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कम्पनी एक कानूनी व्यक्तित्व है, जो अपने सदस्यों से सर्वथा अलग है। इस कथन को स्पष्ट कीजिए।

कम्पनी विधान द्वारा निर्मित एक कृत्रिम व्यक्ति है, जिसका निर्माण एवं अन्त कानून द्वारा होता है। व्यापार करने के लिए एक मनुष्य को जो अधिकार प्राप्त होते हैं और जितने उत्तरदायित्व मानव पर होते हैं, उतने ही अधिकार और उत्तरदायित्व कम्पनी के भी होते हैं। अन्तर केवल इतना होता है कि कम्पनी का अस्तित्व केवल कानून की निगाहों में होता है और उसे प्राकृतिक मनुष्य की भाँति खाने-पीने, सोने की आवश्यकता नहीं है। दूसरे शब्दों में मनुष्य का जन्म और मरण प्राकृतिक रूप से होता है, जबकि एक कम्पनी का निर्माण एवं समापन मानव द्वारा निर्मित विधान के अनुसार होता है। अतः कम्पनी के जन्म एवं मृत्यु पर विधान का ही नियन्त्रण होता है, ईश्वर का नहीं प्राकृतिक मनुष्य की भाँति कम्पनी दूसरों के साथ अनुबन्ध कर सकती है, दूसरों के विरुद्ध वाद प्रस्तुत कर सकती है तथा दूसरे कम्पनी के विरुद्ध वाद प्रस्तुत कर सकती है। प्राकृतिक मनुष्य की तरह ही सम्पत्ति का क्रय-विक्रय कर सकती है किन्तु भौतिक व्यक्ति की भाँति वह मारपीट, हत्या, शादी आदि नहीं कर सकती। साथ ही इस कृत्रिम व्यक्तिको जीवित रहने के लिए खाने-पीने आदि की आवश्यकता नहीं होती है। इतना सब कुछ होने के उपरान्त भी यह जाली व्यक्ति नहीं है अपितु एक वास्तविक व्यक्ति है। इस प्रकार इस सिद्धान्त के अनुसार कम्पनी को कानून द्वारा कृत्रिम, अमूर्त, अदृश्य एवं काल्पनिक व्यक्ति कहा गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि इसे प्राकृतिक व्यक्तियों की तरह किसी सम्पत्ति का क्रय-विक्रय, अनुबन्ध, वाद प्रस्तुत करने एवं प्रपत्रों पर हस्ताक्षर करने का अधिकार है। साथ ही विधान द्वारा निर्मित व्यक्ति होने के कारण कम्पनी का अस्तित्व इसके सदस्यों से बिल्कुल पृथक् होता है। भारत के उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश एवं भारत के भूतपूर्व उपराष्ट्रपति हिदायतुल्ला खाँ ने लिखा है कि “एक समामेलित कम्पनी का पृथक अस्तित्व होता है तथा कानून इसे अपने सदस्यों से पृथक् मानता है। ऐसा पृथक् अस्तित्व समामेलन होते ही उत्पन्न हो जाता है। दूसरे शब्दों में, कम्पनी का अस्तित्व उन लोगों या सदस्यों से भिन्न होता है जो कम्पनी की स्थापना करते हैं या उसके अंश खरीदते हैं। इतना ही नहीं कम्पनी एवं कम्पनी के संचालकों का भी पृथक्-पृथक् अस्तित्व होता है। यदि किसी कम्पनी के लगभग सभी अंश एक ही व्यक्ति के पास हो तो भी कम्पनी एवं ऐसे व्यक्ति का पृथक्-पृथक् अस्तित्व बना रहेगा। इतना ही नहीं, यदि व्यक्तियों का

