“अधिकारों का प्रत्यायोजन किया जा सकता है किन्तु उत्तरदायित्व का प्रत्यायोजन नहीं किया जा सकता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए तथा इसके सम्बन्ध बताइये।” “Powers can be delegated but responsibilities cannot be delegated.” Explain this statement and state its relation.

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अधिकार अन्तरण या भारार्पण से आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Delegation of Authority)

‘भारार्पण’ का सरल अर्थ है-कार्य-भार किसी अन्य व्यक्ति को सौंपना। वर्तमान युग में व्यवसाय का स्वरूप अत्यन्त विस्तृत एवं जटिल हो गया है तथा एक ही व्यक्ति के लिए समस्त प्रक्रियाओं की देखभाल एवं नियन्त्रण सम्भव नहीं है। इसीलिए अधिकारों के भारार्पण की आवश्यकता महसूस की गई।

भायर्पण में व्यक्ति अपना कार्यभार दूसरे व्यक्ति को सौंपता है। जब किसी कर्मचारी को कार्य करने का दायित्व सौंपते हैं तो उसे आवश्यक अधिकार भी देने पड़ते हैं, इसे ही अधिकार अन्तरण कहते हैं। ‘प्रत्यायोजन’, ‘भारार्पण’ या प्रतिनिधान एक ही आशय रखते हैं।

थियो हैमन (Theo Haimann) के अनुसार, “अधिकार अन्तरण का आशय अपने अधीन काम करने वालों को निश्चित सीमाओं के अन्तर्गत कार्य करने का अधिकार प्रदान करना है।

” एफ. जी. मूरे (F. G. Moore) के अनुसार, “भारार्पण से तात्पर्य है अन्य लोगों को कार्य सौंपना तथा कार्य करने हेतु अधिकार देना।”

चूँकि एक प्रधान कर्मचारी के पास अधिक कार्य होते हैं और वह अपने सभी कार्य स्वयं नहीं कर सकता अतः वह अपने कुछ कार्य करने का अधिकार दूसरों को सौंप देता है, इसे ही अधिकार प्रदान करना कहते हैं। शाब्दिक रूप से अधिकार अन्तरण का अर्थ कुछ कार्यभार दूसरे व्यक्तियों को सौंपना है। व्यावहारिक जीवन में हम देखते हैं कि एक सफल प्रबन्धक अपने विभाग के सभी कार्यों को अपने अधीनस्थ काम करने वाले समस्त कर्मचारियों में चतुरता से बाँट देता है। हम जब किसी कर्मचारी को कार्य करने का उत्तरदायित्व सौंपते हैं तो हमें उसे आवश्यक अधिकार भी देने पड़ते हैं, इसे ही अधिकार अन्तरण कहा जाता है।

अधिकार अन्तरण या भारार्पण के प्रकार  (Types of Delegation of Authority)

भारार्पण के विभिन्न प्रकारों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) सामान्य तथा निश्चित भारार्पण-जब एक अधीनस्थ प्रबन्धक को सभी प्रबन्धकीय कार्य नियोजन, संगठन, निर्देशन व नियन्त्रण करने का अधिकार प्रदान किया जाता है तो यह सामान्य भारार्पण है और जब उसे कुछ विशिष्ट कार्य के लिए अधिकारों का भारार्पण किया जाता है तो इसे निश्चित या विशिष्ट भारार्पण कहते हैं।

(2) लिखित एवं मौखिक भारार्पण-लिखित भारार्पण के अन्तर्गत उच्चाधिकारी द्वारा समस्त अधिकार लिखित रूप में सौंपे जाते हैं, जबकि मौखिक भारार्पण के अन्तर्गत उच्चाधिकारी द्वारा समस्त अधिकार केवल मौखिक रूप में प्रदान किये जाते हैं।

