अभिप्रेरणा को परिभाषित कीजिए ? क्या अभिप्रेरण एक प्रक्रिया है ? Define motivation? Is motivation a process?

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अभिप्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Motivation)

मनुष्य के भीतर का वह तत्व जो उसे कार्य करने को उत्साहित करता है, अभिप्रेरणा कहलाता है। अभिप्रेरणा का विषय प्रमुखतः मनोवैज्ञानिक है। किसी भी व्यक्ति में काम करने की असीमित क्षमता हो सकती है, लेकिन इस क्षमता का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक व्यक्ति में काम करने की इच्छा न हो। अतः किसी भी व्यक्ति में काम करने की इच्छा जाग्रत करना ही अभिप्रेरणा है। सरल शब्दों में, अभिप्रेरणा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानव को अभिप्रेरित किया जाता है। जिससे वह अपनी सम्पूर्ण क्षमता को निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये लगा साके |

स्टेनले वेन्स (Stanley Vance) के अनुसार, “अभिप्रेरणा के अन्तर्गत कोई भी ऐसी भावना या इच्छा शामिल होती है, जो किसी व्यक्ति की इच्छा को इस प्रकार बना देती है कि वह कार्य करने को प्रेरित हो जाये।”

माइकल जे. जूसियस (Michacl J. Jucious) के अनुसार, “अभिप्रेरणा स्वयं को या किसी अन्य व्यक्ति को इच्छित कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करने की क्रिया है अथवा वांछित प्रतिक्रिया समाप्त करने के लिए सही बटन दबाना है।”

एडविन बी. फिलिप्पो (Edwin B. Filippo) के अनुसार, “अभिप्रेरणा लाभ या पुरस्कार की सम्भावना के माध्यम से अपनी इच्छानुसार काम करने के लिए दूसरों को प्रभावित करने का प्रयास करने वाली प्रक्रिया कही जा सकती है।

केरोल शार्टल (Carroll Shartle) के अनुसार, “किसी निश्चित दिशा में गतिमान होने अथवा निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निश्चित प्रेरणा या तनाव ही अभिप्रेरणा है।”

अभिप्रेरणा के प्रकार (Types of Motivation)

अभिप्रेरणा का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है जिसमें उन समस्त विधियों पद्धतियों एवं घटकों को शामिल किया जाता है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में कर्मचारियों को अभिप्रेरित करने का कार्य करते हैं। अभिप्रेरणा को चार भागों में बाँटा जा सकता है

(1) धनात्मक अभिप्रेरणा (Positive Motivation)-इससे आशय उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा लाभ या पारिश्रमिक का प्रलोभन देकर कर्मचारियों को स्वेच्छा से काम करने हेतु प्रेरित किया जाता है। इसे ‘सकारात्मक अभिप्रेरणा’ भी कहते हैं। धनात्मक अभिप्रेरणा मौद्रिक या अमौद्रिक हो सकती है। धनात्मक अभिप्रेरणा में नकद पारिश्रमिक देना, मान-सम्मान देना, पदोन्नति के अवसर प्रदान करना, वेतन व मजदूरी देना आदि शामिल हैं। ऐसी अभिप्रेरणा कर्मचारियों के मनोबल को ऊँचा उठाती है। यह कर्मचारियों को आनन्द व सन्तुष्टि देती है तथा निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने हेतु उनको सहयोग के लिए प्रेरित करती है। वर्तमान युग में अभिप्रेरणा का यह रूप अधिक लोकप्रिय है, क्योंकि इससे कर्मचारियों का मनोबल ऊँचा उठता है, उनकी परिवेदनाएँ दूर होती हैं तथा उनके आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

(2) ऋणात्मक अभिप्रेरणा (Negative Motivation) ऋणात्मक अभिप्रेरणा का उद्देश्य घनात्मक अभिप्रेरणा की भाँति, अन्य व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार कार्य करने हेतु अभिप्रेरित करना है किन्तु इस विधि में भयपूर्ण दबाव डाला जाता है। इसके समर्थकों की यह मान्यता है कि व्यक्तियों को कभी-कभी भय, डर, दबाव या दण्ड भी अभिप्रेरित कर सकता है। डाँटना, फटकारना, नौकरी से अलग करना, वेतन वृद्धि व पदोन्नति रोकना आदि ऋणात्मक अभिप्रेरणा के रूप हो सकते हैं। अभिप्रेरणा का यह रूप प्रभावी है किन्तु अत्यधिक कठोर होने के कारण बहुत कम इसका प्रयोग करना चाहिए क्योंकि इससे असन्तोष व विद्रोह फैलने की आशंका रहती है। अतः ऐसे अभिप्रेरण का उपयोग बड़ी ही सावधानीपूर्वक करना चाहिए।

(3) वित्तीय या मौद्रिक अभिप्रेरणा (Financial or Monetary Motivation) वित्तीय प्रेरणाओं के अन्तर्गत कर्मचारियों को इस प्रकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मौद्रिक लाभ प्रदान किये जाते हैं कि उन्हें अधिक कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त हो। वित्तीय प्रेरणाओं का महत्व इसलिए है क्योंकि इनसे श्रमिक अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है। मौद्रिक अभिप्रेरणा अधिकतर वेतन, मजदूरी, बोबस, लाभांश भागिता के रूप में होती है। वित्तीय प्रेरणाएँ कर्मचारियों को सामूहिक वा व्यक्तिगत रूप से प्रदान की जा सकती है। इन प्रेरणाओं से समाज, उत्पादक तथा श्रमिक तीनों को लाभ होता है।

(4) अवित्तीय या अमौद्रिक अभिप्रेरणा (Non-Financial or Non-Monetary Motivation) वित्तीय प्रेरणाओं के साथ-साथ अवित्तीय प्रेरणाओं का भी काफी महत्व है। इसमें वे सभी मनोवैज्ञानिक आकर्षण शामिल किये जाते हैं जिनसे श्रमिकों को अधिकतम एवं श्रेष्ठतम कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। अवित्तीय प्रेरणाएँ मानसिक व अदृश्य प्रकृति की होती है जिसका दित्त या मुद्रा से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। इसके प्रमुख उदाहरण हैं कार्य की प्रशंसा करना, नेतृत्व प्रदान करना, कार्य की उत्तम दशाएँ आदि।

