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एक सार्वजनिक कम्पनी के निर्माण हेतु प्रवर्तन से लेकर व्यवसाय प्रारम्भ तक प्रवर्तक के रूप में आप क्या-क्या कदम उठायेंगे, संक्षेप में वर्णन कीजिए।

यह कम्पनी के निर्माण या स्थापना की प्रथम अवस्था है, क्योंकि इसके द्वारा ही एक कम्पनी अपना जीवन ग्रहण करती है। प्रवर्तन से आशय व्यापार सम्बन्धी सुविधाओं एवं सुअवसरों की खोज करना तथा व्यापारिक संस्थान से लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य के लिए पूँजी, सामग्री, सम्पत्ति एवं क्षमता को एकत्रीकरण करना है। इस प्रकार कम्पनी के निर्माण के सम्बन्ध में किये जाने वाले प्रारम्भिक कार्यों को ही प्रवर्तन कहते हैं। वे व्यक्ति जो कम्पनी का प्रवर्तन करते हैं, ‘प्रवर्तक’ कहलाते 2) प्रवर्तन की कार्यविधि को निम्न प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं

(1) विचार की खोज तथा प्रारम्भिक अनुसन्धान-इसके अन्तर्गत प्रवर्तक अपने मस्तिष्क में कम्पनी के निर्माण के सम्बन्ध में विचारों की गहन जाँच करता है और उसको साकार रूप प्रदान करने के लिए वह प्रारम्भिक अनुसन्धान प्रारम्भ कर देता है तथा कम्पनी की स्थापना की सम्भावना का पता लगाया जाता है।

(2) विस्तृत जाँच-पड़ताल करना- विचार को कार्य रूप देने के लिए विस्तृत रूप से जाँच-पड़ताल की जाती है। विस्तृत जाँच करते समय प्रवर्तक अपने विचार अथवा अनुसन्धान में छिपी हुई 9) कमजोरियों को जानने का प्रयत्न करता है। वह यह मालूम करता है कि कितनी पूँजी की आवश्यकता होगी, व्यय कितना हो सकता है तथा अनुमानित लाभ क्या होगा आदि।

(3) आवश्यक सामान एकत्रित करना-प्रारम्भिक अनुसन्धान एवं विस्तृत जाँच-पड़ताल कर लेने के पश्चात् प्रवर्तक कम्पनी के निर्माण के लिए आवश्यक सामान एकत्रित करना प्रारम्भ कर देता है। इस कार्य के लिए वह विभिन्न विशेषज्ञों तथा संस्थाओं से सम्पर्क स्थापित करता है तथा आवश्यक अनुबन्ध आदि करता है। (4) वित्तीय प्रबन्ध करना- वह प्रविवरण द्वारा पूँजी एकत्र करने का प्रयत्न करता है तथा पूँजी

एकत्र करने में वह अभिगोपकों की मदद लेता है तथा अन्य आवश्यक कार्यवाहियाँ करता है। (5) प्रारम्भिक अनुबन्ध करना-प्रारम्भिक अनुबन्ध से अभिप्राय उन अनुबन्धों से है जो कि कम्पनी की ओर से तथा उसके लाभ के लिए प्रवर्तक विभिन्न पक्षों के साथ कम्पनी के समामेलन से पहले करता है, जैसे-विक्रेताओं और कम्पनी के प्रवर्तकों के मध्य सम्पत्ति खरीदने का अनुबन्ध । चूँकि यह अनुबन्ध कम्पनी के निर्माण से पहले किये जाते हैं, अतः इनके लिए कम्पनी के प्रवर्तक व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होते हैं।

2. कम्पनी का समामेलन

(Incorporation of Company) प्रत्येक कम्पनी का समामेलन कराना अनिवार्य होता है। बिना समामेलन कराये कम्पनी किसी भी कार्य को नहीं कर सकती है। जिस राज्य में कम्पनी का प्रधान कार्यालय स्थित हो उसी राज्य के कम्पनियों के रजिस्ट्रार के कार्यालय में समामेलन कराया जाता है। कम्पनी के समामेलन या रजिस्ट्रेशन के लिए किये जाने वाले कार्यों को निम्न प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं (A) प्रारम्भिक क्रियाएँ (Preliminary Steps)- कम्पनी के समामेलन से पूर्व जो प्रारम्भिक क्रियाएँ की जाती हैं वे निम्नलिखित हैं