(3) औपचारिक एवं अनौपचारिक भारार्पण-औपचारिक भारार्पण में कार्यभार प्रबन्धकीय वे के अन्दर निर्धारित सीमाओं में सौंपा जाता है। अनौपचारिक भारार्पण के अन्तर्गत कर्मचारीगण उच्च अधिकारियों के आदेशानुसार नही, वर स्वतः प्रेरणा से कार्य करते हैं। निजी संस्थाओं में दोनों प्रकार का अधिकार अतरण किया जाता है जबकि सार्वजनिक संस्थाओं में केवल औपचारिक अधिकार रण किया जाता है।

(4) अन्य वर्गीकरण-भारार्पण के अन्य प्रकार निम्नलिखित है

(1) प्रशासनिक भारार्पण-जब केवल प्रशासकीय कार्यों का ही प्रत्यायोजन किया जाता है तो उसे प्रशासकीय भारार्पण कहते हैं।

(ii) क्रियात्मक भारार्पण-क्रियाओं के आधार पर किया गया भारार्पण, क्रियात्मक भारार्पण है।

(iii) भौगोलिक भारार्पण-जब व्यापार का आकार देश-विदेश तक फैला रहता है तो अधिकार या अन्तर क्षेत्रीय आधार पर किया जाता है।

(iv) तकनीकी भारार्पण-जब विविध प्रकार के तकनीकी कार्यों का भारार्पण किया जाता है तो

इसे तकनीकी प्रत्यायोजन कहते हैं।  (Principal Elements of Delegation of Authority)

भारार्पण संगठन प्रक्रिया

का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा एक अधिकारी अपने अधीनस्थ अधिकारियों के साथ अपने प्रबन्धकीय कार्य में हिस्सा बढ़ाता है। इसके प्रमुख तत्व निम्नलिखित है

(1) कार्यभार सौंपा जाना चूंकि एक प्रबन्धक किसी उपक्रम के सभी कार्यों को स्वयं ही पूरा नहीं कर सकता, अतः उसे अपने कार्य का कुछ भाग अपने अधीनस्थों को सौंपना चाहिए, ताकि निधारित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके। इस प्रकार संस्था का प्रवन्धक यह देखता है कि संस्था में कितनी प्रबन्धकीय क्रियाएँ हैं जिन्हें कि पूरा किया जाना है तथा उनमें से कितनी क्रियाओं को वह स्वयं अपने पास रखेगा तथा कितना कार्य-भार वह अपने अधीनस्थों को सौंप देगा। उदाहरणार्थ-अग्रवाल दाल मिल का रायपुर जिले में प्रधान कार्यालय है तथा इसकी झाँसी जिले में अन्य चार शाखाएँ हैं तो ऐसी दिशा में मुख्य प्रबन्धक झाँसी शहर की प्रधान शाखा का कार्य स्वयं सम्भालेगा तथा अन्य शाखाओं का कार्य वह अपने अधीनस्थों को सौंपेगा।

(2) अधिकार प्रदान करणा-एक व्यावसायिक संस्था में प्रबन्धक अधिकारों की शक्ति द्वारा ही कार्य कराने में सफल हो पाता है। प्रबन्धकीय कार्यों के निष्पादन की कुब्जी या आधारशिला अधिकार ही है। संगठन के उद्देश्यों तथा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये संगठन के अन्तर्गत कार्य करने वालों की गतिविधियों का मार्गदर्शन करने तथा उनसे कार्य लेने हेतु आदेश देने के लिए प्राप्त शक्ति को अधिकार की संज्ञा दी जाती है। उदाहरणार्थ-केमारा बैंक के जनरल मैनेजर को रेलवे स्टेशन रोड, दुर्ग पर स्थित शाखाका प्रबन्धक नियुक्त किया है। ऐसी दशा में इस शाखा के संचालन हेतु उन्हें आवश्यक अधिकार भी (जैसे-लिपिकों के मध्य कार्य का विभाजन, निक्षेप स्वीकार करना तथा उस पर ब्याज देना ऋण देना, ग्राहकों के खाते खोलना आदि। सौंपने होंगे।

