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एक कम्पनी अपने सीमा नियम की शर्तों को उन दशाओं, उस रीति तथा उस सीमा के अतिरिक्त परिवर्तित नहीं कर सकती है, जिनकी अधिनियम स्पष्ट व्यवस्था की गयी है। स्पष्ट कीजिए।

पार्षद सीमानियम प्रथम महत्वपूर्ण वैधानिक प्रपत्र है जो समामेलन के समय रजिस्ट्रार ऑफ कम्पनीज के यहाँ प्रस्तुत किया जाता है। पार्षद सीमानियम कम्पनी की आधारशिला है, क्योंकि कम्पनी का जन्म एवं अस्तित्व इसी पर आधारित है। इसका उद्देश्य कम्पनी के सदस्यों, लेनदारों एवं व्यक्तियों को कम्पनी के कार्य क्षेत्र की सीमा बताना है। इसमें कम्पनी का नाम प्रधान कार्यालय, पूँजी की मात्रा,एवं कार्य क्षेत्र का वित किसी भी प्रकार का कोई कार्य नहीं कर सकती इस अधिनियम के के ऐसे है जो किसी विधवा (1) 2013 मारा 2(30) के अनुसार, ‘सीमानियम से आशय

(2) मोर्ज पासीमानकों का महत्वपूर्ण और अप परिस्थितियों की है। कम्पनियों का समामेलन केवल उनही उद्देश्यों के लिए ((3) अनुसार पार्षद सीमानियम कम्पनी का चार्टर है, जो अधिकारों एवं सीमाओं को परिभाषित करता है।”

रूप से समय पर परिवर्तित किया गया है।”

(4) लाई मिलन के अनुसार, “पार्थव सीमानियम का उद्देश्य अंशधारियों, लेनदारों

सब व्यक्तियों को जो कम्पनी के साथ व्यवहार करते हैं. इस योग्य बनाना है कि वे जान कम्पनी का सम्पूर्ण कार्यक्रम क्या है।” (5) लॉर्ड क्रास के अनुसार, पार्षद सीमानियम एक कम्पनी का चार्टर

होता है और अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित कम्पनी के अधिकारों की सीमाओं को परिभाषित करता है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि पार्षद सीमानियम कम्पनी का एक महत्वपूर्ण, आधारभूत अपरिवर्तनीय प्रलेख है जो कम्पनी के उद्देश्यों को परिभाषित करता है तथा इसके कार्यक्षेत्र अधिकारों की सीमाएँ

निर्धारित करता है।” पार्षद सीमानियम के लक्षण अथवा विशेषताएँ

(Characteristics of Memorandum of Association)

पार्षद सीमानियम की महत्वपूर्ण विशेषताओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया

(1) पार्षद सीमानियम कम्पनी का एक अनिवार्य एवं मौलिक प्रलेख होता है।

(2) पार्षद सीमानियम में कम्पनी का नाम प्रधान कार्यालय, उद्देश्य सदस्यों का दायित्व त अंश पूँजी का उल्लेख रहता है। (3) यह कम्पनी के अधिकार की सीमाओं को निर्धारित करता है। पार्षद सीमानियम अधिकार क्षेत्र के बाहर किये गये कार्य व्यर्थ होते हैं।

(4) पार्षद सीमानियम कम्पनी का सामान्यतः एक अपरिवर्तनशील प्रलेख सीमित अवस्थाओं में ही परिवर्तित किया जा सकता है। (5) यह एक सार्वजनिक प्रलेख होता है अतएव बाहरी व्यक्ति से यह आशा की जाती है कि होता है जिसे

उसने कम्पनी से व्यवहार करने से पूर्व पार्षद सीमानियम का अध्ययन कर लिया होगा। (6) यह कम्पनी एवं इसके सदस्यों के बीच अनुबन्ध का निर्माण करता है। (7) इस पर कम्पनी का निर्माण करने वाले व्यक्तियों के हस्ताक्षर होते हैं।

पार्षद सीमानियम का निर्माण (Framing Memorandum of Association)

पार्षद सीमानियम बनाते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए 1. पार्षद सीमानियम निर्धारित प्रारूप में होना चाहिए- प्रत्येक प्रकार की कम्पनी के लिए पार्षद सीमानियम का प्रारूप कम्पनी अधिनियम की अनुसूची-I की तालिका A, B, C, D तथा E में दिया गया है, जो निम्नानुसार है

तालिका ‘A’ का प्रारूप-अंशों द्वारा सीमित कम्पनी के लिए।

तालिका ‘B’ का प्रारूप-गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी जिसमें अंश पूँजी नहीं है, के लिए। तालिका ‘C’ का प्रारूप-गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी जिसमें अंश पूँजी होती है, के लिए। तालिका ‘D’ का प्रारूप-असीमित कम्पनी जिसमें अंश पूँजी नहीं है, के लिए।

तालिका ‘ का प्रारूप-असीमित कम्पनी जिसमें अंश पूँजी है, के लिए।

प्रत्येक कम्पनी को अपने पर लागू होने वाले प्रारूप के अनुरूप ही अपना सीमानियम तैयार चाहिए।

2. पार्षद सीमानियम छपा हुआ (Printed) होना चाहिए। यह ‘फोटो कम्पोज’, ‘ऑफसेट’ या

लेजर प्रिन्टेड’ भी हो सकता है। किन्तु फोटो कॉपी (Xerox) किया हुआ नहीं हो सकता है। “3. पार्षद सीमानियम अनुच्छेदों में बँध हुआ तथा उन पर कमानुसार नम्बर लगे हुए होने चाहिए। 4. पार्षद सीमानियम पर अभिदाताओं (subscribers) के नाम, पते, विवरण, व्यवसाय आदि लिखे होने चाहिए। यदि अभिदाता कोई निगम निकाय है तो उसका विवरण केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रकार का होना चाहिये। इस पर अभिदाताओं के हस्ताक्षर भी होने चाहिए तथा प्रत्येक के हस्ताक्षरों को साक्षी द्वारा प्रमाणित करवाना चाहिए।

5. इस पर नियमानुसार स्टाम्प भी लगाने पड़ते हैं। पार्षद सीमानियम की प्रति की उपलब्धता- कभी-कभी कम्पनी के सदस्य कम्पनी को सीमानियम

