मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के उद्देश्य एवं महत्व बताइए तथा इसके प्रमुख लक्षणों को उल्लेखित कीजिए।

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मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का मुख्य उद्देश्य मानव अधिकारों के संरक्षण हेतु और उन्हें प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन करना तथा मानव अधिकारों के उल्लंघन पर उचित न्याय दिलाने हेतु मानव अधिकार न्यायालय का गठन करना है।

अधिनियम का महत्व (Importance of the Act)

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का मुख्य उद्देश्य मानव अधिकारों के संरक्षण हेतु और उन्हें प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन करना तथा मानव अधिकारों के उल्लंघन पर उचित न्याय दिलाने हेतु मानव अधिकार न्यायालय का गठन करना है।

अधिनियम का महत्व (Importance of the Act) •

संविधान के अतिरिक्त मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का निर्माण मानव अधिकार संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रयास है परन्तु इस अधिनियम में मानव अधिकारों को सीमित कर दिया गया है तथा आयोगों को भी विशिष्ट अधिकार नहीं दिये गये हैं। आयोग केवल सुझाव दे सकता है, उनको लागू कराने का अधिकार आयोग को नहीं है, फिर भी उपरोक्त प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के प्रमुख लक्षण/विशेषताएँ

1. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 सम्पूर्ण भारत में लागू है, परन्तु जम्मू एवं कश्मीर के मामले में यह उन्हीं विषयों में लागू होगा जो संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 1 या सूची 2 में वर्णित हैं।

2. इस अधिनियम की धारा 2 (घ) में ‘मानव अधिकारों’ को व्यक्तियों के जीवन, स्वतन्त्रता, समानता एवं गरिमा के संविधान में गारंटीकृत अधिकार तथा अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदाओं में निहित तया भारत में न्यायालयों में प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में परिभाषित किया गया है।

3. अधिनियम में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना का उपबन्ध है।

4. अल्पसंख्यकों, महिलाओं तथा अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के सम्बन्ध में राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्षों को भी विनिर्दिष्ट कार्यों के निर्वहन के लिए आयोग के सदस्य समझ जाएगा।

5. मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 30 में मानवाधिकारों के उल्लघंन से उत्पन्न अपराधों के शीघ्र विचारण हेतु प्रत्येक जिले में एक मानव अधिकार न्यायालय बनाये जाने का उपबन्ध है।

6. अधिनियम में प्रत्येक मानव अधिकार न्यायालय के लिए एक विशेष लोक अभियोजक की भी व्यवस्था है।

7. मानव अधिकारों के संरक्षण अधिनियम की धारा 36 (2) के अनुसार राष्ट्रीय आयोग या राज्य आयोग किसी ऐसे मामले की जाँच नहीं कर सकते हैं जिसमें मानव अधिकारों के अभिकथित उल्लंघन की तिथि से एक वर्ष का समय बीत चुका है।

8. अधिनियम में केवल उन्हीं मानवाधिकारों का उल्लेख है जो संविधान में प्रत्याभूत हैं अथवा जिन्हें भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदाओं में स्वीकार किया है एवं जो भारत के न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं।

अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के मुख्य प्रावधान (Main Provisions of the Protection of Human Rights Act, 1993)

(1) अधिनियम में कुल आठ अध्याय तथा 43 धाराएँ हैं।

(2) अधिनियम की धारा 1 (3) के अनुसार उक्त अधिनियम 28 सितम्बर, 1993 से प्रवृत्त माना जाएगा।

(3) राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (National Human Rights Commisions) अधिनियम की धारा 3 के प्रावधानों के तहत् मानव अधिकारों के संरक्षण हेतु केन्द्रीय सरकार राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन कर सकती है। इस आयोग में 8 सदस्य होते हैं तथा अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय का पूर्व मुख्य न्यायाधीश होता है। सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष तक की आयु तक होता है। सदस्यों की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर राष्ट्रीय द्वारा की जाती है।

(4) राज्य मानव अधिकार आयोग (State Human Rights Commision) – अधिनियम की धारा 21 के प्रावधानों के अन्तर्गत राज्य सरकार एक राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन कर सकती है, जिसमें अध्यक्ष के रूप में उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को नियुक्त किया जाता है। नियुक्ति समिति की सिफारिश पर राज्यपाल द्वारा 5 वर्ष के लिये या 70 वर्ष तक के लिये की जाती है।

