अधिकार से क्या आशय है ? अधिकार के प्रकारों, खोतों एवं सीमाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए। What is meant by rights? Briefly describe the types, disadvantages and limitations of rights.

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अधिकार का आशय एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Authority)

प्रबन्धकीय कार्यों का निष्पादन करने के लिए प्रबन्धक को अधिकारों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि इसके आधार पर ही वह अपने अधीनस्यों को कार्य का निष्पादन करने हेतु आवश्यक आदेश देता है। अधिकार से आशय विशिष्ट स्वत्व (Rights), शक्ति अथवा अनुमति से है अर्थात् उपक्रम के लिए कार्य करने का अधिकार, उपक्रम की ओर से बोलने का अधिकार, अधीनस्थों को कार्य कराने के सम्बन्ध में आदेश देने का अधिकार, गलत कार्यों के लिए दण्ड देने का अधिकार, उपक्रम की सम्पत्ति का उपयोग करने का अधिकार अथवा उपक्रम का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार आदि। ये अधिकार उपक्रम के अध्यक्ष के पास होते हैं जिन्हें यह अधीनस्थ प्रबन्धकों को उपक्रम द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रदान करता है। परिणामस्वरूप एक प्रबन्धक को यह अधिकार उपक्रम के अध्यक्ष से प्राप्त होते हैं। यदि अधिकार न हो तो वह प्रबन्धक ही नहीं है। अतएव अधिकार से आशय किसी व्यक्ति को प्राप्त उस वैधानिक शक्ति से है जिसके आधार पर वह अधीनस्थों को कार्य के निष्पादन के सम्बन्ध में आदेश देता है तथा उनसे कार्य लेता है।

फ्रेंकलिन मूरे (Franklin G. Moore) अनुसार, “अधिकार तय करने का स्वत्व है और शक्ति निर्णयों का पालन करने को बाध्य करती है।”

कूल्ट्ज तथा ओ’डोनेल (Koontz and ODonnel) के अनुसार, “अधिकार दूसरों को आदेश देने की शक्ति है अथवा उपक्रम या विभागीय लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु अधिकार प्राप्तकर्ता के निर्देशानुसार कार्य करने अथवा न करने के लिए आदेश देने की शक्ति है। ”

जॉर्ज आर टेरी (George) R. Terry) के अनुसार, “सत्ता वह शक्ति है जो अन्य व्यक्तियों को के पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उपयुक्त समझे जाने वाले कार्यों को करने के लिए बाध्य करती है

इस प्रकार अधिकार दूसरों के आदेश देने की शक्ति है। यह उपक्रम अथवा विभागीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए शक्ति प्राप्तकर्ता के निर्देशानुसार कार्य करने अथवा न करने का आदेश है।

अधिकार की विशेषताएँ या तत्व  (Characteristics or Elements of Authority)

अधिकार की प्रमुख विशेषताएँ या तत्व निम्न है

(1) वैधानिक शक्ति का उपयोग अधिकार के अन्तर्गत वैधानिक शक्ति का होना गर्भित है। शिना शक्ति के अधिकार का कोई महत्व ही नहीं रहता। इस सम्बन्ध में यह भी स्मरणीय है कि कों को अपनी अधिकार शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। अधीनस्थों को केवल शक्ति का अनुमान होना चाहिए, फिर वे स्वतः आदेशों का पालन करेंगे। शक्ति का दुरुपयोग करने से भय के वातावरण का निर्माण हो सकता है तथा औद्योगिक सम्बन्ध बिगड़ सकते हैं।

(2) शक्ति के परिणामस्वरूप निष्पादन अधिकार की दूसरी उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें शक्ति के परिणामस्वरूप आदेशों का निष्पादन शामिल होता है।

(3) प्रभावशाली व्यक्तितत्व-उपक्रम में प्रबन्धक का निजी व्यक्तित्व भी अत्यन्त प्रभावशाली होना चाहिए। अधीनस्थों का स्वेच्छा से सहयोग उसी दशा में प्राप्त हो सकता है जबकि वे अपने अधिकारी के व्यक्तित्व से प्रभावित हो। अतः अधिकारों के साथ-साथ प्रबन्धक को अपने व्यक्तित्व का विकास करना चाहिए तथा कुशल नेतृत्व प्रदान करना चाहिए।