की प्रति देने भेजने के लिए आवेदन करते हैं। ऐसी दशा में कम्पनी को उस सदस्य को ऐसे आवेदन और दिनों के भीतर सीमानियम की प्रति भेज देनी चाहिये बशर्तें सदस्य ने निर्धारित किये गये शुल्क का भुगतान कर दिया हो। यदि कम्पनी ऐसा करने में कोई त्रुटि करती है तो कम्पनी तथा कम्पनी के त प्रत्येक दोषी अधिकारी को ऐसे प्रत्येक दोष के लिए ₹ 1,000 प्रतिदिन के अर्थ दण्ड से तब तक दण्डित त्र किया जायेगा जब तक कि ऐसा दोष जारी रहता है अथवा र एक लाख के अर्थदण्ड से जो भी कम हों) से दण्डित किया जा सकेगा।

पार्षद सीमानियम का महत्व (Importance of Memorandum of Association)

पार्षद सीमानियम का एक कम्पनी के लिए कितना महत्व है वह इस बात से स्पष्ट है कि इसके अभाव में कम्पनी की वैधानिक स्थिति शून्य होती है। पार्षद् सीमानियम कम्पनी का मौलिक एवं तर अनिवार्य प्रलेख है, क्योंकि यह कम्पनी को जन्म एवं अस्तित्व प्रदान करता है। कुछ विद्वानों ने इसे महत्वपूर्ण चार्टर भी कहा है, क्योंकि यह कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित कम्पनी के अधिकारों की सीमाओं एवं कार्य प्रणाली को निश्चित करता है। इस प्रलेख का इतना अधिक महत्व है कि वर्ष ₹1980 तक इंग्लैण्ड में इसे अपरिवर्तनीय चार्टर माना जाता था। फलस्वरूप कम्पनियों को कार्य संचालन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इसी कारण अधिनियम में कुछ विशेष दशाओं में एवं कुछ सीमा तक इसके परिवर्तन की व्यवस्था की गयी। इस व्यवस्था को छोड़कर अब भी पार्षद सीमानियम को एक अपरिवर्तनीय चार्टर माना जाता है, क्योंकि यह कम्पनी की आधारशिला है। इसलिए यह लेनदारों, बाहरी व्यक्तियों तथा अंशधारियों के हित में है कि इसमें बार-बार परिवर्तन न किये जायें। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि पार्षद सीमानियम एक कम्पनी का महत्वपूर्ण एवं अपरिवर्तनीय चार्टर होता है, क्योंकि एक कम्पनी का समामेलन इसमें निहित शर्तों के आधार पर एक कृत्रिम व्यक्ति के रूप में किया जाता है। कम्पनी अधिनियम के अनुसार यह प्रत्येक कम्पनी को बनाना आवश्यक होता है। सीमानियम के महत्व के सम्बन्ध में निम्न बातें महत्वपूर्ण हैं

(1) मौलिक प्रपत्र है- प्रत्येक कम्पनी के लिए मौलिक प्रपत्र माना जाता है। प्रत्येक नई कम्पनी के समामेलन के लिए इसे बनाया जाना आवश्यक होता है अन्यथा समामेलन सम्भव नहीं हो पाता है।

य (2) अपरिवर्तनीय चार्टर है-इंग्लैण्ड में 1890 तक इसे अपरिवर्तनीय माना जाता था, परन्तु इससे कम्पनियों की कार्यवाहियों में अनेक कठिनाइयाँ सामने आयीं जिससे प्रेरित होकर अधिनियम में कुछ विशेष दशाओं में इसमें परिवर्तन करने की व्यवस्था की गई। वर्तमान कम्पनी अधिनियम भी इस प्रपत्र के अपरिवर्तनीय स्वभाव को स्वीकार करता है।

(3) सदस्यों की जोखिम का स्पष्टीकरण-सीमानियम का उद्देश्य वाक्य सदस्यों की जोखिम को बताता है। लाई पारकर के शब्दों में-“सीमानियम में उद्देश्य को जितने ही संकीर्ण ढंग से व्यक्त किया जाता है सदस्यों की जोखिम उतनी ही कम रहती है। इसके विपरीत, उद्देश्यों को जितने ही विस्तृत रूप तैयार किया जाना चाहिए।

(4) सीमानयम को एक उद्देश्य से सार्वजनिक प्रलेख भी माना जाता है क्योंकि जो कम्पनी से व्यवहार करता है, से यह आशा की जाती है कि उसने कम्पनी के पाषद सामा अध्ययन पूर्णरूप से कर लिया है। उपरोका विवरण से यह स्पष्ट है कि कम्पनी का पार्षद सीमानियम एक महत्वपूर्ण है जिसके बिना कम्पनी को कोई अस्तित्व प्राप्त नहीं होता है क्योंकि इसमें ही कम्पनी के प्रत्येक

का विवरण दिया हुआ होता है। यदि कम्पनी इसमें उल्लखित कार्यों या उद्देश्यों के बाहर करती है तो वह सीमाओं के बाहर (Ultra-vires) कार्य कहलायेगा। पार्षद सीमानियम के वाक्य या विषय-सामग्री (Clauses or Contents of Memorandum of Associatio

पार्षद सीमानियम के वाक्य निम्नलिखित है (1) नाम वाक्य (Name Clause) यह सीमानियम का महत्वपूर्ण एवं प्रथम क्

जिसमें कम्पनी के नाम का उल्लेख किया जाता है। कम्पनी का नाम तय करने से पूर्व राज एक आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है। कोई भी कम्पनी ऐसे नामों से नही हो सकती, जो-(i) केन्द्रीय सरकार की दृष्टि में अवांछनीय हो। (ii) जनता को धोखे में वाला हो। (iii) नाम संप्रतीक एवं नाम अधिनियम (Emblems and Names Act) 1s अन्तर्गत निषिद्ध हो, जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.); विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.)a) तथा भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तथा भारतीय केन्द्रीय या राज्य सरकार की सील आदि।

प्रत्येक कम्पनी को अपने नाम के पीछे ‘कम्पनी’ शब्द लिखना आवश्यक नहीं है। पब्लिक कम्पनी की दशा में ‘लिमिटेड’ शब्द तथा प्राइवेट कम्पनी की दशा में प्राइवेट लिमिट लिखना आवश्यक है। धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए स्थापित कम्पनियाँ केन्द्रीय सरकार की अनु अपने नाम के आगे लिमिटेड’ शब्द हटा सकती हैं। प्रत्येक कम्पनी को अपने नाम अपने कार्यालय के बाहर एक बोर्ड पर लिखवाना चाहिए।

