्पनी का नाम अपने रजिस्टर में दर्ज कर लेता है और रजिस्ट्री कर देता है। रजिस्ट्री के बाद कम्पन रजिस्ट्रार अपने हस्ताक्षर एवं अपने कार्यालय की मुहर के अन्तर्गत समामेलन का प्रमाण पत्र जारी कर देता है। इसके जारी होने के पश्चात् कम्पनी को वैधानिक अस्तित्व प्राप्त हो जाता है।

समामेलन का प्रमाण-पत्र इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि रजिस्ट्रेशन से सम्बन्धित कम्पनी अधिनियम की समस्त आवश्यकताएँ पूरी कर दी गई है कि प्रत्येक कार्य नियमानुकूल है कि कम्पनी प्रमाण-पत्र में उल्लिखित तिथि से अस्तित्व में आ गयी है और उसको प्राकृतिक व्यक्ति के समान अधिकार एवं दायित्व है तथा यह अनुबन्ध करने में सक्षम है। अतः समामेलन का प्रमाण-पत्र कम्पनी के वैधानिक अस्तित्व का प्रमाण है। समामेलन के प्रमाण-पत्र में उल्लिखित तिथि को रजिस्ट्रार कम्पनी को कम्पनी का पहचान क्रमांक (Company Identification Number or CIN) भी आनंदित करेगा जो उसी तिथि से मान्य होगा। यह पहचान क्रमांक कम्पनी को एक पृथक् पहचान देता है। यही ‘कम्पनी पहचान क्रमांक कम्पनी के समामेलन के प्रमाण-पत्र में भी लिखा जायेगा।

कम्पनी के समामेलन के प्रभाव (Effects of Incorporation of Company)

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 9 में कम्पनी के समामेलन के कुछ प्रभावों का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त, कुछ न्यायिक निर्णयों में समामेलित कम्पनी के प्रभावों का उल्लेख किया गया है। संक्षेप में, कम्पनी के समामेलन या एक समामेलित कम्पनी के निम्न प्रभाव होते हैं

1. निगमीय व्यक्तित्व का जन्म-समामेलन के कारण प्रत्येक कम्पनी अपने समामेलन के प्रमाण-पत्र में लिखी तिथि से ही सीमानियम में उल्लिखित नाम से एक निगमीय व्यक्तित्व का जन्म हो जाता है। समामेलन की तिथि से ही कम्पनी को अपने निर्माण करने वाले सदस्यों से पृथक् अस्तित्व प्राप्त हो जाता है। यह उल्लेखनीय है कि अब भारत में भी एक व्यक्ति कम्पनी का भी समामेलन होता है तथा उस कम्पनी का भी अपना निर्माण करने वाले एकाकी सदस्य से पृथक् अस्तित्व होता है।

2. निश्चित नाम-समामेलन की तिथि से ही कम्पनी उस नाम से जानी एवं पहचानी जाती है जिस नाम का उल्लेख उसके समामेलन के प्रमाण-पत्र में किया गया है।

3. सभी कार्य करने की क्षमता प्रत्येक कम्पनी अपने समामेलन की तिथि से ही वे सभी कार्य करने की क्षमता प्राप्त कर लेती है जो एक समामेलित कम्पनी अपने सीमानियम एवं अन्तर्नियम की सीमा में आते हैं। अतः एक समामेलित कम्पनी माल एवं सम्पत्ति का क्रय-विक्रय कर सकती है, बैंक में खाता खोल सकती है, दूसरों पर वाद प्रस्तुत कर सकती है तथा दूसरे भी इस पर वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

4. अविच्छिन्न उत्तराधिकार-एक समामेलित कम्पनी को अविच्छिन्न उत्तराधिकार प्राप्त होता है।

5. सार्वमुद्रा प्रत्येक समामेलित कम्पनी को अपनी एक सार्वमुद्रा (Common Seal) रखने का अधिकार है।

6. सीमित दायित्व- समामेलन के बाद कम्पनी के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा पारित अंशों पर अदत राशि तक सीमित होता है। न कभी भी उनसे इस अदत्त राशि से अधिक की माँग नहीं कर सकती है। गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी की दशा में कम्पनी के सदस्यों से अधिकतम उनके द्वारा दी गयी सारी की राशि ही माँगी जा सकती है। यह राशि भी कम्पनी के समापन की दशा में ही माँगी जा सकती है।