ये प्रेरणाएँ भी सामूहिक अथवा व्यक्तिगत रूप से प्रदान की जाती है। उत्पादन के साधनों का कुशलतम ढंग से उपयोग करने के लिए वित्तीय प्रेरणा के साथ-साथ अवित्तीय प्रेरणा देना भी अनिवार्य है।

अभिप्रेरणा का महत्व (Importance of Motivation)

अभिप्रेरण के महत्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक प्रत्येक संस्था के कर्मचारियों को आवश्यक अभिप्रेरणा प्रदान करने से निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करना सरल हो जाता है। अभिप्रेरणाओं से कर्मचारियों की कार्य करने की इच्छा जाग्रत हो जाती है और उनके प्रयास निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु उन्हें मौद्रिक एवं अमौद्रिक प्रेरणाएँ दी जानी आवश्यक है।

(2) मानवीय सम्बन्धों की स्थापना में सुविधा-मधुर मानवीय सम्बन्धों की कल्पना एक आदर्श व्यावसायिक प्रतिष्ठान की आधारशिला है। जब तक श्रम प्रबन्ध के बीच मधुर सम्बन्धों की स्थापना नहीं होती तब तक संस्था के लक्ष्य प्राप्त करना सम्भव नहीं है। कर्मचारी को आज वस्तु नहीं समझा जा सकता। कर्मचारियों को उचित मान-सम्मान एवं लाभ देकर उनकी कार्यकुशलता में वृद्धि की जा सकती है।

(3) कार्य रुचि, लगन एवं निष्ठा जाग्रत करने में सहायक कोई भी व्यक्ति अपनी कार्य क्षमता का अधिकतम उपयोग तब तक ही करता है जब तक कार्य करने की इच्छा हो। कर्मचारियों में यह इच्छा जाग्रत करने के लिए अभिप्रेरक योजनाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अभिप्रेरणाएँ व्यक्ति में कार्य के प्रति रुचि, लगन व निष्ठा जाग्रत करती है।

(4) मनोबल में वृद्धि-कर्मचारी, मनोबल और कार्य क्षमता का निकट का सम्बन्ध है। क्षीण मनोबल वाले कर्मचारी की कार्य क्षमता अधिक नहीं हो सकती। उच्च मनोबल वाला कर्मचारी जोशीला और उत्साही होता है और निश्चित रूप से उसमें पहल शक्ति की कमी नहीं होती। अभिप्रेरणाओं के माध्यम से कर्मचारी के मनोबल को बढ़ाया जा सकता है तथा उच्च मनोबल का पूरा लाभ उठाया जा सकता है।

(5) सहयोग प्राप्त करने में सुविधा किसी भी संस्था को यदि कर्मचारियों का स्वैच्छिक सहयोग ही मिलता रहता है तो निश्चित रूप से वह संस्था अपने निर्धारित लक्ष्यों को निर्धारित समय में प्राप्त करने में सफल होती है। कर्मचारियों का स्वैच्छिक सहयोग प्राप्त करने के लिए उन्हें सन्तुष्ट करना आवश्यक है। कर्मचारियों को अभिप्रेरणाएँ देकर सन्तुष्टि प्रदान की जा सकती है।

(6) कार्य क्षमता में वृद्धि कर्मचारियों की कार्य क्षमता बढ़ाने के लिए उन्हें मौद्रिक, अमौद्रिक प्रेरणाएँ दी जानी चाहिए। अमौद्रिक प्रेरणाएँ; यथा-कार्य की दशाएँ, प्रबन्धकों का व्यवहार, उचित सम्मान, पदोन्नति के अवसर आदि सभी कार्मिक की कार्य क्षमता बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं।

(7) कर्मचारियों के आवागमन में कमी-जिस संस्था में स्थायी कर्मचारियों का होना लाभदायक माना जाता है वहाँ स्थायी रूप से कर्मचारियों को संस्था में बनाये रखने के लिए मौद्रिक एवं अमौद्रिक प्रेरणाएँ देना आवश्यक है।

(8) आवश्यकताओं की सन्तुष्टि मनुष्य केवल आर्थिक मनुष्य नहीं है। अतः उसकी सामाजिक, मानसिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को सन्तुष्टि प्रदान करने के लिए अभिप्रेरणाओं का अत्यधिक महत्व है।

अभिप्रेरणा को प्रभावित करने वाले घटक या तत्व (Factors Affecting Motivation)

सभी प्रबन्धक अपने अधीनस्थों को अभिप्रेरित करने का प्रयास करते हैं, किन्तु श्रमिक वास्तव में अभिप्रेरित होते हैं अथवा नहीं, यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। प्रत्येक प्रबन्धक कर्मचारियों को अभिप्रेरित करने हेतु विभिन्न प्रयास करते हैं, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि श्रमिक अभिप्रेरित होंगे। कर्मचारियों का अभिप्रेरित होना अथवा न होना निम्न घटकों से प्रभावित होता है

(1) वेतन एवं मजदूरी श्रमिकों के अभिप्रेरण को मजदूरी एवं वेतन भी प्रभावित करते हैं। अमिक अपनी मानवीय आवश्यकताओं को सन्तोषजनक ढंग से पूरा करने के लिए पर्याप्त मात्रा में वेतन की माँग करते हैं। मालिकों द्वारा अपने श्रमिकों को अभिप्रेरित करने के लिये समय पर वेतन में वृद्धि करनी चाहिए तथा वेतन भुगतान की ऐसी पद्धति लागू करनी चाहिए जिससे अधिक मात्रा में काम करने वाले श्रमिक को अधिक वेतन प्राप्त हो। इससे कम वेतन प्राप्त करने वाले श्रमिक अधिक कार्य करने का प्रयास करेंगे।

