प्रवर्तन शब्द की परिभाषा दीजिए। कम्पनी प्रवर्तकों के कार्य, अधिकार एवं दायित्व समझाइए। Define the term enforcement. Explain the functions, rights and responsibilities of company promoters.

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कम्पनी के प्रवर्तन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Promotion of a Company)

प्रवर्तन कम्पनी के निर्माण की प्रथम सीढ़ी है, जिसमें एक कम्पनी स्थापित करने का विचा उत्पन्न होता है और इसे कार्य रूप में परिणित करने के लिए आवश्यक कार्यवाही की जाती है। इस प्रकार कम्पनी के प्रवर्तन का कार्य नवीन विचार उत्पन्न होने से प्रारम्भ होता है और तब तक चलत रहता है, जब तक कि वैधानिक रूप से कम्पनी की स्थापना न हो जाये। इसके अन्तर्गत यह भी विचार किया जाता है कि कम्पनी का व्यवसाय क्षेत्र क्या होगा, इसकी आवश्यक सामग्री कहाँ से प्राप्त होगी. इसके लिए पूंजी किन-किन स्रोतों से प्राप्त होगी, इसकी स्थापना के लिए कौन-कौन सी वैधानिक कार्यवाहियों करनी पड़ेगी ? आदि।

गर्स्टनबर्ग के अनुसार, “प्रवर्तन में व्यापार सम्बन्धी सुअवसरों की खोज की जाती है और इसके बाद लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से पूँजी, सम्पत्ति एवं प्रबन्ध कला का संगठन किया जाता है।”

गुथमैन एवं डूगल के अनुसार, “प्रवर्तन उस विचारधारा के साथ आरम्भ होती है जिससे किसी के व्यवसाय का विकास किया जाना है और इसका कार्य तब तक चलता रहता है जब तक कि वह व्यवसाय एक चालू संस्था के रूप में अपना कार्य पूर्णरूप से प्रारम्भ करने के लिए तैयार नहीं हो जाता।”

प्रवर्तक का आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Promoter)

प्रवर्तक का आशय ऐसे व्यक्तियों से है जो कम्पनी के निर्माण सम्बन्धी विचार अपने मस्तिष्क लाकर आवश्यक खोजबीन करके एक निश्चित योजना के अनुसार कम्पनी का निर्माण करते हैं। दूसरे शब्दों में, प्रवर्तक से आशय ऐसे व्यक्तियों से है जो व्यापार सम्बन्धी अनुसन्धान करते हैं और किसी निश्चित योजना के अनुसार कम्पनी का निर्माण करते हैं, आवश्यक सामग्री को एकत्र करते हैं और कम्पनी के संचालन की रूपरेखा तैयार करते हैं। कम्पनियों के निर्माण एवं विकास में प्रवर्तकों का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। प्रवर्तक एक व्यक्ति व्यक्तियों का समूह या फर्म या कम्पनी हो सकती है।

(1) लाई ब्लेकबर्न (Lord Blacburn) के अनुसार, “प्रवर्तक शब्द उन व्यक्तियों को सम्बोधित करने का संक्षिप्त एवं सुविधापूर्ण ढंग है जो कि उस मशीन को चालू करते हैं जिसके द्वारा कम्पनी अधिनियम उनको एक समामलित कम्पनी का निर्माण करने के योग्य बना देता है।”

(2) सर फ्रांसिस पामर (Sir Francis Palmer) के अनुसार, “प्रवर्तक वह व्यक्ति होता है, जो कम्पनी के निर्माण की योजना बनाता है, पार्षद सीमानियम तथा अन्तर्नियम तैयार करवाता है, उनकी रजिस्ट्री करवाता है और प्रथम संचालकों को चुनता है, प्रारम्भिक अनुबन्धों एवं प्रविवरण की शर्तों को तय करता है तथा प्रविवरण को प्रकाशित करने तथा पूँजी एकत्र करने का प्रबन्ध करता है। ”