7. पुबक सम्पत्ति कम्पनी की अपने सदस्यों से पृथक सम्पत्तियाँ होती है। कम्पनी की सम्पत्तियों पर कम्पनी का अधिकार होता है न कि अंशधारियों या सदस्यों का उच्चतम न्यायालय ने तो यहाँ तक कहा कि कोई भी अंशधारी कम्पनी की सम्पत्तियों का आंशिक स्वामी भी नहीं होता है। सदस्य केवल समय-समय पर घोषित लाभांश ही प्राप्त कर सकते हैं। समापन की दशा में भी सभी दायित्वों एवं ऋणों के भुगतान के बाद यदि कुछ सम्पत्तियाँ शेष बचती हैं तो उन्हें अंशधारियों में बाँटा जा सकता है।

8. समामेलन की त्रुटियों पर पर्दा-समामेलन का प्रमाण-पत्र इस बात का अकाट्य प्रमाण होता है कि कम्पनी के समामेलन के सम्बन्ध में सभी वैधानिक औपचारिकताओं को पूरा कर दिया गया है। अतः समामेलन हो जाने के बाद उन सभी त्रुटियों या कमियों पर उंगली भी नहीं उठाई जा सकती है जो समामेलन की प्रक्रिया में रह गई थी।

(3) पूँजी अभिदान (Capital Subscription)

अंश पूँजी वाली प्रत्येक कम्पनी तब तक अपना व्यवसाय प्रारम्भ नहीं कर सकती है जब तक वह कम्पनी अपने लिए कम से कम न्यूनतम आवश्यक अंश पूँजी के लिए अभिदान प्राप्त नहीं कर लेती है।

यह उल्लेखनीय है कि प्रत्येक निजी कम्पनी की कम से कम ₹ एक लाख या इससे अधिक निर्धारित की गई राशि की प्रदत्त अंश पूँजी होनी चाहिए। सार्वजनिक कम्पनी की कम से कम ₹5 लाख अथवा इससे अधिक निर्धारित की गयी राशि की प्रदत्त अंश पूँजी होनी चाहिए। कोई भी सार्वजनिक कम्पनी अंश पूँजी प्राप्त करने हेतु निम्नांकित में से किसी एक या दोनों साधनों को अपना सकती है–

(i) निजी आधार पर प्रतिभूतियों का प्रस्ताव पत्र (Private placement offer letters) जारी करके।

(ii) प्रविवरण जारी करके। किन्तु कोई भी निजी कम्पनी केवल निजी आधार पर प्रतिभूतियों का प्रस्ताव पत्र जारी करके ही अंश पूँजी का अभिदान प्राप्त कर सकती है। परन्तु एक व्यक्ति कम्पनी की दशा में सम्पूर्ण अंश पूँजी का अभिदान केवल उसके एकाकी सदस्य को ही करना होता है। अतः ऐसी कम्पनी निजी आधार पर प्रतिभूतियों का प्रस्ताव पत्र केवल उसे ही जारी कर सकती है, किसी और को नहीं।

(4) व्यवसाय का प्रारम्भ (Commencement of Business)

कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार कोई भी अंश पूँजी वाली कम्पनी अपने व्यवसाय को प्रारम्भ तभी कर सकती है या कोई भी राशि उधार तभी ले सकती है जबकि यह निम्न औपचारिकताओं की पूर्ति कर देती है

1. अभिदाताओं से भुगतान प्राप्ति की घोषणा-कम्पनी के किसी एक संचालक द्वारा इस बात की घोषणा कर दी गयी हो कि सीमानियम के प्रत्येक अभिदाता ने अपनी सहमति के अनुरूप अंश लेकर उनके मूल्य का भुगतान कर दिया है। यह घोषणा निर्धारित की गई रीति से निर्धारित शुल्क के साथ की जानी चाहिये तथा इसे रजिस्ट्रार को फाइल किया जाना चाहिए।

2. प्रदत्त पूँजी के सम्बन्ध में घोषणा-निजी कम्पनी की दशा में एक संचालक को यह घोषणा भी करनी होती है कि इस घोषणा के दिन कम्पनी की प्रदत्त अंश पूँजी र एक लाख अथवा इससे अधिक निर्धारित की गयी राशि से कम नहीं है। सार्वजनिक कम्पनी की दशा में, उसके किसी एक संचालक को यह घोषणा करनी पड़ती है कि इस घोषणा के दिन उसकी प्रदत्त अंश पूँजी ₹5 लाख या इससे अधिक निर्धारित की गयी राशि से कम नहीं है।

