मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 द्वारा स्थापित मानवाधिकार आयोग की शक्तियों एवं उसके कार्यों की विवेचना कीजिए।

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की संरचना (Composition of National Human Rights Commssion)

इस आयोग की संरचना केन्द्रीय सरकार करेगी [धारा 2 (5)] इसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे

(क) अध्यक्ष या सभापति जो उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति रहा हो;

(ख) एक सदस्य जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा हो,

(ग) एक सदस्य जो उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति है या रहा हो; (घ) दो सदस्यों की नियुक्ति ऐसे व्यक्तियों में से की जाएगी जिन्हें मानवाधिकारों का ज्ञान या

व्यावहारिक अनुभव हो।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ (ए. आई. आर. 2005 एस. सी. 2419) में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 3 (2) किसी वर्ग के व्यक्ति को राष्ट्रीय मानवाधिकार कमीशन के सदस्य के रूप में नियुक्ति से अपवर्जित नहीं करती है यदि उसमें मानवाधिकारों का ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है।

उपर्युक्त सदस्यों के अतिरिक्त धारा 12 में खण्ड (ब) से लेकर (ज) में उल्लिखित कार्यों के सम्पादन में अल्पसंख्यकों के राष्ट्रीय आयोग, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के राष्ट्रीय आयोग तथा महिलाओं के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष मानवाधिकार राष्ट्रीय आयोग के सदस्य माने जाएँगे [ धारा 3 (1)]। इस प्रकार राष्ट्रीय आयोग में कुल 8 सदस्य होंगे। आयोग का एक महासचिव होगा जो मुख्य कार्यकारी अधिकारी होगा तथा आयोग द्वारा सौंपे गए कार्यों को करेगा [धारा 3 (4)] आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा। केन्द्र सरकार की पूर्वानुमति से आयोग अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकता है।

आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति-आयोग का गठन राष्ट्रपति करेगा। इसके अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति के पूर्व एक समिति की संस्तुतियाँ प्राप्त की जाएँगी। इस समिति के सदस्य निम्नलिखित होंगे (क) प्रधानमंत्री – अध्यक्ष, (ख) लोकसभा का अध्यक्ष, (ग) गृहमंत्री, (घ) लोकसभा में विपक्ष का नेता और (ङ) राज्य सभा का उपाध्यक्ष आयोग के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में उच्चतम न्यायालय का कोई विद्यमान न्यायमूर्ति या उच्च न्यायालय का कोई मुख्य न्यायमूर्ति तब तक नियुक्त नहीं किया जाएगा जब तक इस संबंध में भारत में मुख्य न्यायमूर्ति से सलाह नहीं ले ली जाती है।

अध्यक्ष या सदस्य की नियुक्ति इस आधार पर अवैध नहीं मानी जाएगी कि समिति के किसी सदस्य का पद रिक्त है।

सदस्यों की पदावधि-अध्यक्ष के पद पर नियुक्त व्यक्ति की पदावधि उस समय से पाँच वर्ष होगी। जब वह पद ग्रहण करता है या जब उसकी आयु 70 वर्ष की हो जाती है, इसमें से जो भी पूर्व हो । सदस्य की पदावधि उस समय में 5 वर्ष होगी जब वह अपना पद ग्रहण करता है तथा उसकी पुनः नियुक्ति पाँच वर्ष के लिए हो सकती है। कोई भी सदस्य 10 वर्ष की आयु पूरा करने पर सदस्य नही बना रहेगा। अधिनियम की धारा 6 के अनुसार आयोग के अध्यक्ष या सदस्य कार्यकाल की समाप्ति के पश्चात् केन्द्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा किसी पद पर नियोजन के लिए अयोग्य होंगे। यह उपबन्ध बड़ा ही सराहनीय है।

आयोग के किसी सदस्य का हटाया जाना—अधिनियम की धारा 5 के अनुसार अध्यक्ष या किसी सदस्य को राष्ट्रपति के आदेश से सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर तभी हटाया जाएगा जब राष्ट्रपति के निर्देश करने पर उच्चतम न्यायालय यह जाँच करके रिपोर्ट दे देती है कि अध्यक्ष या सदस्य को उक्त आधार पर हटाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति अध्यक्ष या किसी सदस्य को आदेश द्वारा निम्नलिखित में से किसी आधार पर हटा सकता है