(3) उत्तरदायित्व निर्धारित करना-अपने अधीन कर्मचारियों को केवल कार्य सौंपना ही भारार्पण नहीं है, बल्कि यह भी देखना होता है कि कार्य ठीक प्रकार से हो रहा है अथवा नहीं। जो भी कार्य भार लौपा जाता है, उसे नियमित ढंग से पूरा करना ही दायित्व कहलाता है। दायित्व सदैव उच्चतर अधिकारी के प्रति होता है, निम्नतर अधिकारी के प्रति नहीं। उदाहरणार्थ-मि गुप्ता संचालको द्वारा बिलासपुर-रायपुर ट्रांसपोर्ट कम्पनी के जनरल मैनेजर नियुक्त किये जाते हैं और मि गुप्ता चार अन्य विभागीय प्रवन्धक नियुक्त कर लेते हैं। ऐसी दशा में अधीनस्थों का दायित्व विभागीय प्रबंधकों पर होना और विभागीय प्रबन्धकों का दायित्व मि. गुप्ता पर |

अधिकार अन्तरण या भारार्पण के सिद्धान्त (Principles of Delegation of Authority)

(1) उपेक्षित परिणामों को ध्यान में रखते हुए अधिकार अन्तरण करना-हम किसी अधीनस्थ कर्मचारी या अधिकारी से जिस प्रकार के कार्य की आशा करते हैं, उसके लिए उसी प्रकार की उसी सीमा तक जिन अधिकारों की आवश्यकता हो, वह अन्तरित या प्रदान किये जाने चाहिए।

(2) दायित्वों के अनुरूप अधिकार अन्तरित करना-यदि दायित्वों के अनुरूप अधिकारों का अन्तरण नहीं किया जाता तो अधीनस्थ कर्मचारी या अधिकारियों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अतः दायित्व के अनुरूप ही अधीनस्य सहायक को अधिकारों का अन्तरण करना चाहिए।

(3) केवल अधिकार अन्तरित होते हैं, उत्तदायित्व नही संस्था का कोई भी मुख्य प्रबन्धक या अधिकारी अपने कार्यों को पूरा करने के लिए दूसरे अधीनस्थ कर्मचारियों या सहायकों की सहायता ले सकता है। कार्य करने के अपने कुछ अधिकार दूसरों को अन्तरित कर सकता है, लेकिन अधिकार अन्तरण से उसके उत्तरदायित्व में कोई कमी नहीं आती, उसका उत्तरदायित्व ज्यों का त्यों बना रहता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि केवल अधिकार अन्तरित होते हैं, उत्तरदायित्व नहीं।

(4) आदेश की एकता का सिद्धान्त-एक अधीनस्थ कर्मचारी को केवल एक उच्च अधिकारी से आदेश प्राप्त होना चाहिए, अन्यथा वह भ्रम में पड़ जायेगा कि उसे अनेक अधिकारयों के आदेश मिले है और वह किसके आदेश का पालन करे और किसके आदेश का नहीं। दोहरी अधीनता कभी भी नही होनी चाहिए। किसी कार्य विशेष के लिए अधीनस्थ कर्मचारी को केवल एक उच्च अधिकारी के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।

भारार्पण या अधिकार अन्तरण की सीमा निर्धारण करने वाले घटक

भारार्पण की सीमा निर्धारण करने वाले प्रमुख घटक निम्न है

1. संस्था का आकार संस्था का आकार या उपक्रम बड़ा है या छोटा, इस बात का भारार्पण की सीमा पर प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः हम यह देखते हैं कि बड़े उपक्रमों में सभी कार्य एक ही व्यक्ति नहीं कर पाता अतः कुछ कार्यों का भार दूसरों को सौंपना ही पड़ता है।

2. निर्णयों की लागत निर्णयों की लागत का भी भारार्पण की सीमा पर प्रभाव पड़ता है। अगर निर्णय अधिक लागत के हैं तो उच्च अधिकारी स्वयं ही उस कार्य को करेगा।