(2) कार्य की दशाएँ-कार्य की दशाओं से आशय उस स्थान की दशाओं से है, जहाँ पर श्रमिक कार्य का निष्पादन करते हैं। कार्य की दशाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव श्रमिकों की कार्य क्षमता पर पड़ता है। अतः श्रमिकों को अधिक कार्य हेतु प्रेरित करने के लिए कार्य की दशाओं में निरन्तर सुधार करना चाहिए ताकि श्रमिक अपनी कार्यक्षमता का पूरा-पूरा उपयोग कर सकें।

(3) विकास के अवसर संगठन में कार्य करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपना विकास करना चाहता है। सभी व्यक्तियों में छुपी हुई प्रतिभा होती है। अतः उपक्रम में विद्यमान पदोन्नति के अवसर तथा प्रशिक्षण देकर, श्रमिकों को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान कर उन्हें अभिप्रेरित किया जा सकता है। जब कर्मचारियों को यह मालूम होता है कि अगर वे अधिक कार्य करेंगे तो उनको आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा तो निश्चित रूप से वे अधिक कार्य के लिए प्रेरित होंगे।

(4) श्रम कल्याण श्रम कल्याण कार्यों में हम उन क्रियाओं को शामिल करते हैं, जिनसे श्रमिकों का सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण सम्भव हो। श्रमिकों की शिक्षा, चिकित्सा, आवास, खेलकूद, मनोरंजन आदि कार्य श्रम कल्याण के अन्तर्गत आते हैं। श्रमिकों को अभिप्रेरित करने के लिये श्रम कल्याण पर सेवायोजकों द्वारा विशेष ध्यान देना चाहिए।

(5) पर्यवेक्षण-व्यावसायिक संस्था की पर्यवेक्षण व्यवस्था एवं पर्यवेक्षकों को श्रमिकों के व्यवहार भी अभिप्रेरण को प्रभावित करता है। प्रत्येक श्रमिक यह अपेक्षा करता है, कि उसके ऊप किसी प्रकार का कठोर नियन्त्रण न हो तथा पर्यवेक्षकों का उनके प्रति मानवीय व्यवहार होना चाहिये। पर्यवेक्षकों को श्रमिकों के साथ अभद्र व्यवहार नहीं करना चाहिए तथा उनकी भावनाओं के अनुरूप ही आदेश-निर्देश देने चाहिए।

(6) कार्य की सुरक्षा कार्य की सुरक्षा भी कर्मचारी अभिप्रेरण को प्रभावित करती है। जब श्रमिकों को स्थायी रूप से नौकरी दी जाती है तो वह रोजगार की चिन्ता से मुक्त हो जाता है और उसमें संगठन के प्रति अपनत्व की भावना विकसित होती है। अगर कार्य की सुरक्षा नहीं होगी तो श्रमिक हमेशा नये रोजगार की खोज में अपना प्रयास करेगा और उसकी कार्यक्षमता में गिरावट आयेगी।

(7) पुरस्कार एवं दण्ड-कर्मचारियों को अपने द्वारा किये जाने वाले कार्य का मिलने वाला पुरस्कार अथवा दण्ड भी उन्हें अभिप्रेरित करता है। अगर काम करने वाले तथा काम न करने वाले श्रमिकों के साथ समान व्यवहार ही किया जायेगा तो कोई भी श्रमिक अधिक कार्य करने के लिए नहीं होगा। अतः अभिप्रेरणा के लिए संस्था में अधिक कार्य करने वाले श्रमिकों को पुरस्कार देने तथा कार्य कम करने वाले श्रमिकों के लिये दण्ड की व्यवस्था करनी चाहिये।

(8) संचार व्यवस्था-एक व्यावसायिक संख्या में विद्यमान संचार व्यवस्था भी श्रमिकों के अभिप्रेरण को प्रभावित करती है। प्रत्येक कर्मचारी यह चाहता है कि उसको समय पर आवश्यक आदेश-निर्देश प्राप्त हों तथा उसके द्वारा किये गये प्रयासों की जानकारी उच्च प्रवन्धकों को शीघ्रता से होनी चाहिए। प्रभावशाली संचार व्यवस्था के कारण संगठन में उत्पन्न भ्रांतियों का समाधान समय पर होगा जिससे कार्य पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा |

लोगों को कार्य के दौरान अभिप्रेरित करना

अभिप्रेरणा की विवेचना में मुख्य रूप से ध्यान गैर-प्रबन्धकों को अभिप्रेरित करने के उपायों पर दिया जाता है। इससे प्रदन्धकीय अभिप्रेरणा के विशिष्ट आयामों की उपेक्षा होती है। लोगों को अभिप्रेरित करने की दृष्टि से निम्न अभिप्रेरकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है

(1) चुनौतीपूर्ण कार्य अधिशासियों की यह प्रमुख आवश्यकता होती है कि उनकी योग्यताओं का उपयोग किया जाए और उन्हें विकसित किया जाए। इसलिए उनके कर्तव्य, उत्तरदायित्व और अधिकार सत्ता उनकी योग्यताओं से सम्बन्धित होनी चाहिए। इसमें इसका ध्यान रखा जाना चाहिए कि कार्य पर उनकी योग्यताओं को निखरने का पर्याप्त अवसर मिल सके। उन्हें निरन्तर इसकी प्रतिपुष्टि प्रदान की जानी चाहिए कि उनका काम-काज कितना श्रेष्ठ है।

(2) प्रस्थिति आदि शामिल है। इसमें पदनाम कार्यालय का आकार, फर्नीचर व साज-सज्जा, निजी सचिव

(3) नेतृत्व प्रदान करने की इच्छाशक्ति-वह अपने सहकर्मियों के बीच नेता बनने की इच्छा से सम्बन्धित है।

(4) प्रतियोगिता-यह संगठनात्मक पुरस्कारों, जैसे- पदोन्नति, प्रस्थिति तथा मान्यता पाने लिए स्वस्थ प्रतियोगिता की आवश्यकता है।

