जल विवाद क्या है ? भारतवर्ष की नदियों से सम्बन्धित कुछ प्रमुख जल विवादों का वर्णन कीजिए।

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जल विवाद (Water Dispute)

•जल विवाद एक ऐसी दशा है जिसमें पानी के उपयोग को लेकर दो या दो से अधिक राष्ट्रों, प्रान्तों या समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की स्थितियाँ बन जाती हैं।

भारत नदियों का देश है। गंगा, यमुना, सिन्धु, झेलम, व्यास, ब्रह्मपुत्र, चम्बल, केन, बेतवा, नर्मदा, महानदी, सोन, ताप्ती, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा जैसी अनेक नदियाँ इसकी पहचान है। उक्त सूची में दर्ज कुछ नदियाँ अन्तर्राज्यीय हैं तो कुछ अपने ही प्रदेश के आँगन में अपनी यात्रा पूरी कर लेती हैं। कुछ नदियों में पानी की विपुल मात्रा प्रवाहित होती है तो कुछ कम पानी पर सन्तोष करती है। सिन्धु और ब्रह्मपुत्र का अस्तित्व भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी है। उनके पानी के बँटवारे को लेकर अन्तर्राष्ट्रीय समझौते तथा कतिपय समस्याएँ हैं।

भारत की जलवायु दक्षिण में उष्णकटिबन्धीय है और हिमालयी क्षेत्रों में अधिक ऊँचाई के कारण अल्पाइन (ध्रुवीय जैसी), एक ओर यह पूर्वोत्तर भारत में उष्ण कटिबन्धीय नम प्रकार की है तो पश्चिमी भागों में शुष्क प्रकार की। इसी कारण से इसके कुछ भाग में बरसात अच्छी होती है तो वहीं दूसरे भाग में सूखे का प्रकोप रहता है। इसी कारण की वजह से भारत में राज्यों के बीच अन्तराज्यीय नदियों के पानी के बँटवारे का मामला, अपने आप ही प्रभावित आबादी की पानी की मूलभूत जरूरतों, खेती और आजीविका से जुड़ा मामला बन जाता है।

भारतवर्ष के प्रमुख अन्तर्राज्यीय जल विवाद (India’s Major International Water Dispute)

जल संसाधन मंत्रालय (भारत सरकार) की रिपोर्ट के अनुसार प्रमुख अन्तराज्यीय जल विवादों पर चर्चा आगे की गई है

1. गोदावरी जल विवाद सम्बन्धित राज्य-आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र संविधान की तिथि-अप्रैल, 1969)

वर्तमान स्थिति- इस विवाद पर अभिकरण का अन्तिम निर्णय जुलाई, 1980 में हुआ था। गोदावरी प्रायद्वीप भारत की सबसे बड़ी नदी है। इसका उद्गम नासिक जिले से होता है तथा इसकी लम्बाई 1465 किलोमीटर है। गोदावरी का अपवाह क्षेत्र 3, 12,812 वर्ग किमी है। गोदावरी का बेसिन क्षेत्र महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा व आन्ध्र प्रदेश में फैला हुआ है। इन राज्यों के मध्य इस नदी के जल के बँटवारे को लेकर विवाद था। गोदावरी जल विवाद को सुलझाने के लिए सरकार ने अप्रैल, 1969 में न्यायमूर्ति बछावत की अध्यक्षता में एक न्यायाधिकरण का गठन किया। जब न्यायाधिकरण द्वारा गोदावरी जल विवाद के निपटारे के लिए कार्यवाही चल रही थी उसी दौरान 1975 में सम्बन्धित राज्यों के बीच 1978-79 में कई सिंचाई परियोजनाओं के संबंध में द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय समझौते हुए। न्यायाधिकरण ने इस सभी समझौतों को संज्ञान में लेते हुए जुलाई, 1980 में अपना अन्तिम फैसला सुनाया। अन्तर्राज्यीय समझौतों के तहत् सम्बन्धित राज्य गोदावरी और उसकी सहायक नदियों के जल का इस्तेमाल करने के लिए स्वतन्त्र है, जबकि आन्ध्र प्रदेश बैठक के बाद इसके जल का इस्तेमाल कर सकता है।

2. कृष्णा नदी जल विवाद

सम्बन्धित राज्य-आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र

संविधान की तिथि-अप्रैल, 1969

वर्तमान स्थिति- इस विवाद पर अभिकरण का अन्तिम निर्णय मई, 1976 में हुआ था। कृष्णा नदी का पानी आन्ध्र प्रदेश एवं कर्नाटक के बीच कृष्णा नदी जल विवाद का एक कारण है। यह नदी महाबलेश्वर से निकलकर महाराष्ट्र के सतारा व सांगली जिलों से होकर कर्नाटक व दक्षिणी आन्ध्र प्रदेश में बहती है। कृष्णा नदी कर्नाटक के 60 प्रतिशत क्षेत्रों को नम करते हुए लगभग तीस लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचित करती है।