3. नीतियों की एकरूपता-अनेक बार संस्था की नीतियों में एकरूपता रखनी पड़ती है और ऐसी स्थिति में अधिकारों का भारार्पण कम किया जाता है। यह तथ्य भी सीमा निर्धारण का एक घटक माना जा सकता है।

4. अधिकारों का केन्द्रीकरण-अगर किसी संस्था में शुरू से ही अधिकारों के केन्द्रीकरण पर बहुत अधिक जोर दिया जाता है तो बाद में अधिकारों के भारार्पण में बहुत अधिक कठिनाइयों आती हैं।

5. अधीनस्थों की उपलब्धि-अगर अधीनस्य प्रबन्धक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों तथा भारार्पण में किसी प्रकार की बाधा नहीं आती हो। इसके विपरीत अगर अधीनस्थ उपलब्ध न हों तो भारार्पण किया ही नहीं जा सकता।

6. अधीनस्थों की स्वतंत्रता सम्बन्धी अभिलाषा-अगर किसी उपक्रम के अधीनस्थ कर्मचारियों या प्रवन्धकों में स्वतन्त्रता की अभिलाषा अधिक होगी तो अधिकारों के भारार्पण की मात्रा भी उतनी अधिक रखनी पड़ेगी।

7. उच्च प्रबन्धकों का दृष्टिकोण-अगर संस्था के उच्च प्रबन्धक आधुनिक प्रबन्ध दर्शन को मानने वाले होंगे तो वह अधिकारों के भायर्पण को अधिक प्रोत्साहन देंगे। अगर प्रबन्धक संकुचित विचारधारा वाले होंगे तो वह सभी अधिकार अपने पास रखना पसन्द करेंगे।

8. नियन्त्रण विधियाँ-अगर संस्था में अच्छी एवं प्रभावपूर्ण नियन्त्रण तकनीक अपनाई जा रही हैं तो अधिकारों के भायर्पण को अधिक प्रोत्साहन मिलेगा।

9. विकेन्द्रित कार्य निष्पादन अगर तकनीकी कारणों से उपक्रम के कार्यों का विकेन्द्रीकरण करना जरूरी हो जाये तो अधिकारों के भारार्पण को अपने आप प्रोत्साहन मिलेगा।

10. व्यवसाय का विकास-जो व्यवसाय तीव्र गति से विकास करते हैं, उनमें अपने अधिकारों का भारार्पण बढ़ता जाता है।

भारार्पण में कठिनाइयाँ  (Difficulties in Delgation of Authority)

भारार्पण में प्रमुख कठिनाइयाँ अग्रलिखित हैं

(1) शासन व नियन्त्रण करने की इच्छा कुछ अधिकारी भारार्पण करना इसलिये पसन्द नहीं करते, क्योंकि उनमें शासन एवं नियन्त्रण करने की इच्छा विद्यमान रहती है। ऐसे अधिकारी यह सोचते है कि यदि हम भारार्पण कर देते हैं तो उनकी शासन अथवा नियन्त्रण पर अंकुश लग जायेगा।

(2) समन्वय की समस्या-अधिकार सौंपने की व्यवस्था का क्षेत्र जितना ही अधिक विस्तृत होता है, समन्वय की समस्या उतनी ही जटिल होती है।

(3) अधीनस्थों की अयोग्यता-कभी-कभी भारार्पण करने में यह कठिनाई सामने आ जाती है. कि अधीनस्थ कर्मचारियों में उतनी योग्यता नहीं होती जितनी आवश्यक होती है। अतः यदि अयोग्य कर्मचारियों को कार्य का भारार्पण कर दिया जाता है, तो इससे संस्था का केवल अहित ही नहीं होगा अपितु कार्य भी ठीक ढंग से सम्पादित न हो सकेगा।