(5) मुद्रा के यह इस रूप में अभिप्रेरक है कि यह उच्चस्तरीय निष्पादन प्रतिस्थति, पद, शक्ति उपलब्धि आदि का किस सीमा तक मापक है।

स्वस्थ अभिप्रेरणा पद्धति के मुख्य तत्व (Elements of Sound Motivation System)

एक स्वस्थ अभिप्रेरणा पद्धति के निम्न अनिवार्य तत्व बताये जा सकते हैं

(1) उत्पादकता (Productivity) एक श्रेष्ठ अभिप्रेरणात्मक व्यवस्था वह है जो श्रम की उत्पादकता तथा कार्यक्षमता बढ़ाने में निरन्तर प्रयत्नशील रहे।

(2) प्रतियोगिता (Competition)-कठिन परिश्रम करने तथा आपस में स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा विकसित करने की प्रेरणा एक स्वस्थ अभिप्रेरणात्मक तन्त्र के ठोस तर्क कहे जा सकते हैं। वास्तव में एक व्यक्ति को यह भी देखना है कि इन प्रेरक तत्वों के कारण कहीं उत्पादन लागत आवश्यक रूप से नबढ़ जाये।

(3) व्यापकता (Comprehensiveness) (एक श्रेष्ठ अभिप्रेरक व्यवस्था से आशा की जाती है कि श्रम शक्ति की प्राथमिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं को सन्तुष्ट कराने में सहायता करें। यह सभी श्रेणी के श्रमिकों पर लागू होनी चाहिए तथा जहाँ तक हो सके सभी समान अनुपातों में इससे लाभान्वित हों।

(4) लोचदार व्यवस्था (Flexibility)-अभिप्रेरणा तन्त्र कुछ ऐसा होना चाहिए कि समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप स्वतः ही परिवर्तित हो जाये। चूंकि प्रत्येक व्यक्ति अथवा वर्ग की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होती है, अतः उनको अलग-अलग विधि से उत्साहित किया जा सकता है।

(5) मितव्ययी-अभिप्रेरणा व्यवस्था मितव्ययी होनी चाहिए। ऐसा न हो कि अभिप्रेरणा योजनाओं के लाभ से अधिक उस पर खर्च हो जाये।

(6) प्रेरणात्मक-अभिप्रेरणा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए, जो उपक्रम पर भार स्वरूप न हो तथा कर्मचारियों की दृष्टि से प्रेरणात्मक हो।

(7) मानवीयता पर आधारित-अभिप्रेरणा की पद्धति मानवीयता के सिद्धान्त पर आधारित होनी चाहिये |

(8) उचित आकार-अभिप्रेरणा प्रणाली उपक्रम के आकार तथा आवश्यकताओं के अनुरूप होनी चाहिए।

अभिप्रेरणा की तकनीकें (Techniques of Motivation)

अभिप्रेरणा की प्रमुख तकनीकों या विधियों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) कुशल नेतृत्व द्वारा अभिप्रेरणा-इस तकनीक के अनुसार प्रवन्धकों को एक सच्चे प्रतिनिधि व कुशल नेता के रूप में कर्मचारियों की कठिनाइयों को सुनना चाहिये एवं उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से प्रबन्धक कर्मचारियों के विश्वास पात्र बन जाते हैं और कर्मचारी अभिप्रेरित होकर निष्ठापूर्वक कार्य करते हैं।

(2) उद्देश्यों के स्पष्टीकरण द्वारा अभिप्रेरणा-इस तकनीक के अनुसार प्रबन्धकों को संस्था में कार्य करने वाले सभी व्यक्तियों को संस्था के लक्ष्यों व उद्देश्यों की जानकारी प्रदान करनी चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि उनका व्यक्तिगत हित संस्था के हित से अलग नहीं है।

(3) स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा द्वारा अभिप्रेरणा-इस तकनीक के अनुसार प्रबन्धकों को अन्य संस्थाओं के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा की भावना पैदा करके संस्था के सभी कर्मचारियों को अभिप्रेरित करना चाहिये। जिससे वे एक साथ मिलकर प्रतिस्पर्द्धा में विजय पाने के लिए जुट जायें।

(4) चुनौती द्वारा अभिप्रेरणा-इस तकनीक के अनुसार प्रबन्धकों को संस्था के लक्ष्यों को कर्मचारियों के सामने चुनौती के रूप में रखना चाहिए और अगर कर्मचारी इस चुनौती को स्वीकार कर लेते हैं तो निश्चित रूप से इससे उत्पादकता में वृद्धि होती है।

(5) मौद्रिक एवं अमौद्रिक प्रेरणाएँ इस तकनीक के अनुसार कर्मचारियों को मौद्रिक एवं अमौद्रिक प्रेरणाएँ देकर अभिप्रेरित किया जा सकता है। वर्तमान समय में अभिप्रेरण की यह तकनीक काफी लोकप्रिय है।

(6) मानवीय व्यवहार द्वारा अभिप्रेरणा-कर्मचारियों के साथ मानवीय व्यवहार करके भी उन्हें अभिप्रेरित किया जा सकता है।

(7) सहकारिता द्वारा अभिप्रेरणा-इस तकनीक के अनुसार कर्मचारियों को संस्था के प्रबन्ध निर्णयन में हिस्सेदार बनाकर अभिप्रेरित किया जा सकता है।

अभिप्रेरणा के सिद्धान्त (Theories of Motivation)

कर्मचारियों को अभिप्रेरित करने के लिए विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर अनेक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है, जिन्हें अध्ययन की दृष्टि से निम्न तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है.

