जल संसाधन क्या है ? जल संसाधन की उपयोगिता एवं संरक्षण को समझाइए

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उत्तर-जल ही जीवन का आधार है क्योंकि कोई भी आर्थिक कार्य ऐसा नहीं है जो जल के बिना सम्भव हो। जल धुलाई-सफाई, कृषि, उद्योग, विद्युत उत्पादन आदि के लिए आवश्यक है। जनसंख्या वृद्धि के दबाव में एक ओर जहाँ उपलब्ध जल-संसाधन विकसित हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर तीव्र दर पर जल स्रोत खाली भी होते जा रहे हैं। यह स्थिति जल उपयोग एवं कृषि पर्यावरण क्षेत्र के संरक्षण की एक एकीकृत योजना की आवश्यकता को रेखांकित करती है ताकि सिचाई मानव एवं पशु उपभोग, उद्योग विस्तार, मनोरंजन, जलविद्युत शक्ति उत्पादन तथा जल परिवहन की बढ़ती माँगों से निवा जा सके। जल एक बहुमूल्य संसाधन है, जो अविभाज्य है इसलिए इसका उपयोग सम्पूर्ण रूप में एक बेसिन के लिए नियोजित होना चाहिए।

जल संसाधन के स्रोत (Sources of Water Resources)-जल संसाधनों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-(i) सतही जल संसाधन, (ii) भूमिगत जल संसाधन। इसमें प्रत्येक श्रेणी पृथ्वी की जल प्रवाह प्रणाली का एक भाग है जिसे ‘जल चक्र’ कहा जाता है। जल चक्र की उत्पत्ति वर्षण द्वारा होती है। दोनों श्रेणियाँ एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा एक का लाभ स्पष्ट दूसरे की हानि है। जल के विभिन्न स्रोतों की विवेचना निम्न प्रकार से की गयी है

(a) सतही जल संसाधन (Surface Water Resources)-

1. वर्षापात (Rainfall)-वर्षा जल का प्रमुख स्रोत है जिससे पृथ्वी उपस्थित सभी जल स्रोतों को जल प्राप्त होता है। भारत में औसतन 118 सेमी. वर्षा होती है। भारत के जल संसाधनों का एक बहा अनुपात उन क्षेत्रों में है जहाँ औसतन 100 सेमी. वार्षिक वर्षापात होता है। वर्षापात भूमिगत अलभूतों के पुनर्भरण का मुख्य साधन भी है। इस मात्रा का एक तिहाई भाग वाष्पीकरण में खर्च हो जाता है। लगभग 22% का निस्वंदन तथा शेष नदियों में प्रवाहित हो जाता है।

2. भूतल प्रवाह (Surface Flow)-भू-पृष्ठीय जल कई प्रकार से भूमिगत जल के पुनर्संचयन में योगदान होता है। जैसे-नदियों के समृद्ध प्रवाह द्वारा प्राकृतिक झीलों, तालावों आदि के माध्यम से होने वाले रिसाव द्वारा, कृत्रिम जल भण्डारों, बाँधों एवं नहरों से होने वाले रिसाव द्वारा तथा सिचाई से वापसी प्रवाह द्वारा इत्यादि नदियों को वर्षा के अतिरिक्त बर्फ के पिपलने से भी जल प्राप्त होता है। (b) भूमिगत जल संसाधन (Ground Water Resources) -यह भूमि के अन्दर गहराई में उपस्थित जल है जिसे भूमिगत जल कुओं, ट्यूबवैल एवं अन्य जलनिकास युक्तियों के माध्यम से

सतही जल का उपयोग एवं अति उपयोग (Uses and Overutilization of Surface Water) जल चक्र में वर्षा का जल विभिन्न स्रोतों से होता हुआ समुद्रों में एवं समुद्र से वाष्प के रूप में उड़कर वर्षा के माध्यम से पुनः जमीन में आ जाता है जिसे हम विभिन्न कार्यों में उपयोग करते हैं, इसी जल को हम पृष्ठ या सतही जल (Surface water) कहते हैं। हमारे सामान्य उपयोग का जल इसी सतही जल से प्राप्त होता है।

सतही जल के स्रोत (Sources of Surface Water) सतही जल के निम्नलिखित प्रमुख (1) नदियाँ (Rivers), (2) झील (Lakes), (3) तालाब (Ponds), (4) धारायें (Streams), स्रोत हैं (5) तालित जलाशय (Impounded reserviors), (6) कुण्डिकाएँ तथा संचित वर्षा जल (Cisterns and stored rain water), (7) बाँध (Dams)।