3. सम्बन्धित नियामक संस्था से अनुमोदन-यदि कम्पनी के लिए अपने से सम्बन्धित अन्य किसी नियामक संस्था जैसे रिजर्व बैंक, ‘सेबी’ आदि से भी पंजीयन कराना अनिवार्य हो तो कम्पनी को उनसे अनुमोदन प्राप्त कर लेना चाहिये। ऐसा अनुमोदन प्राप्त कर लेने के उपरान्त ही कम्पनी अपना व्यवसाय प्रारम्भ कर सकेंगी।

4. पंजीकृत कार्यालय का प्रमाणन कम्पनी को व्यवसाय प्रारम्भ करने से पूर्व अपने पंजीकृत कार्यालय का प्रमाणन भी कराना होता है।

उपर्युक्त प्रावधानों का पालन करने में त्रुटि करके कम्पनी द्वारा व्यवसाय को प्रारम्भ कर दिया जाता है तो कम्पनी पर ₹ 5,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कम्पनी के प्रत्येक दोषी अधिकारों पर ₹1,000 प्रतिदिन तक का जुर्माना तब तक लगाया जा सकता है जब तक कि ऐसा दोष जारी रहता है।


Process of Formation of Company

The method of formation of a company includes all the actions that have to be taken from the commencement of the company to enable it to start business. This proceedings have been divided into the following parts-

1. Promotion of Company

This is the first stage of the formation or establishment of the company, because it is through this that a company takes its life. Enforcement refers to the search for business related facilities and opportunities and to collect capital, material, property and management capacity for the purpose of getting profit from the business organization. In this way, the initial work done in relation to the formation of the company is called enforcement. The person who promotes the company is called ‘promoter’. The procedure for enforcement can be explained as follows

(1) The search for the idea and the preliminary research Its originator makes a thorough investigation of the ideas regarding the formation of the company in his mind and to make it a reality, he starts the preliminary research and explores the possibility of the establishment of the company. goes.

(2) Conducting detailed investigation- A detailed investigation is done to give effect to the idea. While doing a detailed investigation, the promoter tries to know the hidden weaknesses in his research. He finds out how much capital would be required, what the expenditure could be and what the expected profit would be, etc.

(3) Collecting the necessary goods – After doing preliminary research and detailed investigation, the promoter starts collecting the necessary items for the formation of the company. For this work, it establishes contact with various experts and institutions and makes necessary contracts etc.

(4) To make financial management – He tries to collect capital through prospectus and in collecting capital he takes the help of the underwriters and takes other necessary actions.

(5) Preliminary contract – Preliminary contract means those contracts which the promoter enters into before the amalgamation of the company with various parties on behalf of the company and for its benefit, such as purchase of property between the sellers and the promoters of the company. contract of Since these agreements are made before the formation of the company, the promoters of the company are personally responsible for them.

2. Incorporation of Company

It is mandatory for every company to be amalgamated. The company cannot do any work without amalgamation. The amalgamation is done in the office of the Registrar of Companies of the same state in which the head office of the company is situated. The functions to be done for the amalgamation or registration of a company can be explained as follows:

(A) Preliminary Steps – The following are the preliminary actions taken before the amalgamation of the company

1. Determining the type of company – The promoter has to first determine the type of his company. There is a provision for registration of public company and private company under the Companies Act. Now any citizen and resident of India can also register for ‘One Person Company’ (OPC). But such a company can be registered as a private company only. All these companies may be limited by shares or liability limited by guarantee.

2. Determination of the place of registered office – First of all, the place should be decided where the registered office of the company will be established. If the place is not decided, then the name of the state must be decided in which the registration office is to be kept.

3. Obtaining Identification Number by Proposed Operators Any person who intends to become a director of the company or who consents to accept the appointment as director in any proposed company shall be provided with an ‘Operator Identification Number’ (Director Identification Number). or DIN) has to be obtained. For this such person has to apply to the Central Government. The Central Government allots the Operator Identification Number within 30 days of receipt of the application.

4. Obtaining ‘Digital Signature’ – Now there is a system of ‘on-line’ application for registration of companies. A ‘digital signature’ is required to file such applications. Therefore, the promoters / proposed directors or company secretary of the proposed company have to obtain a ‘digital signature’ from an authorized person and obtain its certificate.

5. Selection and reservation of the name of the company – For the amalgamation of the company, the name of the proposed company has to be selected and fixed and the registrar has to get that name reserved for the company. To get the name fixed and reserved, the promoter has to make an application to the registrar. This application form no. INC-1 and the prescribed fee should also be deposited along with the application.