(5) आयोग द्वारा जाँच (Inquiry by the Commision)- मानव अधिकार आयोग को मानव अधिकार उल्लंघन की शिकायत प्राप्त होने पर वह उस शिकायत की जाँच करने का अधिकार रखता है। शिकायत की जाँच में वह राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय एजेन्सियों की सहायता ले सकता है। आयोग अपनी कार्यवाहियों को प्रकाशित करने का अधिकार भी रखता है।

(6) मानव अधिकार न्यायालय (Human Rights Court) अधिनियम की धारा 30 में यह प्रावधान किया गया है कि मानव अधिकारों के उल्लंघन के अपराधों की शीघ्र सुनवाई हेतु राज्य सरकार प्रत्येक जिले में उच्च न्यायालय की सहमति से एक मानव अधिकार न्यायालय बना सकती है। ऐसे न्यायालयों में कार्यवाही करने हुए विशिष्ट लोक अभियोजक की भी नियुक्ति की जा सकती है।

(7) अधिनियम की धारा 15 के अन्तर्गत आयोग के समक्ष झूठा साक्ष्य देने पर अभियोग चलाने का उपबन्ध है।

(8) सदस्य एवं अधिकारी लोक सेवक होंगे-अधिनियम की धारा 39 के अनुसार आयोग, राज्य आयोग का प्रत्येक सदस्य एवं इस अधिनियम के अधीन कृत्यों का प्रयोग करने के लिए आयोग या राज्य आयोग द्वारा नियुक्त प्रत्येक अधिकारी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 21 के अन्तर्गत लोक सेवक समझा जाएगा।

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का मूल्यांकन-मानव अधिकारों के संरक्षण एवं अनुपालन के लिये संविधान के उपबन्धों के अतिरिक्त, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का पारित होना एक मील का पत्थर तथा स्वागत योग्य कदम है। यद्यपि मानव अधिकारों के संरक्षण एवं अनुपालन के प्रत्येक उपाय का स्वागत किया जाना चाहिये। यह स्वीकार करना की ही पड़ेगा कि मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम में कई कमियाँ तथा त्रुटियाँ हैं जो संक्षेप में निम्नलिखित है

सर्वप्रथम, राष्ट्रीय मानव अधिकार कमीशन की स्वायत्तता एवं क्षमता के बारे में कई अस्पष्टतायें हैं।

द्वितीय, अधिनियम की धारा 2 (घ) में “मानव अधिकारों” की परिभाषा बड़ी संकीर्ण है। मानव अधिकारों को केवल व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता एवं गरिमा से सम्बन्धित अधिकारों तक सीमित करना उचित नहीं है। तृतीय, राज्य मानव अधिकार कमीशनों की स्थापना को आदेशात्मक एवं अनिवार्य नहीं बताया गया है।

चतुर्थ, अधिनियम में प्रत्येक जिले में मानव अधिकार न्यायालय की अधिकारिता को अधिनियम में स्पष्ट नहीं किया गया है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि जब ऐसे न्यायालयों में मानव अधिकारों के उल्लंघन के मुदकमे चलाये जायेंगे तो क्या प्रक्रिया अपनायी जायेगी। पंचम, राष्ट्रीय मानव अधिकार कमीशन के पास अनुशासित का सर्वथा अभाव है।

छठा, राष्ट्रीय मानव अधिकार कमीशन के पास कोई स्वतंत्र एवं पृथक् जाँच एजेन्सी नहीं है तथा इसके लिये इसे सरकारी अधिकारियों एवं जाँच एजेन्सी पर निर्भर रहना पड़ता है। नहीं है। सातवीं तथा अन्तिम, सेशन न्यायालय को मानव अधिकार न्यायालय विनिर्दिष्ट करना उचित उपर्युक्त वर्णित कमियों एवं दुर्बलताओं के बावजूद, राष्ट्रीय मानव अधिकार कमीशन ने थोड़े समय में ही प्रशंसनीय कार्य किया है। इसमें कुछ मामलों में विशेषकर अभिरक्षा में होने वाली हिंसा एवं मृत्यु, बलात्कार, यंत्रणा, पुलिस द्वारा झूठी मुठभेड़, तथा पुलिस ज्यादतियों आदि में महत्वपूर्ण योगदान किया है। अधिनियम में संशोधन करके इसकी कमियों, त्रुटियों एवं दुर्बलताओं को दूर किया जाना चाहिये जिससे मानव अधिकारों के संरक्षण एवं अनुपालन की व्यवस्था को सशक्त एवं प्रभावी बनाया जा सके तथा इस अधिनियम को मानव अधिकारों के संरक्षण एवं अनुपालन के लिये एक आदर्श अधिनियम बनाया जा सके।

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