उपर्युक्त सभी जल स्रोतों का उपयोग सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक उपयोगों में किया जाता है। लेकिन बढ़ती हुई आबादी एवं शहरीकरण के कारण सतही जल का उपयोग अधिक मात्रा में होने लगा है, जबकि सतही जल प्रतिवर्ष वर्षा के द्वारा निश्चित मात्रा में उपलब्ध होता है। इसके अत्यधिक उपयोग से हमें पेयजल संकट का सामना निश्चित रूप से करना पड़ेगा, क्योंकि हो सकता है कि अत्यधिक उपयोग से पूरे वर्ष ही सतही जल उपलब्ध न हो। कहने का तात्पर्य यह है कि अति उपयोग ही जल संकट का एक कारण है।

इस संकट से बचने के लिए एवं जल स्रोत यथावत बने रहें और हमें उपलब्ध जल बराबर मिलता रहे, इसके लिए हमें जल प्रबन्धन की ओर प्रयास करना पड़ेगा जिससे सभी को जल पर्याप्त मात्रा में सुगमता से उपलब्ध रहे।

भौम-जल का उपयोग एवं अति उपयोग (Uses and Overutilization of Ground Water)

भूमि के अन्दर पाये जाने वाले जल को भौम-जल (ground water) कहते हैं। भौम-जल के स्रोत-भौम-जल के निम्नलिखित स्रोत हैं-

(1) झरने (Springs),

(2) अन्तःस्पन्दन गैलरी (Infiltration galaries)

(3) कुएँ (Wells),

(4) नलकूप (Tubewells) |

यह हम सभी जानते हैं कि भूमिगत जल स्रोतों से प्राप्त जल हमारे उपयोग में सीधे बिना किसी उपचार के किया जाता है, क्योंकि यह अत्यन्त स्वच्छ होता है। लेकिन यदि भूमिगत जल का भी बहुत अधिक उपयोग करेंगे तो भूजल का स्तर (water level) जमीन में बहुत नीचे चला जायेगा और फिर हम उसे आसानी से प्राप्त नहीं कर पायेंगे जैसा आसानी से पूर्व में करते थे। भूमि जल का संरक्षण बहुत ही आवश्यक है, क्योंकि सूखे की स्थिति में बहुत अधिक मददगार हो सकता है।

जल संसाधन संरक्षण (Conservation of Water Resources)

जल एक बहुमूल्य संसाधन है। भारत में यह कहीं बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है, तो कही इसकी मात्रा दुर्लभ होती है, कहीं यह विकास का कारक बनता है, तो कहीं पर विनाश का। जल की इस असमानता को दूर करने हेतु जल संसाधन के संरक्षण की आवश्यकता है। जल संरक्षण हेतु अग्रलिखित उपाय अपनाने चाहिए

1. बाँध एवं जलाशयों का निर्माण नदी के बाढ़ के प्रकोप से बचने के लिए आवश्यक स्थानों (खेतों) पर सिंचाई करने हेतु नदी मार्गों में बाँधों एवं जलाशयों का निर्माण किया जाय। इससे हमें शुद्ध पेयजल एवं औद्योगिक आवश्यकताओं एवं विद्युतशक्ति हेतु जल की प्राप्ति होगी।

2. आधुनिक सिंचाई पद्धति का प्रयोग सामान्य सिंचाई पद्धतियों से धरातल के भीतर की क्षारीयता सतह पर आ जाती है, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। इस समस्या के समाधान हेतु स्प्रिंकलर एवं ड्रिप सिंचाई पद्धति का प्रयोग किया जाना चाहिए।

3. जल शुद्धिकरण संयन्त्रों की स्थापना-जैसा कि आजकल नगरों एवं स्थापित उद्योगों द्वारा जल को अत्यधिक प्रदूषित किया जा रहा है, इस समस्या के समाधान के लिए प्रत्येक नगर एवं उद्योगों में जल शुद्धिकरण संयन्त्रों की स्थापना की गयी है ताकि प्रदूषित जल को शुद्ध कर पुनः उपयोग में लाया जा सके।

4. वृक्षारोपण-जहाँ भूमिगत जल स्तर काफी नीचे है, वहाँ वृक्षारोपण कार्यक्रम को प्राथमिकता दी जाय।

5. जल संसाधन के प्रति जागरूकता-जल संसाधन की समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता जब तक लोगों में इसके प्रति जागरूकता न हो। अतः जल संसाधन संरक्षण कार्यक्रम को जल आन्दोलन का रूप दिया जाय।

आज आवश्यकता है, स्वच्छ मीठे पेयजल को गाँव-गाँव और शहर-शहर पहुँचाने की, इस हेतु भूमिगत जल का सदुपयोग कर इस समस्या से निपटा जा सकता है। इस दिशा में दो योजनाएँ त्वरित ग्रामीण जल पूर्ति कार्यक्रम (ARWSP) तथा ‘राष्ट्रीय पेयजल अभियान’ NMDW बनायी गयी है, जो ग्रामों एवं शहरों की पेयजल समस्या के निदान के उपाय करेंगी।

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