1. कम्पनी का प्रकार निर्धारित करना-प्रवर्तक को सर्वप्रथम अपनी कम्पनी का प्रकार निर्धारित करना होता है। कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत सार्वजनिक कम्पनी तथा निजी कम्पनी के पंजीयन का प्रावधान है। अब कोई भी भारत का नागरिक एवं निवासी व्यक्ति ‘एक व्यक्ति कम्पनी’ (OPC) क भी पंजीयन करवा सकता है। किन्तु ऐसी कम्पनी को एक निजी कम्पनी के रूप में ही पंजीकृ करवाया जा सकता है। ये सभी कम्पनियाँ अंशों द्वारा सीमित अथवा गारण्टी द्वारा सीमित दायित्व वाट हो सकती है।

रेका स्थानकाउस स्थान का निश्चय जाना चाहिए जिस स्थान पर कार्यालय स्थापित किया जायेगा। यदि विश्व नहीं हो पाता तो उस काम करना होगा जिस राज्य में शि रखना है।

3. प्रस्तावित संचालक द्वारा पहचान संख्या प्राप्त करना कोई भी व्यक्ति जो

संचालक पाहता है जो किसी प्रस्तावित कम्पनी में संचालक के रूप में नियुक्ि

स्वीकार करने की सहमति देने वाला है, को संचालक पहचान संख्या’ (Director Identifican Number or DIN) प्राप्त करना होता है। इस हेतु ऐसे व्यक्ति को केन्द्रीय सरकार के पास करना होता है। केन्द्रीय सरकार आवेदन प्राप्ति के 30 दिनों के भीतर ‘संचालक पहचान आबंटित कर देती है।

4. डिजीटल सिगनेचर प्राप्त करना- अब कम्पनियों को पंजीयन हेतु ‘ऑनलाइन’ की व्यवस्था है। ऐसे आवेदन फाइल करने हेतु ‘डिजीटल सिगनेचर’ करने होते हैं। अतः प्रस्त कम्पनी के प्रवर्तकों/प्रस्तावित संचालकों या कम्पनी सचिव को किसी अधिकृत व्यक्ति से स्थ गिनेचर प्राप्त करना एवं उसका प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता है।

5. कम्पनी के नाम का चयन एवं आरक्षण करना कम्पनी का समामेलन कराने के प्रस्तावित कम्पनी के नाम का चयन एवं निर्धारण करना एवं रजिस्ट्रार से उस नाम का कम्पनी लिए आरक्षण करवाना पड़ता है। नाम निर्धारित एवं आरक्षित करवाने के लिए प्रवर्तक को रजिस्ट्रा पास एक आवेदन करना पड़ता है। यह आवेदन पत्र फॉर्म नं. INC-1 में होना चाहिये तथा आवेदन आ साथ निर्धारित शुल्क भी जमा करवाना चाहिये

6. सीमानियम एवं अन्तर्नियमों के मसौदे तैयार करना-प्रवर्तक द्वारा कम्पनी के सीमानि एवं अन्तर्नियमों के मसौदे तैयार करते हैं। इस कार्य के लिए प्रवर्तकों को अपने वकील, क सचिव आदि की सहायता लेनी चाहिए। मसौदों की रजिस्ट्रार से जाँच करवाना-सीमानियम एवं अन्तर्नियमों के मसौदों की रजिस्ट्रक क से जाँच करा लेनी चाहिए। ऐसा करने से इनकी त्रुटियों को उनके मुद्रण से पहले ही दूर किया सकता है और समामेलन में देरी को टाला जा सकता है।

