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कम्पनी के पार्षद सीमानियम तथा अन्तर्नियमों की रजिस्ट्री होने के बाद यह प्रलेख सार्वजनि प्रलेख हो जाते हैं।

कोई भी व्यक्ति जो कम्पनी के साथ व्यवहार करता है उससे यह आशा की जा है कि उसे कम्पनी के पार्षद सीमानियम एवं अन्तर्नियमों का ज्ञान है तथा उन्होंने इनको पढ़, सुन समझकर ही कम्पनी के साथ अनुबन्ध किया है चाहे उन्होंने इन प्रलेखों को कभी देखा, पढ़ा या सु तथा समझा ही न हो। यदि कोई व्यक्ति कम्पनी के साथ व्यवहार करने के बाद पार्षद सीमानिय में दिये हुए नियमों की अनभिज्ञता के कारण हानि उठाता है तो इसे उसे स्वयं सहन करना होगा यह पार्षद सीमानियम के ज्ञान न होने के आधार पर ऐसी हानि के दायित्व से मुक्त नहीं। सकता।

उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यक्ति को कम्पनी से व्यवहार करने से कम्पनी के सीमानियम तथा अन्तर्नियमों का अध्ययन अवश्य कर लेना चाहिए। ऐसा करने से संचालकों के अधिकारों का ज्ञान होगा। न्यायाधीश पॉमर (Palmer) ने भी लिखा है कि “कम्पनी सीमानियम एवं अन्तर्नियम सार्वजनिक प्रलेख है। अतः एक सर्वमान्य तथ्य है कि किसी समामेति कम्पनी से व्यवहार करने वाले अंशधारियों तथा अन्य बाह्य व्यक्तियों को इन प्रलेखों की समुि जानकारी है। ”

आन्तरिक प्रबन्ध के सिद्धान्त के अनुसार कम्पनी से व्यवहार अथवा अनुबन्ध करने वाले. प्रत्येक व्यक्ति को यह मान लेने का अधिकार है कि जहाँ तक कम्पनी की आन्तरिक कार्यवाहियों का सम्बन्ध है, समस्त कार्य नियमित रूप से किये गये हैं। बाहरी व्यक्ति का यह कार्य कदापि नहीं है कि रह यह देखे कि कम्पनी की आन्तरिक कार्यवाहियाँ नियमानुसार चल रही है। किन्तु उसका यह उत्तरदायित्व अवश्य है कि वह इस बात का पता अवश्य लगाये कि प्रस्तावित व्यवहार अथवा अनुबन्ध कही कम्पनी के सार्वजनिक प्रलेखों (पार्षद सीमानियम व पार्षद अन्तर्नियम) के असंगत तो नहीं है। आन्तरिक प्रबन्ध सिद्धान्त का मूल आधार यह है कि यदि कोई व्यक्ति कम्पनी के सार्वजनिक प्रलेखों (पार्षद सीमानिगम एवं पार्षद अन्तर्नियम) पर विश्वास करते हुए कम्पनी से व्यवहार अथवा अनुबन्ध करता है, तो उसका यह मान लेने का अधिकार है कि कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्ध सम्बन्धी सभी नियमों एवं कार्यवाहियों का पालन किया जा चुका है। यदि किसी कारणवश उन नियमों अथवा कार्यवाहियों का पालन नहीं हुआ हो तो इसका उत्तरदायित्व कम्पनी पर होगा। उक्त व्यक्ति के अधिकार इससे प्रभावित नहीं होंगे अपितु ज्यों-ज्यों बने रहेंगे।

आन्तरिक प्रबन्ध सिद्धान्त का प्रतिपादन सन् 1856 में रॉयल ब्रिटिश बैंक बनाम टरक्याण्ड नामक बाद में किया गया था। इस बाद में कम्पनी के अन्तर्नियमों में संचालकों को बॉण्ड निर्गमन करने का अधिकार या बशर्ते कि इसके लिए सदस्यों की सभा में सामान्य प्रस्ताव पारित कर दिया जाए। संचालकों ने टरक्वाण्ड बॉण्ड निर्गमित कर दिये किन्तु उसके लिए कम्पनी के सदस्यों की सभा में निर्धारित प्रस्ताव पारित नहीं कराया। न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया गया है कि टरक्वाण्ड को यह मान लेने का अधिकार या कि संचालकों ने जो बॉण्ड निर्गमित किये हैं उनके लिए वे साधारण प्रस्ताव द्वारा अधिकृत है। अतएव टरक्वाण्ड उक्त बॉण्डों के आधार पर कम्पनी से रुपया पाने का अधिकार है।

आन्तरिक प्रबन्ध के सिद्धान्त के अपवाद

(Exceptions of Doctrine of Indoor Management)

आन्तरिक प्रबन्ध सिद्धान्त के अनुसार कम्पनी से व्यवहार अथवा अनुबन्ध करने वाले व्यक्ति को यह मान लेने का अधिकार है कि कम्पनी का आन्तरिक प्रबन्ध ठीक तरह से चल रहा है तथा उक्त व्यवहार अथवा अनुबन्ध के सम्बन्ध में कम्पनी द्वारा नियमानुसार कार्यवाही सम्पन्न की गई है, किन्तु इस सिद्धान्त के निम्नलिखित अपवाद हैं