(2) स्थान या पंजीकृत कार्यालय वाक्य (Registered Office Clause) इस वाक्य के अ कम्पनी को उस राज्य का नाम देना होता है जिस राज्य में कम्पनी का रजिस्टर्ड कार्यालय स्थिर स्थापित होगा; जैसे- यदि किसी कम्पनी का रजिस्टर्ड कार्यालय कानपुर में स्थित होगा तो सीमानियम में कानपुर स्थित कार्यालय का पता न लिखकर केवल ‘उत्तर प्रदेश’ राज्य का लिखना होगा।

कम्पनी के पंजीयन के आवेदक को पत्र व्यवहार के लिए एक पते की सूचना रजिस्ट्रार होती है ताकि कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय की स्थानापन्न होने तक कम्पनी के साथ पत्र किया जा सके। इस पते की सूचना उस रजिस्ट्रार को भेजी जाती है जिसके क्षेत्राधिकार में प्र कम्पनी का पंजीकृत कार्यालय स्थापित किया जाता है। प्रत्येक कम्पनी का अपने समामेलन दिन से ही एक पंजीकृत कार्यालय होगा। यह कार्यालय कम्पनी को भेजे गये सभी प्रकार के एवं नोटिसों को प्राप्त करने एवं उनकी प्राप्ति की रसीद देने में सक्षम माना जायेगा। प्रत्येक अपने समामेलन के 30 दिनों के अन्दर अपने पंजीकृत कार्यालय का प्रमाणन रजिस्ट्रार को करेगी।

प्रत्येक कम्पनी अपने नाम के साथ पंजीकृत कार्यालय के पते को अपने प्रत्येक कार्यात् कारोबार के स्थान के बाहर सुस्पष्ट भाषा में पेण्ट से लिखेगी या टाँगेगी या चिपकायेगी एवं उसे ही बनाये रखेगी। साथ ही प्रत्येक कम्पनी अपने नाम एवं पंजीकृत कार्यालय के पते को निगमीय पहचान क्रमांक, टेलीफोन नम्बर, फैक्स नम्बर, ई-मेल एवं वेबसाइट के पते को अपने व्यावसायिक पत्रों एवं बिलों के शीर्षक पर छपवायेगी।

(3) उद्देश्य वाक्य (Object Clause)- यह वाक्य कम्पनी के सीमानियम का सबसे महत्वपूर्ण चाय है। इसके अन्तर्गत उन समस्त उद्देश्यों का वर्णन किया जाता है जिनकी पूर्ति हेतु कम्पनी का निर्माण किया जा रहा है। इस वाक्य को तैयार करने में काफी सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि इसमें परिवर्तन सरलता से सम्भव नहीं है। उद्देश्य वाक्य कम्पनी के कार्य क्षेत्र की सीमाएँ निर्धारित करता । कम्पनी अधिनियम 2013 के प्रावधानों के अनुसार उद्देश्य वाक्य में कम्पनी के उद्देश्यों को अग्र प्रकार लिखा जायेगा

(a) कम्पनी के वे उद्देश्य जिनके लिए कम्पनी का समामेलन करना प्रस्तावित है। (b) अन्य कोई उद्देश्य जो इन उद्देश्यों के प्रोत्साहन के लिए आवश्यक माना गया है।

कोई भी कम्पनी अपने सीमानियम के उद्देश्य वाक्य में उल्लिखित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कोई भी आवश्यक कार्य कर सकती है। अतः इस वाक्य में ऐसी किसी भी बात का उल्लेख नहीं करना चाहिए जिससे कम्पनी का कार्य क्षेत्र विपरीत दशा में प्रभावित हो उद्देश्यों के बाहर किये जाने वाले सभी कार्य अधिकारों के बाहर (Ultra-Vires) होंगे।

(4) दायित्व वाक्य (Liability Clause) कम्पनी अधिनियम की धारा 13 (2) के अनुसार, प्रत्येक अंशों द्वारा तथा गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी के पार्षद सीमानियम में इस बात का उल्लेख होना आवश्यक है कि सदस्यों का दायित्व सीमित है। इसके अतिरिक्त यदि किसी कम्पनी ने ‘लिमिटेड’ या ‘प्राइवेट लिमिटेड’ शब्द का प्रयोग न करने के सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार से अनुमति ले ली है तो ऐसी कम्पनी को सदस्यों के दायित्व का विवरण देना आवश्यक है। अंशों द्वारा सीमित कम्पनी में सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा खरीदे गये अंशों के अंकित मूल्य की अदत्त राशि तक सीमित होता है। गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी की दशा में उनके द्वारा दी गई गारण्टी की राशि तक सीमित होता है। अंश पूँजी वाली गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी के पार्षद सीमानियम के दायित्व वाक्य में सदस्यों की गारण्टी की राशि चुकाने की प्रतिज्ञा के साथ-साथ उनके द्वारा धारित अंशों पर अदत्त राशि के भुगतान के दायित्व का भी उल्लेख किया जाता है।

(5) पूँजी वाक्य (Capital Clause) – अंर्शों द्वारा सीमित कम्पनी की दशा में पार्षद सीमानियम के पूँजी वाक्य के अन्तर्गत कम्पनी की अधिकृत पूँजी तथा उसका निश्चित मूल्य के अंशों में विभाजन का उल्लेख किया जाता है। यह कम्पनी की अधिकतम पूँजी होती है। इसका निश्चयन कम्पनी के व्यापार सम्बन्धी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। यह उल्लेखनीय है कि जिस कम्पनी में अंश पूँजी नहीं होती है उस कम्पनी के सीमानियम में पूँजी वाक्य नहीं होता है।

(6) संघ एवं अभिदाता हस्ताक्षर वाक्य (Association and Subscription Clause ) – यह पार्षद सीमानियम का अत्यन्त महत्वपूर्ण वाक्य होता है जिसमें कम्पनी के पार्षद सीमानियम पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति इस पार्षद सीमानियम के अन्तर्गत कम्पनी बनाने की अपनी इच्छा को प्रकट करते हैं। पब्लिक कम्पनी की दशा में कम-से-कम 7 व्यक्तियों द्वारा और एक प्राइवेट कम्पनी की दशा में कम-से-कम 2 व्यक्तियों द्वारा हस्ताक्षर किये जाते हैं। यदि निजी कम्पनी एक व्यक्ति कम्पनी के रूप में पंजीकृत करायी जाती है तो उसके सीमानियम पर केवल एक ही अभिदाता के हस्ताक्षर होते हैं।

यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सीमानियम का कोई भी अभिदाता कम्पनी के समामेलन के पश्चात् अपना नाम वापस नहीं ले सकता है। कम्पनी के सीमानियम के अभिदाता खण्ड में प्रत्येक अभिदाता का नाम, उपनाम, जाति, पता, व्यवसाय, राष्ट्रीयता आदि का उल्लेख किया जाता है। इतना ही नहीं इनके प्रमाणन हेतु उनके पहचान के प्रमाण का भी उल्लेख करना होता है। यदि अभिदाता कोई निगम निकाय है तो केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित विवरण देना पड़ता है। प्रत्येक अभिदाता के हस्ताक्षर का प्रमाणन किसी साक्षी से करवाना होता है। इस वाक्य की भाषा निम्न प्रकार होती है

“हम सभी व्यक्ति जिनके नाम व पते नीचे दिये हैं, इस बात के इच्छुक हैं कि इस पार्षद सीमानियम के अनुसार हमारा निर्माण एक कम्पनी के रूप में हो जाय और हम कम्पनी की अंश-पूँजी में अपने नाम के आगे लिखे अंशों को लेना स्वीकार करते हैं।”

एक व्यक्ति कम्पनी की दशा में यह घोषणा निम्नानुसार होगी: जिसका एवं पता नीचे दिया गया है, इस सीमानियम के अनुसरण में एक क अंश पूंजी में से सभी अंश लेने का वचन देता है। बिना अंश पूंजी वाली एक व्यक्ति कम्पनी की दशा में यह घोषणा निम्नानुसार होगी

“जिसका नाम एवं पता नीचे दिया गया है, इस सीमानियम के अनुसरण निर्माण का हूँ।”

पार्षद सीमानियम के परिवर्तन अनुसार पार्षद सीमानियम कम्पनी का एक अपरिवर्तनीय चार्टर है। इसका मतलब यह नहीं है। इसमें परिवर्तन नहीं किये जा सकते। किन्तु कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 13 के. कम्पनी विशेष प्रस्ताव पारित करके एवं अन्य प्रावधानों के अधीन निर्धारित प्रक्रिया का पालन अपने सीमानियम में परिवर्तन कर सकती है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि बिना अंश पूज गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी अपने सीमानियम में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं करेगी जिससे कम्पनी सदस्य के अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति को कम्पनी के विभाजनीय लाभों में भागीदारी करने का हक ए हो। पार्षद सीमानियम के विभिन्न वाक्यों में निम्नलिखित विधि द्वारा परिवर्तन किया जा सकता है

(Alteration of Memorandum of Association)

(1) नाम वाक्य में परिवर्तन (Alteration in Name Clause)

कम्पनी अधिनियम की व्यवस्थाओं के अधीन पार्षद सीमानियम के नाम वाक्य सम्बन्ध में निम्नलिखित व्यवस्थाएँ हैं में परिवर्तन

(A) कम्पनी की स्वेच्छा से परिवर्तन (Alteration by Own Chocie of Company)-28 कोई कम्पनी स्वेच्छा से अपने नाम में परिवर्तन करना चाहती है तो उसे निम्नलिखित प्रावधानों प्रक्रिया का पालन करना होगा

(a) नाम के चयन सम्बन्धी प्रावधानों का पालन-इस अधिनियम में कुछ प्रावधान दिये गये। जो किसी कम्पनी के नये नाम के चयन में मार्गदर्शन देते हैं। इन प्रावधानों के अनुसार कम्पनी नाम या नये नाम के चयन के समय निम्नांकित बातों को ध्यान रखना चाहिये (1) कम्पनी का नाम किसी अन्य विद्यमान कम्पनी के नाम के समान या नाम से मिलता-जुलत या सदृश नहीं होना चाहिये।

(ii) कम्पनी का नाम ऐसा नहीं होना चाहिये कि उस नाम का उपयोग करना देश के किसी भी विधान के अधीन अपराध बनता हो।

(iii) कम्पनी का नाम ऐसा नहीं होना चाहिये जो केन्द्रीय सरकार की राय में वह नाम अवांछनीय हो।

(iv) कम्पनी के नाम में कोई ऐसा शब्द या पद नहीं होना चाहिये जिससे यह आभास हो कि कम्पनी को सरकार या सरकारी प्राधिकरण या संस्था आदि से संरक्षण प्राप्त हो । (b) नाम के आरक्षण हेतु आवेदन कोई भी कम्पनी अपने नाम में परिवर्तन करने हेतु नये

नाम के आरक्षण हेतु रजिस्ट्रार को आवेदन कर सकती है। कम्पनी इस आवेदन-पत्र में उस नाम का उल्लेख करेगी जो नाम वह रखना चाहती है। यह आवेदन केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित फार्म तथा रीति से किया जायेगा। आवेदन प्राप्त होने पर रजिस्ट्रार कम्पनी के लिए नाम का आरक्षण कर देगा। यह आरक्षित नाम उस कम्पनी के लिए आवेदन की तिथि से 60 दिनों तक आरक्षित रहेगा। (c) विशेष संकल्प कम्पनी को अपने आरक्षित नये नाम को अपनाने हेतु अपनी सभा में एक विशेष संकल्प पारित करना होगा।

(d) केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदन कम्पनी के नाम में परिवर्तन सभी प्रभावी होगा जबकि परिवर्तन पर केन्द्रीय सरकार से अनुमोदन प्राप्त कर लिया जायेगा। अतः कम्पनी केन्द्रीय सरकार को परिवर्तित नाम के अनुमोदन हेतु आवेदन करेगी। किन्तु यह उल्लेखनीय है कि यदि का एक वर्ग से दूसरे वर्ग में परिवर्तन होने के कारण कम्पनी के नाम के साथ ‘प्रा’ शब्द हाया हटाना पड़ता है तो इस हेतु केन्द्रीय सरकार से अनुमोदन प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं

पाहती है। (e) रजिस्ट्रार को आवेदन कम्पनी के नाम में परिवर्तन हेतु रजिस्ट्रार के पास फार्म नं. INC 24 में निर्धारित शुल्क के साथ आवेदन फाइल करना होता है। इस आवेदन फार्म के साथ निम्नांकित प्रलेख भी फाइल करने होते हैं (i) कम्पनी द्वारा नाम परिवर्तन हेतु पारित विशेष संकल्प।

(ii) कम्पनी के नाम में परिवर्तन हेतु केन्द्रीय सरकार से प्राप्त अनुमोदन का आदेश |

