भारत में मानव अधिकार प्रतिमानों के प्रभाव पर एक लेख लिखिए।

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उत्तर-पेरिस में, संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में 10 दिसम्बर, 1948 की साधारण सभा द्वारा (दुर्ग वि. वि. बी. ए. 2019 ) मानव अधिकारों सम्बन्धी घोषणा तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के लागू होने के पश्चात् एक बात देखने में आई कि भारत सहित ऐसे लोकतान्त्रिक देश जो द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् स्वाधीन हुए उन्होंने अपने यहाँ मानव अधिकारों की महत्ता को समझते हुए इन्हें संवैधानिक रूप से अपना लिया। कहीं संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से, तो कहीं अन्य स्वरूप में। हालाँकि मानव अधिकारों से सम्बन्धित प्रावधान इन देशों ने अपने पारम्परिक सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिवेश के रूप में स्वीकार किया किन्तु इसकी महत्ता को स्वीकार अवश्य किया। यही स्थिति भारत में भी रही।

भारत में मानव अधिकारों के प्रतिमानों का प्रभाव (Impect of Human Rights Norms in India)

भारत में मानव अधिकारों की धारणा अपनाना कोई नई बात नहीं है। भारतीय सन्दर्भ में देखें-

तो आर्य संस्कृति के इतिहास में मानव अधिकारों की कल्पना तथा व्याख्या वेद-वाक्यों में निहित है। ऋग्वेद में कहा गया है कि कोई किसी से श्रेष्ठ अथवा निम्न नहीं है। सभी बराबर भाई-भाई हैं। ” इसी प्रकार अथर्ववेद में कहा गया है कि “मानव एक व्यक्ति मात्र नहीं है, अपितु वह एक सामाजिक अंग है। परमात्मा उसी को प्रेम करता है जो कि अन्य इंसानों, जानवरों तथा प्राणियों की सेवा करता है अथवा जीवन दे देता है। ”

स्वाधीनता पश्चात् गणतंत्रीय भारत का अपना एक संविधान तैयार हुआ, तो संविधान निर्माताओं ने भी इस बात को स्वीकार किया कि देश के नागरिकों के मानव अधिकारों के प्रावधान करने एवं उनके संरक्षण की आवश्यकता है और उसके लिए समुचित उपाय किये जाने चाहिए। इसके लिए जो प्रयास किये गये उनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं

1. संविधान के अन्तर्गत मानव अधिकार भारत के संविधान निर्माताओं ने संविधान के अन्तर्गत ही मानव अधिकारों से सम्बन्धित प्रावधान किये हैं। इसके लिए संविधान की प्रस्तावना में ही स्पष्ट कर दिया है कि देश के नागरिकों को समस्त सामाजिक, नागरिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार, न्याय विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता आस्था, आदि से सम्बन्धित अधिकार दिये गये हैं। इसके लिए संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में आवश्यकतानुसार अलग-अलग एवं स्पष्ट जिक किया गया है। साथ ही संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकार, मौलिक कर्त्तव्य, राज्य के नीति निदेशक सम्बन्धी तत्वों का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रावधान करना मानव अधिकारों की धारणा की स्वकारोक्ति कहा जा सकता है।

2. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993- संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सुझाए गए मानव अधिकारों से सम्बन्धित बिन्दुओं को व्यावहारिक स्वरूप देने के उद्देश्य से, उनमें आंशिक संशोधन करते हुए भारत सरकार ने देशवासियों के मानव अधिकारों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए एक कानून का निर्माण किया, जिसे मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 नाम दिया गया तथा इसके अन्तर्गत देश में एक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, राज्यों में राज्यस्तरीय राज्य मानव अधिकार आयोग तया मानव अधिकार न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान कर इनकी स्थापना की गई। इसके लिए इनके संगठन, अधिकार बजट आदि का स्पष्ट प्रावधान किया गया है।

भारत का राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (National Human Rights Commission of India)

मानव अधिकारों के संरक्षण के उद्देश्य से, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत भारत में राष्ट्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का कार्यालय सरदार पटेल, भवन, संसद मार्ग, दिल्ली में स्थित है। इस आयोग के कार्य वैसे तो बहुमुखी हैं, लेकिन इसका प्रमुख कार्य मानव अधिकारों का संरक्षण करना है और शेष अन्य कार्य भी इसी से सम्बन्धित हैं।

स्वप्रेरणा व पीड़ित व्यक्ति अथवा अन्य किसी और व्यक्ति द्वारा उस व्यक्ति की शिकायत किए जाने पर उस विषय में जाँच करता है (i) किसी लोक सेवक द्वारा मानव अधिकारों का अतिक्रमण या उनका दुष्प्रेरणा, या (ii) ऐसे अतिक्रमण के निवारण में उसके द्वारा उपेक्षा

मानव अधिकारों के उल्लंघन से सम्बन्धित किसी न्यायालय में लम्बित विषय में ध्यान न देना। राज्य सरकार को सूचना देकर राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी जेल या अन्य संस्था का, जहाँ व्यक्ति उपचार सुधार या संरक्षण के प्रयोजनों के विरुद्ध दाखिल किए जाते हैं, वहाँ के निवासियों के जीवन की परिस्थितियों का अध्ययन करने हेतु निरीक्षण पर सिफारिश करता है।

संविधान अथवा राज्य किसी विधि में मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए वैधिक रक्षा उपायों की समीक्षा कर, उनकी सफल क्रियान्वित के लिए सुझाव देता है। मानव अधिकारों के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करने वाली समस्याओं तथा आतंकवादी कार्यों का पुनरावलोकन और समुचित उपचारात्मक उपायों की सिफारिश करता है।

मानव अधिकार सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय संधि समझौते का अध्ययन कर, उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सुझाव देता है। मानव अधिकारों के क्षेत्र में अनुसंधान या शोध करता है। मानव अधिकारों के सम्बन्ध में समाज और देश में जागरूकता उत्पन्न करता है और उन अधिकारों के संरक्षण हेतु सेमिनार, संगोष्ठी का आयोजन तथा मीडिया के माध्यम से प्रचार करता है।

मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत गैर सरकारी संगठनों और संस्थानों के प्रयासों को प्रोत्साहित करता है। यह मानव अधिकारों की रक्षार्थ सभी आवश्यक कार्य सम्पन्न करता है।

राज्य मानव अधिकार आयोग (State Human Rights Commission)

जिस प्रकार भारत में मानव अधिकार संरक्षण हेतु राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का प्रावधान किया गया है, उसी तरह भारत के राज्यों (प्रान्तों) में भी मानव अधिकार संरक्षण हेतु उक्त अधिनियम में राज्यों के लिए राज्य स्तरीय मानव अधिकार आयोग के गठन का प्रावधान भी रखा गया है। पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर, असम, महाराष्ट्र, उड़ीसा, आन्ध्रप्रदेश, म.प्र., केरल, कर्नाटक, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में स्थापना हो चुकी है।

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