(3) कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 (69) के अनुसार, “प्रवर्तक से आशय उस व्यक्ति से है जिसका नाम प्रविवरण में प्रवर्तक के रूप में लिखा या समांकित किया गया है अथवा जिसकी पहचान कम्पनी की वार्षिक विवरणी में प्रवर्तक के रूप में करायी गई है अथवा जिसका अंशधारी या संचालक या अन्य किसी रूप में कम्पनी के कार्यकलापों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियन्त्रण हो अथवा जिसकी सलाह या निर्देशों के अनुसार कम्पनी का संचालक मण्डल कार्य करने का अभ्यस्त है। किन्तु यदि कोई व्यक्ति अपनी पेशेवर क्षमता में सलाह या निर्देश देता है, तो उसे प्रवर्तक नहीं माना जायेगा

(4) गुवमैन एवं गूगल (Guthman and Daugal) के अनुसार, “प्रवर्तक वह व्यक्ति है जो कम्पनी के निर्माण की योजना बनाता है एवं कम्पनी को एक कृत्रिम व्यक्ति के रूप में अस्तित्व में लाता है।

इस प्रकार प्रवर्तक से आशय उन व्यक्तियों से है जो किसी कम्पनी के निर्माण की योजना बनाते हैं एवं उसको वास्तविक रूप प्रदान करने हेतु अनेक कार्यों को सम्पन्न करते हैं।

प्रवर्तकों की वैधानिक स्थिति (Legal Position of Promoters)

प्रवर्तक कम्पनी के प्रवर्तन से लेकर उसके व्यापार प्रारम्भ करने की स्थिति तक सभी कार्य करता है। अतः एक प्रवर्तक की सभी सेवाएँ कम्पनी निर्माण के कार्य में असाधारण होती हैं। एक प्रवर्तक की सेवाएँ असाधारण होते हुए भी कम्पनी के साथ एक प्रवर्तक की वैधानिक स्थिति विश्वासाश्रित सम्बन्धों की होती है अर्थात् यह माना जाता है कि कम्पनी के साथ उसका सम्बन्ध विश्वास पर आधारित है और उसने जो भी कार्य किया है, उस पर समामेलन होने के पश्चात् कम्पनी व उसके अंशधारियों को विश्वास करना होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्रवर्तक स्पनी के निर्माण की कल्पना से लेकर उसकी विधियत स्थापना तक के सभी कार्यों को  करते हैं, जिससे कम्पनी में उनकी महत्वपूर्ण स्थिति होती है। वैधानिक दृष्टि से वे कम्पनी के न तो प्रन्यासी (Trustees) होते हैं और न ही प्रतिनिधि (Agent) क्योंकि प्रवर्तन की अवस्था में कम्पनी का कोई वैधानिक अस्तित्व नहीं होता है। प्रवर्तकों एवं कम्पनी के मध्य केवल विश्वासाश्रित सम्बन्ध पाया जाता है। कम्पनी में प्रवर्तक की स्थिति को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. प्रवर्तक कम्पनी के एजेन्ट नहीं है यद्यपि प्रवर्तक कम्पनी के निर्माण सम्बन्धी समस्त कार्य करता है, किन्तु फिर भी प्रवर्तक कम्पनी का एजेन्ट नहीं हो सकता है। इसका कारण यह है कि कम्पनी प्रवर्तक द्वारा किये गये कार्यों का पुष्टिकरण नहीं कर सकती है। पुष्टिकरण द्वारा एजेन्सी तभी स्थापित हो सकती है जबकि प्रधान अनुबन्ध करने के समय अस्तित्व में हो। परन्तु प्रवर्तक जब कार्य करता है या अनुबन्ध करता है तब कम्पनी का अस्तित्व ही नहीं होता है, अर्थात् समामेलन नहीं हो पाता है परिणामस्वरूप कम्पनी प्रवर्तक द्वारा किये गये अनुबन्धों का पुष्टिकरण नहीं कर सकती है और कम्पनी और प्रवर्तक के बीच एजेन्सीका सम्बन्ध भी स्थापित नहीं हो सकता है। इसीलिए अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों में इसको स्वीकार किया गया है कि प्रवर्तक कम्पनी एजेन्ट नहीं होता है।