(I) मूलभूत सिद्धान्त–

(1) एकात्मक सिद्धान्त-इसका आशय है कि प्रत्येक व्यक्ति एक ही उद्देश्य से कार्य करता है और वह है धन की प्राप्ति। अतः इस सिद्धान्त के अनुसार यदि किसी कर्मचारी के प्रयासों का सीधा सम्बन्ध मजदूरी या वेतन से जोड़ दिया जाये तो उसकी अधिक धन कमाने की लालसा उसे अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित करेगी।

(2) बहुलवादी सिद्धान्त-यह उक्ति विचारधारा के विपरीत है। इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य केवल एक ही उद्देश्य (धन कमाना) की पूर्ति करने के लिए कार्य नहीं करता वरन अनेक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कार्य करता है। मनुष्य की अनेक आर्थिक एवं सामाजिक आवश्यकताएँ होती है जिनक सन्तुष्टि के लिए वह कार्य करता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति होने से कर्मचारी अभिप्रेरित होते हैं।

(II) परम्परागत सिद्धान्त–

(1) भय एवं दण्ड का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार मान्यता यह है कि कर्मचारियों से केवल भय एवं दण्ड के द्वारा ही अधिक कार्य लिया जा सकता है। ‘भय दिन होय न प्रीति’ की कहावत को इसमें मान्यता दी जाती है। इसके अन्तर्गत कठोर नियम, उनका कड़ाई से पालन एवं उल्लंघन की दशा में शारीरिक व मानसिक दण्ड व्यवस्था, सेवा से निष्कासन आदि प्रावधानों का प्रयोग होता है। इस सिद्धान्त के समर्थक इस उक्ति में विश्वास रखते हैं ‘करो या मरो’

(2) पुरस्कार का सिद्धान्त-इसके प्रतिपादक श्री एफ. डब्ल्यू. टेलर हैं। इनके अनुसार काम का सम्बन्ध पुरस्कार से जोड़ देने से कर्मचारी अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित होगा। अधिक पुरस्कार का प्रलोभन व्यक्ति को अधिक परिश्रम से कार्य करने के लिए प्रेरणा का कार्य करेगा। अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ ने इस प्रकार के विचार व्यक्त किए थे जिन्होंने कर्मचारियों को अभिप्रेरित करने के लिए मुद्रा को प्रमुख साधन माना था। बारीक दृष्टि से देखा जाये तो यह सिद्धान्त एकात्मक सिद्धान्त का रूप है।

(3) कैरेट व स्टिक सिद्धान्त की मान्यता यह है कि यदि कर्मचारी का कार्य न्यूनतम स्तर से ऊँचा हो तो उसे पुरस्कृत किया जाये और यदि न्यूनतम स्तर से नीचा हो तो उसे दण्डित किया जाना चाहिए। इसके अन्तर्गत श्रमिकों से काम लेने के दो ढंग माने गये हैं-प्रोत्साहन एवं दण्ड (Carrat and Stick)। इन दोनों में से परिस्थिति के अनुसार जो भी उपयुक्त हो उसे ही अपनाया जाना चाहिए। जो कर्मचारी कुशल, ईमानदार एवं कर्त्तव्यनिष्ठ हों, उन्हें सामान्य मजदूरी तथा उससे अधिक मजदूरी देकर प्रेरित किया जाये परन्तु जो श्रमिक कमजोर हैं तथा कार्य के प्रति उदासीन रहते हैं उन्हें दण्डित किया जाना चाहिए अर्थात् मजदूरी में कटौती, सामान्य मजदूरी से भी कम मजदूरी तथा जुर्माना आदि का प्रावधान करके प्रेरित किया जाना चाहिए।

(III) अभिप्रेरणा के आधुनिक सिद्धान्त

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित सिद्धान्तों को शामिल करते हैं–

(1) मेक ग्रेगर का X एवं Y का सिद्धान्त-X सिद्धान्त के अन्तर्गत यह मान्यता है कि कर्मचारी स्वभावतः सुस्त, कमजोर, उदासीन, स्वार्थी एवं विकासात्मक परिवर्तनों का विरोधी होता है अतः उसे कार्य करने को प्रेरित करने के लिए दण्ड व भय का सहारा लेना चाहिए। यह परम्परागत सिद्धान्त है।

Y सिद्धान्त आधुनिक विचारधारा पर आधारित है कि कर्मचारी स्वेच्छा से कार्य करना चाहता है बशर्ते उसे कार्य करने के अवसर प्राप्त हो उसके लिए भय या दबाव की आवश्यकता नहीं है वरन उपयुक्त वातावरण होना चाहिए। कर्मचारी को अभिप्रेरित करने के लिए उसे संस्था के प्रत्येक कार्य में भागीदार बनाना चाहिए। इससे कर्मचारियों में क्षमता बढ़ती है, आय बढ़ती है और जीवन स्तर ऊँचा उठता है। स्पष्ट है कि वास्तविक प्रेरणा का स्रोत कर्मचारी की आन्तरिक अभिप्रेरणा ही है।

(2) भागीदारी का सिद्धान्त-इसमें मान्यता यह है कि केवल मौद्रिक लाभ से श्रमिक प्रेरित नहीं होता वरन उसका संस्था से लगाव भी होना चाहिए, साथ ही वह अपनी अभिव्यक्ति भी चाहता है। अतः उसे केवल आदेशों का पालन करने वाला कर्मचारी अथवा मशीन का एक पुर्जा मात्र न समझकर प्रबन्ध में भागीदार बनाया जाये तो निश्चय ही वह कार्य के प्रति अधिक जागरूक एवं निष्ठावान हो जायेगा। अतः यह स्पष्ट है कि कर्मचारियों को प्रबन्ध में हिस्सेदार बनाकर उन्हें कार्य के प्रति अभिप्रेरित किया जा सकता है।

(3) पय लक्ष्य का सिद्धान्त इस सिद्धान्त की मान्यता यह है कि यदि कर्मचारी उच्च उत्पादकता को अपने एक या अधिक वैयक्तिक लक्ष्यों की पूर्ति का पथ मान लेते हैं तो वे उच्च उत्पादक बनने की और प्रवृत्त होते हैं। इसके विपरीत यदि निम्न उत्पादकता को अपने लक्ष्यों की पूर्ति का पय मान लेते है तो निम्न उत्पादक बनने की ओर प्रवृत्त होते हैं। यह सिद्धान्त व्यक्तियों को व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से अभिप्रेरित करने के लिए उत्पादकता पर बल देता है और उत्पादकता का सीधा सम्बन्ध लक्ष्यों की पूर्ति से है।

