दादाजी के ‘बड़प्पन’ के संबंध में क्या विचार थे ? What were Grandfather’s views on ‘nobility’?

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दादा के बड़प्पन के संबंध में अपने मँझले लड़के कर्मचंद से कहते हैं कि बड़प्पन बाहर की वस्तु नहीं है। बड़प्पन तो मन का होना चाहिए। घृणा को घृणा से नहीं मिटाया जा सकता। छोटी बहू तभी अलग होना चाहेगी जब उसे घृणा के बदले घृणा दी जाएगी। यदि उसे घृणा के बदले स्नेह मिले तो उसकी सारी घृणा धुंधली पड़कर लुप्त हो जायेगी। महानता किसी से मनवाई नहीं जा सकती, अपने व्यवहार से अनुभव कराई जा सकती है। दूँठ वृक्ष आकाश को छूने पर भी अपनी महानता का सिक्का हमारे दिलों पर उस समय तक नहीं बैठा सकता, जब तक अपनी शाखाओं में वह ऐसे पत्ते नहीं लाता, जिनकी शीतल, सुखद छाया मन के सारे तप को हर ले और जिसके फूलों की भीनी-भीनी सुगंध हमारे प्राणों में पुलक भर दें।


Regarding grandfather’s nobility, he tells his middle son Karamchand that nobility is not an external thing. Nobility should be of the mind. Hate cannot be eradicated by hatred. The younger daughter-in-law would like to part ways only when she is given hatred instead of hatred. If he gets love instead of hatred, then all his hatred will fade away and disappear. Greatness cannot be made by anyone, it can be experienced by one’s own behaviour. The stubble tree touches the sky, yet the coin of its greatness cannot sit on our hearts, until it brings such leaves in its branches, whose cool, pleasant shade takes away all the tenacity of the mind and whose flowers are moist- May the sweet fragrance fill our souls with happiness.

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