2. प्रवर्तक कम्पनी के प्रत्यासी नहीं होते हैं-प्रवर्तक कम्पनी का Trustee) भी नहीं होता है। इसका कारण भी वही है जो नहीं होने के सम्बन्ध में दिया गया है। दूसरे शब्दों में, कम्पनी जब तक अस्तित्व में नहीं आ जाती है तब तक वह अपने प्रत्यासी को भी नियुक्त नहीं कर सकती है। अतः प्रवर्तक के प्रत्यासी के रूप में भी कोई दायित्व उत्पन्न नहीं हो सकते हैं।

3. प्रवर्तक का कम्पनी के साथ विश्वासाश्रित सम्बन्ध होता है-प्रवर्तक उसके द्वारा निर्मित कम्पनीका न तो एजेण्ट होता है और प्रत्यासी हो उसका कम्पनी के साथ केवल विश्वासावित सम्बन्ध होता है। यह उल्लेखनीय है कि विश्वासाश्रित सम्बन्ध से तात्पर्य विश्वास, भरोसे एवं सद्भाव के सम्बन्ध से है। प्रवर्तक द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य पूर्ण पारदर्शी, व्यायोचित एवं सद्भावपूर्ण हो। यद्यपि प्रवर्तक न तो कम्पनी के एजेण्ट होते हैं तथा प्रन्यासी ही, किन्तु उसकी स्थिति उन दोनों के समान ही होती है। अतः जिस प्रकार एजेण्ट एवं सीके सभी कार्य पारदर्शी एवं न्यायोचित होते चाहिये ठीक उसी प्रकार प्रवर्तक के कार्य भी पारदर्शी एवं न्यायोचित होने चाहिये।

इस प्रकार प्रवर्तक न तो कम्पनी का एजेण्ट होता है और न प्रन्यासी ही किन्तु उसका कम्पन के साथ विश्वासाचित समाना होता है। इस सम्बन्धको तथ्यों से स्पष्ट किया जा सकता है–

(i) प्रवर्तको द्वारा गुप्त लाभ अर्जित न करना-प्रवर्तकों का महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि कम्पनी के प्रवर्तन अवस्था में वे किसी सौदे के सम्बन्ध में गुप्त लाभ अर्जित न करें और यदि ऐसा लाभ उन्होंने कायतो कम्पनी को इसका हिसाब तथा लाभ की रकम लौटानी पड़ेगी।

(ii) अनुबन्ध के लिए बाध्य करना-कम्पनी निर्मित होने के बाद कम्पनी संचालकों को प्रवर्तक किसी भी ऐसे अनुवना से बाध्य कर सकते हैं जो कम्पनी के प्रवर्तन की स्थिति में किये गये हों।

(iii) प्रवर्तकों का व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी न होना-यदि प्रवर्तकों ने उचित सावधानी तथा ईमानदारी से अपने अधिकारों के अन्तर्गत कम्पनी के हित में कार्य किया है तो वे कम्पनी के प्रति उन हानियों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होते हैं जो कम्पनी ने उनकी त्रुटियों या भूलों के कारण उद्ययी हो।

याथापी प्रवर्तकों के कार्य (Functions of Promoters) यद्यपि प्रवर्तकों के कार्यों के सम्बन्ध में निश्चित रूप से विवेचना करना कठिन है, फिर भी उनके कुछेक सामान्य कार्यों का विवेचन अवश्य किया जा सकता है–

(1) निर्माण व सम्भावना को देखना-कम्पनी के निर्माण का विचार करके उसकी विचारधारा के पूर्ण करने का प्रयास करना।

(2) योग्य व्यक्तियों का चयन-संचालकों की नियुक्ति करने के लिये योग्य व्यक्तियों क चयन करना।

(3) पार्षद सीमानियम एवं अन्तर्नियम तैयार करना कम्पनी के लिए पार्षद सीमानियम एवं पार्षद अन्तर्नियम तैयार करना।

(4) समामेलन प्रमाण पत्र प्राप्त करना कम्पनी की रजिस्ट्री कराकर समामेलन प्रमाण-पत्र प्राप्त करना।