(1) कम्पनी के रजिस्टर में प्रविष्टि रजिस्ट्रार उपर्युक्त प्रलेखों की प्राप्ति के उपरान्त कम्पनियों के रजिस्टर में कम्पनी के पुराने नाम के स्थान पर नये नाम की प्रविष्टि कर देगा। (g) समामेलन का नया प्रमाण-पत्र जारी करना रजिस्ट्रार तत्पश्चात् कम्पनी के समामेलन का नया प्रमाण पत्र नये नाम से जारी कर देगा। यह प्रमाण-पत्र फार्म नं. INC-25 में जारी किया जायेगा। यह उल्लेखनीय है कि नाम के परिवर्तन की प्रक्रिया तभी पूरी होती है जबकि रजिस्ट्रार द्वारा समामेलन का नया प्रमाण पत्र जारी कर दिया जायेगा।

(h) अन्य औपचारिकताएँ-नाम में परिवर्तन का अनुमोदन हो जाने के पश्चात् कम्पनी को निम्न औपचारिकताओं का पालन भी करना होता है (i) सीमानियम एवं अन्तर्नियमों में आवश्यक परिवर्तन करना।

(ii) बहियों, अभिलेखों, प्रलेखों, रजिस्टरों, पत्र-शीर्षकों, नाम पट्ट में आवश्यक परिवर्तन करना।

(iii) नयी सार्वमुद्रा बनवाना तथा उसे संचालक मण्डल की सभा में अंगीकार करना।

(iv) सम्बन्धित स्कन्ध विनिमय केन्द्र को समामेलन के नये प्रमाण पत्र की प्रतिलिपि भेजना। (v) समाचार पत्रों में नाम परिवर्तन की सार्वजनिक सूचना प्रकाशित करना ।

(B) क्रियाओं में परिवर्तन के कारण नाम परिवर्तन (Change in Name by Change in Activities) कभी-कभी कम्पनी अपनी व्यावसायिक क्रियाओं में परिवर्तन कर लेती है किन्तु कम्पनी के नाम से कम्पनी की ऐसी क्रियाओं का आभास नहीं होता है। ऐसी दशा में कम्पनी को अपनी क्रियाओं में ऐसे परिवर्तन होने के 6 माह के भीतर अपने नाम में परिवर्तन करना पड़ता है। क्रियाओं में परिवर्तन के कारण नाम में परिवर्तन के लिए स्वेच्छा से नाम में परिवर्तन की प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है।

(2) पंजीकृत कार्यालय वाक्य में परिवर्तन (Alteration in Registered Office Clause) कोई भी कम्पनी अपने पंजीकृत कार्यालय के स्थान में परिवर्तन कर सकती है। स्थान परिवर्तन में निम्नलिखित चार में से कोई भी परिस्थिति हो सकती है

1. एक ही शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवर्तन-जब कोई कम्पनी अपने पंजीकृत कार्यालय को एक ही शहर के एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित करना चाहती है तो विधान की दृष्टि से उस कम्पनी को दो कार्य करने पड़ते हैं

(i) उसे अपने संचालक मण्डल की सभा में स्थान परिवर्तन सम्बन्धी एक संकल्प पारित करना पड़ता है।

(ii) प्रस्ताव के अनुसार स्थान परिवर्तन कर लेने के 15 दिनों के भीतर कम्पनी को रजिस्ट्रार के पास परिवर्तित पते की सूचना भेजनी पड़ती है। यह सूचना पंजीकृत कार्यालय के स्थान के प्रमाणन के साथ भेजनी चाहिये ।

द्वितीय वर्ष परिवर्तन पंजीकृत कार्यालय के परिवर्तन की सूचना एवं उसका प्रमाणन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियमों द्वारा निर्धारित शैलि एवं फार्म से किया जाना चाहिये। दूसरे स्थान पर

11. एक ही राज्य में उसी रजिस्ट्रार के क्षेत्र में एक स्थान से कम्पनियों अपने पंजीकृत कार्यालय को एक ही राज्य में एक स्थान से दूसरे स्थान पर चाहती है तथा ऐसा नया स्थान विद्यमान स्थान के शहर या करने की स्थानीय सीमा होता है। ऐसी दशा में नया स्थान उसी रजिस्ट्रार के क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) में रहता है तो को प्रक्रिया अपनानी होगी (1) कम्पनी को अपनी साधारण सभा में स्थान परिवर्तन सम्बन्धी एक विशेष संय करना पड़ता है। इस संकल्प में इस बात का उल्लेख होता है कि पंजीकृत कार्यालय किस कही पर स्थानान्तरित किया जायेगा। (ii) तत्पश्चात् कम्पनी को अपने पंजीकृत कार्यालय के स्थान को इस संकल्प के परिवर्तित करना चाहिये। (iii) पंजीकृत कार्यालय के स्थान के परिवर्तन के 15 दिनों के भीतर रजिस्ट्रार को परिवर्त सूचना देनी चाहिये। इस सूचना के साथ ही पंजीकृत कार्यालय के स्थान का प्रमाणन निर्धारि एवं फार्म से करना चाहिये।

(iv) परिवर्तन की सूचना सम्बन्धित स्कन्ध विनिमय केन्द्र को भी देनी पड़ती है यदि सूचीबद्ध हो। III. एक ही राज्य में एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवर्तन, जब रजिस्ट्रार के क्षेत्राधिक परिवर्तन होता है यदि पंजीकृत कार्यालय के स्थान को उसी राज्य में एक स्थान से दूसरे स्थान परिवर्तित करने से नया स्थान किसी दूसरे रजिस्ट्रार के क्षेत्राधिकार में चला जाता है तो निम्नि प्रक्रिया अपनायी जायेगी

1. विशेष प्रस्ताव पारित करना-प्रत्येक कम्पनी जो अपने पंजीकृत कार्यालय के स्थान को। प्रकार से परिवर्तित करना चाहती है, उसे अपनी सभा में इस आशय का एक विशेष प्रस्ताव प करना चाहिये। इस प्रस्ताव में उस स्थान का नाम होना चाहिये जिस स्थान पर कम्पनी का पंजी कार्यालय स्वानान्तरित किया जायेगा।

2. नोटिस का प्रकाशन तत्पश्चात् कम्पनी को एक नोटिस कम से कम एक बार दो समाचार पत्रों में प्रकाशित करना चाहिये। इनमें से एक समाचार पत्र अंग्रेजी भाषा का तथा दूसरा, भाषा का होना चाहिये जो कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय वाले स्थान के जिले की प्रमुख भाषा है।। नोटिस में स्थान परिवर्तन हेतु क्षेत्रीय संचालक को किये जाने वाले आवेदन के साथ ही इस नोटिस ऐसे परिवर्तन में जिन व्यक्तियों के हित प्रभावित होते हैं उन्हें यह सलाह भी दी जाती है कि वे नोटिस के प्रकाशन के 21 दिनों के भीतर अपना विरोध क्षेत्रीय संचालक को प्रस्तुत कर उसकी।