(1) जब अनियमितता का ज्ञान हो जब कम्पनी के साथ व्यवहार करने वाले बाह्य व्यक्ति या तृतीय पक्षकार को कम्पनी में हो रही अनियमितताओं की जानकारी हो और फिर भी वह कम्पनी के साथ व्यवहार करता है तो वह बाह्य व्यक्ति इस सिद्धान्त का सहारा लेकर अपने दायित्व से बच नहीं सकता है। साथ ही वह किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति भी नहीं करवा सकता है। मोरिंस बनाम केनसन के वाद में दिये गये निर्णयानुसार यदि बाहरी व्यक्ति जो कम्पनी के साथ व्यवहार कर रहा है, को कार्य की अनियमितता का ज्ञान हो तो यह सदस्य को प्रदान की जायेगी जो प्रार्थना पत्र के साथ ₹1 का शुल्क भी जमा करता है। आवेदन के 7 दिन के अन्दर कम्पनी द्वारा परिवर्तित अन्तर्नियम की प्रतिप सदस्य को भेजनी होगी।

व्यवहार करने वाला व्यक्ति स्वयं ही कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्ध का हिस्सा हो या उससे जुड़ा हुआ हो (2) जब व्यवहार करने वाला व्यक्ति आन्तरिक प्रबन्ध का हिस्सा हो-यदि कम्पनी के साथ तो वह इस सिद्धान्त के अधीन लाभ या सुरक्षा प्राप्त नहीं कर सकता है।

पक्षकार के साथ अपने अधिकारों की सीमा के बाहर कोई अनुबन्ध करता है तो वह उसके प्रत्यक्ष अधिकार क्षेत्र के बाहर होने के कारण व्यर्थ होता नहीं होती। इस सम्बन्ध में आनन्द बिहारी लाल बना दिनसा एण्ड कम्पनी (1942) का है। इसम्पनी के एकाउण्टेन्ट मे कम्पनी की कुछ सम्पत्ति वादी के नाम हस्तान्तर न्यायालय ने इस छावहार को पर्व साना क्योंकि ऐसा करना एकाउण्टेण्ट के प्रत्यक्ष के बाहर था।

(4) जालसाजी-रुबिन बनाम डोट फिंगाल कंसोलिडेटेड कम्पनी (1906) के बाद में द निर्णयानुसार यदि कम्पनी के नाम में किये गये कार्य जालसाजीपूर्ण या कपटमय है तो आन्तरिक का सिद्धान्त लागू नहीं होगा। इस बाद में कम्पनी के सचिव ने जाली अंश प्रमाण-पत्र के पर धारित अंशों के सम्बन्ध में रजिस्टर्ड होने का दावा किया। न्यायालय ने अंश प्रमाण व्यर्थ घोषित करते हुए यह कहा कि जाली अंश प्रमाण-पत्र के अधीन धारक को कोई मिलता।

बैंक ऑफ लीवरपूल (1924) के बाद में दिये गये

लापरवाही-अण्डरवुड बनाम यदि कम्पनी के साथ व्यवहार करने वाले बाहरी पक्षकार अनियमितताओं का पता लग असावधानी दिखाते हैं, तो उन्हें आन्तरिक प्रबन्ध के सिद्धान्त का लाभ पाने का अधिकार (6) अन्तर्नियमों की अनभिज्ञता-जब किसी व्यक्ति ने सीमानियम व अन्तर्नियमों को अथवा समझा नही हो अथवा उन पर ध्यान न देकर अनुबन्ध किया हो तो न्यायालय साम आन्तरिक प्रबन्ध के सिद्धान्त को लागू नहीं करता है। इस सम्बन्ध में लक्ष्मी रतन लाल कॉटन बनाम जी. के. जूट मिल्स कम्पनी का वाद महत्वपूर्ण है।

(7) जाँच-पड़ताल आयोजित करना- जब सौदे की रकम इतनी ज्यादा है या परिस्थितियों है जोकि अन्तर्नियम की पूर्ति के सम्बन्ध में पूछताछ करना स्वाभाविक हो जाता है तब भी यह वि लागू नहीं होगा। जैसे कोई व्यक्ति ₹ 20 लाख के बॉण्ड खरीदता है, तो उसको स्वभावतः यह पूछ करनी चाहिये कि क्या कम्पनी की साधारण सभा में आवश्यक प्रस्ताव पारित हो गया है। (8) कम्पनी के साधारण व्यवसाय से अवगत हो यदि कम्पनी के साथ किया गया

व्यवहार कम्पनी के व्यवसाय से सम्बन्धित नहीं है अथवा अनाधिकृत है तो उपर्युक्त सिद्धान्तला नहीं होगा। (9) जब कार्य प्रारम्भ से ही व्यर्थ हो- यदि कोई कार्य कम्पनी के अधिकारों के बाहर होने के

कारण प्रारम्भ से ही व्यर्थ हो तो कोई भी आन्तरिक प्रबन्ध के अधीन संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता है।

(10) जब कार्य कम्पनी अधिनियम द्वारा वर्जित हो-यदि कोई व्यक्ति किसी कम्पनी के सा

ऐसा कार्य करने का अनुबन्ध करता है जिसे कम्पनी अधिनियम के अनुसार किया ही नहीं जा सकता है तो अनुबन्ध का पक्षकार इस सिद्धान्त के अधीन संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता है।

 

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