(5) बैंको, अंकेशको एवं सलाहकार की नियुक्ति करना-प्रवर्तकों द्वारा कम्पनी के लिए बैंकों को निर्धारित करने का कार्य किया जाता है। साथ ही कम्पनी के लिए अंकों एवं वैधानिक सलाहकारों की नियुक्ति की जाती है।

(6) प्रविवरण की व्यवस्था करना-प्रविवरण को बनाकर रजिस्ट्रार के यहाँ भेजकर, उसके विज्ञापन की समुचित व्यवस्था करना |

(7) प्रारम्भिक व्ययो का भुगतान करना-प्रारम्भिक व्ययों को स्वयं भुगतान करने की व्यवस्था करना।

प्रवर्तकों के अधिकार (Rights of Promoters)

(1) प्रारम्भिक व्यय लेने का अधिकार प्रवर्तकों को यह अधिकार है कि कम्पनी के निर्माण एवं उसके चलाने में जो आवश्यक व्यय किए जायें, उन्हें वह कम्पनी से वसूल कर लें, परन्तु व्ययों को वसूल करने के लिये उन्हें आवश्यक प्रमाणक पेश करने होंगे। परन्तु यह समस्त व्यय अन्तर्नियम के अनुरूप होना आवश्यक है।

(2) सह-प्रवर्तक से आनुपातिक राशि प्राप्त करने का अधिकार किसी कम्पनी के प्रविवरण में मिव्यावन के फलस्वरूप यह प्रवर्तकों में से किसी एक प्रवर्तक द्वारा क्षतिपूर्ति करनी पड़े या वह गुप्त लाभ अर्जित कर से तो वह प्रवर्तक अन्य सह-प्रवर्तकों से आनुपातिक राशि वसूल कर सकता है।

(3) पारिश्रमिक पाने का अधिकार-चूँकि प्रवर्तक कम्पनियों के निर्माण करने एवं संचालित करने में कठिन परिश्रम करते हैं, अतः कम्पनियाँ इन्हें उनके प्रतिफल के रूप में पारिश्रमिक देती हैं। प्रवर्तक कम्पनी से निम्न रूपों में पारिश्रमिक प्राप्त कर सकता है-(i) लाभ, (ii) पारिश्रमिक, (iii) कमीशन, (iv) एकजुश्त राशि।

प्रवर्तकों के कर्तव्य (Duties of Promoters)

(1) विश्वासाश्रित सम्बन्ध बनाये रखना — प्रवर्तक का कम्पनी के भावी सदस्यों के प्रति भी विश्वासाश्रित सम्बन्ध होता है जिसे बनाये रखना आवश्यक है उसे विश्वास खण्डन का कोई कार्य नहीं करना चाहिए।

(2) प्रन्यासी की भाँति कार्य करना — प्रवर्तक को प्रन्यासी की भाँति कार्य करना होगा तथा कम्पनी के लाभार्थ ही कार्य करना होगा।

(3) सत्यता प्रकट करना — प्रवर्तक को कम्पनी की समस्त सत्य बातों को प्रकट कर देना चाहिए।

(4) जानकारी गुप्त न रखना — कम्पनी के प्रवर्तन के सम्बन्ध में कोई भी जानकारी। रखनी चाहिए। जानकारी गुप्त रखना मिथ्यावर्णन है। इसी प्रकार अपूर्ण स्पष्टीकरण हुआ होता तो छुपाव विश्वास-खण्डन कहलाता है।

(5) अर्जित लाभ का प्रकट न करना — अर्जित लाभ का प्रकट न करना अवैध एवं वर्जित है। वालोमन बनास सालोनन एण्ड कम्पनी के निर्णय के अनुसार पूर्व प्रकटीकरण के आधार पर कमाया गया लाभ वैध है।

प्रवर्तकों के दायित्व (Liabilities of Promoters)

प्रवर्तक के कुछ प्रमुख दायित्व निम्नानुसार है–

1. समामेलन हेतु झूठी सूचनाएँ देने पर दायित्व-कभी-कभी कम्पनी के समामेलन के उपरान्त ग्रह सिद्ध हो जाता है कि कम्पनी का समामेलन निम्नांकित में से किसी भी कारण से हुआ है–