(4) अपेक्षाएँ अधिकार सत्ता अधीनस्थों को काम करने या सौंपने तथा उनसे सन्तोषप्रद निष्पादन रखने की अपेक्षा का अधिकार है।

(5) स्रोत-अधिकर सत्ता का कानूनी स्रोत सम्पत्ति के स्वामित्वाधिकारों में निहित होता है।

(6) अधिकार सत्ता का क्षेत्र प्रबन्धकीय सोपान तन्त्र में जितना ऊँचे जायेंगे, उतने ही बन्धन कम होंगे तथा अधिकार क्षेत्र विस्तृत होगा तथा जितने नीचे जायेंगे अधिकार पर उतने ही अधिक बन्धन मिलेंगे।

(7) अधिकार सत्ता का भारार्पण-अधिकार की एक विशेषता यह है कि उनका आवश्यकतानुसार भायर्पण भी किया जा सकता है। अधिकारों के उचित विकेन्द्रीकरण से प्रबन्धकीय कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

(8) अधीनस्थो को प्रभावित करना-अधिकार का एक महत्वपूर्ण तत्व यह है कि प्रबन्धक में अपने अधीनस्थों को प्रभावित करने की सामर्थ्य होनी चाहिए। अधिकारों का प्रयोग उसी दशा में प्रभावशाली होगा जबकि अधीनस्थ अपने अधिकारों से प्रभावित भी हों किन्तु प्रभाव को स्वेच्छा से स्वीकार किया जाना चाहिए। साथ ही अपने अधीनस्थों से समय-समय पर परामर्श लेते रहना चाहिए जिससे उन्हें प्रभावित किया जा सके।

अधिकार या सत्ता के प्रकार  (Tyjpes of Authority)

अधिकार निम्न तीन प्रकार के होते हैं

( 1 ) रेखा अधिकार सत्ता (Line Authority)- यह समस्त शीर्ष अधिकारियों तथा उनके अधीनस्थों मध्य विद्यमान रहती है। इसका प्रमुख कार्य चिन्तन करना तथा निर्णय लेना है।

(2) स्टाफ अधिकार सत्ता (Staff Authority)- यह वह अधिकार सत्ता है जो परामर्श देने, सहायता करने तथा अन्य विभागों को सेवायें प्रदान करने के लिए संगठन में विद्यमान रहती है।

(3) क्रियात्मक अधिकार सत्ता | Functional Authority)-इसे सीमित अधिकार सत्ता भी कहते हैं क्योंकि इसका क्षेत्र क्रिया विशेष के सम्बन्ध में निर्णय लेने तथा आदेश देने तक ही सीमित होता है।

अधिकार के स्रोत या सिद्धान्त (Sources or Principles of Authority)

अधिकार के महत्वपूर्ण स्रोतों या सिद्धान्तों का विवेचन निम्न प्रकार किया जा सकता है

(1) औपचारिक अधिकार सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारी को अधिकारों की प्राप्ति अपने से ऊँचे अधिकारी से होती है; जैसे-रोकड़िये को सहायक कोषाध्यक्ष से, सहायक कोषाध्यक्ष को कोषाध्यक्ष से, कोषाध्यक्ष को उच्च प्रबन्ध से अधिकारों की प्राप्ति होती है।

(2) स्वीकृति का सिद्धान्त- यह सिद्धान्त अधिकार की स्वीकृति पर आधारित है अर्थात् अधिकारों का स्त्रोत स्वीकृति में है। अतएव इस सिद्धान्त के अनुसार किसी प्रबन्धक के अधिकार का अस्तित्व तभी होता है, जब तक कि उसके अधीनस्थ कर्मचारी उक्त अधिकार को स्वीकार करें। यदि प्रबन्धक के अधीनस्थ कर्मचारी उसके अधिकार को स्वीकार नहीं करते हैं तो ऐसे अधिकार का कोई महत्व नहीं रहता अर्थात् वे न के बराबर हो जाते हैं। अधीनस्थ कर्मचारी उसी दशा में अपने अधिकारी के अधिकारों को स्वीकार करते हैं जब तक कि उनकी दृष्टि में, अधिकारों को स्वीकार करने से होने वाला लाभ, उन्हें अस्वीकार करने से होने वाली हानि की अपेक्षा अधिक होता है।