8. सीमानियम एवं अन्तर्नियमों का मुद्रण कराना-रजिस्ट्रार द्वारा सीमानियम एवं अन्तर्निय के मसौदों की जाँच कर लेने के बाद उनको मुद्रित करवाया जाता है। आजकल कम्प्यूटर द्वारा ले प्रिन्ट की भी मान्यता मिल गई है। अतः इस तरीके से भी मुद्रण करवाया जा सकता है। 9. मुद्रांक लगाना एवं तिथि अंकित करना-मुद्रण के पश्चात् पार्षद सीमानियम एवं अन्तर्नियमों पर आवश्यक मुद्रांक लगाये जाते हैं तत्पश्चात् इन प्रलेखों पर तिथि भी अंकित कर पड़ती है। यह तिथि मुद्रांक लगाने की तिथि के बाद की होनी आवश्यक है।

10. अभिदाताओं के हस्ताक्षर करवाना-कम्पनी के सीमानियम में अभिदाताओं का खण्ड हो है जहाँ पर अभिदाताओं के हस्ताक्षर करवाने होते हैं। सार्वजनिक कम्पनी की दशा में कम से कम तथा निजी कम्पनी की दशा में कम से 2 अभिदाताओं के हस्ताक्षर कराने आवश्यक होते हैं। ए व्यक्ति कम्पनी की दशा में केवल एक ही अभिदाता द्वारा हस्ताक्षर करने होते हैं। यदि अभिदाता स् हस्ताक्षर करने के लिए उपलब्ध न हो तो हस्ताक्षर उसके किसी अधिकृत व्यक्ति से करवाये जा सक है। इस खण्ड में अभिदाता का नाम, पता, व्यवसाय आदि का भी उल्लेख किया जाता है।

11. कानूनी अपेक्षाओं की पूर्ति सम्बन्धी घोषणा करना-प्रवर्तक को कम्पनी का समामेल करवाने के लिए कानूनी अपेक्षाओं की पूर्ति सम्बन्धी घोषणा भी करनी होती है। दूसरे शब्दों में, प्रवर्त को इस आशय की घोषणा करनी होती है कि कम्पनी के पंजीयन तथा आनुषंगिक मामलों के सम्बन में कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों एवं उसके अधीन बनाये गये नियमों की सभी अपेक्षाओं का पाल कर लिया गया है।

12. अभिदाताओं का विवरण प्राप्त करना प्रवर्तक को अभिदाताओं का विवरण भी प्राप्त करना होता है। इनके विवरण में उनका पारिवारिक नाम निवास का पता राष्ट्रीयता आदि सम्मिलित है। 18. संचालको प्रबन्ध संचालकों का विवरण तैयार करना- यदि प्रवर्तक कम्पनी के संचालको, पूर्णकालीन संचालक प्रबन्ध संचालकों का प्रबन्धक आदि की नियुक्ति करना चाहते है तो उसके आस पते आदि के विवरण तथा इनके साथ किये जाने वाले ठहरावों की प्रतिलिपि भी तैयार करवानी

14. संचालकों की सहमति प्राप्त करना-प्रवर्तकों को उन व्यक्तियों को लिखित सहमति भी प्राप्त करनी होती है जो कम्पनी के प्रथम संचालक बनने को राजी हुए है तथा जिनका नाम कम्पनी के अन्तर्नियमों में उल्लिखित है। ऐसी सहमति निर्धारित प्रारूप एवं रीति से प्राप्त करनी पड़ती है। (B) रजिस्ट्रार को प्रपत्रों की सुपुर्दगी-प्रारम्भिक क्रियायें करने के पश्चात् सम्बन्धित कम्पनी जिस्ट्रार के पास निम्नलिखित प्रलेख भेजने चाहिए

1. पत्राचार हेतु पते की सूचना प्रत्येक कम्पनी को समामेलन के समय रजिस्ट्रार को उस

स्थान के पते की सूचना का प्रलेख सुपुर्द करना चाहिये जिस पर कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय की • स्थापना के समय तक पत्र व्यवहार किया जा सके। 2. सीमानियम प्रत्येक कम्पनी को अपना सीमानियम रजिस्ट्रार के पास फाइल करना होता है। सीमानियम पर कम्पनी के सभी अभिदाताओं के निर्धारित की गयी रीति से हस्ताक्षर होने चाहिये।