प्रति कम्पनी को भेज दे। 3. लेनदारों, ऋणपत्रधारियों तथा घन-निक्षेपकर्ताओं को व्यक्तिगत सूचना-कम्पनी को प्रत्येक लेनदार, ऋणपत्रधारी तथा धन-निक्षेपकर्ता को भी स्थान परिवर्तन करने हेतु क्षेत्रीय संचाल को आवेदन प्रस्तुत करने के इरादे की सूचना देनी चाहिये। ऐसी सूचना क्षेत्रीय संचालक को स्व परिवर्तन हेतु आवेदन करने की तिथि से कम से कम एक माह पूर्व दी जानी चाहिये। इस सूचना यह स्पष्ट लिखना चाहिये कि ऐसे परिवर्तन से यदि किसी व्यक्ति के हित प्रभावित होते हों तो उ अपना विरोध इस सूचना के 21 दिनों के भीतर क्षेत्रीय संचालक के समक्ष प्रस्तुत कर उसकी एक प्र कम्पनी को भेज दे।

4. क्षेत्रीय संचालक को अनुमोदन हेतु आवेदन-तत्पश्चात् कम्पनी स्थान परिवर्तन में संकल के अनुमोदन हेतु आवेदन क्षेत्रीय संचालक को करेगी। कम्पनी ऐसा आवेदन उपर्युक्त बिन्दु 2 तथा अनुरूप सूचना देने के एक माह बाद कर सकती है। ऐसा आवेदन निर्धारित शुल्क के साथ क जाना चाहिये।

5. क्षेत्रीय संचालक द्वारा अनुमोदन क्षेत्रीय संचालक आवेदन प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर अपने अनुमोदन की सूचना भेज देगा किन्तु क्षेत्रीय संचालक ऐसा अनुमोदन करने से पूर्व उन सभी आपत्तियों पर विचार करेगा जो कम्पनी द्वारा दिये गये नोटिस के 21 दिनों के भीतर ऐसे परिवर्तन के विरुद्ध उसे प्राप्त हुई हैं। यदि उस नोटिस के 21 दिन के भीतर परिवर्तन के विरुद्ध कोई भी आपत्ति प्राप्त नहीं होती है तो यह माना जायेगा कि सभी सम्बन्धित पक्षकारों ने ऐसे परिवर्तन पर अपनी सहमति दे दी है।

6. अनुमोदन को रजिस्ट्रार के पास फाइल करना क्षेत्रीय संचालक से स्थान परिवर्तन के आवेदन का अनुमोदन प्राप्त करने के पश्चात् उसे रजिस्ट्रार के पास फाइल करना चाहिये। रजिस्ट्रार के पास इसे अनुमोदन की तिथि से 60 दिनों के भीतर फाइल कर देना चाहिये। 7. पंजीयन एवं प्रमाण पत्र रजिस्ट्रार स्थान परिवर्तन के अनुमोदन आदेश की प्राप्ति के 30 दिनों के भीतर उसका पंजीयन कर देगा। रजिस्ट्रार इन्हीं 30 दिनों के भीतर स्थान परिवर्तन के अनुमोदन के पंजीयन का प्रमाण-पत्र भी जारी कर देगा। 8. प्रमाण पत्र परिवर्तन का अकाट्य प्रमाण-रजिस्ट्रार द्वारा स्थान परिवर्तन के आशय का जारी किया प्रमाण-पत्र इस बात का अकाट्य प्रमाण होगा कि पंजीकृत कार्यालय के स्थान परिवर्तन की औपचारिकताओं को पूरा कर दिया गया है। स्थान परिवर्तन उसके प्रमाण पत्र की तिथि से प्रभावी २ माना जायेगा।

9. परिवर्तन की सूचना एवं प्रमाणन कम्पनी नाम परिवर्तन के पंजीयन के प्रमाण पत्र की तिथि के पश्चात् कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय के स्थान को परिवर्तित कर सकती है। कम्पनी के स्थान में परिवर्तन करने के 15 दिनों के भीतर रजिस्ट्रार को परिवर्तन की सूचना देनी होती है। रजिस्ट्रार • इस सूचना को कम्पनियों के रजिस्टर में लिखेगा। यदि कम्पनी सूचीबद्ध है तो सम्बन्धित स्टॉक एक्सचेंज को परिवर्तन की सूचना दी जानी चाहिए। IV. एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थान परिवर्तन किसी भी कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय के स्थान का एक राज्य/केंद्रशासित प्रदेश से दूसरे राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश में परिवर्तन/स्थानान्तरण की प्रक्रिया में अनेक कदम उठाने होते हैं। कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार, किसी कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय के स्थान को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थनान्तरित करने के लिए निम्न कदम उठने पड़ते हैं

1. विशेष प्रस्ताव- किसी भी कम्पनी को अपने पंजीकृत कार्यालय के स्थान को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानान्तरित करने के लिए कम्पनी की सभा में एक विशेष प्रस्ताव पारित करना होता है। इस प्रस्ताव में उस राज्य का नाम लिखा होना चाहिये जिस राज्य में कम्पनी का पंजीकृत कार्यालय स्थानान्तरित किया जायेगा।

2. केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन हेतु आवेदन किसी भी कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय के स्थान को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानान्तरित करने का प्रस्ताव तब तक प्रभावी नहीं होता है जब तक कि केन्द्रीय सरकार उसका अनुमोदन नहीं कर देती है। अतः कम्पनी को उस प्रस्ताव के अनुमोदन के लिए केन्द्रीय सरकार को आवेदन करना चाहिये।

3. लेनदारों तथा ऋणपत्रधारियों की सूची के साथ शपथ-पत्र-कम्पनी द्वारा आवेदन पत्र के साथ लेनदारों तथा ऋणपत्रधारियों की सूची भी संलग्न की जायेगी। यह सूची आवेदन की तिथि से अधिकतम एक माह पूर्व की तिथि की या इसके बाद की तिथि की हो सकती है।

4. कर्मचारियों के सन्दर्भ में संचालकों द्वारा शपथ-पत्र- इस आवेदन पत्र के साथ संचालकों द्वारा एक शपथ-पत्र इस आशय का भी संलग्न किया जायेगा कि कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय के स्थान का एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानान्तरण के कारण किसी भी कर्मचारी की छँटनी नहीं की जायेगी।

