पारिस्थितिक तन्त्र में खाद्य शृंखला या भोजन चक्र की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।

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भोजन ऊर्जा ग्रहण करने के लिये निरन्तर भक्षण प्रक्रिया को दोहराने से जीवधारियों में ऊर्जा के आदान-प्रदान की जो श्रृंखला बनती है, उसे भोजन चक्र कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, भोजन चक्र जीवधारियों के उस समूह में सम्पन्न होने वाली प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत विभिन्न जीवधारी भोज्य एवं भोजक के रूप में एक-दूसरे से सम्बन्धित रहते हैं तथा इस प्रक्रिया में खाद्य ऊर्जा भोज्य से भोजक को स्थानान्तरित होती रहती है।

श्रृंखला

सूर्य, ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत होता है। सौर ऊर्जा की सहायता से विभिन्न प्रकार की हरी वनस्पतियाँ भूमि और वायु से विभिन्न पदार्थ लेकर भोजन निर्माण कर अपनी वृद्धि करती हैं। चूँकि समस्त जैविक समुदाय में हरे पौधे सर्वप्रथम ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत या उत्पादक कहलाते हैं, इन हरी वनस्पतियों का भक्षण शाकाहारी जन्तु प्राथमिक उपभोक्ता कहलाते हैं।

शाकाहारी वस्तुओं (प्राथमिक उपभोक्ता) का शिकार द्वारा भक्षण करने वाले माँसाहारी सजीव तथा सर्वहारी जीव द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumets) कहलाते हैं। सर्वहारी जीव मानव, शाकाहारी तथा माँसाहारी जीवों का भक्षण करने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों का उपभोग अपनी उदरपूर्ति के लिये करता है। वनस्पतियों तथा प्राणियों की मृत्यु हो जाने पर सूक्ष्मजीवों को बैक्टीरिया तथा कवक मृत जीवों का विघटन कर उसे जीवांश के रूप में मिट्टी में मिलाकर मिट्टी को उपजाऊ बना देते हैं। भूमि पर वनस्पति पुनः मिट्टी से उपजाऊ तत्व तथा जल प्राप्त कर सौर ऊर्जा की उपस्थिति में भोजन निर्माण कर अपनी वृद्धि करते रहते हैं तथा अन्य जीवों के लिये भोजन तैयार करते हैं। इस प्रकार यह चक्र लगातार चलता रहता है, जिसे भोजन चक्र कहा जाता है। इस चक्र में आहार ऊर्जा का स्थानान्तरण तथा संचलन निम्न पोषण स्तर से उच्च पोषण स्तरों में शृंखलाबद्ध रूप में चलता रहता है, इसीलिये इये आहार श्रृंखला भी कहा जाता है।

खाद श्रृंखला के प्रकार-भोजन शृंखला निम्नलिखित तीन प्रकार की हो सकती है (1) परिभक्षी शृंखला- इस प्रकार के भोजन चक्र में पौधों से शृंखला प्रारम्भ होकर छोटे जीव-जन्तुओं से क्रमशः बड़े जन्तुओं की ओर जाती है। (2) परजीवी शृंखला- यह शृंखला पौधों से प्रारम्भ होकर बड़े जीवों से छोटे जीवों की ओर जाती

है। (3) मृतोपजीवी शृंखला-भोजन चक्र की वह श्रृंखला मृत जीवों से सूक्ष्म जीवों (Micro Organisms) की ओर चलती है।

ओडम ने भोजन शृंखला को निम्नलिखित दो मूल प्रकारों में वर्गीकृत किया है (1) चारण आहार शृंखला- यह श्रृंखला हरे पौधों (उत्पादक) से प्रारम्भ होकर शाकाहारी (प्राथमिक

भोजन) जन्तुओं के माध्यम से माँसाहारी (द्वितीयक व तृतीयक भोजन) जन्तुओं पर जाकर समाप्त होती है। उदाहरण-पादप -प्लवक (प्लैक्ट) प्राणीप्लवक-छोटी मछली-बड़ी मछली-मानव

(2) अपरद आहार शृंखला यह शृंखला मृत कार्बनिक पदार्थों से प्रारम्भ होकर सूक्ष्म जीवाणुओं के माध्यम से अपरद जीवों का भक्षण करने वो माँसाहारी जीवों की ओर जाती है। उदाहरण-मृत पादप पदाय + सूक्ष्मजीव अपरदन घोंघा झाऊ चूहा → उल्लू ।

(b) खाद्य जाल (Food Web)

खाद्य श्रृंखला के अनुसार प्रत्येक पोषण स्तर अगले पोषण स्तर से सीधे सम्बन्धित होती है। प्राकृतिक स्थितियों में केवल एक खाद्य श्रृंखला का कार्यरत होना असम्भव है, अपितु खाद्य श्रृंखलाएँ, एक-दूसरे के साथ परस्पर सम्बन्ध दिखाती हैं और अन्तर्ग्रथित (Interlocking) नमूना (Pattern) बना लेती हैं। इस प्रकार अनेक खाद्य शृंखलाओं को एक समय कार्यरत होने के जाल (food web) बन जाता है। खाद्य शृंखला में पौधों को चूहे खाते हैं, परन्तु इसके अतिरिक्त पौधों को खरगोश भी खा सकते हैं। चूहों को सौंप के अतिरिक्त दूसरे प्राणी तथा साँप को बाज (hawk) के अतिरिक्त मोर भी खा सकते हैं। इस प्रकार से एक समुदाय के अनेक प्रकार की खाद्य शृंखलाएँ जुड़ी हुई होती हैं और एक खाद्य जाल का क्रियात्मक रूप लेती है।

खाद्य जाल के वैकल्पिक पथ (alternative pathways) खाद्य शृंखला में नहीं पाये जाते। यह खाद्य जाल की स्थिरता बनाये रखने के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि खरगोशों की संख्या किसी क्षेत्र में कम हो जाती है तो उल्लुओं (owls) के भूखे मर जाने की आशा की जाती है, परन्तु खरगोश के कम होने से अधिक घास बची रहती है और चूहों की संख्या बढ़ने में मदद करती है। ऐसी अवस्था में उल्लू खरगोशों के स्थान पर चूहे खाने लगते हैं और बचे हुए खरगोशों को मूल मात्रा में पुनः बढ़ने का अवसर देते हैं। खाद्य जाल में जितने अधिक वैकल्पिक रास्ते होंगे, जीवधारियों के समुदाय की उतनी ही अधिक व स्थिर होने की सम्भावनाएँ बढ़ जायेंगी।

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