3. अन्तर्नियम प्रत्येक प्रस्तावित कम्पनी को अपने समामेलन के लिए रजिस्ट्रार के पास अपने अन्तर्नियम भी फाइल करने पड़ते हैं। अन्तर्नियमों पर भी सभी अभिदाताओं के हस्ताक्षर होने चाहिये। इस अधिनियम की अनुसूची I की सारणी F से J तक की तालिकाओं में विभिन्न प्रकार की कम्पनियों के लिए अन्तर्नियमों के प्रारूप दिये गये हैं। प्रत्येक कम्पनी को अपनी प्रकृति के अनुरूप उनमें से किसी एक उपयुक्त प्रारूप में अपने अन्तर्नियम तैयार करने चाहिये।

4. कानूनी अपेक्षाओं की पूर्ति की घोषणा-प्रत्येक कम्पनी को अपने समामेलन के समय कानूनी औपचारिकताओं/अपेक्षाओं की पूर्ति सम्बन्धी घोषणा भी फाइल करनी होती है। दूसरे शब्दों में, कम्पनी को इस आशय की घोषणा का प्रलेख फाइल करना होता है कि कम्पनी ने कम्पनी के पंजीयन एवं उससे आनुषंगिक मामलों के सम्बन्ध में कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों एवं उसके अधीन बनाये गये नियमों के अधीन औपचारिकताओं को पूरा कर लिया गया है।

5. अभिदाताओं तथा प्रथम संचालकों का शपथ-पत्र-प्रत्येक कम्पनी को अपने सीमानियम के

प्रत्येक अभिदाता तथा प्रत्येक ऐसे प्रथम संचालक जिसका नाम अन्तर्नियमों में उल्लिखित है, से

शपथ पत्र प्राप्त कर समामेलन के आवेदन के साथ प्रस्तुत करना होता है। 6. संचालकों की लिखित सहमति- कम्पनी के समामेलन के समय रजिस्ट्रार को उन लोगों की लिखित सहमति भी (फार्म नं. DIR-12 में) प्रस्तुत करनी चाहिये जिन्होंने कम्पनी के संचालक के रूप में कार्य करना स्वीकार किया है। यह सहमति निर्धारित की गयी रीति एवं प्रारूप में देनी होती है।

7. नाम आरक्षण की पुष्टि करने वाले पत्र की प्रति-कम्पनी को उस पत्र की प्रति भी संलग्न करनी होती है जिसके द्वारा रजिस्ट्रार द्वारा कम्पनी का नाम आरक्षण करने की पुष्टि की गई थी। 8. निर्धारित शुल्क की रसीद-कम्पनी के समामेलन के लिए कुछ शुल्क भी लगता है। यह

शुल्क भारत सरकार के खाते में जमा होता है। शुल्क की दरें भारतीय कम्पनी अधिनियम की दसवीं अनुसूची में दे रखी हैं। इन दरों के अनुरूप शुल्क की राशि इलेक्ट्रॉनिक ट्रान्सफर अथवा नकद या बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से जमा करवायी जा सकती है। शुल्क जमा करने हेतु चालान भी इलेक्ट्रॉनिकली प्राप्त किया जाता है। ये सभी प्रपत्र रजिस्ट्रार द्वारा कम्पनी के नाम के आरक्षण के लिए आवेदन करने की तिथि के 60 दिनों के भीतर प्रस्तुत करने चाहिये।

(C) समामेलन प्रमाण पत्र प्राप्त करना-जब रजिस्ट्रार को निश्चित शुल्क सहित आवश्यक प्रपत्र प्राप्त हो जाते हैं, तब वह इन प्रपत्रों की गहन जाँच करता है। यदि रजिस्ट्रार को यह संतोष हो

6. सीमित दायित्व समापन के सदस्यों का दाि पर राशि तक सीमित होता है। कम्पनी कभी भी उनसे इस राशि से अधिक की नहीं कर सकती है गरी द्वारा सीमित कम्पनी की दशा में कंपनी के सदस्यों से थी आरती की राशि ही भौजी जा सकती है। यह राशि भी कम्पनी के समापन की दशा में ही