(4) अधीनस्थों से भय-कभी-कभी अधिकारीगण अपने अधीनस्थों को भारार्पण इस कारण से भी नहीं करते हैं कि उनके मन में यह डर बैठ जाता है कि ऐसा करने से अधीनस्थ अधिक प्रकाश में आ जायेगा और जब अधीनस्थ को अधिक मान्यता प्राप्त हो जायेगी तो फिर उसे कौन पूछेगा ? हो सकता है कि स्वामी अधीनस्थ को पदोन्नति देकर उसकी छुट्टी कर दे। साथ ही, उसको यह भी भय रहता है कि यदि वह अधिक भारार्पण करेगा तो उसके पास करने के लिए बहुत कम काम बचेगा तथा स्वामी की निगाह में वह एक कामचोर कहलायेगा, इस भय से भी बहुत से अधिकारी भारार्पण करने से कतराते हैं।

(5) विश्वास का अभाव-विश्वास के अभाव के कारण भी बहुत से अधिकारी भारार्पण करने में कठिनाई अनुभव करते हैं। ये यह अनुभव करते हैं कि उनके अधीनस्थ कर्मचारी उस कार्य को करने योग्य नहीं है जिसका कि वे भारार्पण करना चाहते हैं। कभी-कभी उच्च अधिकारियों के मस्तिष्क में यह बात भी उत्पन्न हो जाती है कि जितनी कुशलता से वे स्वयं कार्य कर रहे हैं, उतनी कुशलतापूर्वक उनका अधीनस्थ कार्य नहीं कर सकेगा।

प्रभावी अधिकार अन्तरण की आवश्यक शर्तें  (Essential Conditions of Effective Delegation)

(1) लक्ष्यों की स्पष्ट एवं निश्चित व्याख्या सबसे पहले संस्था के सभी लक्ष्यों की स्पष्ट एवं निश्चित व्याख्या होनी चाहिए तथा अधीनस्थ कर्मचारियों को इनकी जानकारी होनी चाहिए। यदि अधीनस्थ कर्मचारी को उसके कार्य की आवश्यकता और महत्ता बता दी जाये, तो उसके उत्साह में वृद्धि हो जावेगी और वह सौंपे गये कार्य को सहर्ष स्वीकार कर लेगा।

(2) अधिकारों एवं उत्तरदायित्व की स्पष्ट व्याख्या- प्रत्येक अधिकारी को अपने दायित्व तथा अधिकारों के क्षेत्र व सीमा का स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए। उसे यह होना चाहिए कि उसे क्या करना है, वह किसके प्रति उत्तरदायी है तथा उसके प्रति कौन उत्तरदायी है ?

(3) आदेश की एकता के सिद्धान्त का पालन-अधिकार अन्तरण के अन्तर्गत आदेश की एकता के सिद्धान्त का पालन किया जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को दो अधिकारियों के अधीन काम करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए। जब किसी व्यक्ति को अनेक अधिकारियों से आदेश प्राप्त होते हैं तो यह इस भ्रम में पड़ जाता है कि वह किसके आदेश का पालन करें और किसके आदेश का पालन न करें। एक प्रभावी अन्तरण में एक ही उच्च अधिकारी द्वारा किसी अधीनस्थ पदाधिकारी को किसी कार्य को करने का कार्यभार सौंपना चाहिए तथा इस हेतु आवश्यक अधिकार भी सुपुर्द करना चाहिए।

(4) उपयुक्त वातावरण का निर्माण संस्था के उच्च प्रबन्धकों तथा अधीनस्थ अधिकारियों में पारस्परिक सद्भाव, विश्वास होना चाहिए। उनके बीच किसी भी प्रकार की ईर्ष्या या अविश्वास नहीं होना चाहिए। प्रभावी अन्तरण के लिए इसका होना बहुत जरूरी रहता है।

(5) अधीनस्थों को प्रेरणा या अभिप्रेरणा देना-अधीनस्थ कर्मचारी अपना कार्य कुशलतापूर्वक तथा उत्साहपूर्वक करें, इसके लिए उन्हें अभिप्रेरणा दी जानी चाहिए। अभिप्रेरणा वित्तीय रूप में कार्य की सराहना करके, प्रबन्ध में हिस्सा देकर की जा सकती है।