(3) क्षमता सिद्धान्त अधिकार का एक स्रोत तकनीकी क्षमता रूपी व्यक्तिगत गुण भी हैं। कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जिन्हें यद्यपि औपचारिक रूप से कुछ भी अधिकार प्राप्त नहीं होते किन्तु उन्हें उनके निजी प्रभावी व्यक्तित्व तथा तकनीकी योग्यता के कारण विशेष मान्यता प्रदान की जाती है। इस श्रेणी में विद्वान् अर्थशास्त्री, कुशल इंजीनियर आदि आते हैं जोकि दी गई समस्या का सरल समाधान प्रस्तुत करके लोगों के ऊपर प्रभुत्व स्थापित करते हैं।

अधिकार की सीमाएँ  (Limits of Authority)

अधिकार की प्रमुख सीमाओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) जीव विज्ञान सम्बन्धी सीमाएँ किसी भी अधिकारी को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को ऐसा आदेश नहीं देना चाहिए जिसे पूरा करना उसके लिए जीवविज्ञान की दृष्टि से असम्भव हो। इसका कारण यह है कि जीवविज्ञान की दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता सीमित होती है। अतएव यदि उसकी क्षमता से परे कार्य उसे सौंपा जायेगा तो वह उसको कदापि नहीं कर पायेगा; जैसे-एक अधिकारी अपने अधीनस्थ को खड़ी दीवार के ऊपर की ओर चलने का आदेश नहीं दे सकता।

(2) आर्थिक सीमाएँ-इसके किसी वस्तु के उत्पादकों एवं विक्रेताओं के मध्य होने वाली पारस्परिक प्रतियोगिता, बाजार की दशाओं के अनुसार मूल्य का निर्धारण, आदि बातें आती हैं, जैसे-माँग पूर्ति की शक्तियों के कारण यदि किसी वस्तु का मूल्य बाजार में ₹10 है तो भी प्रबन्धक अपने अधीनस्थ कर्मचारी को उस वस्तु को 5 रुपये में लाने का आदेश नहीं दे सकता।

(3) प्राकृतिक सीमाएँ-भौगोलिक स्थिति, जलवायु एवं प्राकृतिक नियमों से सम्बन्धित सीमाएँ प्राकृतिक सीमा के अन्तर्गत आती है; जैसे-एक प्रबन्धक अपने धीनस्थ कर्मचारी को पीतल को सोने में परिवर्तित करने का आदेश नहीं दे सकता क्योंकि ऐसा आदेश प्राकृतिक सीमाओं के प्रतिकूल है।

(4) तकनीकी सीमाएँ-वे सीमाएँ तकनीकी ज्ञान के विकास से सम्बन्ध रखती है एवं कोई भी प्रबन्धक इन तकनीकी सीमाओं के बाहर कार्य करने का आदेश किसी अधीनस्थ कर्मचारी को नहीं दे सकता, जैसे-दिना अन्थि के रोटी पकाना।

(5) व्यक्ति समूहों की प्रतिक्रियाएँ किसी भी अधिकार का प्रयोग करते समय उसके प्रति अन्य व्यक्तियाँ तथा व्यक्ति समूहों की प्रतिक्रियाओं का भी ध्यान रखना आवश्यक है। इसका काल यह है कि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की प्रतिक्रियाओं में प्रायः भिन्नता होती है। अतः सभी प्रकार की प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखने के बाद ही अधिकार का उपयोग किया जाना चाहिए।

उत्तरदायित्व का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definition of Responsibility)

सरल शब्दों में, उत्तरदायित्व से आशय कार्य अथवा कर्त्तव्य पालन से है। कुण्टज तथा ओ डोबेल के शब्दों में, “प्रवन्ध साहित्य में उत्तरदायित्व सबसे अधिक भान्तिजनक शब्द है। प्रायः यह सुना और पढ़ा जाता है कि उत्तरदायित्वों का भारार्पण किया गया, अमुक व्यक्ति को उत्तरदायी व्हराया गया।” उत्तरदायित्व की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्न है