5. रजिस्ट्रार तथा राज्य के मुख्य सचिव को आवेदन की प्रति प्रस्तुत करना कम्पनी अपने पंजीकृत कार्यालय के विद्यमान स्थान के राज्य के रजिस्ट्रार को तथा राज्य सरकार के मुख्य सचिव को भी इस आवेदन की प्रति प्रस्तुत करेगी। इस आवेदन की प्रति के साथ वे सभी संलग्नक (Enclosun किये जायेंगे जो केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत किये गये आवेदन के साथ संलग्न किये

6. पंजीकृत कार्यालय पर सेनदारों की सूची रखना एवं उसका निरीक्षण सुलभ करना-8 अपने सेनदारों की प्रमाणित सूची पंजीकृत कार्यालय पर रखेगी। कोई भी व्यक्ति उस सू शरीक्षण करना चाहेगा कम्पनी उसे निरीक्षण की सुविधा उपलब्ध करेगी। यदि कोई व्यक्ति किसी अंश वा सम्पूर्ण सूची की प्रति चाहेगा तो कम्पनी उससे ₹10 प्रति पृष्ठ शुल्क वसूल कर उपलब्ध करायेगी।

7. आवेदन पत्र का विज्ञापन कम्पनी उस आवेदन पत्र पर केन्द्रीय सरकार द्वारा सुनवादी करने के कम से कम 14 दिन पूर्व आवेदन पत्र का निर्धारित प्रारूप में विज्ञापन द्वारा प्रकाशन कर 8. निम्नांकित में से प्रत्येक को सूचना देना-कम्पनी आवेदन पत्र पर सुनवायी प्रारम्भ कम से कम 14 दिन पूर्व आवेदन पत्र के सम्बन्ध में-(i) प्रत्येक लेनदार, (ii) प्रत्येक ऋ

(1) ‘सेबी’ (यदि कम्पनी सूचीबद्ध है) आदि को सूचित करगी। 19. प्राप्त आपत्तियों की प्रति भेजना-यदि कम्पनी को प्रस्तावित आवेदन-पत्र पर किसी से (जिसका हित प्रभावित होता हो, उससे) आपत्ति प्राप्त हुई है तो कम्पनी को उसकी एक प्रति सरकार को भेजनी चाहिये। यह प्रति केन्द्रीय सरकार द्वारा आवेदन पर सुनवायी प्रारम्भ करने के या उससे पूर्व भेज दी जानी चाहिये।

10. आवेदन-पत्र पर सुनवायी एवं विचार-तत्पश्चात् केन्द्रीय सरकार आवेदन प्रारम्भ करेगी। केन्द्रीय सरकार पंजीकृत कार्यालय के स्थान के परिवर्तन के आवेदन पर विचार समय सभी प्रभावित पक्षकारों के हितों को ध्यान में रखेगी।

पर

11. केन्द्रीय सरकार द्वारा आदेश-केन्द्रीय सरकार कम्पनी के लेनदारों, ऋणपत्रधारियों अन्य सरोकार रखने वाले व्यक्तियों के हितों पर विचार कर उन्हें सुरक्षित करने के पश्चात् यदि

हो तो स्थान परिवर्तन के आवेदन का अनुमोदन कर देगी। 12. रजिस्ट्रार के पास प्रलेख फाइल करना केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदन आदेश करने के पश्चात् कम्पनी निम्नलिखित प्रलेख रजिस्ट्रार को फाइल करेगी

(i) कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय के स्थान को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानान्तरित क हेतु पारित किया गया विशेष संकल्प।

(ii) केन्द्रीय सरकार द्वारा परिवर्तन के आवेदन पर जारी अनुमोदन आदेश की प्रमाणित प्र इसे दोनों ही राज्यों के रजिस्ट्रारों के पास फाइल किया जायेगा। 13. आदेश का पंजीयन दोनों ही राज्यों के रजिस्ट्रार परिवर्तन के अनुमोदन आदेश का पंजीय

करेंगे। अनुमोदन आदेश तभी प्रभावी होगा जबकि उसका रजिस्ट्रार द्वारा पंजीयन कर लिया जायेगा। 14. समामेलन का नया प्रमाण-पत्र जारी करना- तत्पश्चात् उस राज्य का रजिस्ट्रार, जहाँ पंजीकृत कार्यालय स्थानान्तरित किया जा रहा है, कम्पनी को समामेलन का नया प्रमाण-पत्र ज कर देगा।

(3) उद्देश्य वाक्य में परिवर्तन (Alteration in Object Clause) कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 13 के अनुसार कम्पनी द्वारा अपने

पार्षद सीमानियम उद्देश्यों में परिवर्तन करने सम्बन्धी प्रावधानों को निम्न दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है I. प्रविवरण से प्राप्त धनराशि के उपयोग के पूर्व उद्देश्यों में परिवर्तन-कभी-कभी कोई कम्पन प्रविवरण के माध्यम से जनता से प्राप्त धनराशि के उपयोग करने से पूर्व ही अपने सीमानियम उद्देश्य खण्ड में परिवर्तन करना चाहती है। ऐसी दशा में कम्पनी को उद्देश्य वाक्य में परिवर्तन हेतु निम्नांकित प्रक्रिया अपनानी पड़ती है 1. डाक मतपत्र से विशेष संकल्प-ऐसी कम्पनी को सर्वप्रथम डाक मतपत्रों के माध्यम

उद्देश्यों के परिवर्तन हेतु एक विशेष संकल्प पारित करना होगा। 2. संकल्प के विवरण का प्रकाशन-कम्पनी तत्पश्चात् विशेष संकल्प के विवरण एवं औचित का एक विज्ञापन प्रकाशित करेगी। इस विज्ञापन का प्रकाशन एवं सदस्यों को डाक मतपत्र भेजने काही की जायेगी। समाचार पत्र में दिये जाने वाले विज्ञापन में उद्देश्यों के परिवर्तन हेतु पारित किये जाने वाले संकल्प का विवरण दिया जायेगा। “3. असहमत अंशधारियों को प्रतिभूतियों से निकलने का अवसर देना-कभी-कभी कम्पनी के सदस्य उद्देश्यों के परिवर्तन के संकल्प का विरोध करते हैं और उससे अपनी असहमति प्रकट करते