(4) स्वास्थ्य व आरोग्य का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य की आवश्यकताओं को दो समूहों में बाँटा गया है-स्वास्थ्य तत्व एवं अभिप्रेरक तत्व कर्मचारी के असन्तोष का मुख्य कारण उसका दूषित कार्य वातावरण होता है। व्यक्ति की कार्य से सन्तुष्टि उसके कार्य का परिणाम होती है। ये सन्तुष्टि प्रदान करने वाले घटक हैं अभिप्रेरक तत्व। अतः प्रबन्धकों को न केवल स्वास्थ्य सम्बन्धी तत्वों पर ध्यान देना चाहिए, वरन कार्य को समुन्नत करने पर भी ध्यान देना चाहिए, जिससे वह अधिक रुचिकर बन सके और कर्मचारियों को अभिप्रेरित कर सके।

(5) कर्मचारी केन्द्रित पर्यवेक्षण सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के प्रतिपादक रेनसिस लिकर्ट हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार परिवेक्षण कार्य केन्द्रित न होकर मानव केन्द्रित हो तो कर्मचारियों को प्रभावी रूप से अभिप्रेरित किया जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार कर्मचारी को सम्पूर्ण व्यवस्था में मशीन का पुर्जा मात्र न समझकर उसके साथ मानवीय व्यवहार करते हुए उसके हितों एवं कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए। ऐसी स्थिति में ही कर्मचारी अधिक कार्यक्षमता से कार्य करते हैं।

(6) आवश्यकताओं की क्रमबद्धता का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के प्रतिपादक श्री ए. एच. मैस्लो है। इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य की आवश्यकताएँ अनेक है और उनमें क्रमबद्धता पाई जाती है, जैसे-जीवन रक्षक, सुरक्षात्मक, सामाजिक सम्मान व स्वाभिमान तथा आत्म विकास की आवश्यकताएँ । इन आवश्यकताओं को क्रमानुसार पूरा करके ही कर्मचारी को सन्तुष्ट किया जा सकता है। एक क्रम की आवश्यकता पूरी होने पर आगे की क्रम आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रयत्न करता है। इस प्रकार व्यक्ति निरन्तर आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है परन्तु यह सीमा प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होती है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मौद्रिक एवं अमौद्रिक अभिप्रेरणाओं का होना आवश्यक है।

(7) एल्टन मेयो का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार अमौद्रिक अभिप्रेरणाओं का अधिक महत्व है क्योंकि कर्मचारी के कार्य का पुरस्कार उसकी शारीरिक या भौतिक क्षमता से निर्धारित न होकर सामाजिक क्षमता से निर्धारित होता है। सामाजिक क्षमता को प्रेरित करने के लिए अमौद्रिक अभिप्रेरणाओं पर बल दिया जाना चाहिए।


  • Meaning and Definition of Motivation

    Motivation is the element within a person which encourages him to act. The subject of motivation is mainly psychological. Any person can have unlimited capacity to work, but this ability is of no importance unless the person has the desire to work. Therefore, the motivation is to awaken the desire to work in any person. In simple words, motivation is a process by which human beings are motivated. So that he can put all his potential for the attainment of definite objectives.

    According to Stanley Vance, “Motivation includes any emotion or desire which makes a person’s will in such a way as to motivate him to act.”

    Michael J. According to Jucious (Michacl J. Jucious), “Motivation is the act of encouraging oneself or another person to do a desired action or to press the right button to elicit a desired response.”

    Edwin B. According to Filippo (Edwin B. Filippo), “Motivation can be said to be the process of trying to influence others to do what they want through the prospect of profit or reward.

    According to Carroll Shartle, “Motivation is a definite motivation or stress to move in a certain direction or to achieve a specified goal.”

    Types of Motivation

    The scope of motivation is very broad, which includes all those methods, methods and components which directly or indirectly work to motivate the employees. Motivation can be divided into four parts

    (1) Positive Motivation – It refers to the process by which employees are motivated to work voluntarily by offering benefits or remuneration. It is also called ‘positive motivation’. Positive motivation can be monetary or non-monetary. Positive motivation includes giving cash, remuneration, respect, promotion opportunities, salary and wages etc. Such motivation raises the morale of the employees. It gives joy and satisfaction to the employees and motivates them to cooperate to achieve the set goals. This form of motivation is more popular in the present era, because it raises the morale of the employees, removes their grievances and increases their confidence.

    (2) Negative Motivation: The purpose of negative motivation, like positive motivation, is to motivate other people to act according to their will, but in this method, fearful pressure is applied. Its proponents believe that fear, fear, pressure, or punishment can sometimes motivate individuals. Scolding, reprimanding, dismissal from job, withholding of increment and promotion, etc. can be the forms of negative motivation. This form of motivation is effective, but being too harsh, it should be used very sparingly as there is a possibility of spreading dissatisfaction and rebellion. Therefore, such motivation should be used very carefully.

    (3) Financial or Monetary Motivation Under financial motivation, such direct or indirect monetary benefits are provided to the employees so that they get the motivation to do more work. Financial incentives are important because they enable the worker to fulfill all his needs. Monetary motivation is mostly in the form of salary, wages, bobs, dividend sharing. Financial incentives can be provided to employees either collectively or individually. Society, producers and workers all benefit from these motivations.

    (4) Non-Financial or Non-Monetary Motivation Along with financial motivations, non-financial motivations are also of great importance. It includes all those psychological attractions which motivate the workers to do maximum and best work. Non-financial motivations are of mental and invisible nature, which have no relation with Dita or Mudra. The prime examples of this are praise of work, providing leadership, good working conditions etc.

    These motivations are also provided collectively or individually. In order to make efficient use of the means of production, it is essential to provide financial motivation as well as non-financial motivation.

    Importance of Motivation

    The importance of motivation can be explained as follows

    (1) It becomes easy to achieve the set goals by providing necessary motivation to the employees of each organization which helps in achieving the goals. Motivations awaken the desire of the employees to work and for achieving the goals set by their efforts, they need to be given monetary and non-monetary motivations.