(क) दिवालिया घोषित होने पर; या

(ख) अपने पद की अवधि में अपने पद के कर्तव्यों के अतिरिक्त रोजगार करने पर या

(ग) मस्तिष्क या शरीर की अयोग्यता को कारण कार्य करने में अयोग्यता होना, या

(घ) किसी सक्षम न्यायालय द्वारा अस्वस्थ चित्त घोषित किया जाना, या (ङ) किसी अपराध में सिद्ध दोष होना या जेल होना जो राष्ट्रपति के मत में अनैतिक है। इस प्रकार

मानव अधिकार राष्ट्रीय आयोग की संरचना एक स्वतंत्र निकाय के रूप में की गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कृत्य तथा शक्तियाँ-मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अध्याय 3 में आयोग के कृत्य एवं शक्तियों का उल्लेख है। अधिनियम की धारा 12 के अनुसार आयोग निम्नलिखित सभी या इनमें से कोई कार्य सम्पादित कर सकता है

(क) स्वतः या पीड़ित व्यक्ति (द्वारा (i) मानवाधिकारों के उल्लंघन या उसके दुष्प्रेरण, या (ii) किसी लोक सेवक द्वारा ऐसे उल्लंघन को रोकने में उपेक्षा याचिका पर जाँच

(ख) मानवाधिकार के उल्लंघन के आरोप से संबंधित किसी ऐसी कार्यवाही में ऐसे न्यायालय की अनुमति से हस्तक्षेप करना जबकि उस न्यायालय में वाद लम्बित है;

(ग) राज्य सरकार को सूचना देकर राज्य सरकार के नियंत्रण में कोई जेल या अन्य संस्था जहाँ व्यक्ति निरुद्ध किए जाते हैं या इलाज, सुधार या संरक्षण के लिए रखे जाते हैं। उनके रहने की दशाओं का अध्ययन करने तथा उस पर संस्तुति करने के लिए जाकर निरीक्षण करना;

(घ) मानवीय अधिकारों के संरक्षण के लिए संविधान या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में दी गई सुरक्षाओं का पुनरीक्षण करने तथा उनके प्रभावी अनुपालन के लिए उपयोगी अनुशंसा करना;

(ङ) मानवाधिकारों के उपभोग में बाधक तत्व, जिनमें आतंकवाद के कार्य सम्मिलित हैं, का पुनरीक्षण करना तथा उपयुक्त उपाय की अनुशंसा करना;

(च) मानवाधिकारों पर सन्धियाँ तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय लिखत का अध्ययन करने तथा उनके प्रभावी अनुपालन के लिये संस्तुति (recommendation) करना;

(छ) मानवाधिकार के क्षेत्र में अनुसंधान तथा प्रोन्नति करना; (ज) प्रकाशन, माध्यम (media), संगोष्ठी (seminar) तथा अन्य उपलब्ध साधनों द्वारा मानवाधिकार साक्षरता का प्रसार समाज के विभिन्न वर्गों में करना तथा इन अधिकारों के संरक्षण के लिए उपलब्ध सुरक्षाओं की जागरूकता की प्रोन्नति करना;

(झ) मानवाधिकार के क्षेत्र में गैर-सरकारी संगठनों तथा संस्थाओं के प्रयासों को प्रोत्साहित करना;

(ञ) ऐसे अन्य कार्य जिन्हें आयोग मानवाधिकारों की प्रोन्नति के लिए आवश्यक समझे। आयोग उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के अनु 32 के अधीन अधिकारिता के प्रयोग में जारी

किये गये निर्देशों के अनुसार में कार्य करेगा। उच्चतम न्यायालय ने परमजीत कौर बनाम स्टेट ऑफ पंजाब (AIR 1999 SC 340) के वाद में कहा है कि-‘आयोग’ इस न्यायालय के द्वारा जारी किये गये निर्देशों के अनुसरण में कार्य करेगा तथा उस अधिनियम के अधीन कार्य करेगा तथा उस अधिनियम के अधीन काम नहीं करेगा जिसके अन्तर्गत इसका गठन किया गया है।