जार्ज आर. टेरी (George R Terry) के अनुसार, “उत्तरदायित्व किसी कर्मचारी का आवन्धन है, जिससे वह सौंपी गई क्रियाओं को अपनी श्रेष्ठतम योग्यता से पूरी करे।”

कूट तथा ओडोनेल (Koontz and ODennel) के अनुसार, “उत्तरदायित्व किसी कर्मचारी का आवन्धन है, जिसे कोई कार्य निष्पादन के लिये सौंपा गया है।”

उत्तरदायित्व के प्रकार (Kinds of Responsibility)

उत्तरदायित्व निम्न दो प्रकार का हो सकता है

(1) सतत उत्तरदायित्व (Continuous Responsibility)-जब किसी उपक्रम की -संरचना के अन्तर्गत किसी निरन्तर चलते रहने वाले कार्य का भार सँभालने के लिए कोई क्ति किसी अन्य व्यक्ति के अधीन नियुक्त किया जाता है तो उसका उत्तरदायित्व सतत रूप में होता है। उदाहरण के लिए, किसी उपक्रम के प्रमुख प्रबन्धक तथा विक्रय-प्रबन्धक के मध्य में सम्बन्ध हत उत्तरदायित्व के होते हैं।

(2) विशेष उत्तरदायित्व (Specific Responsibility)-जब किसी व्यक्ति को किसी विशेष करने के लिए अन्य व्यक्ति के नीचे नियुक्त किया जाता है तो उसका उत्तरदायित्व विशेष स्वरूप का होता है। ऐसे उत्तरदायित्व को विशेष उत्तरदायित्व कहते हैं। उदाहरण के लिए, जब किसी प्रबन्धक के नीचे किसी विशेष कार्य को करने के लिए तकनीकी विशेषज्ञ की नियुक्ति की जाती है तो ऐसे की विशेषज्ञ का उत्तरदायित्व विशेष उत्तरदायित्व कहलायेगा।

अधिकार एवं उत्तरदायित्व में अन्तर (Difference between Authority and Responsibility)

अधिकार एवं उत्तदायित्व में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित है

1. अधिकार वह शक्ति है जिसके द्वारा पूर्व निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उचित कार्य करने हेतु दूसरों को बाध्य किया जाता है, जबकि उत्तरदायित्व सौंपे गये कार्य को अपनी श्रेष्ठतम योग्यता से करने का अधीनस्थ का बन्धन है।

2. अधिकारों का प्रत्यायोजन किया जा सकता है लेकिन उत्तरदायित्वों का प्रत्यायोजन नहीं किया जा सकता है।

3. अधिकार सदैव उच्च अधिकारी से सम्बन्धित होते हैं जबकि उत्तरदायित्व अधीनस्थ व्यक्तियों से सम्बन्धित होते हैं।

4. अधिकारों का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होता है जबकि उत्तरदायित्व का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर होता है।

5. अधिकार अधीनस्वों से कार्य करवाने की शक्ति है जबकि उत्तरदायित्व सौंपे गये कार्य को श्रेष्ठता से पूरा करने का वैधानिक अथवा नैतिक बन्धन है।

क्या उत्तरदायित्व का भारार्पण किया जा सकता है ? (Can Responsibility be Delegated ?)

प्रत्यायोजन से आशय एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को कार्य सौंपे जाने से है। जब एक व्यक्ति के पास कार्यभार अधिक होता है तो वह दूसरे व्यक्ति को कार्य सौंप देता है। इस मूलभूत प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि कोई भी अधिकारी अपने उत्तरदायित्व पूरा करने के लिए अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की सहायता ले सकता है तथा अपने अधिकारों का कुछ भाग सौंप सकता है किन्तु उसका उत्तरदायित्व ज्यों का त्यों बना रहता है, उसमें किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं होती। उत्तरदायित्व कार्य निष्पादन के हेतु एक आवन्धन (Obligation) है जो कि एक अधिकारी का होता है और किसी भी अधिकारी को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह उसे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को सौंपकर अपने उत्तरदायित्व से बच निकले। उदाहरण के लिए, किसी उपक्रम का प्रबन्ध प्रबन्धक, संचालक मण्डल द्वारा नियुक्त किया जाता है। यह अधिकारी उक्त उपक्रम के समस्त कार्य व्यवहारों तथा आचरणों के लिए अपने नीचे कार्य करने वाले समस्त अधिकारयों की सहायता लेता है तथा उन्हें कार्य निष्पादन हेतु आवश्यक अधिकार भी प्रदान करता है। यदि इन अधीनस्थ अधिकारियों के कर्त्तव्य-भंग अथवा दूषित आचरणों के कारण उपक्रम को कोई हानि होती है तो संचालक मण्डल के प्रति प्रबन्धक-संचालक ही उत्तरदायी कराया जायेगा, भले ही व्यक्तिगत रूप से उपर्युक्त बातों से उसका कुछ भी सम्बन्ध क्यों न रहा हो।