ऐसे में कंपनी के प्रवर्तकों तथा कम्पनी पर नियन्त्रण रखने वाले अंशधारियों का यह दायित्व होगा कि असहमति प्रकट करने वाले अंशधारियों को उनके द्वारा निवेशित प्रतिभूतियों से बाहर निकलने का एक अवसर देंगे। यह अवसर ‘सेबी’ द्वारा निर्धारित विनियमों के अनुरूप दिया जायेगा। 11. अन्य किसी दशा में परिवर्तन- यदि कम्पनी किसी अन्य दशा में अपने उद्देश्यों में परिवर्तन करती है तो उसके लिए एक विशेष संकल्प पारित करना पड़ता है। यह संकल्प कम्पनी की सभा में अथवा हाक मतपत्र के माध्यम से पारित किया जा सकता है। कम्पनी अधिनियम के कुछ अन्य प्रावधान हैं जो सभी दशाओं में उद्देश्यों में परिवर्तन करने पर लागू होते हैं, इन्हें निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. रजिस्ट्रार को प्रलेख फाइल करना उद्देश्यों में परिवर्तन करने की दशा में कम्पनी को

निम्नांकित प्रलेख रजिस्ट्रार के पास फाइल करने पड़ते हैं

(i) कम्पनी द्वारा पारित विशेष संकल्प के प्रमाणित प्रतिलिपि । (ii) समाचार पत्रों में प्रकाशित विशेष संकल्प तथा डाक मतपत्र सूचना का विवरण | (iii) इस बात को प्रमाणित करने वाला प्रमाण-पत्र कि उद्देश्यों के परिवर्तन के विशेष संकल्प से असहमत अंशधारियों को उनके द्वारा निवेशित प्रतिभूतियों से बाहर निकलने का अवसर दे दिया गया है।

2. सीमानियम में परिवर्तन का पंजीयन एवं प्रमाणन उपयुक्त प्रलेखों को फाइल करने पर रजिस्ट्रार सीमानियम के उद्देश्य खण्ड में परिवर्तन का पंजीयन कर लेगा तत्पश्चात् रजिस्ट्रार विशेष संकल्प के फाइल करने के 30 दिनों के भीतर उद्देश्य खण्ड में पंजीयन का प्रमाण-पत्र भी जारी कर देगा। 3. परिवर्तन का प्रभाव-उद्देश्य खण्ड में किये गये परिवर्तन तब तक प्रभावी नहीं होंगे जब तक कि रजिस्ट्रर द्वारा उनका पंजीयन नहीं कर लिया जाता है।

(4) दायित्व वाक्य में परिवर्तन (Alteration in Liability Clause)

किसी कम्पनी के सदस्यों के दायित्वों में परिवर्तन (कमी या वृद्धि) तभी किया जा सकता है

जबकि किसी एक वर्ग की कम्पनी को किसी अन्य वर्ग की कम्पनी में परिवर्तित किया जाता है। इस

अधिनियम के अधीन पंजीकृत किसी भी एक वर्ग की कम्पनी को किसी अन्य वर्ग की कम्पनी में

परिवर्तित करने के लिए उसके सीमानियम तथा अन्तर्नियमों में परिवर्तन करना पड़ता है।

यदि कोई एक विशेष वर्ग की कम्पनी अपने आपको किसी अन्य वर्ग की कम्पनी में परिवर्तित करना चाहती है तो उसे एक विशेष संकल्प पारित कर रजिस्ट्रार को आवेदन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त, उस कम्पनी को वे सभी औपचारिकताएँ पूरी करनी पड़ेगी जो किसी कम्पनी के पंजीयन के लिए की जाती हैं। तत्पश्चात् रजिस्ट्रार कम्पनी के पुनः पंजीयन हेतु फाइल किये गये सभी प्रलेखों का पंजीवन कर लेगा तथा ठीक उसी प्रकार समामेलन का प्रमाण पत्र जारी कर देगा जैसे कि कम्पनी के प्रथम बार पंजीयन के समय जारी किया जाता है। (5) पूँजी वाक्य में परिवर्तन (Alteration in Capital Clause)

यदि कम्पनी के अन्तर्नियम अधिकार देते हैं तो अंशों द्वारा सीमित कोई भी कम्पनी अपने सीमानियम के पूँजी खण्ड में परिवर्तन कर सकती है। ऐसे परिवर्तन के परिणामस्वरूप, कम्पनी अपनी अधिकृत अंशपूँजी में वृद्धि, कमी या अंश पूँजी का पुनर्गठन कर सकती है। कभी-कभी ऐसे परिवर्तन के कारण अंशों का स्कन्ध में तथा स्कन्ध का अंशों में परिवर्तन भी हो सकता है। पूँजी वाक्य में परिवर्तन की प्रक्रिया को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. अन्तर्नियमों में व्यवस्था होना-अंशपूँजी में परिवर्तन करने के लिए कम्पनी के अन्तर्नियमों में कम्पनी की पूँजी परिवर्तन सम्बन्धी व्यवस्था होनी चाहिए। यदि अन्तर्नियमों में पूँजी परिवर्तन सम्बन्धी अधिकार नहीं दिया गया है तो सर्वप्रथम एक विशेष संकल्प पारित करके अन्तर्नियमों में इस प्रकार की व्यवस्था करनी पड़ती है।

2. साधारण संकल्प पारित करना- अन्तर्नियमों में व्यवस्था होने पर कम्पनी एक साध संकल्प पारित करके अपनी पूँजी में परिवर्तन कर सकती है।

3. अधिकरण से अनुमोदन अनावश्यक कम्पनी की अंशपूँजी में किये जाने वाले सभी के समेकनों एवं विभाजनों के लिए अधिकरण से अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी अंश पूंजी में समेकनों एवं विभाजनों के कारण अंशधारियों के मतदान के प्रतिशत परिवर्तन हो जाता है। ऐसी दशा में अधिकरण के अनुमोदन की आवश्यकता पड़ती है। अधिक आ निर्धारित की गयी रीति से आवेदन करने पर अनुमोदन प्रदान कर सकता है।

4. सीमानियम की प्रति के साथ रजिस्ट्रार को सूचना-तत्पश्चात् कम्पनी ऐसे परिवर्तन की से 30 दिनों के भीतर परिवर्तन की सूचना रजिस्ट्रार को देगी। यह सूचना फार्म नं. SH-7 में निषा प शुल्क के साथ भेजी जायेगी। इसके साथ कम्पनी के परिवर्तित सीमानियम की प्रति भी होगी। रजिस्ट्रार सूचना का पंजीयन कर लेगा। अर्थदण्ड–यदि कोई कम्पनी अंशपूँजी में परिवर्तन की सूचना देने में त्रुटि करती है