    (2) Convenience in the establishment of human relations – The concept of sweet human relations is the cornerstone of an ideal business establishment. Unless and until cordial relations are established between the labor management, it is not possible to achieve the goals of the organization. The employee cannot be treated as a commodity today. due respect to employees

    Their efficiency can be increased by giving benefits and benefits.

    (3) Any person who helps in awakening work interest, dedication and loyalty, makes maximum use of his work capacity only as long as there is a desire to work. Motivational plans play an important role in creating this desire among the employees. Motivation awakens interest, dedication and loyalty towards work in a person.

    (4) Increase in morale – There is a close relationship between employee, morale and work efficiency. An employee with low morale cannot have high work efficiency. An employee with high morale is passionate and enthusiastic and certainly does not lack initiative. Employee morale can be increased through motivation and full advantage of high morale can be taken.

    (5) Convenience in getting cooperation If any organization continues to get the voluntary cooperation of the employees, then surely that organization is successful in achieving its set goals in the stipulated time. In order to get the voluntary cooperation of the employees, it is necessary to satisfy them. Satisfaction can be provided by providing motivations to the employees.

    (6) Increase in work efficiency Employees should be given monetary, non-monetary incentives to increase their work efficiency. non-monetary motivations; Such as working conditions, behavior of managers, due respect, opportunities for promotion, etc. all prove helpful in increasing the working efficiency of the personnel.

    (7) Reduction in the movement of employees – In an organization where permanent employees are considered profitable, it is necessary to give monetary and non-monetary incentives to keep the employees in the organization permanently.

    (8) Satisfaction of needs Man is not only an economic man. Therefore, motivations are of utmost importance to satisfy his/her social, mental, physical and psychological needs.

    Factors Affecting Motivation

    All the managers try to motivate their subordinates, but whether the workers are really motivated or not depends on the circumstances. Every manager makes various efforts to motivate the employees, but it is not necessary that the workers will be motivated. Whether the employees are motivated or not is affected by the following factors

    (1) Wages and Wages Wages and wages also affect the motivation of workers. Workers demand a sufficient amount of wages to satisfy their human needs satisfactorily. In order to motivate their workers, the employers should increase the wages on time and such method of payment of wages should be implemented so that the worker who works in more quantity gets more salary. Workers earning less than this will try to do more work.

    (2) Working conditions – Working conditions mean the conditions of the place where the workers perform the work. Working conditions have a direct effect on the working efficiency of the workers. Therefore, to motivate the workers to do more work, the working conditions should be continuously improved so that the workers can make full use of their efficiency.

    (3) Opportunities for Development Every person working in the organization wants to develop himself. Every person has a hidden talent. Therefore, by providing opportunities for promotion and training, existing in the enterprise, workers can be motivated by providing them an opportunity to advance. When employees know that if they do more work, they will get an opportunity to move forward, then they will definitely be motivated to work more.

    (4) Labor Welfare In labor welfare works, we include those activities which make the social and economic welfare of the workers possible. Workers’ education, medical, housing, sports, entertainment etc. come under labor welfare. In order to motivate the workers, labor welfare should be given special attention by the employers.

    (5) Supervision – The supervision system of the business organization and the behavior of the workers to the supervisors also affects the motivation. Every worker expects that there should be no rigid control over him and that the supervisors should have a humane behavior towards them. Supervisors should not behave indecently with the workers and should give instructions according to their feelings.

    (6) Safety of work Safety of work also affects employee motivation. When a worker is given a permanent job, he becomes free from the worry of employment and develops a sense of belonging to the organization. If there is no security of work, then the worker will always try his best in search of new employment and his efficiency will decline.

    (7) Reward and punishment – The reward or punishment received by the employees for the work done by them also motivates them. If working and non-working workers are treated equally, then no worker will be able to do more work. Therefore, for motivation, arrangements should be made to reward the workers who do more work in the organization and punishment for the workers who do less work.

    (8) Communication system – The existing communication system in a business number also affects the motivation of the workers.

    Makes money. Every employee wants that he should get the necessary orders and instructions on time and the top managers should be aware of the efforts made by him. Due to effective communication system, the misconceptions arising in the organization will be resolved in time, which will have a favorable effect on the work.

    motivate people at work

    In the discussion of motivation, the main focus is on the ways of motivating non-managers. This neglects the specific dimensions of managerial motivation. The following motivators play an important role in motivating people

    (1) Challenging tasks The key requirement of executives is that their abilities are harnessed and developed. Therefore their duties, responsibilities and authority should be related to their abilities. Care should be taken to ensure that they get ample opportunity to hone their abilities on the job. They should be constantly given feedback about how excellent their work is.

    (2) includes status etc. In this the designation office size, furniture and furnishings, private secretary

    (3) Willingness to provide leadership – It is related to the desire to be a leader amongst his co-workers.

    (4) Competition – This is the need of healthy competition for organizational rewards such as promotion, status and recognition.

    (5) It is a motivator of money as to the extent to which it is a measure of high level performance status, rank, power achievement, etc.

    Elements of Sound Motivation System

    The following are the essential elements of a healthy motivation system:

    (1) Productivity A best motivational system is one which continuously strives to increase the productivity and efficiency of labor.

    (2) Competition – Motivation to work hard and develop healthy competition among themselves can be called solid arguments of a healthy motivational system. In fact, a person has to also see that due to these motivating factors, the cost of production does not necessarily increase.

    (3) Comprehensiveness (A best motivational system is expected to help satisfy the primary, social and individual needs of the labor force. It should be applicable to all categories of workers and as far as possible to all equal Benefit from it in proportion.

    (4) Flexibility – The motivation system should be such that it changes automatically according to the time and circumstances. Since the needs of each individual or group are different, they can be stimulated in different ways.

    (5) Frugal-motivation system should be thrifty. It should not happen that more than the benefits of the motivation schemes should be spent on it.

    (6) Motivational-motivational system should be such that it is not a burden on the undertaking and is motivating from the point of view of the employees.