(i) किसी बूटी वा असत्व सूचना या तथ्यों के प्रस्तुतीकरण के कारण।

(ii) प्रस्तुत किये गये किसी प्रलेख में किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने या प्रकट नहीं करने के कारण।

(III) प्रस्तुत की गई घोषणा में किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने या प्रकट नहीं करने के कारण।

(iv) किसी अन्य कपटपूर्ण कार्य के कारण। ऐसी दशा में, कम्पनी के प्रवर्तक धारा 447 के अधीन कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होगा।

इस धारा के अधीन दोषी को कारावास की सजा एवं जुर्माने से दण्डित करने का प्रावधान है।

2. भ्रामक प्रविवरण की दशा में दायित्व-कभी-कभी कोई व्यक्ति किसी भ्रामक प्रविवरण पर विश्वास कर उस कम्पनी की प्रतिभूतियों के लिए अभिदान कर देता है। उसके कारण उसे (अभिदाता को) क्षति उठानी पड़ती है। ऐसी दशा में प्रवर्तक उस प्रत्येक व्यक्ति की क्षति की पूर्ति के लिए उत्तरदायी होगा जिसे ऐसे भ्रामक प्रविवरण के कारण क्षति उठानी पड़ी है। उसका यह दायित्व इस अधिनियम के अधीन सामान्य दण्ड के अतिरिक्त होगा।

3. विशेष कार्य की प्रत्येक मद का प्रकटीकरण करने में असमर्थ रहने पर दायित्व-कभी-कभी कम्पनी की साधारण सभा में कोई विशेष कार्य भी किया जाता है। ऐसी दशा में, उस सभा में किये जाने वाले विशेष व्यवसाय/ कार्य की प्रत्येक मद के लिए महत्वपूर्ण तथ्यों का विवरण उस सभा की सूचना के साथ संलग्न किया जाना चाहिये। यदि इस प्रावधान का पालन करने में चूक की जाती है तो कम्पी का प्रत्येक प्रवर्तक तथा अन्य दोषी अधिकारी पर ₹50,000 तक अथवा ऐसे प्रवर्तक या दोषी अधिकारों या उनके नातेदारों को होने वाले लाभ की राशि को 5 गुना तक की राशि का जुर्माना किया जा सकेगा।

4. धनराशि या सम्पत्ति लौटाने में असफल रहने पर दायित्व-कभी-कभी संवीक्षा / छानबीन के दौरान अथवा राण कम्पनी के पुनर्वास की योजना के क्रियान्वयन के दौरान अधिकरण को यह लगता है कि कम्पनी या रुग्ण कम्पनी के प्रवर्तन से जुड़े किसी प्रवर्तक ने निम्न अपराध या कार्य किये हैं–

(i) उस कम्पनी की किसी राशि या सम्पत्ति का उसने गलत उपयोग किया है |

(ii) वह उसके साथ दुराचार या भ्रष्टाचार करने या प्रन्यास भंग करने का दोषी है।

ऐसी दशा में, अधिकरण आदेश जारी कर उस राशि या सम्पत्ति को लौटाने का प्रवर्तक को नर्देश दे सकता है अथवा उस रुग्ण कम्पनी या उस पर हकदार को क्षतिपूर्ति के रूप में जितनी भी चित समझे, उतनी राशि का अंश दान देने का निर्देश प्रवर्तक को दे सकता है।


Meaning and Definition of Promotion of a Company

Enforcement is the first step in the formation of a company, in which the idea of ​​setting up a company arises and necessary action is taken to make it work. In this way, the work of promotion of the company starts with the generation of new ideas and continues till the company is legally established. Under this, it is also considered that what will be the business area of ​​the company, from where it will get the necessary materials. For this, from what sources will the capital be received, what legal actions will have to be taken for its establishment? Etcetera.

According to Gerstenberg, “Enforcement consists in the discovery of business opportunities and then the organization of capital, wealth and management skills with the aim of obtaining profit.”

According to Guthman and Doogle, “Enforcement begins with the idea by which one’s business is to be developed and continues until that business is fully functional as an ongoing institution.” not ready for it.”