Meaning and Definitions of Authority

In order to perform managerial functions, the manager needs rights because on the basis of this, he gives necessary orders to his subordinates to execute the work. Right means specific rights, power or permission i.e. the right to act for the undertaking, the right to speak on behalf of the undertaking, the right to order subordinates to get the work done, to punish for wrongdoings. Right, the right to use the property of the undertaking or the right to represent the undertaking, etc. These powers are vested with the head of the enterprise, to whom it confers on subordinate managers to achieve the goals set by the enterprise. As a result, a manager gets these rights from the head of the undertaking. If he does not have authority, he is not a manager. Therefore, authority means that legal power received by a person, on the basis of which he gives orders to subordinates in relation to the execution of work and takes work from them.

According to Franklin G. Moore, “Right is the authority to decide and power compels decisions to be followed.”

According to Koontz and O’Donnel, “Authority is the power to order others to do or not to act as directed by the authority for the achievement of undertaking or departmental goals.”

According to George R. Terry, “Power is the power that compels other persons to do what they deem fit for the attainment of predetermined objectives of

Thus authority is the power to give orders to others. It is an order to do or not to act according to the instructions of the recipient of power to achieve the goals of the undertaking or department.

Characteristics or Elements of Authority

Following are the main features or elements of authority

(1) The exercise of legal power implies the existence of legal power under the right. The right of shina shakti has no significance. It is also to be remembered in this regard that one should not abuse his authority. The subordinates should only have an estimation of power, then they will automatically follow orders. Misuse of power can create an atmosphere of fear and worsen industrial relations.

(2) Execution in consequence of power Another notable feature of the right is that it involves the execution of orders in consequence of the power.

(3) Influential personality- The personal personality of the manager should also be very influential in the undertaking. Voluntary cooperation of subordinates can be obtained only if they are influenced by the personality of their officer. Therefore, along with the rights, the manager should develop his personality and provide efficient leadership.

(4) Requirements Authority Power is the right to assign or assign work to subordinates and expect them to have satisfactory performance.

(5) Source-rights The legal source of power lies in the ownership rights of the property.

(6) The higher the area of ​​authority, the higher the level of authority in the managerial hierarchy, the less will be the constraints and the jurisdiction will be wide, and the lower you go, the more will be the restrictions on authority.

(7) Assignment of authority – One of the features of rights is that they can also be surrendered as per the requirement. Proper decentralization of powers leads to an increase in managerial efficiency.

(8) Influencing subordinates – An important element of authority is that the manager should have the ability to influence his subordinates. The exercise of rights will be effective only if subordinates are affected by their rights but the effect should be accepted voluntarily. Also, consult your subordinates from time to time so that they can be influenced.

Types of Authority

There are three types of rights

(1) Line Authority – It exists between all the top officers and their subordinates. Its main function is to think and make decisions.

(2) Staff Authority – It is the authority that exists in the organization to advise, assist and provide services to other departments.

(3) functional authority power. Functional Authority) – It is also called limited authority because its area is limited to making decisions and giving orders regarding a particular action.

Sources or Principles of Authority

The important sources or principles of authority can be discussed as follows:

(1) Formal authority principle – According to this principle, the officer gets the rights from an officer higher than himself; For example, the cashier gets the rights from the assistant treasurer, the assistant treasurer from the treasurer, the treasurer from the higher management.

(2) The principle of acceptance – This principle is based on the acceptance of rights, that is, the source of rights is in acceptance. Therefore, according to this principle, the authority of a manager exists only as long as the employees subordinate to him accept the said authority. If the employees subordinate to the manager do not accept his authority

If you do, then such rights have no importance, that is, they become equal to them. Subordinate employees accept the rights of their superior only if, in their view, the benefit of accepting the rights is greater than the loss caused by denial of them.