(6) सन्देशवाहन की खुली व्यवस्था उच्च अधिकारी द्वारा अधीनस्थ अधिकारी को अधिकार सौंपे जाने के बाद भी उन दोनों में विचार-विमर्श और परामर्श का मार्ग सदैव खुला रहना चाहिए। अधीनस्थ को इस बात की खुली छूट होनी चाहिए कि वह अपनी कोई भी समस्या अपने अधिकारी के सामने रख सके।

(7) नियन्त्रण अधिकार अन्तरण का आशय यह नहीं कि अधीनस्थ कर्मचारियों को अपने अधिकार एवं उत्तरदायित्व सौंप देने मात्र से किसी बड़े अधिकारी का उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है। समय-समय पर अधीनस्थ कर्मचारियों या अधिकारियों की प्रगति का मूल्यांकन करना चाहिए। इसके लिए नियन्त्रण की उचित व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए।

(8) अधीनस्थों के दैनिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए-कार्यभार के अधिकार का प्रत्यायोजन करने के बाद उच्च प्रबन्ध को अधीनसयों के दैनिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

अधिकार एवं उत्तरदायित्व में सम्बन्ध

अधिकार और उत्तरदायित्व एक ही सिक्के के दो पहलू है। हम इन्हें आपस में अलग नहीं कर सकते। उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए पर्याप्त अधिकार देना बहुत जरूरी होता है। अधिकारों का दुरुपयोग रोकने के लिए उत्तरदायित्वों का निर्धारण करना बहुत जरूरी होता है। अगर अधिकार और उत्तरदायित्वों में उचित समन्वय न हो तो संस्था के पूर्व निर्धारित उद्देश्यों को प्रभावशाली ढंग से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यह दोनों एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।


Meaning and Definition of Delegation of Authority

The simple meaning of ‘Assignment’ is to hand over the work-load to another person. In the present era, the nature of business has become very elaborate and complex and it is not possible for a single person to take care and control of all the processes. That is why the need for entitlement of rights was felt.

In Bhairpan, a person assigns his workload to another person. When an employee is entrusted with the responsibility of doing work, then he has to give necessary rights also, this is called transfer of authority. ‘Delegation’, ‘Assignment’ or Delegation have the same meaning.

According to Theo Haimann, “The meaning of transfer of rights is to give the right to work within certain limits to those working under him.

“According to F. G. Moore, “Delegation means to assign work to other people and to give authority to do work.”

Since a principal employee has more work and cannot do all his work himself, therefore he delegates the right to do some of his work to others, this is called delegating authority. Literally devolution of authority means to assign some workload to other persons. In practical life we ​​see that a successful manager smartly distributes all the work of his department among all the employees working under him. When we entrust the responsibility of doing work to an employee, then we also have to give necessary rights to him, this is called transfer of authority.

Types of Delegation of Authority

The different types of weighting can be explained as follows

(1) General and fixed assignment – When a subordinate manager is given the authority to plan, organize, direct and control all managerial functions, then it is general assignment and when he is entrusted with the authority for some specific work, then This is called fixed or specific weighting.

(2) Written and oral assignment – Under the written assignment, all the rights are handed over by the higher authority in writing, whereas under the oral assignment, all the rights are given only in the oral form by the higher authority.

(3) Formal and Informal Assignment – ​​In formal assignment, the workload is assigned within the prescribed limits within the managerial way. Under informal assignment, the employees do not work according to the orders of the higher officials, but on their own motivation. In private institutions both types of authority are transferred whereas in public institutions only formal authority is transferred.

(4) Other classification-the following are the other types of weighting

(1) Administrative assignment – When only administrative functions are delegated, it is called administrative assignment.

(ii) Functional loading – The loading done on the basis of actions is functional loading.

(iii) Geographical encumbrance – When the size of the trade extends to the country and abroad, then it is done on right or inter-regional basis.