इस नदी के विवाद को निपटाने के लिए 1969 में बछावत न्यायाधिकरण का गठन हुआ, जिसने 1976 में अपना निर्णय दिया निर्णय में कर्नाटक को 700 अरब क्यूसेक, आन्ध्र प्रदेश को 800 अरब क्यूसेक व महाराष्ट्र को 560 अरब क्यूसेक पानी के उपयोग की छूट दी गयी। इस मामले में कई निर्णयों के बाद भी कृष्णा नदी जल विवाद का अंत नहीं हुआ। इस जल विवाद को लेकर अगली सुनवाई वर्ष 2050 के बाद किया जाएगा।

3. कृष्णा नदी जल विवाद II

सम्बन्धित राज्य-कर्नाटक, तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश और महाराष्ट्र

संविधान की तिथि-अप्रैल, 2004

वर्तमान स्थिति इस विवाद पर अभिकरण का निर्णय और रिपोर्ट 30 दिसम्बर, 2010 तैयार की गयी थी और 16.9.2011 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, अगले आदेश तक, राज्यों और केन्द्र सरकार द्वारा दायर संदर्भों पर ट्रिब्यूनल द्वारा किए गए निर्णय को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया जाएगा। फिल्हाल मामला विचाराधीन है। 3. नर्मदा नदी जल विवाद सम्बन्धित राज्य-मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र संविधान की तिथि-अक्टूबर, 1969 वर्तमान स्थिति-इस विवाद पर अभिकरण का अन्तिम निर्णय दिसम्बर, 1979 में हुआ

4. कावेरी जल विवाद

सम्बन्धित राज्य-केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और पुडुचेरी

संविधान की तिथि-जून, 1990.

वर्तमान स्थिति- इस विवाद पर अभिकरण का निर्णय और रिपोर्ट जून, 1990 तैयार की गयी थी। लेकिन विशेष छुट्टी याचिका (एसएलपी) दायर करने की वजह से अभी विचाराधीन है।

कावेरी नदी जल विवाद

कावेरी जल कर्नाटक से निकलकर तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के रास्ते कई क्षेत्रों से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस नदी का बेसिन तमिलनाडु में 48,730 वर्ग किलोमीटर है, जबकि यह कर्नाटक में 48,730 और केरल में 2,930 वर्ग किलोमीटर है। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी के बँटवारे का मामला लगभग 124 साल

पुराना मामला है। इस विवाद को मानसून की बेरुखी हवा देती है। सन् 1995 और सन् 2002 में मानसून ने धोखा दिया। मानसून की बेरुखी हालात खराब किये। सन् 2003 से 2006 तक के सालों में तमिलनाडु और कर्नाटक में मानसून की बरसात सामान्य हुई। पानी का बँटवारा, मुद्दा नहीं बना। कावेरी जल विवाद आजादी से भी पहले से चला आ रहा है। 1892 में पहली बार मैसूर राज्य और

मद्रास प्रेसिडेंसी यानि तमिलनाडु के बीच जल बँटवारे को लेकर समझौते हुए। कावेरी को लेकर 1924 में भी एक समझौता हुआ। भारत की आजादी के बाद मैसूर को कर्नाटक में शामिल कर दिया गया था। 1892 और 1924 के समझौते से कर्नाटक को ऐसा लगता था कि मद्रास प्रेसिडेंसी पर अंग्रेजों का प्रभाव अधिक था, इसलिए समझौता मद्रास के पक्ष में किया गया। इसके बाद से ही विवाद शुरू हुआ था। भारत सरकार ने 1972 में एक कमेटी बनाई। इस कमेटी की रिपोर्ट और विशेषज्ञों की सिफारिशों के बाद अगस्त 1976 में कावेरी जल विवाद को लेकर सभी चार राज्यों (कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी) के बीच एक

भारत सरकार ने 1972 में एक कमेटी बनाई। इस कमेटी की रिपोर्ट और विशेषज्ञों की सिफारिशों के बाद अगस्त 1976 में कावेरी जल विवाद को लेकर सभी चार राज्यों (कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी) के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते की घोषणा संसद में भी की गई। लेकिन इस समझौते का पालन नहीं हुआ और ये विवाद जारी रहा जो आज भी दोनों राज्यों के बीच जारी है।

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