6. Draft memorandum and Articles of Association – Prepares draft of the memorandum and contents of the company by the promoter. For this work the promoters should take the help of their lawyer, company secretary etc.

7. To get the drafts checked by the Registrar – The drafts of the Memorandum and Articles should be checked with the Registrar. by doing so their Errors can be corrected before they are printed and delays in amalgamation can be avoided.

8. Printing of memorandum and articles – After checking the drafts of memorandum and articles by the Registrar, they are got printed. Nowadays, taking prints by computer has also been recognized. So printing can be done in this way also.

9. Stamping and marking of date – After printing, necessary stamps are put on the Councilor’s memorandum and the Articles of Association, after which the date has to be marked on these documents. This date must be after the date of stamping.

10. Getting the Signatures of the Subscribers In the memorandum of the company there is a clause of the Subscribers where the signatures of the Subscribers are to be done. Signatures of at least 2 subscribers are required in case of public company and at least 2 in case of private company. In the case of a one person company, it has to be signed by only one subscriber. If the subscriber is not available for self-signing, the signature can be got done by any of his authorized person. The name, address, occupation, etc. of the subscriber are also mentioned in this section.

11. Declaration regarding fulfillment of legal requirements – Promoter has to make declaration regarding fulfillment of legal requirements to get the company amalgamated. In other words, Promoter A has to make a declaration to the effect that all the requirements of the provisions of the Companies Act and the rules made thereunder have been complied with in relation to the registration of the company and matters incidental thereto.

12. Obtaining Subscribers Details – The Promoter also has to get the details of the Subscribers. Their details include their family name, residence address, nationality etc.

13. Preparation of details of directors, managing directors – If the promoters want to appoint directors, carpet operators, managing directors or managers etc. of the company, then they should prepare the details of their capacity, address etc. and also the copy of the agreements to be made with them. Have to get it done

14. Obtaining the consent of the directors – The promoters also have to obtain written consent from those persons who have agreed to be the first directors of the company and whose name is mentioned in the Articles of Association of the company. Such consent has to be obtained in the prescribed format and manner.

(B) The registrar should send the following documents to the concerned Registrar of Companies after the delivery-preliminary actions of the forms

1. Information of Address for Correspondence Every company shall at the time of amalgamation, submit to the Registrar a document indicating the address of the place at which correspondence may take place at the time of establishment of the registered office of the company.

2. Memorandum of Understanding – Every company has to file its memorandum with the Registrar. The memorandum should be signed in the manner prescribed by all the subscribers of the company.

3. Articles of Association.- Every proposed company has to file its Articles also with the Registrar for its amalgamation. The Articles should also be signed by all the Subscribers. The formats for different types of companies are given in the tables F to J of Schedule I of this Act. Every company should prepare its Articles of Association in any one of them suitable for its nature.

4. Declaration of Compliance of Legal Requirements Every company is required to file a declaration regarding fulfillment of legal formalities/requirements at the time of its amalgamation. In other words, the company has to file a document of declaration to the effect that the formalities under the provisions of the Companies Act and the rules made thereunder have been completed in relation to the registration of the company and matters incidental thereto.

5. Affidavit of Subscribers and First Directors – Every company has to obtain an affidavit from every subscriber to its memorandum and every such first director whose name is mentioned in the Articles of Association and submit it along with the application for amalgamation.

6. Written consent of directors- At the time of amalgamation of the company, the registrar should also submit the written consent (in Form No. DIR-12) of those who have agreed to act as directors of the company. This consent has to be given in the prescribed manner and format.

7. A copy of the letter confirming the reservation of names The company is also required to enclose a copy of the letter by which the registrar confirms the reservation of the name of the company.

8. Receipt of prescribed fee – Some charges are also levied for amalgamation of the company. This fee is deposited in the account of Government of India. The rates of duty are given in the Tenth Schedule of the Indian Companies Act. The amount of fee corresponding to these rates can be deposited by electronic transfer or through cash or bank draft. Challan for payment of fee is also received electronically. All these forms should be submitted by the Registrar within 60 days from the date of application for reservation of company name.

(C) Obtaining the Certificate of Incorporation – When the Registrar has received the necessary forms along with the fixed fee, then he conducts a thorough examination of these forms. If the Registrar is satisfied that all the statutory proceedings relating to the amalgamation of the company have been completed, or the name of the company registers and registers. After the registry, the Registrar of Companies issues the certificate of amalgamation under his signature and the seal of his office. After its issuance, the company gets statutory existence.