(iv) Technical Laying – When various types of technical works are to be commissioned, then

This is called technical delegation. (Principal Elements of Delegation of Authority)

commissioning organization process

is an important part of. It is a means by which an officer increases the share in his managerial work with his subordinate officers. Its main elements are as follows

(1) Assignment of work Since a manager cannot complete all the tasks of an undertaking on his own, he should entrust some part of his work to his subordinates, so that the set objectives can be achieved. In this way the manager of the organization sees that how many managerial activities are there in the organization which are to be completed and how many of them he will keep with himself and how much workload he will delegate to his subordinates. For example- Agrawal Dal Mill has its head office in Raipur district and it has other four branches in Jhansi district, so in such direction the Chief Manager will himself handle the work of the main branch of Jhansi city and will hand over the work of other branches to his subordinates.

(2) Empowerment – In a business organization, the manager is able to get the work done only by the power of rights. Right is the key or cornerstone of the execution of managerial functions. The power obtained to guide the activities of the people working under the organization and to give orders to take work from them for achieving the objectives and goals of the organization is called authority. For example, the General Manager of Kemara Bank has been appointed as the manager of the branch located at Railway Station Road, Durg. In such a situation, they will also have to entrust the necessary powers for the operation of this branch (eg, division of work among clerks, accepting deposits and giving interest on it, giving loans, opening accounts of customers, etc.).

(3) Determining the responsibility – It is not only the assignment of work to the employees under him, but it is also to see whether the work is being done properly or not. Whatever work load is assigned, it is called responsibility to complete it regularly. The responsibility is always with the higher authority and not the lower one. For example- General of Bilaspur-Raipur Transport Company by Mr. Gupta operators.

Najers are appointed and Mr Gupta appoints four other departmental managers. In such a situation, the responsibility of the subordinates should be on the departmental managers and the responsibility of the departmental managers should be on Mr. on Gupta.

Principles of Delegation of Authority

(1) Transfer of authority keeping in view the neglected results – For the kind of work we expect from a subordinate employee or officer, the same kind of rights which are required to be transferred or granted. needed.

(2) Transfer of rights according to the obligations – If the rights are not transferred according to the obligations, then the subordinate employees or officers have to face many difficulties. Therefore, according to the obligation, the subordinate assistant should transfer the rights.

(3) Only the rights are transferred, not the responsibility, any chief manager or officer of the organization can take the help of other subordinate employees or assistants to complete his work. He can transfer some of his rights to work to others, but the transfer of rights does not reduce his responsibility, his responsibility remains as it is. Thus it can be said that only rights are transferred, not responsibilities.

(4) Principle of unity of command – A subordinate employee should get orders from only one superior officer, otherwise he will get confused that he has got orders from many officers and whose orders he should obey and whose orders should not. There should never be dual subordination. A subordinate employee should be responsible only to a higher authority for a particular task.

Factors Determining the Limitation of Assignment or Transfer of Rights

The following are the major factors determining the limit of levy

1. Size of the organization The size of the organization or whether the undertaking is large or small, has an effect on the extent of the burden. Generally we see that in big undertakings all the work cannot be done by the same person, hence some work has to be handed over to others.

2. Cost of decisions The cost of decisions also has an effect on the extent of the assignment. If the decisions are of high cost, the higher authority will do the work himself.

3. Uniformity of Policies- Many times there has to be uniformity in the policies of the organization and in such a situation the burden of rights is reduced. This fact can also be considered a component of boundary determination.

4. Centralization of Rights- If too much emphasis is placed on the centralization of rights in an organization from the very beginning, then later there are many difficulties in the assignment of rights.

5. Achievement of subordinates – If subordinate managers are available in sufficient quantity and there is no obstacle in the assignment. On the contrary, if the subordinates are not available, then the assignment cannot be done.

6. Desire related to independence of subordinates – If the desire for independence is more among the subordinate employees or managers of an enterprise, then the amount of imposition of rights will also have to be kept more.