Meaning and Definition of Promoter

Promoter means such persons who bring the idea of ​​formation of the company in their mind after doing necessary research and form the company according to a definite plan. In other words, Promoter means such persons who do business related research and form the company according to a definite plan, collect the necessary materials and prepare the outline of the company’s operations. Promoters play an important role in the formation and development of companies. Promoter can be an individual, a group of persons or a firm or a company.

(1) According to Lord Blacburn, “The word promoter is a short and convenient form of addressing those persons who operate the machine by which the Companies Act enables them to form an amalgamated company. ”

(2) According to Sir Francis Palmer, “Promoter is the person who plans the formation of the company, gets the councilor memorandums and articles to be prepared, gets them registered and chooses the first directors, initial Decides the terms of contracts and prospectus and arranges for publication of prospectus and collection of capital. ,

(3) As per section 2 (69) of the Companies Act, 2013, “promoter” means a person whose name is mentioned or numbered in the prospectus as a promoter or who is identified as a promoter in the annual return of the company. or which has direct or indirect control over the affairs of the company as a shareholder or director or in any other form or according to whose advice or directions the board of directors of the company is accustomed to act. Provided that if any person in his professional capacity gives advice or direction, he shall not be deemed to be an originator.

(4) According to Guthman and Daugal, “Promoter is the person who plans the formation of the company and brings the company into existence as an artificial person”.

Thus, promoter means those persons who plan the formation of a company and carry out many tasks to give it a real shape.

Legal Position of Promoters

The promoter performs all the functions of the company from the date of its incorporation to the stage of commencement of business. Therefore, all the services of a promoter are exceptional in the work of company formation. Services of a Promoter Notwithstanding the extraordinary, the legal status of a promoter with the company is that of a trust relationship, that is, it is believed that his relationship with the company is based on trust and that all the acts he has done after the amalgamation have taken place. The company and its shareholders have to be trusted. Thus, it can be said that the promoters do all the work from the conception of the creation of the company to its legal establishment, which gives them an important position in the company. From the legal point of view, they are neither Trustees nor Agents of the company as there is no legal entity of the company in the state of enforcement. Only trust-dependent relationship is found between the promoters and the company. The position of the promoter in the company can be explained as follows:

1. Promoter is not an agent of the company, although the promoter does all the work related to the formation of the company, but still the promoter cannot be an agent of the company. This is because the company cannot verify the work done by the promoter. The agency can be established by confirmation only if the principal is in existence at the time of making the contract. But when the promoter works or makes a contract, then the company does not exist, that is, the amalgamation does not take place, as a result the company cannot confirm the contracts made by the promoter and the agency relationship between the company and the promoter is also not established. could. That is why in many important decisions it has been accepted that the promoter is not the agent of the company.

2. Promoter is not a nominee of the company There is also no Trustee of the Promoter Company. The reason for this is also the same which has been given in relation to not being there. In other words, unless the company comes into existence, it cannot even appoint its own candidate. Hence, no liability can arise in the form of a nominee of the promoter.

3. Promoter has a fiduciary relationship with the company – Promoter is neither an agent nor a trustee of the company formed by him, he has only a fiduciary relationship with the company. It is worth mentioning that by trust relationship means the relationship of trust, trust and good faith. Every work done by the promoter should be completely transparent, just and in good faith. Although the promoters are neither the agents of the company nor the trustees, their status is similar to both of them. Therefore, just as all the actions of the Agent and CK should be transparent and just, similarly the actions of the Promoter should also be transparent and just.

Thus the promoter is neither an agent nor a trustee of the company but has a trust relationship with the company. This relation can be clarified from the facts-

(i) Promoter not to earn secret profit – It is the important duty of the promoters that in the company’s operation stage, they should not earn secret profit in respect of any transaction and if they make such profit, the company will have to account for it and return the amount of profit.

(ii) Compulsion to contract – After the formation of the company, the promoters can bind the directors of the company by any such communication which may have been made in the event of the company’s operation.

(iii) Promoters not to be personally liable – If the promoters have acted in the interest of the company with due care and honesty within their rights, then they are not personally liable to the company for the losses which the company has caused. Be generous because of their errors or omissions.

