भारत में धर्म निरपेक्षता से क्या अभिप्राय है ? What is meant by secularism in India?

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धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप-राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता को लक्ष्य में रखकर ही भारत के संविधान निर्माताओं ने इस देश को धर्म निरपेक्ष प्रजातान्त्रिक गणतन्त्र घोषित किया। धर्म-निरपेक्षता का अभिप्राय यही है कि राज्यतन्त्र उसके नागरिकों को धर्म की स्वतन्त्रता देता है और राज्य और धर्म को अन्योन्याश्रित नहीं मानता। धर्म निरपेक्ष भारत की संस्कृति को सामंजस्य और सहिष्णुता की संस्कृति कहा जा सकता है। सर्वधर्म समभाव पर यहाँ बल दिया जाता है। विविधता में एकता का सूत्र पिरोने वाली यहाँ की संस्कृति वस्तुतः कई उप-संस्कृतियों का मधुर संगम है।

विविधताओं के इस देश में यातायात और संचार की बढ़ती सुविधाओं के कारण लोगों में अन्तरप्रान्तीय अन्तः प्रक्रियाओं के दायरे बढ़े हैं। यद्यपि पिछले वर्षों में कतिपय प्रादेशिक आब्दोलन हुए है फिर भी इन बढ़ती अन्तरप्रादेशिक अन्तः क्रियाओं ने भारत में विभाजन की नई भित्तियों को खड़ा होने से रोका है। संचार सूत्रों और आवागमन के साधनों ने प्रदेशों के गवाहों को खुला रखा है। कोई भी प्रदेश एक भाषी नहीं है। कोई भी प्रदेश किसी एक संस्कृति या धर्म के लोगों में आक्रान्त नहीं है। पूरे भारत में जिस प्रकार अनेकताएँ पाई जाती है वैसे ही प्रत्येक प्रदेश के सामाजिक ढाँचे में भी विविधताएँ है। आर्थिक दृष्टि से विभिन्न प्रदेश अन्तनिर्भर हैं। प्रादेशिक स्वायत्तता या छोटे राज्यों की माँग भी देश की केन्द्रीय सरकार से की जाती है जिस पर संसद निर्णय लेती है। इस दृष्टि से देखा जाये तो प्रदेशवाद पर चलने वाले सभी आन्दोलन देश के लिए विघटनकारी नहीं होते।

वस्तुतः प्रदेशवाद से देश में सहभागी राजनीतिक संस्कृति पनप रही है। भारत राष्ट्र निर्माण की अपनी प्रक्रिया में बहुत अंशों तक सफल रहा है। लड़खड़ाया अवश्य पर टूट नहीं। भारत ने एक उभरती संस्कृति की विविधता के मोतियों को एक सूत्र में पिराये रखा है। उसने जो भी सिप्त का सत्कार करते हैं और अवांछित का तिरस्कार इस देश की विशाल संस्कृति की ढेरों परम्परा का पोषण किया है और वांछित परिवर्तन का स्वागत। उसके सीमान्तों पर द्वारपाल सजग हैं उप-संस्कृतियों में सहचर हैं, वे दीवारों में बन्द नहीं हैं, उनके गवाक्ष खुले है। इसी से भारतीय संस्कृति ● भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में वह सक्षम है। सहिष्णुता और सामंजस्य की उसकी विशेषता सुसमृद्ध है, विकासमान है। वर्तमान विश्व की अनिवार्यताओं को झेलने में उसका सामर्थ्य बढ़ा है। का ही यही प्रतिफल है कि हमारी संस्कृति की भारतीयता बरकरार है।


Nature of Secularism – Keeping in view the need of national unity, the framers of the Constitution of India declared this country a secular democratic republic. The meaning of secularism is that the state system gives freedom of religion to its citizens and does not consider the state and religion to be interdependent. The culture of secular India can be called the culture of harmony and tolerance. The emphasis here is on the equality of all religions. The culture here, which has the thread of unity in diversity, is actually a sweet amalgamation of many sub-cultures.

In this country of diversity, due to the increasing facilities of transport and communication, the scope of inter-provincial interactions among the people has increased. Although there have been some regional movements in the last years, yet these increasing inter-regional interactions have prevented the emergence of new walls of partition in India. The sources of communication and means of transport have kept the witnesses of the territories open. No region is a single language. No state is encroached upon by people of any one culture or religion. Just as diversity is found in the whole of India, in the same way there is diversity in the social structure of each region. From the economic point of view, different regions are interdependent. Territorial autonomy or small states are also demanded from the central government of the country on which the Parliament decides. If seen from this point of view, all movements based on regionalism are not disruptive to the country.

In fact, participatory political culture is flourishing in the country due to regionalism. India has been successful to a large extent in its process of nation building. Must have stumbled but did not break. India has put together the pearls of diversity of an emerging culture. He has nurtured many traditions of this country’s vast culture and welcomes the desired change. The gatekeepers on its frontiers are alert, they are companions in the sub-cultures, they are not locked in the walls, their doors are open. With this, Indian culture is capable of facing the challenges of the future. His specialty of tolerance and harmony is rich, developing. Its capacity has increased to face the exigencies of the present world. It is the result of this that the Indianness of our culture remains intact.

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