7. Approach of top managers- If the top managers of the organization are to follow the modern management philosophy, then they will give more encouragement to the delegation of authority. If the manager is narrow minded, he would like to keep all the rights with himself.

8. Control Methods- If good and effective control techniques are being adopted in the organization, then the devolution of rights will be encouraged more.

9. Decentralized work execution If due to technical reasons it becomes necessary to decentralize the functions of the enterprise, then the devolution of powers will automatically be encouraged.

10. Development of Business- Businesses which develop at a rapid pace, the burden of their rights increases in them.

Difficulties in Delegation of Authority

Following are the major difficulties in loading

(1) Desire to govern and control Some officers do not like to delegate because they have the desire to govern and control. Such officers think that if we surrender, then their governance or control will be curtailed.

(2) Problem of co-ordination: The more extensive the scope of the system of delegating authority, the more complex is the problem of coordination.

(3) Incompetence of subordinates – Sometimes this difficulty comes to the fore in the burden of responsibility. That the subordinate employees do not have as much qualification as is required. Therefore, if the work is handed over to the unqualified employees, then this will not only harm the organization, but the work will also not be executed properly.

(4) Fear of subordinates – Sometimes the officers do not entrust their subordinates even because there is a fear in their mind that by doing this the subordinate will come in more light and when the subordinate will get more recognition. Then who will ask him? It is possible that the master may give promotion to the subordinate and leave him. At the same time, he is also afraid that if he dedicates more, then he will be left with little work to do and he will be called a doodle in the eyes of the master, because of this fear many officials shy away from the burden.

(5) Lack of trust – Due to lack of trust, many officers find it difficult to surrender. They feel that the employees subordinate to them are not capable of performing the work which they are entrusted with.

Don’t want Sometimes it also arises in the mind of the higher officials that their subordinate will not be able to do the work as efficiently as they are working themselves.

Essential Conditions of Effective Delegation

(1) Clear and definite explanation of goals First of all, there should be a clear and definite explanation of all the goals of the organization and subordinate employees should be aware of them. If the subordinate employee is told the need and importance of his work, then his enthusiasm will increase and he will happily accept the assigned work.

(2) Clear Explanation of Rights and Responsibilities – Every officer should have a clear knowledge of the scope and extent of his responsibilities and rights. He should know what he has to do, to whom is he responsible and who is responsible to him?

(3) The principle of unity of command should be followed – The principle of unity of command should be followed in the transfer of rights. No person should be asked to work under two officers. When a person receives orders from many officers, he gets confused as to whose orders he should obey and whose orders he should not obey. In an effective transfer, a subordinate officer should be entrusted with the task of doing some work by the same superior officer and necessary authority should also be delegated for this.

(4) Creation of suitable environment There should be mutual goodwill, trust between the top managers and subordinate officers of the organization. There should be no jealousy or mistrust between them. It is very important for effective transfer.

(5) To give motivation or motivation to subordinates- The subordinate employees should be motivated to do their work efficiently and enthusiastically. Motivation can be done by appreciating the work in financial terms, by sharing in the management.

(6) Open system of communication Even after the superior officer has delegated authority to the subordinate officer, the path of discussion and consultation should always be open between them. The subordinate should have a free hand that he can put any of his problems in front of his officer.

(7) Transfer of control does not mean that the responsibility of a superior officer ends just by handing over his rights and responsibilities to subordinate employees. The progress of subordinate employees or officers should be appraised from time to time. For this proper system of control should be established.

(8) There should not be interference in the daily work of subordinates – After delegating the authority of workload, the higher management should not interfere in the daily work of subordinates.

relationship between rights and responsibilities

Rights and Responsibilities are two sides of the same coin. We cannot separate them from each other. It is very important to give adequate authority to discharge the responsibilities. Determining responsibilities is very important to prevent abuse of rights. If there is no proper coordination between rights and responsibilities, then the pre-determined objectives of the organization cannot be achieved effectively. These two are closely related to each other.

3 COMMENTS

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