जाँच से संबंधित शक्तियाँ (Powers relating to Enquiries)- मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 13 के अन्तर्गत शिकायतों की जाँच करने के संबंध में आयोग को वे सारी शक्तियाँ प्राप्त हैं जो एक सिविल व्यायालय को किसी वाद की सुनवाई करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अन्तर्गत होती हैं। आयोग को यह शक्ति प्राप्त है कि वह किसी भी व्यक्ति को ऐसे मामलों पर सूचना देने को कह सकता है जो आयोग के मत में उपयोगी है। ऐसा व्यक्ति भारतीय दण्ड संहिता की धारा 176 तथा 177 के अर्थ के भीतर ऐसी सूचना भेजने को बाध्य है। परन्तु ऐसा उपबंध ऐसे विशेषाधिकार के अध्ययीन है जिसका दावा ऐसा व्यक्ति तत्समय विधि के अन्तर्गत करता है। जहाँ कोई

ऐसा अपराध जो भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 175, 178, 179, 180 या 228 में उल्लिखित है, आयोग के मत या उसकी उपस्थिति में होता है तो आयोग को एक सिविल न्यायालय माना जाएगा तथा आयोग दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अनुसार तथ्यों को रिकॉर्ड करके ऐसे मजिस्ट्रेट को प्रेषित करेगा और ऐसा मजिस्ट्रेट शिकायत की सुनवाई उसी प्रकार करेगा जैसे वाद का दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 176 के अन्तर्गत प्रेषित किया गया है।

अन्वेषण (Investigation) – धारा 14 के अनुसार अन्वेषण करने के प्रयोजन से आयोग केन्द्र सरकार या राज्य सरकार किसी अधिकारी या अन्वेषण अधिकारी की सेवाओं का प्रयोग केन्द्र सरकार या राज्य सरकार की सम्मति से कर सकता है। आयोग के नियंत्रण तथा निर्देश के अधीन अन्वेषण से संबंधित प्रयोजन से ऐसा अधिकारी या अभिकरण निम्नलिखित कार्य कर सकता है

(क) किसी व्यक्ति को बुलाना, उसकी उपस्थिति को सुनिश्चित करना तथा परीक्षा करना; (ख) किसी दस्तावेज की खोज तथा उसका प्रस्तुतिकरण; (ग) किसी कार्यालय से सार्वजनिक रिकार्ड या उसकी प्रतिलिपि माँगना ।

शिकायतें जिनका विचार आयोग नहीं कर सकता है मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 36 के अनुसार आयोग को निम्नलिखित मामलों में जाँच करने की अधिकारिता नहीं होगी- (1) ऐसे मामले जो किसी राज्य आयोग या किसी अन्य आयोग में जो किसी विधि के अन्तर्गत स्थापित किये गये हैं, में लम्बित हैं। (2) आयोग ऐसे किसी मामले में जाँच नहीं करेगा जिसके मानवाधिकारों के उल्लंघन का कृत्य होने की तिथि से एक वर्ष का समय बीत चुका है। कार्य (Functions) – आयोग कार्य निम्नलिखित है

1. मानव अधिकार उल्लंघन की याचिकाओं की जाँच करना,

2. मानव अधिकारों से सम्बन्धित न्यायालयों में लम्बित मामलों में न्यायालय की अनुमति से हस्तक्षेप करना,

3. सूचना देकर जेल तथा अन्य सुधार संस्थाओं का निरीक्षण करना,

4. संविधान में उल्लिखित मूल अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव देना,

5. मानव अधिकारों के उपयोग में बाधक तत्वों को दूर करने के उपायों को बताना,

6. मानव अधिकारों से संबंधित अन्तर्राष्ट्रीय विधि का अध्ययन कर उन्हें प्रभावी बनाने हेतु उपाय सुझाना,

7. मानवीय अधिकारों के क्षेत्र में अनुसंधान करना,

8. अन्य ऐसे कार्य जिन्हें वह उचित समझे।

क्षेत्राधिकार या शक्तियाँ (Powers)-आयोग को किसी शिकायत की जाँच करते समय वे सभी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं जो कि किसी एक व्यवहार न्यायालय को प्राप्त होती हैं। इसके अलावा आयोग को कुछ दाण्डिक शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। अधिनियम की धारा 21(5) के अनुसार, राज्य आयोग मानव अधिकारों के उल्लंघन के उन्हीं मामलों की जाँच कर सकता है जो संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 2 एवं 3 में उल्लिखित हैं। इस प्रकार राज्य आयोग उन मानवाधिकारों के उल्लंघनों की जाँच नहीं कर सकता है जो संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 1 में उल्लिखित हैं।

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