The certificate of amalgamation is irrefutable proof that all the requirements of the Companies Act relating to registration have been fulfilled that every business is in accordance with the rules that the company has come into existence from the date mentioned in the certificate and that it is treated as a natural person. Has rights and obligations and is capable of contracting. Therefore, the certificate of amalgamation is the proof of the legal existence of the company. The Registrar shall also furnish to the company the Company Identification Number or CIN on the date mentioned in the certificate of amalgamation which shall be valid from that date. This identification number gives a distinct identity to the company. The same ‘Company Identity Number’ will also be mentioned in the certificate of amalgamation of the company.

Effects of Incorporation of Company

Section 9 of the Companies Act, 2013 deals with some of the effects of amalgamation of the company. In addition, the effects of the amalgamated company have been mentioned in some judicial decisions. In short, the amalgamation of the company or an amalgamated company has the following effects:

1. Birth of a Corporate Personality – Due to the amalgamation, every company takes the birth of a corporate personality by the name specified in the memorandum from the date mentioned in its certificate of amalgamation. From the date of amalgamation, the company gets a separate entity from the members who form it. It is worth mentioning that now in India also a one person company is also amalgamated and that company also has a separate existence from the sole member forming its own.

2. Fixed Name – From the date of amalgamation, the company is known and recognized by the name mentioned in its certificate of amalgamation.

3. Capacity to perform all functions Every company acquires from the date of its amalgamation the capacity to perform all those functions which an amalgamated company is subject to its memorandum and Articles of Association. Therefore, an amalgamated company can buy and sell goods and property, open an account with a bank, sue others and others can also sue.

4. Perpetual succession- An amalgamated company enjoys perpetual succession.

5. Universal Currency Every amalgamated company has the right to keep one common seal of its own.

6. Limited Liability- The liability of the members of the company after amalgamation is limited to the amount unpaid on the shares passed by them. Nor can ever demand more than this unpaid amount from them. In the case of a company limited by guarantee, the members of the company can be demanded only for the maximum amount given by them. This amount can also be called for in the event of winding up of the company.

7. Public property is the property of the company separately from its members. The property of the company is the right of the company and not the shareholders or members, the Supreme Court has even said that no shareholder is even a partial owner of the company’s properties. Members can receive dividends declared from time to time only. Even in the event of liquidation, if some assets are left after the payment of all liabilities and debts, then they can be distributed among the shareholders.

8. Curtain on the Errors of Amalgamation – The certificate of amalgamation is irrefutable proof that all the statutory formalities regarding the amalgamation of the company have been completed. Hence, after the amalgamation has taken place, all those defects or shortcomings which were left in the process of amalgamation cannot be pointed out.

(3) Capital Subscription

Every company with share capital cannot start its business unless that company has subscribed for at least the minimum required share capital for itself.

It is to be noted that every private company should have a paid-up share capital of at least ₹ one lakh or more of the prescribed amount. The public company should have a paid-up share capital of at least ₹ 5 lakh or more of the prescribed amount. Any public company can adopt any or both of the following means for obtaining share capital-

(i) By issuing private placement offer letters on a private basis.

(ii) by issuing a prospectus. But any private company can subscribe to the share capital only by issuing offer letter of securities on private basis. But in the case of a one person company, the entire share capital has to be subscribed only by its sole member. Therefore, such a company can issue offer of securities on private basis only to him and not to anyone else.

(4) Commencement of Business

According to the Companies Act, 2013, any share capital company can start its business or borrow any amount only if it fulfills the following formalities

1. Declaration of receipt of payment from subscribers- A declaration has been made by one of the directors of the company that each subscriber to the memorandum has taken the shares as agreed upon and paid the value thereof. This declaration shall be determined in the manner prescribed.

The copy should be made along with the fee and it should be filed with the Registrar.

2. Declaration in respect of paid-up capital – In the case of a private company, a director has to also declare that the paid-up share capital of the company is not less than T one lakh or more than the prescribed amount on the day of such declaration. In the case of a public company, one of its directors has to declare that his paid-up share capital is not less than ₹ 5 lakh or more on the date of such declaration.

3. Approval from the concerned regulatory body- If it is mandatory for the company to register with any other regulatory body related to it like Reserve Bank, SEBI etc., then the company should get approval from them. The company will be able to start its business only after obtaining such approval.

4. Certification of Registered Office The company also has to get the certification of its registered office done before starting the business.

In default of complying with the above provisions, if the company starts business, then the company can be fined up to ₹ 5,000. In addition, a fine of up to ₹ 1,000 per day may be imposed on each of the defaulting rights of the company as long as such defect continues.

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