Functions of Promoters Although it is difficult to discuss with certainty about the functions of promoters, yet some of their common functions can be discussed-

(1) Seeing the creation and potential – After considering the creation of the company, try to fulfill its ideology.

(2) Selection of qualified persons – To select qualified persons for the appointment of operators.

(3) Preparation of Councilor Memorandum and Articles of Association To prepare the Councilor Memorandum and Councilor Memorandum for the company.

(4) Obtaining the certificate of amalgamation Obtaining the certificate of amalgamation by getting the company registered.

(5) Appointment of banks, numerators and consultants – The work of determining the banks for the company is done by the promoters. Along with this, marks and statutory advisors are appointed for the company.

(6) Arranging the prospectus – After making the prospectus and sending it to the Registrar, making proper arrangements for its advertisement.

(7) To pay the initial expenses – To make arrangements to pay the initial expenses themselves.

Rights of Promoters

(1) Right to take initial expenses Promoters have the right to recover the necessary expenses incurred in the formation and running of the company, but they will have to produce necessary proofs to recover the expenses. But all this expenditure must be in accordance with the Articles of Association.

(2) The right to receive proportionate amount from the co-promoter if it has to be compensated by one of the promoters by way of discrepancy in the prospectus of a company or by earning a secret profit, then that promoter shall recover a proportionate amount from the other co-promoters. Can do.

(3) Right to be remunerated – Since the promoters work hard in building and operating the companies, the companies give them remuneration as their consideration. The promoter can receive remuneration from the company in the following forms – (i) profit, (ii) remuneration, (iii) commission, (iv) lump sum.

Duties of Promoters

(1) Maintaining trust relationship – The promoter also has a trusting relationship with the future members of the company, which is necessary to be maintained, he should not do any act of breach of trust.

(2) Acting as a trustee – The promoter has to act as a trustee and act only for the benefit of the company.

(3) Disclosure of truth – The promoter must disclose all the truthful facts of the company.

(4) Information not to be kept secret – Any information relating to the operation of the company. Should keep Keeping information confidential is misrepresentation. Similarly, if an incomplete explanation had taken place, then the concealment is called disbelief.

(5) Non-disclosure of profit earned – Non-disclosure of profit earned is illegal and prohibited. As per the judgment of Valoman Banas Salonen & Co., profit earned on the basis of prior disclosure is valid.

Liabilities of Promoters

Some of the major responsibilities of the promoter are as follows-

1. Liability on giving false information for amalgamation – Sometimes after the amalgamation of the company, it is proved that the amalgamation of the company has taken place due to any of the following reasons-

(i) any booty or existence by reason of the presentation of information or facts.

(ii) suppression of any material fact in any document produced or Due to non-disclosure.

(III) by reason of suppression or non-disclosure of any material fact in the declaration furnished.

(iv) on account of any other fraudulent act. In such case, the promoter of the company shall be liable for action under section 447.

Under this section, there is a provision to punish the guilty with imprisonment and with fine.

2. Liability in case of misleading statement – Sometimes a person subscribes to the securities of that company by relying on a misleading statement. He (the subscriber) has to suffer because of that. In such case, the promoter shall be liable to compensate the damages caused to every person who has suffered damages due to such misleading statement. His liability shall be in addition to the ordinary punishment under this Act.

3. Liability for failure to disclose each item of special work – Sometimes a special business is also done in the general meeting of the company. In such a case, a statement of important facts for each item of particular business/work to be performed in that meeting should be attached to the notice of that meeting. If there is a default in complying with this provision, every promoter and other defaulting officer of the company shall be fined up to ₹ 50,000 or up to five times the amount of profit accruing to such promoter or defaulting rights or their relatives. .

4. Liability for failure to return money or property.—Sometimes during scrutiny/investigation or in the course of implementation of the scheme of rehabilitation of the company, the Tribunal finds that the company or any promoter connected with the operation of a sick company has committed the following offence. or have worked-

(i) he has wrongfully used any amount or property of that company.

(ii) he is guilty of misconduct or corruption or breach of trust.

In such a case, the Tribunal may, by order, direct the promoter to return the amount or property or direct the promoter to donate such amount as may be deemed necessary by way of compensation to the sick company or the person entitled thereto. could.

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