    (7) Based on Humanity – The method of motivation should be based on the principle of humanity.

    (8) Appropriate size-motivation system should be commensurate with the size and requirements of the enterprise.

    Techniques of Motivation

    The main techniques or methods of motivation can be explained as follows:

    (1) Motivation by efficient leadership – According to this technique, the manager should listen to the difficulties of the employees as a true representative and efficient leader and try to overcome them. By doing this, the manager becomes the trust worthy of the employees and the employees get motivated and work sincerely.

    (2) Motivation by Explanation of Objectives- According to this technique, the managers should provide information about the goals and objectives of the organization to all the people working in the organization and tell them that their personal interest is not different from the interest of the organization.

    (3) Motivation through healthy competition- According to this technique, the managers should motivate all the employees of the organization by creating a sense of healthy competition with other organizations. So that they come together to win the competition.

    (4) Motivation by Challenge – According to this technique, the managers should put the goals of the organization in front of the employees in the form of a challenge and if the employees accept this challenge then surely it increases the productivity.

    (5) Monetary and non-monetary motivations According to this technique, employees can be motivated by giving monetary and non-monetary motivations. This technique of motivation is very popular nowadays.

    (6) Motivation by human behavior- Employees can also be motivated by doing human behavior with them.

    (7) Motivation by cooperative – According to this technique, employees can be motivated by making them a participant in the management decision making of the organization.

    Theories of Motivation

    To motivate the employees, various scholars have propounded many theories from time to time, which can be divided into the following three parts from the point of view of study.

    (I) Fundamental principles–

    (1) Unitary principle – It means that each person works for one purpose and that is to get money. Hence this principle

    According to this, if the efforts of an employee are directly related to wages or salary, then his desire to earn more money will motivate him to do more work.

    (2) Pluralist theory – This statement is contrary to ideology. According to this principle, man does not work for fulfilling only one purpose (earning money) but works for fulfillment of many purposes. Man has many economic and social needs, for the satisfaction of which he works. The fulfillment of these needs motivates the employees.

    (II) Conventional Theory–

    (1) Theory of Fear and Punishment – According to this theory, it is believed that more work can be taken from the employees only through fear and punishment. The saying of ‘Bhay din hoy na preeti’ is recognized in it. Under this, strict rules, their strict observance and in case of violation, physical and mental punishment, expulsion from service etc. The supporters of this theory believe in the saying ‘do or die’.

    (2) The principle of the award – its exponent Mr. F. W. Taylor is. According to them, the employee will be motivated to do more work by linking the work relationship with the reward. The temptation of more rewards will act as a motivation for the individual to work harder. Such views were expressed by Adam Smith, the father of economics, who considered money as the main means of motivating employees. If seen closely, this theory is a form of unitary theory.

    (3) The belief of the caret and stick principle is that if the work of the employee is above the minimum level then he should be rewarded and if the work is below the minimum level then he should be punished. Under this, two methods of taking work from the workers have been considered – Incentive and Punishment (Carrat and Stick). Of these two, whichever is suitable according to the situation should be adopted. Employees who are efficient, honest and conscientious, they should be motivated by paying normal wages and more than that, but those workers who are weak and are indifferent to work, they should be punished i.e. wage reduction, wages less than normal wages and fines. etc. should be encouraged.

    (III) Modern Theories of Motivation

    It includes the following principles –

    (1) Mace Gregor’s Theory of X and Y – Under the X theory, it is believed that the employee is naturally dull, weak, indifferent, selfish and opposed to developmental changes, so he has to resort to punishment and fear to motivate him to work. Should take This is the traditional principle.

    The Y principle is based on the modern ideology that the employee wants to work voluntarily provided he gets the opportunity to work, there is no need for fear or pressure, but there should be a suitable environment. To motivate the employee, he should make him a participant in every work of the organization. This increases the efficiency of the employees, increases the income and raises the standard of living. It is clear that the source of real motivation is the internal motivation of the employee.

    (2) The principle of participation – It is the belief that the worker is not motivated only by monetary benefits, but he should also have attachment to the organization, as well as he wants to express himself. Therefore, if he is made a participant in the management rather than considering him to be just an employee following orders or a part of the machine, then surely he will become more aware and loyal towards the work. So it is clear that employees can be motivated towards work by making them partners in management.

    (3) Theory of Purpose Goals The belief of this theory is that employees tend to become highly productive if they consider high productivity as a path to the achievement of one or more of their personal goals. On the contrary, if we consider low productivity as a measure of fulfillment of our goals, then we tend to become low producers. This theory emphasizes on productivity to motivate individuals individually and collectively and productivity is directly related to the achievement of goals.

    (4) Principle of health and wellness – According to this principle, human needs are divided into two groups – health element and motivational element. The main reason for employee’s dissatisfaction is his polluted work environment. Satisfaction with a person’s work is the result of his work. These satisfaction-providing components are the motivational elements. Therefore, the managers should not only pay attention to the health related elements, but should also pay attention to the improvement of the work, so that it can become more interesting and motivate the employees.

    (5) Employee Centered Supervision Theory – The exponent of this theory is Rensis Likert. According to this principle, if the supervision is not work centric but human centric, then the employees can be effectively motivated. According to this principle, the employee should work for his interests and welfare by treating him humanely instead of considering him as a mere part of the machine in the whole system. In such a situation, the employees work more efficiently.

    (6) Theory of orderliness of needs – The exponent of this theory, Shri A. H. Maslow. According to this theory the needs of man

    There are many and sequence is found in them, such as life-saving, protective, social respect and self-respect and self-development needs. The employee can be satisfied only by fulfilling these needs sequentially. When the need of one sequence is satisfied, the next sequence tries to satisfy the requirement. In this way, a person constantly tries to move forward, but this limit is different for each person. Monetary and non-monetary motivations are necessary to meet these needs.

    (7) Theory of Elton Mayo – According to this theory, non-monetary motivations are more important because the reward of an employee’s work is determined not by his physical or material ability but by social ability. The emphasis should be on non-monetary motivations to motivate social competence.

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