कोई समूह एक से अधिक कम्पनियों का निर्माण करता है और सभी कम्पनियों का प्रबन्ध एवं स्वामित्व उसी समूह के पास हो तो भी सभी कम्पनियों एवं उन सदस्यों का अस्तित्व पृथक-पृ ही बना रहेगा। सरल शब्दों में कम्पनी का अस्तित्व इसके सदस्यों से भिन्न होता है। अतः यदि द्वारा कोई दावा किया जाये या कम्पनी पर कोई दावा किया जाये तो इसे कम्पनी के सदस्यों कम्पनी के सदस्यों पर चलाया हुआ दावा नहीं समझा जायेगा। इसी को समामेलन का आद कहते हैं। कम्पनी का अपने सदस्यों से पृथक वैज्ञानिक अस्तित्व को सालोमन बनाम सालोमन कम्पनी, सन् 1897 ई. के विवाद को स्पष्ट किया गया है। इस विवाद में सालोमन नामक एक चमड़े के जूतों का व्यापार करता था। उसने सालोमन एण्ड कम्पनी लिमिटेड की स्थापना की, वह स्वयं उसकी पुत्री तथा उसके चार पुत्र सदस्य थे। इसके पश्चात् सालोमन ने अपना व्य कम्पनी के लिए 30,000 पौण्ड में बेच दिया। नकद रुपया देने के स्थान पर कम्पनी ने उसे 1 पो प्रति अंश के 20,000 पूर्णदत्त अंश दिये तथा 10,000 पौण्ड के ऋणपत्र दिये। इस प्रकार सालोमन पास 1 पौण्ड प्रति अंश के 20,000 अंश थे। अन्य 6 सदस्यों में से प्रत्येक के पास 1 पीण्ड अंश अन्त में कम्पनी का समापन हुआ। इस समय इसकी सम्पत्तियाँ 6,000 पौण्ड की और दायित्वों 10,000 पौण्ड के सालोमन के ऋणपत्र जो कि सुरक्षित लेनदार थे और 7,000 पौण्ड के असुरक्षित लेनदार थे। इसकी सम्पत्तियाँ सुरक्षित लेनदारों का भुगतान करने के लिए काफी थीं, लेकिन असुरक्षित लेनदारों को देने के लिए कुछ नहीं बचता था। असुरक्षित लेनदारों का कहना था कि कम्पनी और सालोमन में कोई अन्तर नहीं था और वह स्वयं अपने से कोई ऋण नहीं ले सकता था इसलिए पहले भुगतान उन्हें ही मिलना चाहिए। हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने यह निर्णय दिया कि कम्पनी का निर्माण विधान द्वारा हुआ है। कम्पनी की सम्पत्तियाँ कम्पनी की है, सालोमन की नहीं। सालोमन के अनुसार कम्पनी सदस्यों से अलग समझी जाती है, इसका अस्तित्व अलग होता है। इसलिए सालोमन अपने ऋणपत्रों की रकम पहले ले सकता है, क्योंकि वे सुरक्षित हैं। यहाँ न्यायाधीशों ने पर्दे के पीछे जाना उचित नहीं माना इस प्रकार सालोमन के मामले ने यह सिद्ध कर दिया कि कम्पनी के व्यक्तित्व तथा उसके सदस्यों के प बीच एक पर्दा (आवरण) है और वह वैध तथा न्यायालय उस पर्दे को हटाकर आर्थिक सत्य को जानने क चेष्य नहीं करेंगे, इसे ही ‘कम्पनी का आवरण’ कहा जाता है। इस विवाद के अतिरिक्त भी अन्य कई विवादों में भी यह निर्णय किया जा चुका है कि कम्पनी के सदस्यों का अस्तित्व कम्पनी से पृथक् होता है।

वे परिस्थितियाँ निम्न हैं, जिनमें न्यायालय कम्पनी का पृथक् अस्तित्व नहीं मानता (1) न्यूनतम संख्या से कम कम संख्या हो जाने पर कम्पनी अधिनियम की धारा 45 के अनुसार, लोक कम्पनी में 7 से कम और निजी कम्पनी में 2 से कम सदस्य होने पर भी 6 माह से अधिक कम्पनी का व्यापार चलाया जाता है तो जिन सदस्यों को इस तथ्य की जानकारी होती है उन्हें कम्पनी के पृथक् वैधानिक अस्तित्व का लाभ नहीं मिलता और इस अवधि के लिए सभी ऋणों के लिए वह व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होते हैं।

(2) कम्पनी का नाम स्पष्ट किये बिना विनिमय विपत्रों पर हस्ताक्षर-यदि कम्पनी का नाम स्पष्ट किये बगैर कम्पनी का कोई अधिकारी किसी विनिमय विपत्र या प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर करता है तो धारक के प्रति वह स्वयं उत्तरदायी होगा। (3) कपटपूर्ण व्यापार की दशा में यदि कम्पनी के समापन के समय यह सिद्ध हो जाता है कि

लेनदारों तथा अन्य व्यक्तियों को धोखा देने के उद्देश्य से कम्पनी का व्यवसाय चलाया गया तो जानबूझकर इस कार्य को करने वाले दोषी होंगे और उन्हें कम्पनी से अलग नहीं माना जायेगा। • (4) प्रविवरण में मिथ्या कथन की दशा में यदि कम्पनी के प्रविवरण में मिथ्या कथन है और किसी व्यक्ति ने अंशों का क्रय इस मिव्या-कथन पर विश्वास करके किया है तो हानि होने पर ऐसा व्यक्ति कम्पनी के संचालकों, प्रवर्तकों या अन्य दोषी व्यक्तियों को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी व्हरा सकता है, जो कि ऐसे प्रविवरण के निर्गमन के लिए उत्तरदायी है। इस प्रकार, इस स्थिति में समामेलन का पर्दा उठाकर उसके दोषी अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी व्हराया जा सकता है।