(3) Competence Theory A source of authority is also the personal qualities of technical ability. There are also some people who, although they do not get any rights formally, but they are given special recognition due to their personal effective personality and technical ability. In this category there are learned economists, skilled engineers, etc., who establish dominance over the people by presenting simple solutions to the given problem.

Limits of Authority

The major limitations of authority can be explained as follows:

(1) Limitations related to Biology: No officer should give such order to his subordinate employees which is biologically impossible for him to fulfill. The reason for this is that from the point of view of biology each person’s capacity is limited. Therefore, if work is assigned to him beyond his capacity, he will never be able to do it; For example, an officer cannot order his subordinate to walk up a standing wall.

(2) Economic Limitations- There are mutual competition between the producers and sellers of a commodity, determination of price according to market conditions, etc., e.g., due to the forces of supply and demand, if the price of a commodity in the market is Rs. 10, even then the manager cannot order his subordinate employee to bring that item for Rs.5.

(3) Natural boundaries – The boundaries related to geographical conditions, climate and natural laws come under natural limits; For example, a manager cannot order his subordinate employee to convert brass into gold because such an order is against natural limits.

(4) Technical limitations-those limits are related to the development of technical knowledge and no manager can give orders to a subordinate employee to work outside these technical limits, such as baking bread of the day.

(5) Reactions of individual groups While exercising any right, it is necessary to take into account the reactions of other individuals and groups of individuals towards it. The reason for this is that there is often a difference in the reactions of different people. Therefore authority should be exercised only after taking into account all kinds of reactions.

Meaning and Definition of Responsibility

In simple words, responsibility refers to the performance of work or duty. In the words of Kuntz and O’Dobel, “Responsibility is the most different word in the literary literature. It is often heard and read that responsibilities are entrusted, some person is held responsible.” Some of the main definitions of responsibility are as follows:

George R. According to George R Terry, “Responsibility is the allocation of an employee to perform the assigned tasks to the best of his ability.”

According to Koontz and O’Donnell, “Responsibility is the allocation of an employee to whom a task is entrusted to perform.”

Kinds of Responsibility

Responsibility can be of two types

(1) Continuous Responsibility – When a person is appointed under another person to take care of the ongoing work under the structure of an undertaking, then his responsibility is in a continuous form. For example, the relationship between the head manager of an enterprise and the sales manager is one of responsibility.

(2) Special Responsibility – When a person is appointed below another person to do a particular job, then his responsibility is of a special nature. Such responsibility is called special responsibility. For example, when a technical specialist is appointed under a manager to perform a particular task, then the responsibility of such specialist will be called special responsibility.

Difference between Authority and Responsibility

Following are the major differences between rights and responsibilities

1. Authority is the power by which others are compelled to do proper work for the attainment of predetermined objectives, whereas responsibility is the obligation of the subordinate to do the assigned work to the best of his ability.

2. Rights can be delegated but responsibilities cannot be delegated.

3. Rights always belong to the higher authority whereas responsibilities are related to subordinate persons.

4. The flow of rights is from top to bottom whereas the flow of responsibility is from bottom to top.

5. Right is the power to get the work done by subordinates whereas responsibility is the legal or moral obligation to perform the assigned task with excellence.

Can responsibility be delegated? (Can Responsibility be Delegated ?)

Delegation refers to the assignment of work by one person to another. When one person has more workload, he delegates the work to another person. this basicIn answer to the question, it can be said that any officer can take the help of his subordinate employees to fulfill his responsibilities and can entrust some part of his rights, but his responsibility remains as it is, in that any type of There is no shortage. Responsibility is an obligation for the performance of work which belongs to an officer and no officer can be allowed to evade his responsibility by handing it over to his subordinate employees. For example, the managing manager of an undertaking is appointed by the board of directors. This officer takes the help of all the officers working under him for all the work practices and conduct of the said undertaking and also gives them the necessary rights for execution of the work. If there is any loss to the undertaking due to breach of duty or corrupt practices of these subordinate officers, then the manager-operator will be made liable to the Board of Directors, even if he has personally had any relation with the above mentioned things.

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