सम्पत्ति कम्पनी की अपने सदस्यों से पृथक सम्पत्ति होती है। कम्पनी की सम्पत्तियों पर कम्पनी का अधिकार होता है न कि अंशधारियों या सदस्यों का उच्च तो यहाँ तक कहा कि कोई भी अंशधारी कम्पनी की सम्पत्तियों का आंशिक स्वामी भी नहीं होता है। सदस्य केवल समय-समय पर घोषित लाभांश ही प्राप्त कर सकते हैं। समापन की दशा में भी सभी एवं ऋण के भुगतान के बाद यदि कुछ सम्पत्ति शेष बचती है तो उन्हें अंशधारियों में बाँध जा सकता है।

18. समामेलन की त्रुटियों पर पर्दा समामेलन का प्रमाण-पत्र इस बात का अकाट्य प्रमाण होता है कि कम्पनी के समामेलन के सम्बन्ध में सभी वैधानिक औपचारिकताओं को पूरा कर दिया गया है। अतः समामेलन हो जाने के बाद उन सभी त्रुटियों या कमियों पर उंगली भी नहीं उठाई जा सकती है जो समामेलन की प्रक्रिया में रह गई थी।

(3) पूँजी अभिदान (Capital Subscription)

अंश पूँजी वाली प्रत्येक कम्पनी तब तक अपना व्यवसाय प्रारम्भ नहीं कर सकती है जब तक वह कम्पनी अपने लिए कम से कम न्यूनतम आवश्यक अंश पूँजी के लिए अभिदान प्राप्त नहीं कर लेती है।

यह उल्लेखनीय है कि प्रत्येक निजी कम्पनी की कम से कम र एक लाख या इससे अधिक निर्धारित की गई राशि की प्रदत्त अंश पूँजी होनी चाहिए। सार्वजनिक कम्पनी कम से कम ₹5 लाख अथवा इससे अधिक निर्धारित की गयी राशि की प्रदत्त अंश पूँजी होनी चाहिए। कोई भी सार्वजनिक कम्पनी अंश पूँजी प्राप्त करने हेतु निम्नांकित में से किसी एक या दोनों साधनों को अपना सकती है

(i) निजी आधार पर प्रतिभूतियों का प्रस्ताव पत्र (Private placement offer letters) जारी करके। (ii) प्रविवरण जारी करके।

किन्तु कोई भी निजी कम्पनी केवल निजी आधार पर प्रतिभूतियों का प्रस्ताव-पत्र जारी करके ही अंश पूँजी का अभिदान प्राप्त कर सकती है। परन्तु एक व्यक्ति कम्पनी की दशा में सम्पूर्ण अंश पूँजी का अभिदान केवल उसके एकाकी सदस्य को ही करना होता है। अतः ऐसी कम्पनी निजी आधार पर प्रतिभूतियों का प्रस्ताव पत्र केवल उसे ही जारी कर सकती है, किसी और को नहीं।

(4) व्यवसाय का प्रारम्भ (Commencement of Business)

कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार कोई भी अंश पूँजी वाली कम्पनी अपने व्यवसाय को प्रारम्भ तभी कर सकती है या कोई भी राशि उधार तभी ले सकती है जबकि वह निम्न औपचारिकताओं की पूर्ति कर देती है

1. अभिदाताओं से भुगतान प्राप्ति की घोषणा- कम्पनी के किसी एक संचालक द्वारा इस बात की घोषणा कर दी गयी हो कि सीमानियम के प्रत्येक अभिदाता ने अपनी सहमति के अनुरूप अंश लेकर उनके मूल्य का भुगतान कर दिया है। यह घोषणा निर्धारित की गई रीति से निर्धारित शुल्क साथ की जानी चाहिये तथा इसे रजिस्ट्रार को फाइल किया जाना चाहिए। के

2. प्रदत्त पूँजी के सम्बन्ध में घोषणा-निजी कम्पनी की दशा में एक संचालक को यह घोषणा भी करनी होती है कि इस घोषणा के दिन कम्पनी की प्रदत्त अंश पूँजी र एक लाख अथवा इससे अधिक गयी राशि से कम नहीं है। सार्वजनिक कम्पनी की दशा में, उसके किसी एक संचालक को यह घोषणा करनी पड़ती है कि इस घोषणा के दिन उसकी प्रदत्त अंश पूँजी ₹ 5 लाख या इससे अधिक निर्धारित गयी राशि से कम नहीं है।