(5) कम्पनी का नियन्त्रण विदेशी शत्रुओं के अधिकार में होने पर एक ऐसी कम्पनी जिसके प्रबन्धक शत्रु देश के निवासी हैं या वे भारतीय नागरिक होते हुए भी शत्रु देश के इशारे पर कार्य कर रहे हैं तो न्यायालय ऐसी कम्पनी के पृथक अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि कम्पनी एक कृत्रिम व्यक्ति है। इसमें दिमाग एवं आत्मा असली व्यक्ति की भाँति नहीं है। इस दृष्टि से यह न तो मित्र हो सकती है और न दुश्मन, परन्तु इसका दुश्मन का आचरण हो सकता है।

(6) कपटमय उद्देश्यों के लिए प्राप्त किये गये धन-निक्षेप को लौटाने में असफल रहने पर कभी-कभी कोई कम्पनी अपने द्वारा जनता से प्राप्त धन-निक्षेप की राशि या उस पर देय ब्याज की राशि को लौटाने में असमर्थ रहती है। ऐसी दशा में यह भी सिद्ध कर दिया जाता है कि कम्पनी ने उस धन का निक्षेप किन्ही कपटपूर्ण उद्देश्यों के लिए या निक्षेपकर्ताओं के साथ कपट करने के उद्देश्य से प्राप्त किया गया था। उस स्थिति में उस कम्पनी का प्रत्येक अधिकारी जो उन धन-निक्षेप को प्राप्त करने के लिए उत्तरदायी है वे सभी उस निक्षेपित धन एवं ब्याज को लौटाने के लिए व्यक्तिगत रूप से ■ उत्तरदायी होंगे। वे धन-निक्षेपकर्ताओं द्वारा उठायी गयी सभी क्षतियों की पूर्ति के लिए असीमित रूप से व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे।

(7) सूत्रधारी एवं सहायक कम्पनी की दशा में यह तथ्य सुस्पष्ट है कि सूत्रधारी कम्पनी एवं उसकी सहायक प्रत्येक कम्पनी का अपना-अपना पृथक् वैधानिक अस्तित्व होता है। किन्तु प्रत्येक सूत्रधारी कम्पनी को अपना एवं अपनी सभी सहायक कम्पनियों का एक समेकित (Consolidated) वित्तीय विवरण तैयार करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक सूत्रधारी कम्पनी को इस समेकित वित्तीय विवरण को अपने स्वयं के पृथक् वित्तीय विवरण के साथ अपनी वार्षिक साधारण सभा में भी प्रस्तुत करना पड़ता है।

(8) कम्पनी का अवैध या अनुचित उद्देश्यों के लिए उपयोग करने पर यदि कम्पनी प्रारूप का उपयोग किसी अवैध या अनुचित उद्देश्य के लिए किया जा रहा है तो भी न्यायालय कम्पनी को

बेनकाब कर सकता है।

(9) कम्पनी के वास्तविक चरित्र को निर्धारित करने के लिए कभी-कभी किसी कम्पनी से सम्बन्धित विवाद में ऐसे अवसर आते हैं जबकि कम्पनी की वास्तविक प्रकृति को निश्चित या निर्धारित करना पड़ता है। उदाहरण के लिए किन्हीं कम्पनियों के संचालक-मण्डल आपस में गुंथे हुए हैं अथवा नहीं; कोई कम्पनी किसी समूह या प्रबन्ध विशेष से सम्बन्ध रखती है अथवा नहीं कोई कम्पनी शत्रु कम्पनी है अथवा नहीं आदि अनेक प्रश्न हो सकते हैं। इन जैसे अनेक प्रश्नों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के लिए न्यायालय को कम्पनी का वैधानिक पर्दा उठाना पड़ता है और उसकी वास्तविकता का पता लगाना पड़ता है।

(10) सरकारी आय की सुरक्षा के लिए कभी-कभी कुछ लोग कम्पनी का निर्माण सरकारी करों से बचने के लिए भी करते हैं। ऐसी दशा में आयकर अधिकारी तथा न्यायालयों को अधिकार होता है कि वे कम्पनी को बेनकाब कर दें तथा उसके पर्दे के पीछे बैठे सदस्यों को इस दण्डनीय अपराध के लिए उत्तरदायी ठहरा सकें।